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Monday, June 29, 2015

आदि महादेव का पंचाक्षरी महामंत्र प्रयोग




आदि महादेव का पंचाक्षरी महामंत्र प्रयोग

प्रचंडं  प्रकष्ठं प्रगल्भं परेशं,  अखंडं अजं भानु  कोटि प्रकाशं,

त्रयः शूल निर्मूलनं शूल पाणी, भजेऽम भवानिम पति भाव-गम्यं |


प्रिय स्नेही स्वजन !

ये साधना मूल रूप से भगवान् शिव की कृपा प्राप्ति हेतु है और पंचाक्षरी मन्त्र से शिव की प्राप्ति भी संभव है इतिहास और हमारे पुराण प्रमाण हैं कि भगवती पार्वती ने भी इसी मन्त्र के द्वारा भगवान् शिव को प्राप्त करने के लिए पहला चरण बढ़ाया था | शिव यानि परब्रम्ह | और परब्रम्ह की प्राप्ति यानी मूल उत्स से लेकर सहस्त्रार तक पहुँचने कि क्रिया |
साधना और प्रयोग में अंतर है यदि इस क्रिया को साधनात्मक रूप में करना है तो समय और श्रम दोनों ही लगेंगे और यदि मात्र प्रयोग करना है तो कृपा तो प्राप्त हो जाती है क्योंकि महादेव तो भोलेनाथ है ही |      हैं ना J

साधना विधान और सामग्री—शिव लिंग निर्माण हेतु--- तंत्र साधको के लिए शमशान की मिटटी,और भस्म, श्यामा (काली) गाय का गोबर दूध और घी, गंगा जल, शहद बेलपत्र धतूर फल और फूल स्वेतार्क के पुष्प, भांग रुद्राक्ष की माला, लाल आसन, लाल वस्त्र |
इन सभी सामग्री को पहले ही इकत्रित कर लें | स्नानादि से निवृत्त होकर जहा पर शिवलिंग का निर्माण करना है उस स्थान को गोबर से लीप कर पवित्र कर लें | तथा मिटटी भस्म और गोबर को गंगा जल से भिगोकर एक १६ इंच लम्बा और पांच इंच मोटा यानि गोलाई ५ इंच होनी चाहिए, शिवलिंग का निर्माण करें |

साधना विधान—
     पीले वस्त्र और पीला आसन उत्तर दिशा की ओर मुख कर आसन ग्रहण करें और संकल्प लेकर जो भी आप चाहते हैं, मैंने पहले ही कहा है कि यदि आप साधना करना चाहते हैं तो संकल्प पूर्ण सिद्धि का और प्रयोग करना चाहते हैं तो उस कार्य का दिन ११ या २१ करके जो आप माला निश्चित करना चाहते हैं जैसे--- ३१,०००, ५१००० आदि |  किन्तु साधना हेतु ५ लाख जप ही आवश्यक है | मंत्र के पूर्व गुरु पूजन कर चार माला अपने गुरुमंत्र की अवश्य करें जो इस साधना में आपके शरीर को निरंतर उर्जा और सुरक्षा प्रदान करती रहेगी|  गौरी गणेश की स्थापना सुपारी में कलावा लपेटकर करें और पुजन संपन्न करें तथा अपने दाहिने ओर भैरव की स्थापना करें यदि आपके पास भैरव यंत्र या गुटिका हो तो अति उत्तम या फिर सुपारी का भी उपयोग कर सकते हैं  अब भगवान् भैरव का पूजन सिन्दूर और लाल फूल से करें तथा गुड का भोग लगायें | उनके सामने एक सरसों के तेल का दीपक प्रज्वलित करें जो मन्त्र जप तक जलता रहे | अब अपने बायीं ओर एक घी का दीपक प्रज्वलित करें जो कि पूरे साधना काल में अखंड जलता रहे |

ध्यान-
ध्यायेन्नितय् महेशं रजतगिरिनिभं चारूचंद्रावतंसं ,
रत्नाकल्पोज्ज्व्लाङ्ग परशुमृगवराभीति हस्तं प्रसन्नम् |
पद्मासीनं समन्तात् स्तुतममरगणैव्याघ्रकृत्तिं वसानं,
विश्ववाध्यम विश्ववध्यम निखिल भयहरं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रं |
ॐ श्री उमामहेश्वराभ्यां नमः आवाहयामि, स्थापयामि पूजयामि ||

Dhyayenityam  mahesham  rajatgirinibham  charuchandravatansam,
Ratnakalpojvlang  parshumragvrabhiti  hastam  prasannam .
Padmasinam  samataat   stutmmarganevyaghrkrttim  vsanam,
Vishwvadhyam  vishwavandhyam  Nikhil bhayharam panchvaktram trinetram.
Om  shree  umamaheshwrabhyam namh  avahyami ,sthapyami  pujyami .

इसके शिव का पूजन पंचामृत, गंगाजल और फूल और नैवेध्य आदि से करें और एक पंचमुखी रुद्राक्ष की छोटे दानों की माला शिव को पहना दें और दूसरी माला से जप करें | सहना के संपन्न होते ही ये माला दिव्य माला हो जाएगी जो जीवनपर्यंत आपके काम आएगी |
अब एक पाठ रुद्राष्टक का करें व मन्त्र जप की सिद्धि हेतु प्रार्थना करें अब अपनी संकल्प शक्तिअनुसार जप करें |  


मन्त्र—

ॐ नम: शिवाय ||
Om namh shivay .  

                                       
इसके बाद फिर एक पाठ रुद्राष्टक का और पुनः गुरु मन्त्र | पूरे दिन आपका यही क्रम होना चाहिए | किसी भी साधना में नियम संयम का पालन पूरी दृढता होना ही चाहिए न कि अपने अनुसार कम या ज्यादा |
नियम- जो कि अन्य साधना में होते हैं- पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन, भूमि शयन, क्षौर कर्म वर्जित आदि |

विशेष—ये साधना  शैव साधकों की है अतः उनमे कुछ अघोर पद्धति से भी होंगे और कुछ वामपंथ से भी अतः उनके लिए उनका तीनों संध्या अर्थात क्रम पूजन अति आवश्यक है और यदि उन्हें शिव का अघोर पूजन क्रम आता हो तो प्रतिदिन उसी पूजन को करें क्योंकि मूलतः ये अघोर साधना ही है किन्तु शौम्यता का समावेश लिए हुए |

इस साधना क्रम को पूर्णिमा से प्रारम्भ कर पूरे श्रावण माह तक संपन्न करना है अतः जो भी साधना का संकल्प लें अच्छे से सोच समझकर करें ताकि बीच में क्रम टूटे न |
तो, जो साधक हैं वे तैयारी करें और हो जाएँ शिवमय |

भाइयो बहनों ब्लॉग पर अनेकों साधनाएं हैं आप जिन्हें पढ़ते भी हैं किन्तु सदैव कुछ नए की आसा रखते हैं ये अच्छी बात किन्तु साधनाएं सिर्फ पढ़कर मनोरंजन की लेख नहीं हैं इन्हें अपने जीवन में उतारें जरुर | मुझे लिखने में या आपको कोई भी साधना विधि बताने में कोई परेशानी नहीं है किन्तु सार्थकता तब है जब आपमें से एक व्यक्ति भी सफल हो जाता है, मै सदैव आपके इस प्रयास में साथ हूँ गुरुदेव आपको सफलता प्रदान करें-------

रजनी निखिल
***N P R U***

Sunday, June 28, 2015

पुरुषोत्तम माह के ही दो महत्वपूर्ण प्रयोग


                 




                   पुरुषोत्तम माह के ही दो महत्वपूर्ण प्रयोग 
 

   मुझे उम्मीद ही नहीं पूर्ण विश्वास है इस पुरुषोत्तम मास का लाभ आप लोग अपनी ऊर्जा शक्ति को उत्तरोत्तर बढाने में संलग्न होंगे एवं अध्यात्मिक गतिविधियों को संपन्न कर रहे होंगे | इस नारायण साधना के कुछ अलग-अलग पक्ष भी हैं जिनको उपयोग आपकी अन्य समस्याओं के निराकरण में सहायक हो सकतें हैं | श्रृष्टि के मूल रचयिता श्री हरी विष्णु के स्पंदन से ही प्राण मन व इन्द्रियों की उत्पत्ति मानी जाती है एवं जो स्वयं अनंत है काल स्वरूप हैं सबकुछ उनसे उत्पन्न होकर उन्ही में समाया हुआ है, वे सब हैं व सब सब उन्ही में व्याप्त है| जहां मनोकामनाएं हैं,सैयम है, पूजा है, श्रृद्धा है,  क्षमा हैं वहीँ भगवान् श्री हरी का निवास है | श्री हरी की इस साधना के साथ यदि अभय एवं आत्मिक सुख की प्राप्ति हो तो साधना का सुख अनंत गुना होता है | अतः इस साधना को अवश्य संपन्न करे |

साधक स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण कर पूर्व की ओर मुंह कर अपने पूजा स्थान में बैठे, इस साधना के लिए प्रातः ९ बजे के पूर्व का समय अत्यंत उचित कहा गया है | सर्व प्रथम अपने गुरु व गणपति का पंचोपचार पूजन करें | अब साधक दांये हाथ में जल लेकर संकल्प करे, संकल्प में साधक कामना करे की में इस निश्चित तिथि मास वर्ष के सभी देवि देवताओं का ध्यान कर इस साधना को करने का संकल्प लेता हूँ, मेरे सभी सहायक हो और मुझे साधना में पूर्ण सफलता प्राप्त हो | भगवान् विष्णु के नाभि में से कमल पुष्प निकला व उसी से ब्रह्मा की उत्पत्ति मानी जाती है, अतः इस साधना में कमल बीज का महत्त्व अत्यधिक बढ़ जाता है |

श्री विष्णु बीज मन्त्र-

|| ॐ श्री अनंताय नमः ||

यह बीज मन्त्र अत्यधिक शक्ति युक्त है | यदि साधक नियमित रूप से इस मन्त्र का जप करे तो निश्चित रूप से सभी सुखों की प्राप्ति होती है, केवल भौतिक ही नहीं अपितु अध्यात्मिक दृष्टि से भी मानसिक स्तर अत्यंत उच्च हो जाता है| जो साधक कुण्डलिनी जागरण की दिशा में साधना कर रहे है उन्हें भी अवश्य ही इस मन्त्र का जप करना चाहिए |

सर्व प्रथम साधक ताम्बे के पात्र में जल लेकर अपने दाहिने हाथ से जल का छिडकाव अपने शरीर व अपने आसन तथा चारो दिशाओं में करें, उसके बाद घी का दीपक लगा दे तथा दूसरी ओर अगरबत्ती भी लगा दें | तत्पश्चात जैसा की ऊपर दिया गया है गुरु व गणपति पूजन संपन्न करें व संकल्प करें

यह पूजन साधक सुखासन अथवा पद्मासन में बैठ कर संपन्न करे तो अत्यंत श्रेष्ट होगा, सर्प्रथम साधक एक पात्र में १०८ कमल बीज पहले ही रख ले | प्रत्येक कमल बीज एक बाज मन्त्र का जप करने के पश्चात अपने सर के ऊपर फेरे, तथा श्री यंत्र के सामने अर्पित कर दें, यह क्रम पूरी एक माला अर्थात १०८ बार होना चाहिए |

 इस पूजन के पश्चात साधक स्फटिक माला से बीज मन्त्र की उसी स्थान पर बैठे बैठे ग्यारह मालाओं का जप अवश्य करें उसके पश्चात ही अपना स्थान छोड़े, तत्पश्चात श्री विष्णु आरती अपने पूरे परिवार सहित करें |

  विशेष यह है की साधक इस विशेष दिन निराहार रहे, केवल फल अथवा दूध ही ग्रहण करें |
इच्छित कामना पूर्ती प्रयोग-

यदि साधक इस दिन ऊपर दिए गए पूरे साधना क्रम को निभाते हुए यदि श्वेत पुष्प में लपेट कर १०८ कमल बीज अर्पित करते हुए निम्न लिखित बीज मन्त्र का जप करे तो उसके कोई विशिष्ट अपूर्ण इच्छा अवश्य ही पूर्ण होती है-

|| ॐ क्लीं ऋषिकेशाय नमः ||

इस मन्त्र में क्लीं शब्द का अत्यंत महत्त्व है, यह क्रम २१ दिन तक संपन्न करना चाहिए |
इस साधना में साधक एक पात्र में कुछ घी और कुछ काली मिर्च रख लें, तथा “ॐ नारायणाय नमः” मन्त्र की ११ मालाएं जप करने के पश्चात शुद्ध घी को ग्रहण करे, साधक को वचन सिद्धि, बुद्धि वृद्धि प्राप्त होती है, इस मन्त्र का जप तो प्रत्येक साधक को जब भी समय मिले अवश्य ही करना चाहिए |

    सदगुरुदेव प्रदत्त ये साधना वैसे तो अनंत चतुर्दशी के मुहूर्त पर की जाती हैं किन्तु अधिक मास के शुभ दिनों में भी इस साधना को समपन्न करें और सबसे बड़ी बात है कि इन दिनों आप सब नारायण के दिवस की विशेष साधना में भी लगे हुए अतः फल तो द्वीगुना हो सकता है (यदि कर रहें तो) , शेष नारायण कृपा ----

रजनी निखिल
   


Monday, June 22, 2015

पुरुषोत्तम मास की नारायण साधना




श्री हरी साधना

 शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभाङ्गम् ।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम्
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ॥

भगवान श्री हरि के कृष्ण अवतार मानव कल्याण के लिए हुआ था | श्री कृष्ण स्वरुप में भगवान् श्री हरि पूर्ण योगेश्वर, भक्ति, शक्ति, पराक्रम तथा नीति के साक्षात संगम हैं | पुरुषोत्तम माह में भगवान् श्री हरि की उपासना या योगेश्वर कृष्ण की साधना का एक ही प्रतिफल मिलता है | कृष्ण का स्वरुप आज से पाँच हज़ार वर्ष पूर्व जितना सार्थक था आज भी उतना ही है | कृष्ण का जीवनचरित्र बालपान से लेकर निर्वान तक हर कदम पर रस से, योग से, प्रेम से, माया से, नीति आदि से ओतप्रोत था | उनके जीवन की हर घटना प्रेरणादायक है, वे साक्षात परब्रह्म हैं उन्होंने अपने जीवन में कभी भी कर्म की राह नहीं छोड़ी व जीवन को पूर्ण आनंद और वैभव के साथ जिया | इसलिए कहा जाता है के सबसे बड़ा योगी तो गृहस्थ होता है जो इतने बंधनों को सँभालते हुए भी जीवन यात्रा करता है और इनसब कर्मों को निभाते हुए साधना करता है और प्रभु तक पहुँचाने का मार्ग प्रशस्त करता है
श्री हरि साधना/ यानि श्री युक्त हरि यानी नारायण साधना----
इस साधना हेतु आवश्यक सामग्री—चांदी के समतल श्री यंत्र और उस पर विष्णु जी की खड़ी प्रतिमा जो श्री यंत्र के ऊपर ही स्थापन होगी, तथा कमलगट्टे की माला | लकड़ी की चौकी पर पीला वस्त्र बिछाएं और उस पर कुमकुम से स्वास्तिक बनायें तथा उस श्री स्थापित कर फिर उस विष्णु जी की प्रतिमा स्थापित करें |

  भगवान् श्री हरी विष्णु की साधना हेतु कुछ आवश्यक तथ्य इस माह १ समय सात्विक भोजन – पीले वस्त्र, पीला आसन, उत्तर दिशा, ब्रहमचर्य, भूमिशयन इत्यादि |
पूजा हेतु – केसर, गंगाजल, अष्टगंध, घी का दीपक, नारायण की प्रतिमा, कमल के फूल यदि मिल जाएँ तो, वर्ना पीले पुष्प की पंखुडियां और भोग हेतु खीर . प्रातः ५ से के बीच और और संध्या काल में १० बजे के पहले इस साधना को पूर्ण करें


ध्यान-

मंगलम भगवान् विष्णु, मगलम गरुडध्वज: |
मंगलं पुण्डरीकाक्ष:     मंगलाय तनो हरि ||
Mangalam  bahgavaan Vishnu ,  mangalam garudhjaah |
Mangalam pundariikshaah ,        mangalaay  tano hari  ||

मन्त्र--  “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय”
Om  namo  bhagvate  vaasudevaay 

इस मन्त्र की ११ माला करें फिर विष्णुसहस्त्रनाम के १,५,७,या ११ पाठ करें
विशेष- इस साधना में  नारायण सहस्त्रनाम का पाठ अति आवश्यक अंग है, जो कि किसी भी पूजा शॉप पर सरलता से मिल जायेगा या नेट पर भी उपलब्ध है | साधना अति सरल किन्तु शीघ्र फलदायी है |

 पिछले वर्ष मेरी एक बुजुर्ग आंटी ने मुझसे कहा कि- “बेटी मै कई वर्षों से नारायण की पूजा आराधना कर रही हूँ और उनके दर्शन की आकांक्षा है किन्तु ऐंसा लगता है कि अब इस युग में ये संभव नहीं है या मेरी श्रद्धा भक्ति पर मेरे पाप कर्म भारी हैं मेरे गुरुदेव ने मुझे कहा था कि तुझे ईष्ट दर्शन होंगे किन्तु अब जीवन संध्या में उम्मीद छोड़ बैठी हूँ | यदि बिटिया तुम कुछ बता सको तो मै बड़ी आभारी रहूंगी, और उन्होंने पुरुसोत्तम माह नहीं अपितु कार्तिक माह में इस साधना को संपन्न किया और उन्हें प्रभु बिम्बातामक दर्शन लाभ हुआ और ये मेरे कार्य की सार्थकता थी |
    
भाइयो-बहनों मुझे नहीं मालूम कि किसको क्या मिलेगा किन्तु जो जिस भाव से इस साधना को संपन्न करेगा उसे उसी भाव का फल मिलेगा ही |
अतः साधना करें और अनुभव करें शेष नारायण कृपा J

निखिल प्रणाम


रजनी निखिल 

Friday, May 8, 2015

वलगा माला मन्त्र साधना




सौन्दर्य सार मपरं तन्त्रं विधेयं,
तंत्रात्मकं विश्वमिदं चराचरम |
सूर्य: लयं समुदयं प्रकरोति तेन,
तंत्रेण शास्ति अखिलं प्रकृति: पराद्धा ||

    सम्पूर्ण जीवन के सौन्दर्य का सार तंत्र है | यह समस्त चर और अचर जगत तंत्रमय ही है सूर्य का प्रतिदिन उदित होना और अस्त होना भी तंत्रात्मक प्रक्रिया ही है . पराशक्ति प्रकृति तंत्र के माध्यम से ही सम्पूर्ण विश्व को नियंत्रित करती है ------



जय सदगुरुदेव , स्नेही भाईयो- बहनों !


   जब भी किसी विशष्ट विषय पर लिखा जाता है तो कही से या तो अध्ययन करके या अपने अनुभव से, किन्तु बिना अध्ययन या गुरु निर्देशन के आप ना तो कुछ लिख सकते हैं और न ही बता सकते हैं, फिर किसी ने नेट से पढ़कर लिख हो या साहित्य से---- J हैं  ना क्यों कि कोई भी व्यक्ति माँ के पेट से सीख नहीं आ सकता क्योंकि ये युग महाभारत कालीन नहीं है | एक बात और हमें कुछ भी क्रियान्वित करते रहना चाहिए चाहे आप कहीं से भी देख कर करें, पढ़कर करें, बस अपनी विचारधारा सकारात्मक रखें सफलता या असफलता तो बाद में है---


  इस ग्रुप में बहुत सारे  प्रश्न आते हैं किन्तु सही उत्तर देने की अपेक्षा लोग टीका टिप्पणी ज्यादा करते हैं , सिर्फ एक निवेदन है, हम एक सकारात्मक सोच लेकर प्रत्येक लेख को पढ़ें समझें और यदि आपकी इच्छा है तो एक बार प्रयास अवश्य करें किन्तु उस साधना पर मन्त्र पर टीका टिप्पणी न करें, हाँ यदि शंका है कहें जरुर , क्योंकि शंका होगी तो ही समाधान भी संभव होगा| 


   एक बात मेरा उन गुरु भाइयों से भी निवेदन है जिन्होंने तंत्र को बड़ी गहराई से समझा है, वे जानते हैं कि तंत्र एक क्रमबद्ध क्रिया है या निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है या इत्यादि---- तो उनसे अनुग्रह है कि जिन्हें नहीं पता या भ्रमित हैं तो उनका भ्रम दूर करें या सिखाने हेतु आगे आयें सभी साधना साधन में उपलब्ध करवाने हेतु सदैव तत्पर हूँ ----



  अब मै आगे के क्रम अप्सरा यक्षिणी की साधना देने से पहले कुछ महत्वपूर्ण प्रयोग जिनकी आवश्यकता है दे रही हूँ ----

भगवती बागला मुखी की जयंती अभी कुछ दिनों पूर्व निकल गयी किन्तु प्रकृति के प्रकोप की वजह से न केवल नेपाल अपितु भारत के कुछ क्षेत्र भी प्रभावित थे अतः जिससे मन खिन्न था कि कुछ लिखने या देने का मन ही  नहीं बना पाई |

 किन्तु अभी एक भाई कहने पर सदगुरुदेव प्रदत्त बगलामाला मन्त्र

साधना---- 



स्नेही भाइयो बहनों !


 माँ बागला मुखी तंत्र की षट्कर्म साधन की अधिष्ठात्री हैं सम्पूर्ण सम्मोहन, वशीकरण, स्तम्भन, विद्वेषण, उच्चाटन, और मारण इन सभी कर्मों को सिर्फ एक ही साधना से सीख या किया जा सकता है, माँ बागला के बारे में हालांकि मेरे ख्याल से सभी जानते हैं क्योंकि तना ज्यादा लिख जा चूका है कि अब किसी भी तरह के लेख की आवश्यकता नहीं है अतः सीधे ही मूल विधान पे आ रही हूँ |



साधना विधान


v  प्रस्तुत साधना में पूर्ण पवित्रता ब्रह्मचर्य का पालन करना है |


v  साधक को दिन में नींद नहीं लेनी है, न व्यर्थ कि बातचीत करे, पूर्ण ब्रहमचारी व्रत का पालन करें


v  साधना काल में साधक बगलामुखी यंत्र , या चित्र स्थापित कर उसके सामने मन्त्र जप करे |


v  साधना काल में ही साधक न तो बाल कटवाए ना ही किसी प्रकार का क्षौर कर्म करे|


v  यह साधना या मन्त्र जप रात्री में ही होता है अतः साधक मन्त्र जप कि क्रिया रात्री १० बजे से प्रातः ४ बजे के बीच करे परन्तु जो साधना संपन्न कर चुकें हैं वे साधक दिन में भी मन्त्र जप कर सकतें हैं |


v  साधना काल में दीपक के लिए जिस रुई का उपयोग करें उसे पहले ही पीले रंग में रंग कर सुखा ले व दीपक के लिए गौ के घी में हल्दी मिला ले या फिर पीली सरसों का तेल उपयोग में लायें |



v  जो कौल साधक हैं वे साधना में कुलाचार का पूजन, वीर साधना, चक्रानुष्ठान अवश्य ही करें जिससे पूर्ण सफलता प्राप्त हो सके |

पीले वस्त्र, पीला आसन, उत्तर दिशा जप संख्या १,२५००० या लघु अनुष्ठान ५१,०००, ३१,००० २१,००० का भी संपन्न कर सकते हैं |  ये बगला साधना है, प्रयोग नहीं, यदि प्रयोग करना हो तो हि ३१ २१ का विधान करें किन्तु साधना तो सवा लक्ष से हि संपन्न होती है और उसी अनुसार नियम संयम का ध्यान रखें |



विनियोग :-


अस्याः श्री ब्रह्मास्त्र-विद्या बगलामुख्या नारद ऋषये नम: शिरसि | त्रिष्टुप् छन्दसे नमो मुखे | श्री बगलामुखी देवतायै नमो हृदये | ह्रीं बीजाय नमो गुह्यो | स्वाहा शक्तये नम: पादयो: | ॐ नम: सर्वांगे |श्री बगलामुखी-देवता-प्रसाद सिद्धयर्थे न्यासे विनियोगः |


Asyaah  shree  brahmaastr-vidya  bagalaamukhyaa  naarad  rishaye  namah  shirasi .  trishthup  chandase  namo  mukhe .   shree bagalaamukhi  devataayai  namo  hridaye .  hreem  beejaay  namo  guhyo .  swahaa  shaktaye  namah  paadayoh .  aum  namah  sarwaange .  shree  baglaamukhi-devataa-prasaad  siddhyarthe  nyaase  viniyogah .  




आवाहन :-


ॐ ऐं ह्रीं श्रीं बगलामुखी सर्व-दुष्टानां मुख स्तम्भिनी सकल-मनोहारिणी

अम्बिके इहागच्छ सन्निधिं कुरु सर्वार्थं साधय साधय स्वाहा |


Om ang hreem shreem baglamukhi sarv-dushtanam  mukh
 stambhini
Sakal-manoharini ambike ihagacch sannidhim kuru sarvartham sadhay 

Sadhay  swaha  .




ध्यान :-


ॐ सौवर्णासनसंस्थितां त्रिनयनं पीतांशुकोल्लासिनीं हेमाभांगरूचिं

शशांकमुकुटां सच्चम्पकस्त्रग्युताम् | हस्तैर्मुद्गरपाशवज्ररशनाः सविंभ्रतीं

भूषणैर्व्याप्तागीं बगलामुखीं त्रिजगतां संस्तम्भिनीं चिन्तयेत् ||




Om sauvarnsansansthitaam  trinayanam pitamshukollasinim hemabhangruchi

Shshankmukutam sacchmpakstrgyutam . hastaymurdgarpaashvjrarshnah  savimbhratim

Bhushnayvyarptaagim baglamukhim trijagatam sanstambhini chintyet .






माला मंत्र :-  
    

ॐ नमो भगवती, ॐ नमो वीरप्रतापविजय भगवती, बगलामुखी!

मम सर्वनिन्दकानाम् सर्वदुष्टानाम वाचम् मुखम् पदम् स्तम्भय,

जिव्हाम मुद्रय मुद्रय, बुद्धिम् विनाशय विनाशाय, अपरबुद्धिम कुरु,

कुरु, अत्मविरोधिनाम् शत्रुणाम् शिरो, ललाटम् मुखम्, नेत्र, कर्ण,

नासिकोरू, पद, अणु-अणु, दन्तोष्ठ, जिव्हा, तालु, गुह्य, गुदा, कटि,

जानु, सर्वांगेषु केशादिपादान्तम् पादादिकेश्पर्यन्तम् , स्तम्भय स्तम्भय,

खें खीं मारय मारय, परमंत्र, परयंत्र, परतन्त्राणि, छेदय छेदय, आत्ममन्त्रतंत्राणि

रक्ष रक्ष, ग्रहम निवारय निवारय , व्याधिम् विनाशय विनाशय, दुखम् हर हर,

दारिद्रयम् निवारय निवारय, सर्वमंत्रस्वरूपिणि, दुष्टग्रह, भूतग्रह, पाषणग्रह,

सर्वचाण्डालग्रह, यक्षकिन्नरकिम्पुरुषग्रह, भूतप्रेत पिशाचानाम्, शाकिनी

डाकिनीग्रहाणाम, पूर्वदिशम् बंधय बंधय, वार्ताली! माम् रक्ष रक्ष, दक्षिणदिशम् बंधय

बंधय किरातवार्ताली! माम् रक्ष रक्ष, पश्चिमदिशम् बंधय बंधय, स्वप्नवार्ताली! माम्

रक्ष रक्ष, उत्तरदिशम् बंधय बांधय भद्रकालि! माम् रक्ष रक्ष, ऊर्ध्व दिशम् बंधय

बंधय उग्रकाली! माम् रक्ष रक्ष, पाताल दिशम् बंधय बंधय बगला परमेश्वरी! माम्

रक्ष रक्ष, सकल रोगान् विनाशय विनाशय, शत्रु पलायनम् पंचयोजनम्ध्ये

राजजनस्वपचम् कुरु कुरु, शत्रून दह दह, पच पच, स्तम्भयस्तम्भय, मोहय मोहय,

आकर्षय आकर्षय, मम शत्रून् उच्चाटय उच्चाटय हुम् फट् स्वाहा |



Om namo bhagvati, om namo virpratapvijay bhagvati ,baglamukhi !

Mum sarvnindkanam sarvdushtanam mukham padam stambhay

Jivham mudray mudray buddhim vinashay vinashay aparbuddhim

Kuru kuru aatmvirodhinam shatrunam shiro lalatam mukham netra karn

Nasikoru pad anu-anu dantoshth jivha talu guha guda kati janu sarvangeshu

Keshadipadantam padadikeshparyantam stambhay stambhay, kem khim

Maray maray parmantra paryantra partantrani cheday cheday  aatmamantratantrani

Raksh raksh , graham nivaray nivaray sarnmantraswarupini dushtgrah, bhutgrah, paashangrah,

Sarvchandalgrah, yakshkinnarkimpurushgrah , bhutpret pishachanam , shakini

Dakinigrahanam  purvdisham bandhay bandhay,  vaartaali  maam raksh raksh,  dakshindisham  bandhay

bandhay swapnvaartaali  maam raksh raksh,  paschimdisham  bandhay bandhay,  ugrakaali  maam raksh

raksh,  paataaldisham bandhay bandhay,  baglaa parmeshwari  maam raksh raksh, sakal rogan

Vinaashay vinaashay, shatru palaayanam panchyojanmadhye  rajajanaswapacham kuru kuru,

Shatroon dah dah, pach pach, stambhay stambhay, mohay mohay, aakarshay aakarshay, mam

Shatroon ucchaatay ucchaatay,  hum fat swaha.




चूँकि ये माला मन्त्र साधना है अतः इसमें हवन विधान नहीं है , तथा पूर्णाहुति के लिए अंतिम दिवस बेसन के लड्डुओं का भोग लगाकर पूर्ण विधि विधान से पूजन आरती संपन्न करें व तीन पांच या नौ कन्याओं को भोजन वस्त्र व दक्षिणा देकर विदा करें | शेष सदगुरुदेव कृपा ही केवलं----- J

निखिल प्रणाम

रजनी निखिल

***NPRU***