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Friday, March 20, 2015

दुर्गा सप्तसती के गुह्यतम और तीक्ष्ण विधान





सर्व मंगल-मांगल्यै,   शिवे सर्वार्थ साधिके |

शरण्यै त्रयम्बिके गौरी नारायणी नमोस्तुते ||


 चैत्र नवरात्री की बड़ी महत्ता है चैत्र शुक्ल पक्ष से प्रारम्भ होने वाली इस नव रात्रि का प्रथम इस दिन से नए वर्ष की शुरुआत होती  है, द्वितीय- संवत्सर का प्रारम्भ भी इसी तिथि से होता है, तृतीय- यह नवरात्री सकाम्य नवरात्री कहलती है | अर्थात समस्त प्रकार की कामनाओं को पूर्ण करने वाले शुभ दिवस हैं ये |

    नवरात्री पूजन , या साधना के अनेक विधान हैं जो जिस भी तरीके से माँ को मना सकता है, मनाता है | किन्तु इस बार हम इस नवरात्र विशेस साधना करेंगे , इन नौ दिनों में भगवती के तीन विविध मन्त्र की साधना, जो प्रत्येक व्यक्ति को जीवन मे एक उच्च आयाम तक पहुंचा सकती है, यदि वह सच में पूर्ण मन कर्म और वचन यानी संकल्प के साथ संपन्न कर लेता है तो निश्चित ही प्रत्येक क्षेत्र में सफल होगा ही ये अकाट्य सत्य है और मेरा अनुभूत भी |

     दुर्गा सप्तसती एक तांत्रिक ग्रन्थ है ये तो सभी जानते हैं किन्तु प्रयोग विधान कम ही लोग कर पाते हैं और जो कर लेते हैं तो उनके लिए कुछ भी कठिन नहीं | दुर्गा सप्तसती में माँ आद्याशक्ति के भिन्न रूपों की साधना है ये,

१-    प्रबल-आकर्षण हेतु महामाया प्रयोग—जो की प्रत्येक व्यक्ति को चाहिए ही ताकि वह अपने कार्यों में सामाजिक जीवन हो या अध्यात्मिक जीवन व्यक्ति के व्यक्तित्व में आकर्षण होगा तो सफलता मिलना निश्चित हि है और इस प्रयोग को नवरात्रि के पहले तीन दिवस करना है |

२-    आत्म विश्वास हेतु महा सरस्वती प्रयोग- आकर्षण तो है किन्तु अपनी बात कहने या कार्य करने में आत्म विश्वास नहीं तो क्या लाभ, अतः उसका दूसरा सोपान आत्मशक्ति जागरण का है , अतः मध्य के तीन दिवस इस प्रयोग को करना होगा |

३-    धनधान्य पुत्र पौत्र सुख सौभाग्य हेतु श्री दुर्गा प्रयोग- अब अपने प्रबल आकर्षण और आत्मविश्वास से आप अपना व्यापार या सुख सम्रद्धि पा भी लेते हो किन्तु उसे भोगने हेतु परिवार नहीं पुत्र-पौत्र नहीं तो भी कोई लाभ नहीं अतः इस हेतु अंतिम तीन दिवस इस प्रयोग को करना से पूर्णता प्राप्त होती ही है |

विधि व सामग्री-
             वैसे तो इन दिनों सभी के पास सभी पूजा सामग्री प्राप्य होती है किन्तु फिर भी माँ अम्बे का एक सुन्दर चित्र, पीले आसन पीले वस्त्र प्रथम तीन दिवस, मध्य के तीन दिनों में, श्वेत वस्त्र और आसन, अंतिम तीन दिवस में लाल वस्त्र और लाल आसन, दिशा पूर्व या उत्तर दिशा चेंज नहीं करनी है बस मन्त्र और प्रयोगानुसार वस्त्र और आसन हि बदलने हैं, घी का दीपक जो नौ दिन अखंड जलेगा, कलशा की स्थापना और नव गृह की स्थापना अनिवार्य है, दाहिने ओर गणेश, और बायें ओर भैरव स्थापना करना है | प्रतिदिन प्रातः माँ का पूजन अबीर गुलाल कुमकुम चन्दन पुष्प धुप दीप और नेवैद्ध से करना है नेवैद्ध में खीर या हलुवे का भोग , यदि संभव हो सके तो  प्रति दिन एक कन्या का पूजन कर भोजन करवाएं या दसवे दिन तीन पांच या नौ कन्याओं को एक साथ |

   चूँकि ये साधना रात्रि कालीन है अतः दसवें दिन ही हवन और पूर्णाहुति सभव है, दूसरी बात प्रत्येक तीन के बाद चतुर्थ दिन प्रातः उस प्रयोग के मंत्रो का हवन करना है फिर रात से दूसरा प्रयोग शुरू होगा |

पूर्ण नियम संयम ब्रह्मचर्य, भूमि सयन, प्रति दिन प्रातः के पूजन में यदि कवच, अर्गला और रात्रिसूक्त का पाठ और कुंजिका स्त्रोत किया जाए तो अति उत्तम |
   
प्रबक आकर्षण हेतु महामाया प्रयोग—
पीले वस्त्र पीला आसन, जप संख्या-पांच माला हल्दी माला से |  हवन हेतु १५० बार |
ध्यान मन्त्र –
ॐ खड्गंचक्रगदेषुचापपरिद्याञ्छूलं भुशुण्डीं शिरः,
शङखं संदधतिं करैस्त्रिनयनां सर्वाङगभूषावृताम |
नीलाश्मद्युतिमास्यपाददशकां सेवे महाकालिकां,
यामस्तौत्स्वपिते हरौ कमलो हन्तु मधुं कैटभं ||

Aum khadgamchakrgadeshuchaapparidyaanchulam bhushundi shirah,
Shankham sandadhatim karaistrinayanaa sarvaangbhooshaavritaam  |
Neelaashmdyutimaasypaadadashakaam seve mahaakaalikaam,
Yaamastoutsvapite harou kamalo hantu madhum kaitabham ||

मन्त्र—
ॐ महामाया हरेश्चैषा तया संमोह्यते जगत्,
ग्यानिनामपि चेतांसि देवि भगवती हि सा |
बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति ||

Aum  mahaamaayaa  hareshchaishaa  tayaa  samohyate  jagat,
Gyaaninaamapi  chetaansi  devi  bhagavati  hi  saa |
Balaadaakrishy  mohaay  mahaamaayaa  prayacchati ||

२- आत्मविश्वास हेतु महा सरस्वती प्रयोग-
सफ़ेद वस्त्र सफ़ेद आसन, जप संख्या पांच माला, स्फटिक माला से | हवन हेतु १५० मन्त्र जप से |

ध्यान मन्त्र—
ॐ घंटाशूलहलानि शंख्मुसले चक्रम धनुः सायकं,
हस्ताब्जैर्दधतीं घनान्तविलसच्छीतांशुतुल्यप्रभाम् |
गौरीदेहसमुद्धवामं त्रिजगतामाधारभूतां महापूर्वामत्र
सरस्वतीमनुभजे शुंभादिदैत्यार्दिनीम् ||

Aum  ghantaashoolhalaani  shankhmusale  chakram  dhanuh  saayakam,
Hastaabjairdadhateem  ghanaantvilasachcheetaanshutulyprabhaam |
Gauridehsamuddhavaamam  trijagataamaadhaarabootaam  mahaapoorvaamatra
Saraswatuimanubhaje  shumbhaadidaityaardineem ||

मन्त्र—
यो मां जयति संग्रामे, यो मे दर्पं व्यपोहति |
यो मे प्रतिबलो लोके स मे भर्ता भविष्यता  ||

Yo  maam  jayati  sangraame,  yo me darpam  vypohati |
Yo  me  pratibalo loke  sa me bhartaa  bhavishytaa ||

३-धन धन्य एवं पुत्र-पौत्र हेतु श्री दुर्गा प्रयोग-
लाल आसन, लाल वस्त्र, जप संख्या पांच माला मूंगा माला से | हवन हेतु १५० मन्त्र से—

ध्यान-
ॐ विद्युत्दामसमप्रभामं मृगपतिस्कंधस्थितां भीषणां,
कन्याभिः करवालखेटविलासद्धस्ताभीरासेवितां |
हस्तैश्चक्रगदासिखेटविशिखांश्चापं गुणं तर्जनीं,
बिभ्राणा-मनलात्मिकां शशिधरां दुर्गां त्रिनेत्रां भजे ||

Aum  vidyutdaamasamaprabhaam   mrigapatiskandhsthitaam   bheeshanaam,
Kanyaabhih  karavaalakhetvilaasaddhastaabheeraasevitaam |
Hastaishchakragadaasikhetvishikhaamshchaapam  gunam  tarjaneem,
Bibhraanaa-manalaatmikaam  shashidharaam  durgaam  trinetraam  bhaje ||

मन्त्र-

सर्वाबाधाविनिर्मुक्तो धनधान्यसुतान्वितः |
मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशयः ||

Sarvaabaadhaavinirmukto dhandhaanysutaanvitah |
Manushyo matprasaaden bhavishyati na sanshayah

इस तरह इस साधना की पूर्णाहुति होती है किन्तु इन तीनों मन्त्रों को एक माह तक याने ३० दिनों तक निराब्तर ११ या २१ बार करें |


स्नेही स्वजन !
 साधना से जीवन पथ आसान होता है और व्यक्तित्व मुखर होता है व उच्चता प्राप्त होती है अतः साधक बनें व अध्यात्म की उचाईयों तक पहुंचे यही सदगुरुदेव से आप सब के लिए निवेदन है|

निखिल प्रणाम

रजनी निखिल

***NPRU***

Thursday, March 19, 2015

त्वरिता शक्ति साधना


त्वरिता शक्ति साधना


या श्री: स्वयम स्वकृतिनां भवनेष्वलक्ष्मी:
पापात्मनां कृतधियां हृद्येशु बुद्धि: |
श्रृद्धा शतां कुलजन प्रभवस्य लज्जा,
ता त्वां नतास्म परिपालय देवि विश्वं ||

जो महा शक्ति पुण्यात्माओं के गृह में लक्ष्मी स्वरुप में, पापियों के घर में दरिद्रता रूप में, सत्पुरुषों में श्रृद्धा रूप में, शुद्ध:अंतःकरण वाले ह्रदय में बुद्धि रूप में तथा कुलीन मनुष्य में लज्जा रूप में निवास करती है . हे देवि ! आप समस्त विश्व का कल्याण करें, पोषण करें |

    माँ आदि शक्ति के अनेक स्वरुप हैं, जिनके माध्यम से भक्तों का कल्याण करते हुए इस चराचर जगत में सदैव विचरण करती रहती है, माँ आद्धा शक्ति मनुष्य ही नहीं अपितु शिव की की भी शक्ति हैं शिव भी शक्ति के बगैर शव समान हैं, ये सर्व विदित हैं, जिनके बिना ब्रह्मा श्रष्टि का निर्माण करने में असमर्थ हैं तो विष्णु पालन करने में | उस आदि शक्ति का ध्यान न करने वाला या साधना न करने वाला व्यक्ति सिर्फ और सिर्फ दुर्भाग्य शाली ही माना जायेगा. जो जगत्जननी अपने विभिन्न रूपों में मानव का कल्याण करती है जिनके एक एक स्वरुप की माया अति निराली है उस जो अति शीघ्र प्रसन्न होने वाली है उसी जगदम्बा के पर्व वर्ष में चार बार नवरात्रि के रूप में आते हैं जिनके माध्यम से अपनी उर्जा को संचार कर जगत का कल्याण करती है, क्योंकि इस वक्त माँ की उर्जा, माँ की कृपा, चहुँ ओर पूर्ण शांति, पुष्टि, तुष्टि और क्रियात्मक रूप में बरसती है| 

उसी माँ भगवती का आशीर्वाद प्राप्त और वरदान प्राप्त करना प्रत्येक साधक का न केवल कर्तव्य अपितु अधिकार भी है क्योंकि माँ के स्नेह पर तो सभी बच्चों का समान अधिकार है | हैं न ------ :J


भाइयो बहनों !

ये पर्व शक्ति का का पर्व है , और शक्ति और सिद्धि का सम्बन्ध चोली-दामन का है शक्ति के बिना सिद्धि नहीं और सिद्धि सिर्फ और साधना के द्वारा ही प्राप्त हो सकता है |   साधना और शक्ति सिद्धि एक महान प्रक्रिया है अपने बल और बुद्धि को पहचान कर जीवन दिशा निर्धारित करने की | ये पर्व है – शक्ति तत्व को जागृत कर सिद्धि प्राप्त कर दुखो को, अभावों को कष्टों को संकटों को दूर कर सुखों को प्राप्त करने का |
परन्तु प्रश्न ये आता है कि सब साधना नहीं कर सकते, कुछ का मानना है कि दीक्षा प्राप्त नहीं है कुछ मानना है कि विधि विधान नहीं मालूम , कुछ का मानना है कि कभी की नहीं अतः सफलता मिलने के चांस कम है, किसी को अप्सरा, किसी को यक्षिणी, किसी को भूत प्रेत अथवा अन्य कोई प्रत्यक्षीकरण साधना करना चाहता है किन्तु सफलता प्राप्त नहीं हो पा रही है |

  तो भाइयों बहनों क्यों न सबसे पहले हम इन समस्यायों के निवारणार्थ ही कोई उपाय करें ? सदगुरुदेव ने इसके उपाय हेतु, यानी सफलता प्राप्ति हेतु और वो भी तत्काल सफलता प्राप्ति हेतु त्वरित फल देने वाली त्वरिता साधना बताई है जिसे कर साधक किसी भी साधना में अति शीघ्र सफलता प्राप्त कर लेता है |

       त्वरिता शक्ति साधना में देवि का ध्यान प्रिया रूप में हि किया जाना चाहिए अर्थात इस साधना को भी अप्सरा-यक्षिणी की तरह ही प्रेमिका रूप में ही सिद्ध किया जा सकता है दूसरी बात इसमें भी त्वरिता शक्ति के प्रत्यक्षीकरण की सम्भावना है अतः पूर्ण पौरुषता और निडरता के साथ करना चाहिए, इसका मतलब ये नहीं है कि इसे स्त्रियाँ नहीं कर सकती , जिस प्रकार पुरुष इस साधना को प्रेमिका रूप में सिद्ध करे वहीँ स्त्रियाँ सखी रूप में | और सदगुरुदेव ने तो ये तक बताया है कि अप्सरा-यक्षिणी या इस तरह की कोई भी साधना स्त्रियाँ अति शीघ्र और सरलता से कर सकती हैं----- J



साधना के लिए लिए प्रमुख सामग्री---

चार मयूर पंख, एक ताम्बे का सर्प, केशर, गुलाब या चमेली के पुष्प, इसी तरह गुलाब या चमेली का इत्र, पीला वस्त्र, बाजोट सुगंधित अगरबत्ती जो पूरे साधना काल में जलती रहे स्फटिक माला | पीले वस्त्र पीला आसन, उत्तर या पश्चिम दिशा साधना का समय रात्री १० से ११ के बीच साधना प्रारम्भ हो जनि चाहिए |

 जिनके पास अप्सरा यक्षिणी यंत्र हो तो स्थापित अवश्य करें या कहीं से त्वरित यंत्र प्राप्त हो जाए तो अति उत्तम , एक विशेस बात याद रखिये यंत्र के आभाव में साधना नहीं हो सकती ऐंसा नहीं है, साधना हेतु दृढ़ संकल्प और श्रद्धा  और आत्म विश्वास की आवश्यकता होती है जब तक आप में इन चीजों का आभाव रहेगा तब सफलता अनिश्चित ही रहेगी, अतः इनका तीनों तत्वों को अपने अन्दर जागृत करिए और काम पर चलिए, मतलब साधना करिए ..... J

वैसे तो इस साधना को शुक्रवार से प्रारम्भ कर शुक्रवार को समाप्त करने का विधान है किन्तु, चैत्र नवरात्री के पूर्व की अमावस्या यदि मिल जाये तो अति उत्तम, और एक दिन करना होगा, अन्यथा आठ दिन, या नवरात्री में या किसी भी शुक्ल पक्ष की पंचमी से करें |

स्नान कर पीले वस्त्र धारण करे व पीले आसन पर बैठ कर सामने बजोट पर पीला वस्त्र बिछाकर यंत्र या ताम्बे का नाग स्थापित करें कमरे में चारों दिशाओं में मोर पंख लगा दें, तथा संकल्प लेकर स्वयं को इत्र का टीका लगायें व टिल के तेल का दीपक लगायें कमरे में साधना काल में सुगंधित धुप या अगरबत्ती जलती रहे .|
 नाग की और यंत्र की केशर और सुगंधित पुष्प से पूजन करें तथा इत्र लगायें और उसी को अपने शारीर पर भी लगा लेवें |

अब निम्न मन्त्र की ११ माला स्फटिक माला से संपन्न करें—

 || ॐ ह्रीं हुं खेचछे क्षः स्त्रीं हूं क्षे ह्रीं फट् ||

“OM  HREEM  HUM  KHECHCHHE   KSHAH  STREEM  HOOM KSHE  HREEM  FATT” |

 यदि ये साधना अमावश्य को की जाती है तो एक माह तक प्रति दिन एक माला एक माह तक अवश्य करनी चाहिए, और यदि बाद में तो आठ दिन करने के बाद भी एक माह तक एक माला करनी चाहिये |

इस साधना के बाद दुसरे दिन से नवरात्री है ही अतः फिर आप किसी और साधना का भी संकल्प लेकर साधना कर सकते है------

निखिल प्रणाम

रजनी निखिल

***NPRU***

Friday, March 6, 2015

धनदा रतिप्रिया यक्षिणी प्रयोग (भाग २)




अहम् चिन्त्यं मनः चिन्त्यं प्राणा चिन्त्यं गुरौश्वर |
सर्व सिद्धि प्रदातव्यंतस्मै श्री गुरुवे नमः ||

हे इश्वर सिर्फ आपसे एक प्रार्थनाहै कि सदैव मेरा शरीर और जीवन सदैव गुरुदेव का ही स्मरण करता रहे, मेरा मन प्रत्येक क्षण गुरु चरणों में लीन रहे, मेरे प्राण गुरु स्वरुप इश्वर में अनुरक्त रहें, ब्रह्माण्ड में केवल गुरु ही है जो मुझे समस्त प्रकार कि सिद्धियाँ प्रदान कर सकतें हैं | अतः ऐसे सदगुरुदेव को शत् शत् नमन है |

  स्नेही स्वजन,
     होली कि शुभकामनाओं के साथ जय सदगुरुदेव

 उम्मीद ही नहीं पूर्ण विश्वास है के आपने होली पूर्णिमा का साधनात्मक लाभ उठाया होगा और सदगुरुदेव से यही प्रार्थना है कि आप सबको पूर्ण सफलता प्रदान करें |
 जिन साधकों ने कल इस साधना को एक हि दिन में पूर्ण किया है उनके लिए आगे के तीन महत्वपूर्ण प्रयोग दिए जा रहे हैं, जिनसे इस साधना को पूर्णता प्राप्त होगी |


चूंकि रुद्रयामल तंत्र में वर्णित है कि धनदा रतिप्रिया यक्षिणी के साथ यदि काम देव का पूजन किया जाये (जो कि आप सबने किया ही है) तो देवि अत्यंत प्रसन्न होती हैं व साधक के सांसारिक जीवन के सभी मनोरथों को पूर्ण करती है | चाहे वो कन्याओं द्वारा श्रेष्ट पति कि प्राप्ति हेतु हुए हो या किसी भी रोगी के द्वारा शारीरिक दोषों और दुर्बलताओं का नाश करने हेतु हो | कामदेव ओर रतिप्रिया यक्षिणी के समिल्लित पूजन से साधक स्वयं कामदेव के सामान सौन्दर्य व पूर्णता भी प्राप्त कर सकता है |

 लक्ष्मी तंत्र कि सर्वोत्तम साधना मानी जाती है | भाइयों बहनों हम यदि प्राचीन ग्रंथों में भारत कि वैभवता व श्रेष्टता के बारे में पढ़ते हैं तो आश्चर्य लगता है लेकिन यह पूर्ण सत्य है ओर इसका कारण यह है कि उस समय लोगों के द्वारा किया जाने वाला आचार विचार और साधनाओं के प्रति पूर्ण आस्था, तांत्रिक ज्ञान की पूर्ण प्रमाणिक जानकारी की प्रमुखता | जैसे जैसे धर्म अर्थात प्राचीन विद्याओं को लोग भूलते चले गए वैसे वैसे दरिद्रता का आगमन होता चला गया |

 अतः आवश्यकता है इस विशेष ज्ञान को पूर्ण प्रमाणिकता के साथ समझे, परखें, स्वयं प्रत्यक्ष क्रियाओं को संपन्न करें और अपने जीवन को समृद्ध, सुसंपन्न व वैभवशाली बनायें |

 इसी क्रम में इस साधना के तीन प्रमुख प्रयोग-

·        ऋण मोचन प्रयोग
·        आकास्मिक धन प्राप्ति हेतु
·        व्यापार एवं कार्य वृद्धि हेतु

 इस साधना को संपन्न करने के बाद साधक को आवश्यकतानुसार प्रयोग संपन्न करना चाहिए

1.     ऋण मोचन हेतु
||ॐ ह्रीं श्रीं मां देहि धनदे रतिप्रिये स्वहा ||
           Aum hreem shreem maam dehi dhanade ratipriye swaha

2.     आकस्मिक धन प्राप्ति हेतु
||ॐ ह्रीं ॐ माम ऋणस्य मोचय मोचय स्वाहा ||

Aum hreem aum maam rinasy mochay mochay swaha


3.     व्यापार एवं कार्य वृद्धि हेतु
|| ॐ धं श्री ह्रीं रतिप्रिये स्वाहा ||

Aum dham shreem hreem ratipriye swaha

इन प्रयोगों को संपन्न करने के लिए जो नियम मूल साधना के हैं उन्ही को संपन्न करना चाहिए तथा मूल मन्त्र की एक माला करने के बाद सम्बंधित मन्त्र की १०१ माला एक दिन में ही सपन्न करके प्रयोग पूर्ण करें | सदगुरुदेव से यही प्रार्थना है कि आप सभी साधना संपन्न बनें और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पूर्ण सफलता प्राप्त करें |

निखिल प्रणाम

रजनी निखिल


***NPRU***  

Thursday, March 5, 2015

होली का यक्षिणी प्रयोग

         {तंत्रस्य जीवनं धर्म, तन्त्रं ही परिपूर्णता}




स्नेही स्वजन !

           होली की शुभकामनाओं के साथ********

तंत्र, तो जीवन का आधार है, हम तंत्र में ही जीते हैं, ये अलग बात है कि मन्त्र बद्ध न होकर क्रिया बद्ध होकर जीते हैं, किन्तु यही क्रिया शीलता मान्त्रिक होजये तो तंत्र का मूल स्वरुप सामने आ जाता है, भाइयो बहनों ! मेरे विचार में आज के समय में तंत्र की व्याख्या समझाने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि आप सभी बहुत कुछ पढ़ चुके हैं और समझ चुके हैं किन्तु तंत्र तो महा विज्ञान है जिसमें हजारों सिद्धांत है . अब ये तो जीवन की व्यवस्था है जिसमें अभ्यास और व्यवहारिक ज्ञान का समावेश है |

          बस इतना समझना ही काफी है कि तंत्र के माध्यम से सम्पूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त ईश्वरीय शक्ति को आकर्षित कर अपने अनुकूल कर सिद्धि प्राप्त की जा सकती है |

   तंत्र साधक अपने अन्दर उस सिद्ध शक्ति को चुम्बकीय प्रभावशाली और तीव्र उर्जायुक्त बनाता है | ये विज्ञान मानव शरीर के सूक्ष्म शरीर में स्तिथ चक्र और यौगिक ग्रंथियों को जागृत कर शक्तिशाली बनाता है, तंत्र के माध्यम से आम्नव अपने अन्दर की बंधन से मुक्त होकर अपनी शक्तियों का विस्तार कर सकता है , शरीर में रहते हुए भी शरीर से मुक्त होकर अपने आपको विस्तार दे सकता है, इसी क्रम में ब्रम्हांड में स्तिथ अनेक शक्तियां यक्ष, किन्नर, गन्धर्व, एवं अन्य भूत प्रेत प्रकार की योनी को भी अपने अनुकूल बनाकर अपने जीवन को सहजता प्रदान कर सकता है....

 चूँकि होली महानिषा के श्रेणी में आती है अतः तंत्र का विशिष्ट दिवस कहलाता है सभी तंत्र साधक इस दिन का बड़ी बेसब्री से इंतज़ार करते हैं , तो इस बार हम पूर्णिमा से पूरे पांच दिन अलग-अलग साधनाएं सम्पन्न कर अपनी पूर्णता की ओर अग्रसर होंगे |

      मै जानती हूँ कि आप सब अपनी पसंद की साधना करना चाहते हैं और हमारे ब्लॉग सभी तरह का मैटर उपलब्ध है भी किन्तु जो सबसे आवश्यक और और महती आवश्यकता हो आप उसे पहले करिए, और जीवन में सभी मूल भूत आवश्यकताओं की पूर्ती हेतु धन यानि लक्ष्मी की आवश्यकता होती ही है अतः पहले इसी ओर प्रयास करना चाहिए | हैं ना J

भाईयों बहनों ! सद्गुरुदेवजी ने बताया है कि तंत्र और लक्ष्मी आपस में पूर्ण रूप से जुड़े हैं लक्ष्मी प्राप्ति हेतु जिस प्रकार क्रिया शील रहना आवश्यक है उसी अनुरूप तंत्र भी क्रियारूप है हि तंत्र में वह शक्ति है कि वह लक्ष्मी को अपने वष में कर ले | और जहाँ बात आती हो यक्षिणी कि तो लक्ष्मी का सर्वश्रेष्ठ स्वरुप है धनदा रतिप्रिया यक्षिणी | और इस स्वरुप को तंत्र साधना द्वारा जागृत किया जा सकता है |

भाइयो बहनों ! अब प्रश्न आता है कि साधना सामग्री, यानी यंत्र माला वगैरह , तो आप में से अधिकांशतः लोगों के पास तंत्र कौमुदी का अप्सरा यक्षिणी रहस्य खंड और तंत्र मण्डल यंत्र  तो है ही बाकी विधि ये है ही अब आपके ऊपर निर्भर है कि प्रत्यक्षीकरण करना है या आवश्यकतानुसार लाभ प्राप्त करना है |

दारिद्रय सन्हत्री यक्षिणी पाप खंडिनी विद्या के अंतर्गत धनदा रतिप्रिया यक्षिणी साधना साधक को संपन्न करनी चाहिए, यह देवि लक्ष्मी का सर्वोत्तम व एकमात्र स्वरुप है जिसमे तांत्रिक विधान द्वारा सिद्धि प्राप्त कि जा सकती है |

   इस साधना कि सबसे बड़ी विशेषता यह है कि लक्ष्मी के जितने भी स्वरुप होते है, उन सभी स्वरूपों का आवाहन व विशेष पूजा की जाती है, प्राण प्रतिष्ठा प्रक्रिया संपन्न की जाती है, दशों दिशाओं का कीलन किया जाता है जिससे किसी भी बाहरी बाधा से साधना में विघ्न ना पड़े और जो भी संकल्प साधक करें, उसका फल साधक को तत्काल अवश्य ही प्राप्त हो |

 प्राण प्रतिष्ठा से हि शक्तियां चैतन्य होती है | प्राण प्रतिष्ठा का विधान अत्यंत गुह्तम रहा है व इस महान तांत्रोक्त साधना में प्राण प्रतिष्ठा आवश्यक है |

 रुद्रयामल तंत्र  में स्पष्ट वर्णित है कि यदि यह तंत्र साधना पूर्ण विधि विधान से संपन्न कि जाय, तो ऐसा हो हि नहीं सकता कि देवि तत्काल आकर साधक का मनोरथों को पूर्ण ना करे |

 इस तांत्रोक्त साधना का मूल विधान तो एक ही है, परंतु आगे प्रत्येक आर्थिक समस्या के सम्बन्ध में अलग अलग मन्त्र जप है | 


सदगुरुदेव द्वारा प्रदत्त--

        तांत्रोक्त धनदा रतिप्रिया यक्षिणी साधना

     अब साधक सबसे पहले कुबेर पूजन सम्पन्न करें, अपने सामने कुबेर यंत्र स्थापित कर उसका चन्दन से पूजन कर एक माला निम्न कुबेर मन्त्र का जप करें

कुबेर मन्त्र 
                                                    
|| ॐ यक्षाय कुबेराय धनधान्याधिपतये धनधान्यसमृद्धि मे देहि दापय स्वाहा ||
तत्पश्चात् सर्वप्रथम एक थाली में “ॐ ह्रीं सर्वशक्ति कमलासनाय नमः” लिखें और उस पर पुष्प की पंखुड़ियां रखें, तत्पश्चात् इस पर धनदा रतिप्रिया यक्षिणी यंत्र,    या  अप्सरा यक्षिणी मण्डल यंत्र स्थापित कर चन्दन लेपन करें और सुगंधित पुष्प अर्पित कर संकल्प विनियोग संपन्न करें |


   विनियोग में अपने हाँथ में जल लेकर निम्न विनियोग मन्त्र पढ़ कर जल भूमी पर छोड़ दें –

 ॐ अस्य श्रीधन्देश्वरीमंत्रस्य कुबेर ऋषिः पंक्तिश्छंदः श्रीधन्देश्वरी देवता धं बीजं स्वाहा शक्तिः श्रीं कीलकं श्रीधन्देश्वरीप्रसादसिद्धये समस्तदारिद्रयनाशाय श्रीधन्देश्वरीमन्त्रजपे विनियोगः ||


प्राण प्रतिष्ठा प्रयोग –

प्राण प्रतिष्ठा के द्वारा जीव स्थापना की जाती है व साक्षात यक्षिणी का आवाहन किया जाता है, इसमें अपने चारो ओर जल छिड़के तथा निम्न मन्त्रों द्वारा आवाहन करें-

  ॐ आं ह्रीं क्रौं यं रं लं वं शं षं सं हं सः सोऽहं श्रीधन्देश्वरीयंत्रस्य प्राणा इह प्राणाः |     
  ॐ आं ह्रीं क्रौं यं रं लं वं शं षं सं हं सः सोऽहं श्रीधन्देश्वरीयंत्रस्य जीव इह स्थितः |

  ॐ आं ह्रीं क्रौं यं रं लं वं शं षं सं हं सः सोऽहं श्रीधन्देश्वरीयंत्रस्य सर्वेंद्रीयाणि इह स्थितानि |

  ॐ आं ह्रीं क्रौं यं रं लं वं शं षं सं हं सः सोऽहं श्रीधन्देश्वरीयंत्रस्य वाङमनस्त्वक्चक्षु श्रोत्रजिव्हाघ्रापाणिपादपायूप्स्थानी इहैवागत्य सुखं चिरं तिष्ठन्तु स्वाहा ||

                श्रीधान्देश्वरी इहागच्छेहतिष्ठ||

    यह प्राण प्रतिष्ठा प्रयोग साधना का सबसे महत्वपूर्ण कार्य है, यह अपनी साधना में प्राण प्रतिष्ठा में प्राण तत्व भरने कि प्रक्रिया है |

    अब धनदा यक्षिणी लक्ष्मी के ३६ स्वरूपों की पूजा कर उनका आवाहन किया जाता है, प्रत्येक स्वरुप का आवाहान कर ‘ एक तांत्रोक्त लक्ष्मी फल ‘ (लघु नारियल) “जो कि किसी भी पूजा सामग्री की दूकान में प्राप्त हो जाता है”  स्थापित करें, धनदा यक्षिणी के ३६ स्वरूपों पर चन्दन चढ़ाएं,(यंत्र पर हि चन्दन का तिलक करें), प्रत्येक तांत्रोक्त लक्ष्मी फल के आगे एक-एक दीपक जलाएं तथा पुष्प कि एक-एक पंखुड़ी रखें, आवाहन क्रम निम्न प्रकार से है-

ॐ धनदायै नम :
ॐ दुर्गायै नम :
ॐ चंचलायै नम :
ॐ मंजुघोषायै नम :
ॐ पद्मायै नम :
ॐ महामायै नम :
ॐ सुन्दर्यै नम  :
ॐ रुद्राण्यै नम :
ॐ वज्रायै नम :
ॐ कमलायै नम :
ॐ अभयदायै नम :
ॐ उमायै नम :
ॐ कामदायै नम :
ॐ महाबलायै नम :
ॐ कामप्रियायै नम :
ॐ चपलायै नम :
ॐ सर्वशक्तयै नम :
ॐ सर्वेश्वर्यै नम :
ॐ मंगलायै नम :
ॐ त्रिनेत्रायै नम :
ॐ त्वरितायै नम :
ॐ सुगन्धायै नम :
ॐ वाराह्यै नम :
ॐ ॐ कराल भैरव्यै नम :
ॐ सरस्वत्यै नम :
ॐ चामर्यै नम :
ॐ हरिप्रियायै नम :
ॐ वरदायै नम :
ॐ सुपट्टिकायै नम :
ॐ महालक्ष्म्यै नम :
ॐ क्षुधायै नम :
ॐ धनुर्धरायै नम :
ॐ गुह्याश्वर्ये नम :
ॐ लीलायै नम :
ॐ भ्रामर्यै नम :
ॐ माहेश्वर्यै नम :

  इस प्रकार पूजन कर साधक यक्षिणी का ध्यान करे, तथा यक्षिणी यन्त्र व चित्र के सामने खीर का भोग लगाये, इसके अतिरिक्त घी, मधु तथा शक्कर का भोग लगायें |
 कुछ ग्रंथों में यह भी वर्णित है कि साधक धनदा रतिप्रिया यंत्र के नीचे अपना फोटो अथवा अपना नाम अष्टगंध से कागज़ पर लिख कर रख दे |

  अब साधक धनदा रतिप्रिया यंत्र का वीर मुद्रा में बैठ कर मन्त्र जप तांत्रोक्त यक्षिणी माला से प्रारम्भ करे व मंत्रजाप सम्पूर्ण होने के पश्चात हि आसन से उठे |

मन्त्र-
|| ॐ रं श्रीं ह्रीं धं धनदे रतिप्रिये स्वाहा ||

  यह धनदा साधना का मूल मन्त्र है, १०० माला मन्त्र जप करना है, यदि आसन सिद्धा नहीं है अर्थात एक ही दिन में साधना यदि संपन्न न कर सकें तो ,
इस साधना का ११ दिन का संकल्प लें और इसे प्रतिदिन १००८ मन्त्रों का जप यानी ११ माला जप करते हुए ११ दिन में साधना संपन्न करें, इस तरह सम्पूर्ण प्रयोग कुल ११ दिन का हो जायेगा |  तो साधना करने का दृण संकल्प लें और----J


निखिल प्रणाम


***रजनी निखिल***