Wednesday, June 20, 2018

संगीत के सात स्वर और सात चक्र

जय सगुरुदेव /\
स्नेही स्वजन !
संगीत के सात स्वर और सात चक्र ---




नोट :- इस  लेख केवल वहीं काम करें  जो कला संगीत में साक्षरता प्राप्त हो अन्यथा किसी अनुभवी कलाकारों के सानिधय में रियाज या प्रेक्टिस में हैं ,अन्यथा इसके विपरीत परिणाम आ सकते हैं-----
संगीत से................ कुंडलिनी जागरण

                 प्राचीन काल से ही मनुष्यों का सबंध संगीत से जुडा रहा हैं । उस दौर में संगीत को मनुष्य ने अपने भाव को व्यक्त करने का एक उत्तम माध्यम बनाया था । प्राचीन काल में यह केवल एक मनोरंजन का स्त्रोत ही नहीं था । हमारे कई ऋषि मुनि संगीत शाश्त्र में निपूर्ण भी थे । और आज भी कई उच्च कोटि के योगीजन संगीत में पूर्ण दखल रखते है । उनको इस का ज्ञान भी है । जो भक्ती भाव में डूवे हुवे थे उन को भी संगित का रंग चढ चुका था । क्या हमने कभी सोचा था की जो हमेशा इष्ट के आनंद में रमे रहते थे । उन्हें यह बाहरी मनोरंजन के माध्यम संगीत की क्या जरुरत हैं ? कैसी कौन सी शक्ति थी की इन को भी मंत्रमुग्ध कर गयी ?
                 संगीत का मतलब आज क्या लिया जाता है ?  ये कहा नहीं जा सकता लेकिन प्राचीन काल में ये एक आध्यात्मिक माध्यम का ही हिस्सा था । संगीत के माध्यम से ही कई लोगो ने पूर्णता प्राप्त की हैं । मीराबाई या फिर नरसिंह जैसे कई उदाहरण  हमारे सामने ही हैं । तो फिर यह भेद क्यों ?
                 वास्तव में हमने संगीत को कभी समझा ही नहीं । भंवरे की गुंजन भी एक प्रकार से संगीत ही हैं । जिसे रोज सुना जाये तो आदमी धीरे धीरे विचार शून्य हो जाता हैं । सामान्य मनुष्यों को संगीत मनोरंजन का माध्यम लगता है । समय काटने का प्रबन्ध लगे लेकिन योगीजन के लिए संगीत बहुत गहरी परिभाषा लिए हुए हैं ।
                 ध्वनि की महत्ता निर्विवाद रूप से मानी जाती हैं  और एक विशेष ध्वनि कोई न कोई विशेष उर्जा प्रसारित करती ही हैं । संगीत के सप्तक या सात स्वर सा रे ग म प् ध नि आदि शब्द कोई सामान्य शब्द समूह नहीं हैं । देने को तो इन ध्वनियों को कुछ भी उच्चारण दे दिया जाता है । लेकिन सा रे ग म प ध नि का गहन अर्थ हैं । जब एक विशेष लय के साथ एक मूल ध्वनि सम्मिलित होती हे तो वह शरीर में किसी एक विशेष चक्र को स्पंदित करती हैं ।
               सभी स्वर अपने आप में तत्वों के प्रतिनिधि करये हैं । और हर सुर एक विशेष तत्व के ऊपर अपना प्रभुत्व रखता हैं । जिसमे सा- पृथ्वी, रे, ग – जल तत्व म, प – अग्नि तत्व ध- वायु और नि- आकाश तत्व का प्रतिनिधित्व करता हैं ।
               अब जिस तरह से ये सप्त सुर हैं । उसी तरह शरीर में सप्त सुरिकाए हैं । जहाँ से सुर का या ध्वनि की रचना होती हैं । यह हे सर, नासिका, मुख-कंठ, ह्रदय (फेफड़े), नाभि, पेडू और ऊसन्धि । ध्यान से देखा जाए तो ये सारी जगह शरीर के सप्त चक्रों के अत्यंत ही नजदीक हैं । अब इस तरह संगीत तंत्र में कुण्डलिनी सबंध में सप्त सुर एक एक चक्र को स्पंदित करने में सहयोगी हैं ।

सा – मूलाधार ( पृथ्वी तत्व, सुरिका- ऊसन्धि)

रे – स्वाधिष्ठान( जल तत्व , सुरिका – पेडू )

ग – मणिपुर (जल तत्व , सुरिका – नाभि )

म – अनाहत ( अग्नि तत्व, सुरिका – ह्रदय)

प – विशुद्ध ( अग्नि तत्व, सुरिका – कंठ)

ध – आज्ञा ( वायु तत्व, सुरिका – नासिका)

नि – सहस्त्रार ( आकाश तत्व, सुरिका – मस्तक)

                  इन स्वरों का, उपरोक्त स्वरिकाओ से सबंधित चक्र का ध्यान करने से चक्र जागरण की प्रक्रिया शुरू हो जाती हैं । और उस से कई विशेष अनुभव होने लगते हैं । मगर ये चक्र जागरण होता हैं । भेदन नहीं होता ।
                 इसी लिए विभ्भिन रागों की रचना हुयी हैं । जिसमे ध्वनिओ के संयोग से कोई विशेष राग निर्मित किया जाता हैं  जो की वह विशेष चक्र को भेदन कर सकता हैं ।
                जैसे मालकोष राग के माध्यम से विशुद्ध चक्र को जाग्रत किया जा सकता है । इसी प्रकार कल्याण राग के निरंतर अभ्यास से भी विशुद्ध चक्र को स्पंदन प्राप्त होता है और वो जाग्रत हो जाता है । और एक बार जब ये चक्र जाग्रत हो जाता है तो साधक वायुमंडल में व्याप्त तरंगों को महसूस कर सकता है ।  उन्हें ध्वनियों में परिवर्तित कर सकता है । पर कल्याण राग जैसा राग सांयकाल के समय ही गाना उचित होता है । अर्थात सूर्य अस्त के तुरंत उपरांत । नन्द राग के द्वारा मूलाधार चक्र जाग्रत हो जाता है, और वेदों का सही अर्थ व्यक्ति तभी समझ सकता है जब उसका मूलाधार पूरी तरह जाग्रत हो जाता है । इस राग को रात्रि के दुसरे प्रहार में गाना चाहिए । ठाट बिलाबल राग देवगिरी के प्रयोग से अनाहत चक्र की जाग्रति होती है । व्यक्ति अनहद नाद को सुनने में और उसकी शक्तियों की प्राप्ति में सक्षम हो जाता है । इसी प्रकार सभी राग किसी न किसी चक्र को स्पंदित करते ही हैं ।
                     लेकिन क्या, संगीत सिर्फ कुण्डलिनी जागरण के लिए ही हैं ? ये गहन बिचार मानसपटल में अंकुरित होना लाजमी है । पर संगीत केवल कुंडलिनी जागरण के लिये नहीं होता । संगीत की शक्ति से तानसेन ने दीपक राग का प्रयोग कर जहां दीपकों को प्रज्वलित कर दिया था वही बैजू बावरे ने संगीत के एक विशेष राग का प्रयोग कर पत्थर को पिघलाकर उसमे अपना तानपुरा दाल दिया था । और राग बंद कर दिया था । जिससे की वो तानपुरा उस पिघले हुए पत्थर में ही जम गया था । ये सब तो कुछ उदाहरण मात्र हैं । संगीत भी अपने आप में एक पूर्ण तंत्र है । ब्रम्हांड के सभी पदार्थ ५ तत्व से ही निर्मित हैं । संगीत के सप्त सुर इन ५ तत्वों का प्रतिनिधित्व भी करते हैं । संगीत से किसी विशेष सुर या राग के माध्यम से हम अपना वायु तत्व बढ़ाले और भूमि एवं जल तत्व को कम करदे तो मनुष्य अद्रश्य एवं वायुगमन सिद्धि प्राप्त कर लेता हैं । यदि साधक सही तरीके से संगीत का प्रयोग करे तो बाह्य चीजों पर भी यही प्रयोग करके उसे भी अद्रश्य कर सकता है । या फिर उसके तत्वों के साथ संयोग करके तत्वों को बदल ने पर उसका परिवर्तन भी संभव हैं । या फिर संगीत के माध्यम से हवा में ही सबंधित कोई भी वस्तु के तत्वों को संयोजित कर के उसे कुछ ही क्षणों में प्राप्त किया जा सकता हैं । वास्तव में ही संगीत मात्र मनोरंजन नहीं हैं । हमारे ऋषि मुनि अत्यंत ही उच्चकोटि के वैज्ञानिक थे मगर हमने उने कभी भी समझने की कोशिश नहीं की हैं । हमने जभी भी उनको देखा तो केवल तिरस्कार की दृष्टि से ही देखा । हम ने कभी उने और उनकी विशेषता को नही पहचाना । जिस की बहूत बडी कीमत हमे आज बर्तमान में चुकानी पढ रही है । आज उनकी आवश्यकता महसुस हो रही है ।
खेर बहरहाल अगर कोई व्यक्ति संगीत प्रेमी है और वह संगीत साधना की ओर अग्रसर होकर अपनी कुंडली पर काम करना चाहता है तो
इस पर सोच सकता है और इसे भी क्रियान्वित  कर सकता है
रजनी निखिल 
निखिल प्रणाम 
निखिल परा विज्ञान शोध इकाई 





Thursday, February 8, 2018

षट्कर्म और तंत्र प्रतीक




जय सदगुरुदेव /\ 

स्नेही स्वजन !

आवाहन....... आवाहन ........आवाहन .......

परिक्ष्याकारिणी श्रीश्चिरं तिष्ठति|

अर्थात “जो कार्य की सत्यता, असत्यता को समझकर जानकर कार्य में प्रवृत्त होता है ऐसे व्यक्ति में लक्ष्मी चिरकाल तक निवास करती है”

अधिकांशतः हम साधना या कोई अनजाने कार्य में आधी-अधूरी जानकारी के साथ प्रवृत्त हो जाते हैं जिससे साधक या व्यक्ति को सिर्फ असफलता का ही सामना करना पड़ता है | इनसे साधन की कुछ गुप्त कुंजिया होती हैं जिनका अनुसरण और प्रयोग करते हुए यदि प्रमाणिक विधान किया जाये तो सफलता के प्रतिशत बढ़ जाते हैं | हमारी कार्मिक गति के आधार पर भले ही सफलता मिलने में विलम्ब हो सकता है किन्तु परिश्रम करने पर सफलता न मिले ऐंसा हो हि नहीं सकता | साधना में देश काल वातावरण को अपने अनुकूल करने हेतु यंत्र, आसन, माला इत्यादि की आवश्यकता होती ही है इसे कोई भी नकार नहीं सकता | क्योकि यंत्र उपकरण के बिना तंत्र संभव ही नहीं है, पूर्ण विधान सामग्री के साथ कोई भी साधना सम्पन्न की जाये तो सफलता मिलनी है इसके आभाव में साधना में पूर्णता दुस्कर है अन्य साधना की तरह ही तांत्रिक षट्कर्म में यंत्र विशेस की आनिवार्यता है इसे तैयार करने की विशेष पद्धति है, और इनमें उनसे समबन्धित शक्तियों का आवाहन और स्थापन आदि कर्म संपादित  किये जाते हैं, जिससे हम अपेक्षाकृत अधिक सरल तरीके से सफलता प्राप्त कर सकते हैं

तंत्र एक विज्ञानं है और इसमें प्रत्येक यंत्र निर्माण की अलग पद्धति होती है और प्रत्येक देवता के अगम शास्त्र में तीन रूप बताये गए हैं मन्त्र रूप, यंत्र रूप और तंत्र रूप |

इन तीन रूपों के आधार देव शक्तियों से संपर्क स्थापित करना ही साधना कहलाता है और एक के आभाव दुसरे की साधना संभव नहीं है मंत्रो के स्वर में देव शक्तियों के स्वरुप और मन्त्र वर्णों के कम्पन में उन देवता की स्वरशक्ति विद्दमान होती है |

और इसे मनः शक्ति की साधना द्वारा मन्त्र और प्राण शक्ति की साधना द्वारा यंत्र की पूर्ण जाती है सामान्य रूप से तंत्र मंडलों में तीन उपमंडल होते हैं जिनमें से हर मण्डल की अलग विशेसता होती है और ये शक्ति के तीन विभिन्न रूपों का प्रतिनिधत्व भी करते हैं |

इन तीनों मंडलों में से एक मण्डल रक्षा कार्य कार्य को सम्पादित करता है और उर्जा को सतत बांये रखता है | ये शिव तत्व से सम्बंधित होते हैं |

एक मण्डल क्रिया को गति देता है और विस्तारित करता है और अभीष्ट शक्ति के आवाहन में सहायक होता है तथा ये विद्या तत्व का प्रतिनिधित्व करता है एक अन्य मण्डल साधक की मनोवांछित साधना और उससे सम्बंधित देव शक्ति की न सिर्फ कृपा प्राप्त करवाने में सहता देता है अपितु मन्त्र शक्ति के विखंडित अणुओं को संलयित और संगठित होने के लिए उसके अनुरूप वातावरण का निर्माण भी करता है और ये आत्म तत्व का प्रतिनिधित्व करता है |

इस प्रकार इन तीन मंडलों के योग से मूलमंडल का निर्माण होता है अब हम चाहे तो इनकी अलग व्यवस्था कर सकते हैं या क्रमानुसार एक ही जगह एक ही पात्र पर अंकित कर के भी प्रयोग में ला सकते हैं जैसे हमारा ये ‘गुरुसायुज्य तंत्र कर्म सिद्धि मण्डल यंत्र’ , इसमें ९ यंत्र को समावेश होता है |
महामृत्युंजय यंत्र – जो कि किसी भी प्रकार की विपत्ति संकट या किसी भी प्रकार की क्रिया का दुष्परिणाम को निर्मूल कर सुरक्षा देता है |

त्वरिता सिद्धि महायंत्र – तंत्र साधना के क्षेत्र में त्वरिता देवि की कृपा से ही साधना में त्वरित सफलता दिलाती है |

अनिष्ट निवारण यंत्र – जीवन में कभी किसी ने वैमनस्य के कारण आपके ऊपर कोई प्रयोग किया हो , या आप किसी अभिसप्त जगह से गुजरे हों या कोई देवीय प्रकोप हो या कुल देवि देव का दोष हो तो ये यंत्र इनको शांत करने के लिए शांति विधान में सहायक होता है |

षट्कर्म सिद्धि दात्री महायंत्र – षट्कर्म में पूर्ण सिद्धि हेतु ये अति आवश्यक उपकरण है ये यंत्र अब कहीं उपलब्ध नहीं है, सदगुरुदेव की कृपा से इस यंत्र की उपलब्धता हुई है ये यंत्र समस्त प्रकार की षट्कर्म की क्रियाओं को सिद्ध करने में सहायक है |

गुरु सायुज्य महायंत्र – तंत्र, मन्त्र या कोई भी साधना के मूल में गुरु ही तो हैं गुरु तत्वा की प्रधानता से ही कोई भी यंत्र या सिद्धि में सफलता प्राप्त हो सकती है गुरु तत्व सायुज्य यंत्र होने की वजह से षट्कर्म में आने वाली बाधाओं का शमन होता है और गुरु के आशीर्वाद से सिद्धि में सफलता के प्रतिशत बढ़ जाते है | इस महायंत्र में इसीलिए गुरु सायुज्य यंत्र का समावेश किया गया है |

कालदण्ड प्रतीक – किसी भी तंत्र साधना में बिना प्रतीक के साधना में सफलता की सोचना तो ऐंसा है कि रास्ता जाने बिना मार्ग पर बढ़ जाना | और बिना तंत्र प्रतीक साधना भला कैसे संभव है क्योंकि समय को भेद कर मन्त्र की इथर शक्ति को सतत साधक से सम्पर्कित कर उसके अभीष्ट को साधना ही इसका मुख्य कार्य है | ९० के दशक में सदगुरुदेव ने इन प्रतीकों से परिचय करवा कर इन्हें उपलब्ध भी करवाया था किन्तु आज ये कही भी उपलब्ध नहीं हैं और न ही किसी ने इन्हें सहेजने की कोशिश ही की | किन्तु गुरु कृपा से आज ये उपलब्ध हैं |

वशीकरण यंत्र – ये यंत्र केवल एक प्रकार के वशीकरण के लिए न होकर सदगुरुदे
व ने जितने भी वशीकरण के प्रकार बताये हैं, जैसे समूह वशीकरण, जन वशीकरण, राज्यवशीकरण, उच्च अधिकारी वशीकरण,सम्पूर्ण चराचर जगत वशीकरण | और ये आश्चर्यजनक यंत्र इन सभी क्रियाओं को पूर्ण करने वाला है |

पूर्ण शत्रु परास्त यंत्र—  -- यह यंत्र अपने आप में अनेक विधाओं को समाहित किये हुए है, क्योंकि चाहे मारण प्रयोग हो, उच्चाटन प्रयोग हो या विद्वेषण प्रयोग हो तो इस यंत्र की अनिवार्यता ही है क्योंकि इन प्रयोगों में प्राण उर्जा का अत्यधिक प्रयोग होता है और जिसे सम्हालने के लिए या उसके दुष्परिणाम को रोकने लिए इस यंत्र की अनिवार्यता होती है क्योंकि समस्त बाधाओं को दूर कर ये सफलता को निश्चित कर देता है |

स्वर्ण सिद्धि यंत्र – इस महा यंत्र की उपयोगिता स्वर्ण निर्माण में प्रयासरत लोगो को ज्यादा मालूम है और इसे पाना उनके लिए देव दुर्लभ स्वप्न के सामान ही है अतः इस यंत्र का महत्व अपने आप में अति विशिष्ट है |

इस प्रकार विशेष क्रमों से इस मण्डल में उपमंडल की स्थापना और प्राणप्रतिष्ठा, अभिषेक, चैतन्यीकरण, दिप्तीकरण, विभिन्न सामग्री से और काल में की जाती है |

षट्कर्म में इन यंत्रों का विशिष्ट महत्वा है बिना इसकी सहायता के इन कर्मों को संपन्न 
नहीं कर सकते | इस मण्डल की प्राप्ति के बाद साधना काल में मूल यंत्र माला और विधान लगता है यदि वो षट्कर्म का कोई अलग विधान हो तब वरन बाकि की गोपनीयता तो इसके संयोग से ही संपन्न जो जाती है बाकी बचाती हैं मुद्राएँ ध्यान दिनचर्या आदि तो वो आपको कार्यशाला के दौरान ही बता सकते हैं ये अप्रत्यक्ष नहीं समझाया जा सकता और इसके लिए आपको कार्यशालाओं में सम्मलित होना चाहिए क्योंकि तंत्र विज्ञानं प्रायोगिक विज्ञानं है न कि थ्योरिकल,
समय कम है आपके ऊपर निर्भर है कि आप इसका लाभ लेना चाहते हैं या नहीं ---

निखिल प्रणाम

रजनी निखल 

Friday, February 2, 2018

शिव और षट्कर्म



शान्तं पद्मासनस्थं शशिधरमुकुटम पंचवक्त्रं,
शूलं वज्रं च खंगम परशुमभयदं दक्षभागे वहन्तम ||
नागं पाशं च घण्टां प्रलयहुतवहं साङ्कुशं वामभागे,
नानालंकारयुक्तं स्फटिकमणिनिभं पार्वतीशं नमामि ||

“पद्माशन में शांत स्थिर महादेव अपने मस्तक पे चन्द्रमा तीन नेत्रों से युक्त दाहिने हाथ में त्रिशूल वज्र खंग परशु तथा अभय मुद्रा धारण किये हुए, बांये हाथों नाग पाशरज्जु घंटा प्रलायग्नी और अंकुश धारण किये हुए अनेक दिव्य अलंकारों से विभूषित स्फटिक मणि के सद्रश चमकते हुए भगवन भूत भावन शिव शंकर को बारम्बार मै नमन करती हूँ |

शिव अत्यंत तेजोमय, श्रेष्ठ कर्मों को संपन्न करने वाले समस्त द्रव्यों के स्वामी एवं विद्याधर हैं, अज्ञेय और अगम्य हैं एवं सभी के लिए सर्वदा कल्याणकारी हैं,  सदाशिव, जो भोलेनाथ नटराज हैं तो शक्तियुक्त और रसेश्वर भी है |

स्रष्टि की उत्पत्ति से लेकर संहार तक केवल शिव हैं चाहे सगुन रूप में मूर्तिमान रूप में उपासना की जाये या निर्गुण रूप में शिवलिंग की पूजा की जाए | वे केवल जलधारा, दुग्धारा और बिल्वपत्र से ही प्रसन्न होने वाले देव हैं इसलिए भोलेनाथ हैं |

चूँकि महादेव ही सभी विद्याओं के स्वामी हैं, फिर चाहे वो मंत्र हो तंत्र हो वेद हों, रस-विज्ञानं हों या षट्कर्म हो पूजा कर्म हो भक्ति हो या हठयोग की तंत्र साधना हो |
किसी भी कर्म या साधना, तपस्या महादेव के बगैर अधूरी होती है, चूँकि आदि महादेव आदि गुरु हैं, समयानुसार शिव ने शक्ति सयुक होकर अनेक विद्याओं को प्रदर्शित किया जो बाद में वेद उपनिषद ग्रंथों के रूप में प्रकट हुए | इसी क्रम में रस विज्ञान, सूर्यविज्ञान, सम्मोहन विज्ञान, आयुर्वेद आदि की रचना होती चली गयी जो समाजोपयोगी थी |

स्नेही भाइयो ! कई लोग हैं कई साधक हैं जो अनेक वर्षों से साधना कर रहें है किन्तु सफलता २-5 % भी नहीं है |कई ऐंसे लोग हैं जिन्होंने बहुत अच्छी एजुकेशन कर रखी है किन्तु नौकरी ही नहीं है कई ऐसे भी जिन्होंने व्यापार में बहुत पैसा लगा दिया किन्तु लाभ 0% या नहीं के बराबर | कुछ लोग १ या २ % से कहीं पीछे रह जाते हैं | कुछ लोग सुन्दर सुशील हैं एजुकेटेड है अच्छी जॉब है किन्तु जीवन साथी अर्थात विवाह में बाधा आ रही है |

कुछ अपनी जॉब में अपना १००% देने के बाद भी कभी बोस खुश नहीं तो कभी कलीग खुश नहीं | कुछ अपनी पत्नी को खुश रखें तो माँ बाप नाखुश और मा बाप को खुश रखें तो पत्नी नाराज | कहीं अत्यधिक निर्धनता है या सिर्फ काम चल रहा है | अत्यधिक मेहनत के बाद भी कमाई में बरकत नहीं | कहीं धन तो सुकून नहीं कोर्ट केश हैं कहीं तो झगड़े हैं | कहने का तात्पर्य कि कहीं न कहीं कुछ तो कमी है जिसकी तलाश या जिसे दूर करने के लिए कभी ये ज्योतिष बाबा फ़क़ीर या तांत्रिक मान्त्रिक की शरणागत होते हैं |

किन्तु कभी सोचा है, कि स्वयं ही कुछ ऐसा किया जाए कि अपनी समस्या का निवारण स्वयं कर सके |

षट्कर्म ऐसी विद्या को कहा जाता है जिसमें समस्त कार्यों को सम्पादित किया जा सकता है, जिसके अनेको स्वरुप हैं जिसे आदिवासी तंत्र में भी किया जाता है साबर तंत्र में भी किया जाता है अघोर तंत्र में भी किया जाता है और यदि समझा जाये तो प्रत्येक व्यक्ति इस क्रिया को किसी न किसी रूप में करता अवस्य है फर्क सिर्फ इतना है कि यदि इसे सिस्टेमेटिक तरीके से किया जाये तो यही क्रिया उच्च कोटि की साधना बन जाती है और तब ये स्वयमसिद्धा न होकर समाजोपयोगी हो जाती है | हमारी तंत्र कौमुदी षट्कर्म किताब इसी दर्शन को प्रदर्शित करती है |

मै आपको अपने जीवन की एक घटना बताती हूँ आपने पक्षी तंत्र सुना होगा और जिसने अरुण कुमार शर्मा जी की पुस्तकें पढ़ी होगी तो उन्होंने उलूक तंत्र भी पढ़ा होगा अब भिन्नता बताती हूँ ये एक अघोर क्रिया है जिसमें उल्लू पक्षी को सिद्ध किया जाता है जिसमे वो अपने शारीर के प्रत्येंक अंग की उपयोगिता बताता और आखिर में साधक के किन्ही तीन प्रश्नों का उत्तर देता है तीसरे उत्तर के साथ ही साधक को तलवार से उसकी गर्दन काटनी होती अन्यथा वो उसकी आँखें नोंचकर उसे मार देता है |

लेकिन इसी के एक रूप की साधना या टोटका मैंने आदिवासियों में देख है मंडला क्षेत्र टोनो टोटकों के लिए अत्यंत प्रसिद्द है मंडला से अमरकंटक की ओर जाने पर बीच में ही एक गाँव है जहाँ पर एक ओझा रहते हैं, नाम नहीं बता सकती क्योंकि वचनबद्द हूँ | मेरे बहुत प्रार्थना करने पर और ज़िद करने पर उन्होंने मुझे तीन प्रयोग बताये थे पक्षियों की भाषा समझना, हत्थाजोडी पहचानना और कार्यानुसार सिद्ध करना और उलुक साधन|

उन्होंने 14दसी के दिन पता नहीं कहाँ से कैसे एक उल्लू पकड़ कर ले आये और अमावस्या के दिन मुझे कमरे में उनकी बड़ी बेटी जो स्वयम भी ओझा ही थी के साथ बिठा दिया, और स्पष्ट निर्देश कि जब तक हमारा पूजा क्रम चले न तो मुह से आवाज निकले और ना ही जगह से हिलना है | उस झोपडीनुमा कमरे में एक कोने में एक मिटटी के चबूतरे पर एक लाल कपडा बिछा कर एक कटोरी में शराब, एक मिटटी के दिए जैसे बर्तन में मुर्गे की कलेजी के बारीक टुकड़े, लाइ, जो चावल को भूनकर बनाते हैं और काजू सिन्दूर आदि चींजे रखी थीं |

उसके बाद ओझा ने सिर्फ एक लंगोटी पहनी और आकर घास के बने हुए आसन पर बैठ कर कुछ बुदबुदाने लगा , अब उसने थोड़ी सी मिटटी लेकर चारों तरफ फेंका और आवाज की जैसे किसी को बुला रहा हो और सच में 4 से 5 मी. में उल्लू जाने कहाँ से उड़कर वहां आया और ठीक ओझा के सामने बैठ गया और उसे टुकुर टुकुर देखने लगा अब उन्होंने उसे वो सब खाने का निर्देश दिया तो उसने खाया फिर तब तक ओझा कुछ मन्त्र कर रहा था फिर उसे शराब भी पिलाई और फिर मन्त्र करता रहा जैसे जैसे मन्त्रों गति की बढ़ रही थी उल्लू की बैचेनी भी बढ़ रही थी तकरीबन एक से डेढ़ घंटे के बाद अचानक उल्लू चीखा उसके चीखते ही मेरी भी चीख निकलने को हुई किन्तु उसकी बेटी ने मेरा मुह दबा दिया और इशारा किया कि चुप बैठना, अब उल्लू के मुह से कुछ मानवीय भाषा में शब्द निकल रहे थे और वो लकड़ी उन्हें नोट कर रही थी  
मेरी समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था क्योंकि मेरे दिमाग में अरुण कुमार शर्मा जी की उलूक तंत्र की घटना अंकित थी मै इसीलिए डरी हुई थी | हालाँकि वातावरण थोडा भयावह और रहस्यमयी था किन्तु ये मेरे लिए कुछ था ही नहीं क्योकि अब तक मै कामख्या में गुरूजी के साथ एक दो साधना शमशान में कर चुकी थी तो ये वातावरण मेरे लिए नया नहीं था |

जब एक घंटे तक वह बोलता रहा और ओझा पूछता रहा फिर पूछते हुए ही उसने एक लोहे की पतली चेन का फंदा बना कर उल्लू की गर्दन में फेंका और वो बंध सा गया अब ओझा के इशारे पर उल्लू धीरे धीरे चलता हुआ उसके हाथ पर बैठ गया और उसे ताकने जैसे उसने उसे कोई कसम दी हो | अब वो उस ओझा की ओर ताक रहा था जिसे वो आदेश दे ओर पूरा करे अर्थात अब वो उसके पूरी तरह से वश में था |

मुझे और उसकी बेटी को उसने इशारा किया बाहर जाने का, मै अभी तक सकते में थी हालांकि ये क्रिया इतनी भयावह नहीं थी जब हम बाहर आये तो उनकी बेटी और उन्होंने बताया कि ये पक्षी को वश में करके मनचाहा कार्य सिद्ध करवा सकते है | जो कल तुमने उसकी भाषा में सुना वो अपने शरीर के प्रत्येक अंग का विवरण दे रहा था और उससे क्या कार्य सिद्ध होते हैं ये बता रहा था फिर उन्होंने उससे मेरे बारे में भी पूछा कि इसको मै कोई क्रिया करवाऊ या नहीं ये इमानदार है या नहीं | तो उसने क्या कहा ये तो नहीं बताया किन्तु मुस्कराहट के साथ उठ गए फिर उन्होंने चार पांच दिनों में मुझे वो दो साधना सिखायी | जिसके लिए मै उनकी सदैव ऋणी रहूंगी |
स्नेही भाइयो ! इन साधनाओ से अवगत कराना ही हमारा उद्देश्य है जरा सोचिये कि एक छोटे से प्रयोग से उल्लू जैसा पक्षी आपके वश में हो सकता है तो क्या इन्सान क्या देवता, और जब बात देवताओं की आई तो साधना की भी है जब वशीकरण उस स्तर पर जा सकता है तो कोई साधना फिर चाहे वो अप्सरा यक्षिणी हो भूत प्रेत हो पिशाच हों जिन्न परी हों, हम इन साधनाओ से अपने जीवन की प्रत्येक कमी को पूर्ण कर आगे बढ़ सकते है |

इसलिए क्या हम अपने कार्य, कार्य की पूर्ती हेतु वशीकरण जैसे विद्या का उपयोग नहीं कर सकते जिससे किसी का नुकसान भी न हो और हमारा कार्य भी सफल हो जाये इसी तरह के अनेकानेक प्रयोग जिसे हम अपने व्यापार, जॉब और दैनिक जीवन की समस्याओं के निवारण के लिए उपयोग में ला सकते हैं ये षटकर्म का पहला कर्म है, इनमें बाकि के पञ्च कर्म शांति कर्म, स्तम्भन, उच्चाटन,विद्वेषण, मारण हैं किन्तु पांच कर्म से ही जीवन सुगम और सरल आनंदमय हो सकता है तो छटे की आवश्यकता है ही नहीं, जब तक कि आपके जीवन पे संकट ना आ जाये |

महाशिव रात्रि में महादेव के पूजा के साथ इनमें वशीकरण और शांतिकर्म के लिए सर्वाधिक उपयुक्त समय है और यही वहा है कि 5-6-7 फरवरी के सेमीनार को 13-14-और 15 फरवरी पे पोस्टफोन किया गया सदगुरुदेव की और माई की आज्ञानुसार इसे सेमीनार न करके तीन दिन की साधना वर्कशाप करने का सोचा है |

इसमें १३ ता. षट्कर्म का पूर्ण विवेचन, साधना सम्बन्धी सूक्ष्म तथ्य और जानकारी |
ता.14 पारदेश्वर महादेव का महाभिषेक चार प्रहर में सदगुरुदेव प्रदत्त तत्वमसि क्रिया के साथ, और साधना |
ता. 15 रस विज्ञान की प्रारंभिक जानकारी और अष्ट संस्कार से सम्बंधित जानकारी |
अब ये आप सब के सोचने का विषय है कि इससे आप कितना लाभ उठा पाते है अपना रजिस्ट्रेशन कृपया 6  फरवरी तक करवा लें क्योंकि ये अंतिम ता. निश्चित की गयी है |

आपकी अपनी

रजनी निखिल


निखिल प्रणाम 

***NPRU***

Friday, January 19, 2018

भोपाल सेमीनार 5-6-7फरवरी

 NPRU
निखिल परा विग्यान शोध इकाई भोपाल द्वारा
एक अद्भुत कार्य शाला का आयोजन
आमन्त्रण

जीवन में अनेक समस्याये हैं और इस भागदौड़ की जिंदगी में हमारे पास समय है ही नहीं कि कुछ अलग कर सकें.
अनेक  संस्थाये हैं जो कोइ ध्यान कराते हैं कोइ योग तो कोइ कुछ और.  किन्तु समस्याओ का हल नही है.
इस सेमिनार के माध्यम से आप वो क्रिया प्रक्रिया सीख सकते हैं जिसके माध्यम से आप अपनी प्रतिदिन आने वाली बाधा से स्वयं मुक्त हो सकें ना  किसी तान्त्रिक्, ना ज्योतिष और ना बाबा ना  दरबार  की आवश्यकता होगी |
क्योंकि वो षट्कर्म के कुछ प्रकार आप भी कर पायेंगे 
बिल्कुल वैज्ञानिक  विधि से |
क्योंकि कोइ माने या ना माने सभी कही ना कही टोने टोटको से या नजर बाधा या ग्रह बाधा से पीड़ीत हैं |
विस्वास सभी करते है किन्तु विश्वास ना करने का दिखावा अवस्य करते हैं |
इन्ही सारे सूत्रों को इसलिए सेमिनार के माध्यम से आप सभी को स्वय के लिए तैयार करना ही हमारा उदैश्य है .|
कही ना कही समाज से जो तन्त्र के नाम पर डर और अंधविश्वास है उसे दूर कर हमारे वेद और शास्त्र एवं ऋषि मुनियो की धरोहर के रूप मे जो ग्यान विग्यान है उसे आप तक पूर्ण प्रमाणिकता के साथ पहुंचाना
अब आप स्वय निर्णय लें कि इस अवसर को  पकड़ना  है  या नहीं

वैसे मेरा आप सभी को हार्दिक आमन्त्रण है
रजनी निखिल
भोपाल (म प)
मो. No.8827071034
0755-4901714




Wednesday, January 17, 2018

श्री विद्या




जय गुरुदेव /\
स्नेही स्वजन! 
श्री विद्या का मूल स्वरूप क्या है? 
ये प्रश्न मैने अति अबोधता और अनजाने में गुरुदेव से पूछ लिया |
अब डर भी लग  रहा था कि गुरुदेव कही नाराज ना हों जायें |
किंतु इसके विपरीत उन्होने मुझे मुस्कुरते हुये देखा और कहा, कृति अब तेरा  कमाख्या जाने और दिक्षा का समय हो गया है |
और तब उन्होने मुझे त्रिपुरा रहस्य समझाया,
ये घटना क्रम आज अचानक इसलिए याद आया क्योंकि एक पोस्ट मेरे सामने आयी, "एक अति विद्वान और मेरे ज्योतिष ग्रुप के सम्मानीय सदस्य भाइ श्री कृपाराम उपाध्याय जी" की इस पोस्ट ने मुझे आज दे करीब 22 वर्ष पूर्व के घटना याद दिलायी |
अब हम इस ग्यान चर्चा को क्रमशः करेंगे,क्योंकि ये एक अति विशिष्ट और उच्च साधना के तथ्य हैं इन्हें आप तक पहुंचाना शायद मेरी जिम्मेदारी है इसलिए ......
क्योंकि साधको के जीवन मे प्रत्येक घटना के पीछे कोइ कारण होता ही है... 

श्री सूक्त योग रहस्य ¶
आत्मविद्या ही श्री विद्या है । श्री सूक्त के पीछे पूरा भारत और विदेश पागल हो रखा जो देखो वो इसका प्रयोग कर रहा है
लक्ष्मी और धन दोनी में फर्क है।
यह योग सिद्ध होते हुए भी कितने लोगो फल नहीं देता चाहे 1000 श्री सूक्त करले या लक्ष
बात मूल यही आती है श्री सूक्त विधान सम झजना न ब्रह्मण यह समझा  पाता है नहीं कोई इसका कौल ज्ञान किसीको मिलता है यह एक उच्चतम विद्या है किन्तु आज इसके यंत्र का और मन्त्र का व्यापारी करण हो चूका है 
श्री के मन्त्र करेंगे जरुर पर इसका सम्यक ज्ञान न होने के कारण यह विद्या इतनी फलीभूत नहीं बनती आज लोग बस धन और माया के पीछे भागने के लिए या उन्हें श्री के अभिषेक मन्त्र तंत्र यंत्र से कुछ धन मिल जाये इसके पीछे पद जाते है यह एक निम्न कक्षा की सोच है जिस अवस्था मेंयह योग रचा गया था वो पश्यन्ति और परा के बिच में लिखा हुआ है पर जिसने न यह समजा है नहीं योग्य गुरु की सिख मिलती है तबतक श्री सूक्त श्री यंत्र श्री मन्त्र मिथ्या है 
दूसरी बात कोई भी महा विद्या या सिद्ध प्रयोग की पूरी समज न हो नहीं उनके विधान का रहस्य पता है तब तक वः फल नहीं देता 
जैसे संस्कृत भारत की नहीं अपितु पुरे ब्रह्मांड का नियमन करने वाली लिपि है इससे उपर देवनागरी आती है जहा देवता मनुष्य को बोध देते है 
जैसे वेद बने उपनिषद बने

श्री सार और श्री रहस्य भी कुछ ऐसा जब तक देवता या चित्त में आवृत वृतियो का निरोध होकर चित्त देवतुल्य और उर्ध्वगामी नहीं बनता तबतक यह विद्या बिना बुलेट की गन जैसे ही
जैसे बंदूक तो होगी पर निशाना और बुलेट नहीं तो क्या काम
ऐसे ही बिना सूक्त योग रहस्य समजे यह विधान फलीभूत नहीं होगी

लक्ष्मी और उसका प्रयोजन
हमने लक्ष्मी का मतलब कुछ और समजा है लक्ष्मी यानि धन वैभव दौलत नहीं होता लक्ष्मी वो लक्ष्य को प्राप्त कराने वाली शक्ति को लक्ष्मी कहते

हमारा शरीर लक्ष्मी है यह लक्ष्मी को भगवद कार्य और आत्मज्ञान हेतु मिला हुआ है कहते है की दुर्लभो मानुष देहो देवानामपि दुर्लभं
यह मनुष्य शरीर चाहे तो पशुओ की बहती भोग विलास कर सकता है 
और चाहे तो इसके भीतर आत्मज्ञान का दिया जला कर दुनिया में अज्ञान का अँधेरा मिटा सकता है

दूसरी लक्ष्मी हमारे विचार और संस्कार है जैसे विचार और संस्कार वैसे ही लक्ष्य वैसे ही शक्ति
श्री सूक्तं में कहा हुआ है 
अलक्ष्मी नाशयाम्यहम 
हमे हमारी भीतर की अलक्ष्मी को मारना है है और सदगुणों की पूर्ण लक्ष्मी का प्रगट्य करना होता है
नर तू ऐसी करनी कर के नारायण बन जाये
श्री विद्या श्री कुल वैष्णवी विद्या इनका आधर नारायण है 
और नारायण की पत्नी लक्ष्मी है 
और ऐसे ही काली कुल के अधिपति शिव है

वैसे श्रीसूक्त योग पूरा समजे तो यह एक रूपांतरण क्रिया है जिसमे नर को नारायण स्वरुप बनाया जाता है
बात यहा पर आएगी एक सामान्य नर नारायण कक्षा को कैसे प्राप्त करे इसका विधान ही श्री सूक्त है

जो श्री सूक्त का पाठ करता है या यंत्र कुल चक्र की पूजा करता है किन्तु वो आचरण नहीं करता तब भी यह विधान उस के लिए निष्फल होगा

सूक्त के प्रयोजन में साधक अग्नि देव को आवाहन दे कर उसके अनुक्त शक्ति की प्राप्ति हेतु प्रार्थना करता है

पर क्या साधक वो शक्ति को जानता भी है या नहीं परिचय है भी या नहीं या फिर वो पुस्तक पढ़ कर करता है

बात आती है लक्ष्मी से परिचय होना और उससे परिचय होते ही उनके स्वरुप के अनुकूल होना तब जाके देव की शक्ति तुम्हारे चित्वृत्ति पर आरूढ़ होगी
जैसे श्री कृष्ण को संदीपनी ने नारायण स्वरूप दिया
जैसे वशिष्ठ ने राम को नारायण बनाया
जैसे दत्त ने परशुराम को त्रिपुरा रहस्य समजा कर पूरा ब्रह्मांड भेदन और ब्रह्मास्त्र विद्या सिखाई
तब जाकर पूरी प्रकृति वशीभूत हो गयी यही श्री विद्या विधान है जब अनुरूप केंद्र बिंदु बन गए तो पूरा ब्रह्मांड तुम्हारे सोच पर चल सकता है 
यह आत्मविद्या गहन है इसको सिखने हेतु पूर्ण गुरु का सानिध्य चाहिए जो नाद और बिन्द दोनों ही कला में निपुण हो तब यह विद्या को पूर्णत: समज पाना सम्भव है
यहा सच्चा गुरु यंत्र का प्रयोजन तुम्हारे भीतर की कुंडलिनी में कर देगा और षट्चक्र भेदन कर भीतर के बिंदु को ब्रह्मांड के तत्व से जोड़ देंगे और यही यंत्र का अभिषेक रोज़ यह तत्व से करना है अब श्री यंत्र और उसकी स्थिति समजने से पहले लक्ष्मी को जान ले 
कौनसी लक्ष्मी स्थिर है और कौनसी चंचल
पहले यह सोचो की इस दुनिया में कौनसी चीज़ स्थिर है?
या फिर जन्म से पहले और मृत्यु। पश्चात कौनसा धन तुम्हारे पास रहेगा
उसके लिए कबीर ने खूब कहा है कबीर वो धन संचिये जो आगे को होय
जो मृत्यु के पश्चात काम आये वो धन संचित करो वरना बाकि का धन तो शरीर की मृत्यु होते ही समाप्त हो जायेगा अभी श्रीसूक्त को पूरा समजे तो इसमें यही धन की प्राप्ति हेतु साधक अग्नि से प्रज्वलित करता है ।गुरु कृपा केवलं।
निखिल प्रणाम
एन पी आर यू

Monday, January 15, 2018

षट्कर्म और सेमीनार

(आवाहन) 


गोक्षीधारधवल घनसुन्दर खं,  चिन्तामणि चतुर्वेदमयं जनेशः |
गंधप्रियं चिन्मघं चिर्जिवितं त्यं, नमामि निखिलेश्वर पाद निर्मिलम ||

तांत्रिक षट्कर्म—

तन्यते विस्तार्यते ज्ञानमनेन इति तन्त्रं"

अर्थात जिसके  आधार पर ज्ञान का विस्तार किया जाता है उसे तंत्र कहते हैं, सदगुरुदेव के  अनुसार तंत्र शब्द की उत्पत्ति ‘तनु धातु’ से एवं और्णादिक ‘ष्ट्रन’ प्रत्यय के योग से हुई है . शक्ति और तंत्र को अलग नहीकिया जा सकता ये एक दुसरे के पर्याय हैं क्योंकि इनमें पूर्ण रूप से सम्बन्ध है तंत्र के बिना शक्ति प्राप्त नहीं की जा सकती और वहीँ शक्ति तंत्र आधीन होती है  अतः जिस साधक या शिष्य को शक्तिसंपन्न बनाना है तो उसे तंत्र अपनाना ही होगा |

 यदि किसी साधक ने तंत्र क्षेत्र का नाम सुना हो और उसे षट्कर्म के बारे में न पता हो ऐंसा हो ही नहीं सकता क्योंकि ये तंत्र कि अति आवश्यक विधा है हालाँकि ये भी सत्य है कि इसका उपयोग सामाजिक कार्यों के लिए जैसा होना चाहिए था वैसा हुआ नहीं है क्योंकि इसके कई अर्थों के अनुसार इसे जन सामान्य में मैली विद्या जैसी मानी जाती है , किन्तु वास्तविकता में ऐंसा है नहीं ये एक अति उच्च और विशिष्ट विद्या का स्वरुप है जिसके अनेकों आयाम हैं | पर अभी तो आवश्यक ये है कि हम यह जान सके कि तांत्रिक षट्कर्म है क्या ?

वशीकरण या आकर्षण, शांति, स्तम्भन, विद्वेषण, उच्चाटन, मारण ये छः प्रकार के कर्म या साधनाओं के वर्गीकृत के सम्मिलित स्वरुप को षट्कर्म कहते हैं और इनका सामान्य सा अर्थ है
१-      वशीकरण- अर्थात किसी को भी अपनी आज्ञानुसार चलाना यानि वह आपकी प्रत्येक बात को माने | आपका रंग रूप कैसे भी हो किन्तु आपका आकर्षण इतना हो कि प्रत्येक व्यक्ति आपकी बात सुने आप जहाँ भी जाएँ सबकी आँखे आप पर हों और आप आकर्षण का केंद्र हों |

२-      शांति कर्म का साधारण सा अर्थ है, साधक पर किसी भी बुरे गृह या ग्रहों की अशुभ अशुभता का या जो देवि देवता जिनमें कुल देवी देवता से लेकर अनेकों ग्राम देवता और अन्य भी हो सकते हों उनके क्रोध और दुस्प्रभाव का प्रभाव का शमन हों सके ये क्रम शांति कर्म के अंदर आते हैं

३-      विद्वेषण का सामान्य अर्थ कि किन्ही दो व्यक्तियों के बीच मतभेद पैदा करना या झगडा करवाना |
४-      उच्चाटन, मतलब जी या मन का उचाट होना अर्थात जिस व्यक्ति पर ये प्रयोग पर किया जाता है उसे उसके इक्छित विषय से उसके मन को या जी को हटा देना |

५-      स्तम्भन का साधारण अर्थ है कि किसी कि गति कैसी भी रोक देना |

६-      मारण – अर्थात प्रयोग द्वारा किसी को भी मार देना मृत्यु देना |

किसी भी व्यक्ति को या साधक को तब तक तांत्रिक कहलाने का अधिकार नहीं है जब तक वो इन कर्मों की सिद्धि को पूर्णता के साथ सिद्ध न कर ले इस विधा को किसी अन्य दृष्टिकोण से न देखकर केवल इतना समझ लें कि मारण मोहन जो जाने वो सारा ब्रह्मांड पछाड़े |

सदगुरुदेव ने अपने पत्रका के प्रकाशन के प्रारम्भ काल में ही इस विषय की उपयोगिता और साधकों को इससे सम्बंधित भ्रांतियों को दूर कर इसका पूर्ण ज्ञान दिया था |

हमारा प्रयास भी इस पुस्तक के माध्यम से इन षट्कर्म को न केवल साहित्य के रूप में आप तक पहुचाना है अपितु प्रायोगिक रूप में आपको सिखाना भी है |

बशर्ते आप तैयार हों | इसके लिए  हम एक सेमीनार यानी प्रायोगिक कार्यशाला आयोजित कर रहें हैं जो भी साधक साधिका इसमें भाग लेना चाहते है वे समय रहते अपने नामांकन करवा लें इस हेतु आप हमारी मेल id पर अपना नाम और फोन न०  भेंजे जिससे बाकी कि जानकारी आपको दी जा सके |

हमारी इस कार्यशाला में संपन्न होने वाली प्रमुख साधनाएं व कार्यक्रम ---

षट्कर्म के प्रथम तीन कर्म वशीकरण, शांति और स्तम्भन को पूर्ण प्रायोगिक विधान से करवाना ,
षट्कर्म में षट्चक्र का विशेस महत्व है अतः मूलाधार चक्र को पूर्ण रूप से जाग्रत करने का विधान |

रस विज्ञानं अर्थात पारद विज्ञानं का प्राम्भिक ज्ञान

तीन दिन की कार्यशाला में पूर्ण साधनात्मक क्रियाएं

 स्नेही स्वजन !


5-6-7 फरवरी २०१८  आप सभी आमंत्रित हैं इन उच्च और विशिष्ट साधनाओं के प्रायोगिक ज्ञानार्जन हेतु कार्यशाला में और साहित्यिक ज्ञानार्जन हेतु हमारी तंत्र कौमुदी की “षट्कर्म और रस विज्ञानं के गुप्त रहस्य खण्ड” पुस्तक का नवीन संस्करण के साथ स्वागत है ---/\ 


***रजनी निखिल***
**एन पी आर यु ** 


Wednesday, January 3, 2018

MERA SAFAR



जय सदगुरुदेव

स्नेहिल स्वजन !

वो समय आ गया है जब कि मै आरिफ जी  के पदचिन्हों पर चलते हुए आपको तंत्र मंत्र साधना और ज्ञान के अनेक आयाम जहा से हम लोग गुजरकर यहाँ तक पहुंचे और इस राह में अनेक साधक अनेक गुरु भाई बहिन अनेक सन्यासी साधकों ने हमारा मार्गदर्शन किया उन सबके बारे में जानना आपका अधिकार है क्योंकि ये एक अकाट्य सत्य है कि कोई भी व्यक्ति सरलता से साधन के अयामो को बल्कि उच्च आयामों को छू भी नहीं सकता

हम बहुत भाग्यशाली हैं कि सदगुरुदेव परमहंस स्वामी निखलेश्वरानंद जी (डॉ नारायण दत्त श्री माली जी) का वरद हस्त हमारे शीश पर्थ और उन्होंने प्रत्येक पल हमारी ऊँगली थाम कर हमें इस मार्ग पर चलाया |

 अपने जीवन के उन पड़ावों को (जहाँ मैंने साधना सिद्धि प्राप्त की और जैसे मुझे गुरुदेव का मार्गदर्शन मिला साथ हि उनकी आदेश से जिन लोगों ने मुझे सिखाया) मै एक सीरिज के माध्यम से शेअर करती जाउंगी ताकि आप भी उस ज्ञान और उन व्यक्तित्व से परिचित हो सकें,
मैंने तंत्र को हि जिया और अभी भी तंत्र को ही जानने और समझने की कोशिश करती रहती हूँ इससे पहले कि मई अपनी यात्रा का विवरण आपसे शेअर करूँ आप सभी इसे समझे फिर आगे बढ़ेंगे 


जब सृष्टि की उत्पत्ति हुई तब त्रिदेव ने सृष्टि के सुगम सञ्चालन के लिए प्रत्येक पहेली
के समाधान  की एक गुप्त रचना कर रखी है... या यु कहे की पहेली की रचना ही
इसीलिए हुई की वो गुप्त रचना सृष्टि में प्रथम बार घटित हो कर एक अध्याय रचने
के लिए तैयार हो सके. और इसि गुप्त रचना कों हम प्रश्न का उत्तर या ताले की कुंजी

कह कर भी संबोधित करते है.  और साक्षर पांडित्य शब्दों में इसे तंत्र की संज्ञा दी
गई..
तंत्र, एक ऐसा शास्त्र जो समस्त हिंदू धर्मं का विश्वकोष बन कर स्थापित हुआ. जहा
विभिन्न पद्धतियों से साधना और उपासना का मार्ग प्रशस्त हुआ. तंत्र की उत्पत्ति
सृष्टि के उत्पत्ति से पहले ही हो चुकी थी.. जेसा की उपरोक्त कथं में कहा है की किसी
भि प्रश्न का हल पहले से ही नियोजित है या दूसरे शब्दों में हल के प्रकटीकरण में ही
प्रश्न की उत्पत्ति हुई.
तंत्र शास्त्र मुख्य रूप से आगम और निगम इन दो श्रेणियों में विभाजित है... इन के
आलावा यामल, डामर, उड्डिश आदि नामो के वर्ग में भि विभाजित हुए और साथ
ही साथ उपतंत्र भि स्थापित हुए. इस उपलक्ष में प्राचीन काल में ही ऋषि मुनि
महान तंत्राचार्यो ने हस्त लिखित मनु स्मृतियों में पूर्व से ही काली काल के लिए
भाविश्यित कर दिया था की “काली काल में तंत्र की आगम निगमता के वैतिरिक्त
अन्य कोई शास्त्र पर्याय स्वरूप शेष नहीं रहेगा जीवन की विकटता से निपटने के
लिए”
काली काल अर्थात कलियुग में जीवित रहने के लिए तंत्र ही एकमेव श्रेष्ठ मार्ग
स्थापित होगा और इसी कारण विलुप्त होती इस विधा के जैसे अब तक त्रिदेवो ने
विशेष नायक स्वरूप अवतरित होकर इसकी काट संसार कों दी...और जब फिर
स्थिति के विचल होते ही इसी के पुनः संस्मरण और स्थापन के लिए परम
वन्दनीय श्री निखिलेश्वरानंद जी  का अवतरण पूजनीयडॉ. नारायण दत्त श्रीमाली
जी के गृहस्थ रूप में हुआ और उन्होंने पुनः इस विधा कों एक नया श्वास प्रदान
किया है...उनकी एक सीख हमेशा याद रहती है की सब कहे पोथन की देखि पर मै
कहू आखन की देखि... वे मंत्र तंत्र यन्त्र या इतर विज्ञान के ना केवल रक्षक के रूप में
खड़े हुए अपितु वे इस काली काल के मंत्र तंत्र यन्त्र के सृष्टा भि हुए... उनके
अनगिनत पक्ष है जिस पर यहाँ लिखा जा सकता बस जगह कम पड़ती जायेगी
तंत्र अनुगमनता में प्राचीन काल से विभिन्न संप्रदायों की स्थापना की.. हालाँकि
बाह्य परिप्रेक्ष्यता से देखे तो सभी सम्प्रदाय शिव शक्ति के ही उपासक है.. इसलिए
जितने शास्त्र लिखे गए वे शाक्तागम और शैवागम पर ही निर्धारित है. केवल पद्धति
अलग होती है परन्तु उपासना फल एक सा ही होता है... अर्थात गंतव्य सदा से एक
ही रहा है उस ब्रम्ह का साक्षात्कार परन्तु मार्ग विभिन्न रहे है. मनुष्य सदा से
सर्जनशील रहा है और वही रचनात्मकता उसे एक से दो, दो से तीन संप्रदायों कों

रचित करने के लिए प्रेरित करती रही.. वह सदा से अद्वितीयता कों प्राप्त करना
चाहता रहा है और यही उसकी प्रेरक शक्ति भि रही है. तो यहाँ में संप्रदायों के
यथासम्भव प्राप्त विभिन्न नाम कुछ इस प्रकार से है –
१.   कौल मार्ग जिसे कुल मार्ग कौल मत भि कहा जाता है.
२.   पाशुपत मार्ग
३.   लाकुल मार्ग
४.   कालानल मार्ग
५.   कालमुख मार्ग
६.   भैरव मत
७.   वाम मत
८.   कापालिक मत
९.   सोम मत
१०.                    महाव्रत मत
११.                    जंगम मत
१२.                    कारुणिक या कारुंक  मार्ग
१३.                    सिद्धांत मार्ग जिसे रौद्र मार्ग भी कहा गया है
१४.                    सिद्धांत मत शैव मार्ग
१५.                    रासेश्वर मत
१६.                    नंदिकेश्वर मत
१७.                    भट्ट मार्ग
उपरोक्त मार्गो में से कुछ मार्ग बहुत ही प्रचालित रहे.. मतलब की उस मार्ग कों
अनुगमन करने वाले साधक की तादाद ज्यादा रही... परन्तु काल के फेर में कभी
कोई मार्ग बहिष्कृत होता तो कभी कोई.. इसी के चलते मान्यता प्राप्ति हेतु बहुत से
मतों का मिश्रण होकर नए मतों का अवतरण भि होता गया.. कुछ मार्ग बहुत ही
गुप्त रूप से अवलंबित होने लगे थे. जो केवल गुरुमुखी परम्परा में ही चलते है अब...
प्रश्न ये उद्भवित होता है की इतने विविध मत मार्ग क्यों?  जब एक ही मार्ग से
अभीष्ट की प्राप्ति हो सकती है. लेकिन एक पक्ष विचारणीय बिंदु यही रहा है की
उपासना मार्ग में सबसे श्रेष्ठ मार्ग तभी प्रमाणित हो सकता है जब आपने सभी मार्गो
कों अवलंबित कर प्रत्येक साधना यात्रा कों अनुभूत किया हो.. और उसी के आधार

पर इसका निष्कर्ष संभव है. परन्तु फिर प्रत्येक का निष्कर्ष भिन्न हो सकता है.
क्युकी व्यक्ति भिन्न तो मत भी भिन्न...
अब दूसरा पक्ष कुछ इस प्रकार से हो सकता है की प्राचीन तंत्राचार्यो ने जब
संप्रदायों की पद्धतियों कों मिश्रित किया तो उसके परिणाम तीव्र एवं अत्यंत
प्राभावी मिले और समय अनुरूप भि...
जैसे किसी सम्प्रदाय के गुरु के पास अगर दूसरे सम्प्रदाय के शिष्य ने तंत्र ज्ञान की
याचना की. सुपात्र  शिष्य कों गुरु स्वयं ढूढते है तो मिलने पर नाकारा कैसे जा
सकता है.. परीक्षित होने पर गुरु उसे शक्तिपात कर उस सम्प्रदाय की गुरु परंपरा
कों निर्वाहित करते है. और उसी ज्ञान के आधार पर शिष्य एक नविन अध्याय रचते
है.. और दो संप्रदायों का उनके सिद्धांतों का कुछ इसी तारह मेल एक नए सम्प्रदाय
के अध्याय कों जन्म देता रहा..यहाँ जरुरी नहीं की सभी शिष्यों से यह होता रहता
हज़ारो में से इक्का दुक्का ही इस इतिहास के रचयिता बने...
इसी प्रकार तंत्र की गुह्य से गुह्य जानकारी कों पुनः अगले लेख में प्रस्तुत करने की कोशिश करुँगी ....

निखिल प्रणाम 


***रजनी निखिल ****
   ****NPRU ****


Tuesday, September 5, 2017

pitra dosh nivaran sadhna and tarapan


pitra dosh nivaran sadhna, tarapan 


“सर्वात्मकं सर्वज्ञं सर्वशक्तिसमन्वितं पित्तरेश्वराय नमः”
जय सदगुरुदेव /\
स्नेही स्वजन !
मानव जीवन परा अपरा शक्तियों के द्वारा हि चलायमान है किन्तु इन शक्तियों पर हमारा पूर्ण रूप से नियंत्रण नहीं अतः जिस प्रकार का जीवन व्यक्ति जीना चाहता है वह उसके लिए संभव नहीं हो पाता, चाहे वह धनि हो या निर्धन अनेकानेक समस्याएं आती जाती रहती हैं उसे कई दृष्टियों से समस्याएं झेलना पड़ता है | क्या इनसे सुलझने के कोई उपाय हैं ? क्या हम उन्हें पहचान नहीं सकते ? कि कौन हमें सहयोग प्रदान करेगा और कौन नहीं किसकी शक्ति हमें प्राप्त हो सकती है यदि शत्रु हमें परेशां कर रहा है तो उसे कैसे रोका जाये या अन्य कोई बाधा है तो उसे कैसे कंट्रोल किया जाये |
जहाँ तक सही मार्गदर्शन का या सहयोग का सम्बन्ध है, तो वह है गुरु | क्योंकि बगैर गुरु के निर्दिष्ट दिशा प्राप्त नहीं हो पाती जीवन के प्रत्येक पक्ष को गुरु द्वारा सुद्रण बनाया जा सकता है किन्तु योग्य गुरु के अभाव में कभी कभी जीवन नष्ट भी हो जाता है इसलिए शास्त्रों में गुरु के चुनने को अति महत्वपूर्ण बताया गया है ....
और गुरु के पश्चात् सबसे बड़ा सहयोगी परिवार होता है और उसमें भी हमारे वरिष्ठ और पूर्वज | जीवित रहते हुए कभी आपस में मनमुटाव या मतभेद हो सकते हैं किन्तु यही विषय मृत्यु के पश्चात् समाप्त होजाती है और जिस प्रकार माता पिता अपनी संतान को सदैव योग्य और सामर्थ्यवान देखना चाहते हैं उसी प्रकार पूर्वज भी यही चाहते हैं कि उनके वंसज अपने जीवन में पूर्ण रूप से सुखी संपन्न हों |
शास्त्र सम्मत है और सिद्ध है कि मृत्यु जीवन का अंत नहीं है इसके बाद का जीवन हि अधिक शक्तिशाली प्रभावकारी और सामान्यतः अनियंत्रित है | भौतिक जीवन कि सभी रुकावटें और गतिविधियों से परे है और मृत्यु के पश्चात् प्राणी एक तेज शक्ति पुंज बन जाता है |
गीता के अनुसार – व्यक्ति के जीवन का अंत होने से जीवन यात्रा समाप्त नहीं होती बल्कि एक तरह से पुराने वस्त्र छोड़कर नए वस्त्र धारण करती है | आत्मा स्थूल शरीर को त्याग कर सूक्ष्म शरीर को धारण करती है विभिन्न मतों के अनुसार – आत्मा मृत्यु के बाद भी अपने सम्बन्धियों के आसपास मंडराती रहती है मोहवश वे उनसे दूर नहीं जा पाती और उनके नजदीक हि रहती है | चूँकि वे सूक्ष्म रूप में होने से सबको देख सकती हैं किन्तु हम उन्हें नही देख पाते | और यही वजह है कि हम उनके प्रति लापरवाह हो जाते है और उन्हें सही पूजा भावना आदि नहीं दे पाते फलस्वरूप वे हमसे निराश होती जाती हैं और वे हमसे रुष्ट हो जाती हैं जिससे जीवन में अनेक बाधाएं और समस्याएं आने लगती हैं |
हम समझ हि नहीं पाते कि आखिर क्या वजह है कि इन समस्याओं से निपट नहीं पा रहे हैं |
किन्तु अब कालान्तर से वर्तमान में बहुत अधिक परिवर्तन आया है लोग हमारी प्राच्य ज्योतिष विद्या की ओर अग्रसर हुए और हो रहें हैं जिससे हमें अनेक वे बातें मालूम हो जाती है जिनसे बाधा आने वाली है या आ सकती है और हम सतर्क भी हो रहे हैं हालंकि इस क्षेत्र में भी काफी भटकाव है किन्तु फिर भी कहीं न कहीं से सही  मार्गदर्शन मिल हि जाता है | ज्योतिष में कुंडली के आधार पर देखा जा सकता है कि हमारी लग्न कुंडली में पित्र दोष है या नहीं सूर्य ,चन्द्र के राहू केतु से पीड़ित होने पर ये दोष लगता है और व्यक्ति इसी में उलझा रह जाता है
सदगुरुदेव ने अपनी अनेक मेग्जिन और बुक्स में पित्तरों की शक्ति सामर्थ्य और उनकी साधना पर जोर दिया है और प्रकाश भी डाला है ताकि उससे हम लाभ उठा सकें | ऐंसी हि एक विशिष्ट साधना हम इस बार करेंगे,
 पित्तरेश्वर की शक्ति सूक्ष्म होने कारण अति विशाल और शक्ति एवं सिद्धि के स्वरुप हो जाते हैं उत्तम होने के कारन वायु स्वास्थ्य गर्भ आदि के नियंत्रक भी हो जाते हैं अपनी शक्तियों से आने वाली प्रत्येक घटना जानकारी उन्हें होती है अतः वे अपने वंसज को सही मार्ग दिखा कर ऐसे कार्य की ओर प्रवृत्त कर देते हैं जिससे उनकी पूर्ण उन्नति हो सकें फिर उनके लिए कोई भी कार्य असंभव नहीं रह पाता किन्तु आवश्यकता केवल इस बात की है कि हमारे पूर्वज पूर्ण रूप से प्रसन्न हों इसके लिए हमें उनकी पूजा साधना ध्यान और पवित्र भावना का ध्यान रखना होगा |
शास्त्र, धर्म आदि में रूचि और विस्वाश रखने वाला व्यक्ति सदैव अपने प्रत्येक शुभ कार्य करने से पहले अपने पितृ देवों का आवाहन और ध्यान और पूजा जरुर करता हैं किन्तु केवल इतना ही काफी नहीं होता उन्हें अपने अनुकूल बना कर अपना सहयोगी बनाने हेतु विशेस साधना की आवश्यकता भी होती है शास्त्रों के अनुसार श्राद्ध दिवस या पित्र पक्ष शुभ कार्यों के अनुकूल नहीं होते | इस समय वायु की गति विशेस प्रकार की होती है और आकाश में तारा मण्डल का एक विशेस समूह बनता है और जिससे इस समय पूर्वज पित्र सूक्ष्म मार्ग से पृथ्वी लोक पर आते हैं और पूर्ण गति से भ्रमण करते हैं इस समय यदि कोइ व्यक्ति पूर्ण विधि विधान से पित्तरेश्वर साधना करता है तो उसे पूर्ण रूप से और सरलता से सफलता प्राप्त होती है
ये एक अटूट सत्य पितरों के कारण ही वर्तमान का शरीर अस्तित्व में आ पाया है उनके द्वारा पालन पोषण और जीवन को बनाने में उनके सहयोग को भुलाया नहीं जा सकता किन्तु हम यही भूल जाते हैं जबकि इस भूल का तात्पर्य है कि आप स्वयम के अस्तित्व को ही नकारना | अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान भक्ति की भावना निरंतर प्रकट करना और उनकी साधना करना हर दृष्टि से आवश्यक है और यही तर्पण है |
इस बार श्राद्ध दिवस भाद्रपद शुक्ल पक्ष 15 पूर्णिमा  6-9-2017   प्रथम दिवस से  20-6-2017 तक है
साधना विधान –
आवश्यक सामग्री- सफ़ेद वस्त्र सफ़ेद आसन अपने लिए, एक कपडा सफ़ेद जो कि बजोट पर बिछाने हेतु,
ताम्बे का पात्र पांच तीन मुखी काले रुद्राक्ष, ११ लघु नारियल, सिन्दूर, चावल कुमकुम हल्दी काले तिल, घी और रुद्राक्ष माला |
प्रथम दिन प्रातः स्नानादि से निवृत्त होकर जहा आपको पूजन करना है उस स्थान को धो पोंछ कर साफ करलें फिर दक्षिण की ओर मुह कर करके एक बाजोट पर सफ्र्द वस्त्र बिछाकर काले तिल की ढेरी पर पांचों रुद्राक्ष स्थापित कर दें ,उनके पीछे चावल की ढेरी पर अर्द्ध चन्द्राकार ११ लघु नारियल स्थापित करें सामने एक घी का दीपक प्रज्वलित करें, अब ताम्र पात्र में जल भरकर बाहर जाएँ और सूर्य को अर्ध्य दें फिर अपनी अंजुली में जल लेकर निम्न मंत्र के साथ अर्ध्य दें –
ॐ लं नम:
ॐ वं नमः
ॐ रं नमः
ॐ यं नमः
तत्पश्चात बिना किसी की ओर देखे अन्दर आ जायें और आसन पर बैठकर संकल्प लें कि –मै अमुक गौत्र का अमुक नाम  व्यक्ति अपने पितरों की प्रसन्नता और कृपा प्राप्ति हेतु इस साधना को समपन्न कर रहा हूँ | घी तिल मिलकर रख लें और निम्न ध्यान मन्त्र का पूर्ण श्रद्धा भाव से जप करते हुए तिल घी पांचों रुद्राक्ष पर अर्पित करें इस मन्त्र का पांच बार जप करना है तथा पांच बार ही चढ़ाना है
स्व शरीरं तेजोमय पुण्यात्मकं पुरुषार्थसाधनम
पित्तरेश्वराराधनयोग्यं ध्यात्वा तस्मिन् शरीरः
सर्वात्मकं सर्वज्ञं सर्वशक्ति समन्वितम
पित्तरेस्वरामय आनंद स्वरूपं भावयेत ||
इस प्रकार अत्यंत पवित्र मन और भावना से किया गए मन्त्र से पितृ देव प्रसन्न भाव से आकर आसन ग्रहण कर उस पर प्रतिष्ठित हो जायेंगे | ये साधना मूल रूप आपकी भावना को प्रदर्शित करती है अतः भावना आदरणीय और भक्ति युक्त होना चाहिए | पूर्ण भक्ति भाव से श्रद्धा युक्त होकर पितृ देवों से हर द्रष्टि से सह्योग कि इक्छा प्रकट करें |
अब अर्ध्य चंद्राकार रूप में स्थापित लघु नारियल की केसर घी सिन्दूर चावल ,और तुलसी पत्र आदि से पूजा करे.
अब रुद्राक्ष माला से निम्न मन्त्र की पांच माला जप करें
 “ॐ सर्व पित्र प्रं प्रसन्नो भव”  
Om sarva pitra pram prasanno bhava
इस
प्रकार पूरे 15 दिन श्राद्धों में इस साधना को संपन्न करना है अंतिम दिवस यानि पितृ मोक्ष अमावस्या को साधना संपन्न कर भोजन और मिष्ठान्न के साथ तर्पण कर सभी सामग्री को उसी वस्त्र में लपेट कर जल में में प्रवाहित कर दे या शमशान में रख आवे |
इस तरह से किया गया तर्पण और पूजन न केवल पित्रदोश मुक्त करेगा अपितु पित्तरो को प्रसन्न भी करेगा और उनकी कृपा से आपकी चहूँ ओर उन्नति होने लगेगी |
अकाट्य सत्य—पूर्ण श्रद्धा भाव से की गयी साधना फलित होगी ही तो स्वयम संपन्न करें ओर अनुभव करें ---
 ****RAJNI NIKHIL****
    **** N P R U****