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Monday, January 15, 2018

षट्कर्म और सेमीनार

(आवाहन) 


गोक्षीधारधवल घनसुन्दर खं,  चिन्तामणि चतुर्वेदमयं जनेशः |
गंधप्रियं चिन्मघं चिर्जिवितं त्यं, नमामि निखिलेश्वर पाद निर्मिलम ||

तांत्रिक षट्कर्म—

तन्यते विस्तार्यते ज्ञानमनेन इति तन्त्रं"

अर्थात जिसके  आधार पर ज्ञान का विस्तार किया जाता है उसे तंत्र कहते हैं, सदगुरुदेव के  अनुसार तंत्र शब्द की उत्पत्ति ‘तनु धातु’ से एवं और्णादिक ‘ष्ट्रन’ प्रत्यय के योग से हुई है . शक्ति और तंत्र को अलग नहीकिया जा सकता ये एक दुसरे के पर्याय हैं क्योंकि इनमें पूर्ण रूप से सम्बन्ध है तंत्र के बिना शक्ति प्राप्त नहीं की जा सकती और वहीँ शक्ति तंत्र आधीन होती है  अतः जिस साधक या शिष्य को शक्तिसंपन्न बनाना है तो उसे तंत्र अपनाना ही होगा |

 यदि किसी साधक ने तंत्र क्षेत्र का नाम सुना हो और उसे षट्कर्म के बारे में न पता हो ऐंसा हो ही नहीं सकता क्योंकि ये तंत्र कि अति आवश्यक विधा है हालाँकि ये भी सत्य है कि इसका उपयोग सामाजिक कार्यों के लिए जैसा होना चाहिए था वैसा हुआ नहीं है क्योंकि इसके कई अर्थों के अनुसार इसे जन सामान्य में मैली विद्या जैसी मानी जाती है , किन्तु वास्तविकता में ऐंसा है नहीं ये एक अति उच्च और विशिष्ट विद्या का स्वरुप है जिसके अनेकों आयाम हैं | पर अभी तो आवश्यक ये है कि हम यह जान सके कि तांत्रिक षट्कर्म है क्या ?

वशीकरण या आकर्षण, शांति, स्तम्भन, विद्वेषण, उच्चाटन, मारण ये छः प्रकार के कर्म या साधनाओं के वर्गीकृत के सम्मिलित स्वरुप को षट्कर्म कहते हैं और इनका सामान्य सा अर्थ है
१-      वशीकरण- अर्थात किसी को भी अपनी आज्ञानुसार चलाना यानि वह आपकी प्रत्येक बात को माने | आपका रंग रूप कैसे भी हो किन्तु आपका आकर्षण इतना हो कि प्रत्येक व्यक्ति आपकी बात सुने आप जहाँ भी जाएँ सबकी आँखे आप पर हों और आप आकर्षण का केंद्र हों |

२-      शांति कर्म का साधारण सा अर्थ है, साधक पर किसी भी बुरे गृह या ग्रहों की अशुभ अशुभता का या जो देवि देवता जिनमें कुल देवी देवता से लेकर अनेकों ग्राम देवता और अन्य भी हो सकते हों उनके क्रोध और दुस्प्रभाव का प्रभाव का शमन हों सके ये क्रम शांति कर्म के अंदर आते हैं

३-      विद्वेषण का सामान्य अर्थ कि किन्ही दो व्यक्तियों के बीच मतभेद पैदा करना या झगडा करवाना |
४-      उच्चाटन, मतलब जी या मन का उचाट होना अर्थात जिस व्यक्ति पर ये प्रयोग पर किया जाता है उसे उसके इक्छित विषय से उसके मन को या जी को हटा देना |

५-      स्तम्भन का साधारण अर्थ है कि किसी कि गति कैसी भी रोक देना |

६-      मारण – अर्थात प्रयोग द्वारा किसी को भी मार देना मृत्यु देना |

किसी भी व्यक्ति को या साधक को तब तक तांत्रिक कहलाने का अधिकार नहीं है जब तक वो इन कर्मों की सिद्धि को पूर्णता के साथ सिद्ध न कर ले इस विधा को किसी अन्य दृष्टिकोण से न देखकर केवल इतना समझ लें कि मारण मोहन जो जाने वो सारा ब्रह्मांड पछाड़े |

सदगुरुदेव ने अपने पत्रका के प्रकाशन के प्रारम्भ काल में ही इस विषय की उपयोगिता और साधकों को इससे सम्बंधित भ्रांतियों को दूर कर इसका पूर्ण ज्ञान दिया था |

हमारा प्रयास भी इस पुस्तक के माध्यम से इन षट्कर्म को न केवल साहित्य के रूप में आप तक पहुचाना है अपितु प्रायोगिक रूप में आपको सिखाना भी है |

बशर्ते आप तैयार हों | इसके लिए  हम एक सेमीनार यानी प्रायोगिक कार्यशाला आयोजित कर रहें हैं जो भी साधक साधिका इसमें भाग लेना चाहते है वे समय रहते अपने नामांकन करवा लें इस हेतु आप हमारी मेल id पर अपना नाम और फोन न०  भेंजे जिससे बाकी कि जानकारी आपको दी जा सके |

हमारी इस कार्यशाला में संपन्न होने वाली प्रमुख साधनाएं व कार्यक्रम ---

षट्कर्म के प्रथम तीन कर्म वशीकरण, शांति और स्तम्भन को पूर्ण प्रायोगिक विधान से करवाना ,
षट्कर्म में षट्चक्र का विशेस महत्व है अतः मूलाधार चक्र को पूर्ण रूप से जाग्रत करने का विधान |

रस विज्ञानं अर्थात पारद विज्ञानं का प्राम्भिक ज्ञान

तीन दिन की कार्यशाला में पूर्ण साधनात्मक क्रियाएं

 स्नेही स्वजन !


5-6-7 फरवरी २०१८  आप सभी आमंत्रित हैं इन उच्च और विशिष्ट साधनाओं के प्रायोगिक ज्ञानार्जन हेतु कार्यशाला में और साहित्यिक ज्ञानार्जन हेतु हमारी तंत्र कौमुदी की “षट्कर्म और रस विज्ञानं के गुप्त रहस्य खण्ड” पुस्तक का नवीन संस्करण के साथ स्वागत है ---/\ 


***रजनी निखिल***
**एन पी आर यु ** 


Wednesday, January 3, 2018

MERA SAFAR



जय सदगुरुदेव

स्नेहिल स्वजन !

वो समय आ गया है जब कि मै आरिफ जी  के पदचिन्हों पर चलते हुए आपको तंत्र मंत्र साधना और ज्ञान के अनेक आयाम जहा से हम लोग गुजरकर यहाँ तक पहुंचे और इस राह में अनेक साधक अनेक गुरु भाई बहिन अनेक सन्यासी साधकों ने हमारा मार्गदर्शन किया उन सबके बारे में जानना आपका अधिकार है क्योंकि ये एक अकाट्य सत्य है कि कोई भी व्यक्ति सरलता से साधन के अयामो को बल्कि उच्च आयामों को छू भी नहीं सकता

हम बहुत भाग्यशाली हैं कि सदगुरुदेव परमहंस स्वामी निखलेश्वरानंद जी (डॉ नारायण दत्त श्री माली जी) का वरद हस्त हमारे शीश पर्थ और उन्होंने प्रत्येक पल हमारी ऊँगली थाम कर हमें इस मार्ग पर चलाया |

 अपने जीवन के उन पड़ावों को (जहाँ मैंने साधना सिद्धि प्राप्त की और जैसे मुझे गुरुदेव का मार्गदर्शन मिला साथ हि उनकी आदेश से जिन लोगों ने मुझे सिखाया) मै एक सीरिज के माध्यम से शेअर करती जाउंगी ताकि आप भी उस ज्ञान और उन व्यक्तित्व से परिचित हो सकें,
मैंने तंत्र को हि जिया और अभी भी तंत्र को ही जानने और समझने की कोशिश करती रहती हूँ इससे पहले कि मई अपनी यात्रा का विवरण आपसे शेअर करूँ आप सभी इसे समझे फिर आगे बढ़ेंगे 


जब सृष्टि की उत्पत्ति हुई तब त्रिदेव ने सृष्टि के सुगम सञ्चालन के लिए प्रत्येक पहेली
के समाधान  की एक गुप्त रचना कर रखी है... या यु कहे की पहेली की रचना ही
इसीलिए हुई की वो गुप्त रचना सृष्टि में प्रथम बार घटित हो कर एक अध्याय रचने
के लिए तैयार हो सके. और इसि गुप्त रचना कों हम प्रश्न का उत्तर या ताले की कुंजी

कह कर भी संबोधित करते है.  और साक्षर पांडित्य शब्दों में इसे तंत्र की संज्ञा दी
गई..
तंत्र, एक ऐसा शास्त्र जो समस्त हिंदू धर्मं का विश्वकोष बन कर स्थापित हुआ. जहा
विभिन्न पद्धतियों से साधना और उपासना का मार्ग प्रशस्त हुआ. तंत्र की उत्पत्ति
सृष्टि के उत्पत्ति से पहले ही हो चुकी थी.. जेसा की उपरोक्त कथं में कहा है की किसी
भि प्रश्न का हल पहले से ही नियोजित है या दूसरे शब्दों में हल के प्रकटीकरण में ही
प्रश्न की उत्पत्ति हुई.
तंत्र शास्त्र मुख्य रूप से आगम और निगम इन दो श्रेणियों में विभाजित है... इन के
आलावा यामल, डामर, उड्डिश आदि नामो के वर्ग में भि विभाजित हुए और साथ
ही साथ उपतंत्र भि स्थापित हुए. इस उपलक्ष में प्राचीन काल में ही ऋषि मुनि
महान तंत्राचार्यो ने हस्त लिखित मनु स्मृतियों में पूर्व से ही काली काल के लिए
भाविश्यित कर दिया था की “काली काल में तंत्र की आगम निगमता के वैतिरिक्त
अन्य कोई शास्त्र पर्याय स्वरूप शेष नहीं रहेगा जीवन की विकटता से निपटने के
लिए”
काली काल अर्थात कलियुग में जीवित रहने के लिए तंत्र ही एकमेव श्रेष्ठ मार्ग
स्थापित होगा और इसी कारण विलुप्त होती इस विधा के जैसे अब तक त्रिदेवो ने
विशेष नायक स्वरूप अवतरित होकर इसकी काट संसार कों दी...और जब फिर
स्थिति के विचल होते ही इसी के पुनः संस्मरण और स्थापन के लिए परम
वन्दनीय श्री निखिलेश्वरानंद जी  का अवतरण पूजनीयडॉ. नारायण दत्त श्रीमाली
जी के गृहस्थ रूप में हुआ और उन्होंने पुनः इस विधा कों एक नया श्वास प्रदान
किया है...उनकी एक सीख हमेशा याद रहती है की सब कहे पोथन की देखि पर मै
कहू आखन की देखि... वे मंत्र तंत्र यन्त्र या इतर विज्ञान के ना केवल रक्षक के रूप में
खड़े हुए अपितु वे इस काली काल के मंत्र तंत्र यन्त्र के सृष्टा भि हुए... उनके
अनगिनत पक्ष है जिस पर यहाँ लिखा जा सकता बस जगह कम पड़ती जायेगी
तंत्र अनुगमनता में प्राचीन काल से विभिन्न संप्रदायों की स्थापना की.. हालाँकि
बाह्य परिप्रेक्ष्यता से देखे तो सभी सम्प्रदाय शिव शक्ति के ही उपासक है.. इसलिए
जितने शास्त्र लिखे गए वे शाक्तागम और शैवागम पर ही निर्धारित है. केवल पद्धति
अलग होती है परन्तु उपासना फल एक सा ही होता है... अर्थात गंतव्य सदा से एक
ही रहा है उस ब्रम्ह का साक्षात्कार परन्तु मार्ग विभिन्न रहे है. मनुष्य सदा से
सर्जनशील रहा है और वही रचनात्मकता उसे एक से दो, दो से तीन संप्रदायों कों

रचित करने के लिए प्रेरित करती रही.. वह सदा से अद्वितीयता कों प्राप्त करना
चाहता रहा है और यही उसकी प्रेरक शक्ति भि रही है. तो यहाँ में संप्रदायों के
यथासम्भव प्राप्त विभिन्न नाम कुछ इस प्रकार से है –
१.   कौल मार्ग जिसे कुल मार्ग कौल मत भि कहा जाता है.
२.   पाशुपत मार्ग
३.   लाकुल मार्ग
४.   कालानल मार्ग
५.   कालमुख मार्ग
६.   भैरव मत
७.   वाम मत
८.   कापालिक मत
९.   सोम मत
१०.                    महाव्रत मत
११.                    जंगम मत
१२.                    कारुणिक या कारुंक  मार्ग
१३.                    सिद्धांत मार्ग जिसे रौद्र मार्ग भी कहा गया है
१४.                    सिद्धांत मत शैव मार्ग
१५.                    रासेश्वर मत
१६.                    नंदिकेश्वर मत
१७.                    भट्ट मार्ग
उपरोक्त मार्गो में से कुछ मार्ग बहुत ही प्रचालित रहे.. मतलब की उस मार्ग कों
अनुगमन करने वाले साधक की तादाद ज्यादा रही... परन्तु काल के फेर में कभी
कोई मार्ग बहिष्कृत होता तो कभी कोई.. इसी के चलते मान्यता प्राप्ति हेतु बहुत से
मतों का मिश्रण होकर नए मतों का अवतरण भि होता गया.. कुछ मार्ग बहुत ही
गुप्त रूप से अवलंबित होने लगे थे. जो केवल गुरुमुखी परम्परा में ही चलते है अब...
प्रश्न ये उद्भवित होता है की इतने विविध मत मार्ग क्यों?  जब एक ही मार्ग से
अभीष्ट की प्राप्ति हो सकती है. लेकिन एक पक्ष विचारणीय बिंदु यही रहा है की
उपासना मार्ग में सबसे श्रेष्ठ मार्ग तभी प्रमाणित हो सकता है जब आपने सभी मार्गो
कों अवलंबित कर प्रत्येक साधना यात्रा कों अनुभूत किया हो.. और उसी के आधार

पर इसका निष्कर्ष संभव है. परन्तु फिर प्रत्येक का निष्कर्ष भिन्न हो सकता है.
क्युकी व्यक्ति भिन्न तो मत भी भिन्न...
अब दूसरा पक्ष कुछ इस प्रकार से हो सकता है की प्राचीन तंत्राचार्यो ने जब
संप्रदायों की पद्धतियों कों मिश्रित किया तो उसके परिणाम तीव्र एवं अत्यंत
प्राभावी मिले और समय अनुरूप भि...
जैसे किसी सम्प्रदाय के गुरु के पास अगर दूसरे सम्प्रदाय के शिष्य ने तंत्र ज्ञान की
याचना की. सुपात्र  शिष्य कों गुरु स्वयं ढूढते है तो मिलने पर नाकारा कैसे जा
सकता है.. परीक्षित होने पर गुरु उसे शक्तिपात कर उस सम्प्रदाय की गुरु परंपरा
कों निर्वाहित करते है. और उसी ज्ञान के आधार पर शिष्य एक नविन अध्याय रचते
है.. और दो संप्रदायों का उनके सिद्धांतों का कुछ इसी तारह मेल एक नए सम्प्रदाय
के अध्याय कों जन्म देता रहा..यहाँ जरुरी नहीं की सभी शिष्यों से यह होता रहता
हज़ारो में से इक्का दुक्का ही इस इतिहास के रचयिता बने...
इसी प्रकार तंत्र की गुह्य से गुह्य जानकारी कों पुनः अगले लेख में प्रस्तुत करने की कोशिश करुँगी ....

निखिल प्रणाम 


***रजनी निखिल ****
   ****NPRU ****


Tuesday, September 5, 2017

pitra dosh nivaran sadhna and tarapan


pitra dosh nivaran sadhna, tarapan 


“सर्वात्मकं सर्वज्ञं सर्वशक्तिसमन्वितं पित्तरेश्वराय नमः”
जय सदगुरुदेव /\
स्नेही स्वजन !
मानव जीवन परा अपरा शक्तियों के द्वारा हि चलायमान है किन्तु इन शक्तियों पर हमारा पूर्ण रूप से नियंत्रण नहीं अतः जिस प्रकार का जीवन व्यक्ति जीना चाहता है वह उसके लिए संभव नहीं हो पाता, चाहे वह धनि हो या निर्धन अनेकानेक समस्याएं आती जाती रहती हैं उसे कई दृष्टियों से समस्याएं झेलना पड़ता है | क्या इनसे सुलझने के कोई उपाय हैं ? क्या हम उन्हें पहचान नहीं सकते ? कि कौन हमें सहयोग प्रदान करेगा और कौन नहीं किसकी शक्ति हमें प्राप्त हो सकती है यदि शत्रु हमें परेशां कर रहा है तो उसे कैसे रोका जाये या अन्य कोई बाधा है तो उसे कैसे कंट्रोल किया जाये |
जहाँ तक सही मार्गदर्शन का या सहयोग का सम्बन्ध है, तो वह है गुरु | क्योंकि बगैर गुरु के निर्दिष्ट दिशा प्राप्त नहीं हो पाती जीवन के प्रत्येक पक्ष को गुरु द्वारा सुद्रण बनाया जा सकता है किन्तु योग्य गुरु के अभाव में कभी कभी जीवन नष्ट भी हो जाता है इसलिए शास्त्रों में गुरु के चुनने को अति महत्वपूर्ण बताया गया है ....
और गुरु के पश्चात् सबसे बड़ा सहयोगी परिवार होता है और उसमें भी हमारे वरिष्ठ और पूर्वज | जीवित रहते हुए कभी आपस में मनमुटाव या मतभेद हो सकते हैं किन्तु यही विषय मृत्यु के पश्चात् समाप्त होजाती है और जिस प्रकार माता पिता अपनी संतान को सदैव योग्य और सामर्थ्यवान देखना चाहते हैं उसी प्रकार पूर्वज भी यही चाहते हैं कि उनके वंसज अपने जीवन में पूर्ण रूप से सुखी संपन्न हों |
शास्त्र सम्मत है और सिद्ध है कि मृत्यु जीवन का अंत नहीं है इसके बाद का जीवन हि अधिक शक्तिशाली प्रभावकारी और सामान्यतः अनियंत्रित है | भौतिक जीवन कि सभी रुकावटें और गतिविधियों से परे है और मृत्यु के पश्चात् प्राणी एक तेज शक्ति पुंज बन जाता है |
गीता के अनुसार – व्यक्ति के जीवन का अंत होने से जीवन यात्रा समाप्त नहीं होती बल्कि एक तरह से पुराने वस्त्र छोड़कर नए वस्त्र धारण करती है | आत्मा स्थूल शरीर को त्याग कर सूक्ष्म शरीर को धारण करती है विभिन्न मतों के अनुसार – आत्मा मृत्यु के बाद भी अपने सम्बन्धियों के आसपास मंडराती रहती है मोहवश वे उनसे दूर नहीं जा पाती और उनके नजदीक हि रहती है | चूँकि वे सूक्ष्म रूप में होने से सबको देख सकती हैं किन्तु हम उन्हें नही देख पाते | और यही वजह है कि हम उनके प्रति लापरवाह हो जाते है और उन्हें सही पूजा भावना आदि नहीं दे पाते फलस्वरूप वे हमसे निराश होती जाती हैं और वे हमसे रुष्ट हो जाती हैं जिससे जीवन में अनेक बाधाएं और समस्याएं आने लगती हैं |
हम समझ हि नहीं पाते कि आखिर क्या वजह है कि इन समस्याओं से निपट नहीं पा रहे हैं |
किन्तु अब कालान्तर से वर्तमान में बहुत अधिक परिवर्तन आया है लोग हमारी प्राच्य ज्योतिष विद्या की ओर अग्रसर हुए और हो रहें हैं जिससे हमें अनेक वे बातें मालूम हो जाती है जिनसे बाधा आने वाली है या आ सकती है और हम सतर्क भी हो रहे हैं हालंकि इस क्षेत्र में भी काफी भटकाव है किन्तु फिर भी कहीं न कहीं से सही  मार्गदर्शन मिल हि जाता है | ज्योतिष में कुंडली के आधार पर देखा जा सकता है कि हमारी लग्न कुंडली में पित्र दोष है या नहीं सूर्य ,चन्द्र के राहू केतु से पीड़ित होने पर ये दोष लगता है और व्यक्ति इसी में उलझा रह जाता है
सदगुरुदेव ने अपनी अनेक मेग्जिन और बुक्स में पित्तरों की शक्ति सामर्थ्य और उनकी साधना पर जोर दिया है और प्रकाश भी डाला है ताकि उससे हम लाभ उठा सकें | ऐंसी हि एक विशिष्ट साधना हम इस बार करेंगे,
 पित्तरेश्वर की शक्ति सूक्ष्म होने कारण अति विशाल और शक्ति एवं सिद्धि के स्वरुप हो जाते हैं उत्तम होने के कारन वायु स्वास्थ्य गर्भ आदि के नियंत्रक भी हो जाते हैं अपनी शक्तियों से आने वाली प्रत्येक घटना जानकारी उन्हें होती है अतः वे अपने वंसज को सही मार्ग दिखा कर ऐसे कार्य की ओर प्रवृत्त कर देते हैं जिससे उनकी पूर्ण उन्नति हो सकें फिर उनके लिए कोई भी कार्य असंभव नहीं रह पाता किन्तु आवश्यकता केवल इस बात की है कि हमारे पूर्वज पूर्ण रूप से प्रसन्न हों इसके लिए हमें उनकी पूजा साधना ध्यान और पवित्र भावना का ध्यान रखना होगा |
शास्त्र, धर्म आदि में रूचि और विस्वाश रखने वाला व्यक्ति सदैव अपने प्रत्येक शुभ कार्य करने से पहले अपने पितृ देवों का आवाहन और ध्यान और पूजा जरुर करता हैं किन्तु केवल इतना ही काफी नहीं होता उन्हें अपने अनुकूल बना कर अपना सहयोगी बनाने हेतु विशेस साधना की आवश्यकता भी होती है शास्त्रों के अनुसार श्राद्ध दिवस या पित्र पक्ष शुभ कार्यों के अनुकूल नहीं होते | इस समय वायु की गति विशेस प्रकार की होती है और आकाश में तारा मण्डल का एक विशेस समूह बनता है और जिससे इस समय पूर्वज पित्र सूक्ष्म मार्ग से पृथ्वी लोक पर आते हैं और पूर्ण गति से भ्रमण करते हैं इस समय यदि कोइ व्यक्ति पूर्ण विधि विधान से पित्तरेश्वर साधना करता है तो उसे पूर्ण रूप से और सरलता से सफलता प्राप्त होती है
ये एक अटूट सत्य पितरों के कारण ही वर्तमान का शरीर अस्तित्व में आ पाया है उनके द्वारा पालन पोषण और जीवन को बनाने में उनके सहयोग को भुलाया नहीं जा सकता किन्तु हम यही भूल जाते हैं जबकि इस भूल का तात्पर्य है कि आप स्वयम के अस्तित्व को ही नकारना | अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान भक्ति की भावना निरंतर प्रकट करना और उनकी साधना करना हर दृष्टि से आवश्यक है और यही तर्पण है |
इस बार श्राद्ध दिवस भाद्रपद शुक्ल पक्ष 15 पूर्णिमा  6-9-2017   प्रथम दिवस से  20-6-2017 तक है
साधना विधान –
आवश्यक सामग्री- सफ़ेद वस्त्र सफ़ेद आसन अपने लिए, एक कपडा सफ़ेद जो कि बजोट पर बिछाने हेतु,
ताम्बे का पात्र पांच तीन मुखी काले रुद्राक्ष, ११ लघु नारियल, सिन्दूर, चावल कुमकुम हल्दी काले तिल, घी और रुद्राक्ष माला |
प्रथम दिन प्रातः स्नानादि से निवृत्त होकर जहा आपको पूजन करना है उस स्थान को धो पोंछ कर साफ करलें फिर दक्षिण की ओर मुह कर करके एक बाजोट पर सफ्र्द वस्त्र बिछाकर काले तिल की ढेरी पर पांचों रुद्राक्ष स्थापित कर दें ,उनके पीछे चावल की ढेरी पर अर्द्ध चन्द्राकार ११ लघु नारियल स्थापित करें सामने एक घी का दीपक प्रज्वलित करें, अब ताम्र पात्र में जल भरकर बाहर जाएँ और सूर्य को अर्ध्य दें फिर अपनी अंजुली में जल लेकर निम्न मंत्र के साथ अर्ध्य दें –
ॐ लं नम:
ॐ वं नमः
ॐ रं नमः
ॐ यं नमः
तत्पश्चात बिना किसी की ओर देखे अन्दर आ जायें और आसन पर बैठकर संकल्प लें कि –मै अमुक गौत्र का अमुक नाम  व्यक्ति अपने पितरों की प्रसन्नता और कृपा प्राप्ति हेतु इस साधना को समपन्न कर रहा हूँ | घी तिल मिलकर रख लें और निम्न ध्यान मन्त्र का पूर्ण श्रद्धा भाव से जप करते हुए तिल घी पांचों रुद्राक्ष पर अर्पित करें इस मन्त्र का पांच बार जप करना है तथा पांच बार ही चढ़ाना है
स्व शरीरं तेजोमय पुण्यात्मकं पुरुषार्थसाधनम
पित्तरेश्वराराधनयोग्यं ध्यात्वा तस्मिन् शरीरः
सर्वात्मकं सर्वज्ञं सर्वशक्ति समन्वितम
पित्तरेस्वरामय आनंद स्वरूपं भावयेत ||
इस प्रकार अत्यंत पवित्र मन और भावना से किया गए मन्त्र से पितृ देव प्रसन्न भाव से आकर आसन ग्रहण कर उस पर प्रतिष्ठित हो जायेंगे | ये साधना मूल रूप आपकी भावना को प्रदर्शित करती है अतः भावना आदरणीय और भक्ति युक्त होना चाहिए | पूर्ण भक्ति भाव से श्रद्धा युक्त होकर पितृ देवों से हर द्रष्टि से सह्योग कि इक्छा प्रकट करें |
अब अर्ध्य चंद्राकार रूप में स्थापित लघु नारियल की केसर घी सिन्दूर चावल ,और तुलसी पत्र आदि से पूजा करे.
अब रुद्राक्ष माला से निम्न मन्त्र की पांच माला जप करें
 “ॐ सर्व पित्र प्रं प्रसन्नो भव”  
Om sarva pitra pram prasanno bhava
इस
प्रकार पूरे 15 दिन श्राद्धों में इस साधना को संपन्न करना है अंतिम दिवस यानि पितृ मोक्ष अमावस्या को साधना संपन्न कर भोजन और मिष्ठान्न के साथ तर्पण कर सभी सामग्री को उसी वस्त्र में लपेट कर जल में में प्रवाहित कर दे या शमशान में रख आवे |
इस तरह से किया गया तर्पण और पूजन न केवल पित्रदोश मुक्त करेगा अपितु पित्तरो को प्रसन्न भी करेगा और उनकी कृपा से आपकी चहूँ ओर उन्नति होने लगेगी |
अकाट्य सत्य—पूर्ण श्रद्धा भाव से की गयी साधना फलित होगी ही तो स्वयम संपन्न करें ओर अनुभव करें ---
 ****RAJNI NIKHIL****
    **** N P R U****


Wednesday, May 10, 2017

छिन्नमस्तकाम व्ज्राविरोचिनी स्वाहा


यस्यां प्रभवात शान्तं समेधाम







जय सदगुरुदेव /\
स्नेही स्वजन !
 आप सभी को छिन्नमस्ता जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं –
माँ छिन्नमस्ता भगवान शिव का ही प्रकृति स्वरुप है अर्थात शिवा
समस्त समस्याओं को पल भर में छिन्न भिन्न करने वाली एक मात्र महाविद्या...
शरीर को वज्र की कठोर करने वाली-
राजकीय बाधा से मुक्त कर विजय दिलाने वाली—
शत्रुओं से रक्षा करने वाली—
किसी भी प्रकार से तंत्र बाधा से मुक्त रखने वाली—
सुख संपत्ति प्रदान करने वाली—
महा शमशान की अधिष्ठात्री—
शमशान की सभी साधनाओ को निर्विघ्न पूर्ण करने वाली इस महाविद्या के अवतरण दिवस पर साधना सम्पन्न कर अपने जीवन को निष्कंटक करें, और सुखी सम्पन्न जीवन का आगाज करें |
इन्ही शुभकामनाओ के साथ---
साधना पथ अग्रसर होने वाले साधकों के लिये अति महत्वपूर्ण साधना है ये  साधना उन साधकों को के लिए जिन्हें साधना पूर्ण करने में कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है | साधना मार्ग में आने वाली कठिनाइयों को दूर करने के लिए अति उत्तम है |
साथ हि तंत्र बाधा शत्रुओं से सुरक्षा और अनेकों आयामों को प्रदान करने वाली साधना है इस साधा को संपन्न करने पर साधक सभी दृष्टियों से सुखी समपन्न होता है वह स्वयम में इतना सक्षम और प्रभावी हो जाता कि शत्रू पक्ष सदैव भयभीत रहता है और साधक उस पर हमेशा प्रभावी रहता है |
इस साधना में साधना सामग्री में सिर्फ लाल आसन लाल वस्त्र और काली हकीक माला ही चाहिए यदि यंत्र हो तो उत्तम अन्यथा छिन्नमस्ता पिक्चर भी चल जायेगा | बस आप सब साधनाएं करें यदि समयाभाव के कारण प्रतिदिन ना भी  करें तब भी विशेस तिथित्यों अवश्य करें हमेशा उर्जा मिलती रहेगी,
स्नान से फ्री होकर दक्षिण मुख हो बैठे जो व्यक्ति पूर्ण सात्विक मेरा मतलब है दक्षिण मार्गी है वैष्णव हैं वे उत्तर हो कर बैठें और घी का दीपक लगावें बाकि सरसों के तेल का दीपक हि लगेगा |
देवि का ध्यान करें –
भास्वन्मंडल मध्यगाम निजशिशिछिन्न विकीर्णानल,
स्फरास्यम प्रपिबद्ध्गलात्स्वरुधिर वामे करे विभातीम |
याभास्क्तरतीस्मरोपगिताम सख्यो जिने गकिनी ,
वार्णिन्यो परिद्रश्यम कलितां श्री छिन्नमस्तां भजे |
यंत्र पर कुमकुम चढाते हुए पांच बार मूल मन्त्र का उच्चारण करें एवं अक्षत चढाते हुए पूजा करे |
अब काली हकीक माला से निम्न मंत्र की ७५ माला जप संपन्न करें |
ॐ ह्रीं ग्लों सर्व दारणाये फट्
OM HREEM GLAUM SARVA SARV DARNAYE FATTA
इसके बाद पूर्णता हेतु २१ दिनों तक एक माला प्रतिदिन करें |
साधना में पूर्ण सफलता प्राप्त हो ऐंसी शुभ कामनाओं के साथ –
रजनी निखिल

निखिल प्रणाम

 

Sunday, April 9, 2017

रस विज्ञानं और पारदेश्वर साधना








पारद शिवलिंग--- हरित सकल रोगान्मुर्छितो यो नराणां, वितरित किलबद्ध: खेचरत्वं जवेन |
               सकल सुर्मुनिन्द्रैर्वंदितं शम्भुबीजं, स जयति मयसिंधो: पारद: पार्दोयऽम ||

जय सदगुरुदेव /\

कुछ प्रश्न आपके और यथोचित उत्तर हमारे |

स्नेही भाइयो !

अभी कुछ समय पूर्व पारद यानि रस विज्ञान पर कुछ गोपाल कृष्णा ने पारद शिवलिंग और तत्वमसि क्रिया पर एक बहुत ही महत्वपूर्ण लेख पोस्ट किया , इससे आप लोगों के कुछ प्रश्न हैं और कुछ साधना से सम्बंधित भी मै अपनी जानकारी और ज्ञान के आधार पर उनका उत्तर देने का प्रयास कर रही हूँ |

रस विज्ञान या रस तंत्र ६४ तंत्र में सबसे प्राचीन और गूढतम और रहस्यमयी विद्या कही गयी है | इस विद्या की उपलान्धियों का जितना भी प्रचार प्रसार हुआ, उसके अनुसार इस विद्या की तरफ किसी का भी आकर्षण होना स्वाभाविक है इस विज्ञानं का पूर्ण आधार है पारद, जो कि एक अद्भुत धातु है | इसी को पारा एवं रस आदि के नाम से संबोधित क्या गया है |

ये दिव्य धातु सब धातुओं में अनूठी युआ रहस्यमयी गुणों से युक्त है क्योंकि यह शिव बीज है यानि भगवन शिव का वीर्य , किन्तु प्रथ्वी पर प्रदूषण होने की वजह ये दूषित अवस्था में ही पाया जाता है किन्तु इसी पारे का शोधन कर लिया जाये अर्थात इसको दोष मुक्त कर लिया जाये तो ऐंसा पारद कई-कई प्रकार की सिद्धियाँ प्रदान करने में समर्थ है |

ऐंसे पारद को अलग पदार्थों या मन्त्रों के संयोग से शोधित और संयोजन करके उच्चवर्ण की धातु में परिवर्तित किया जा सकता है और इसी वजह से ये लोगों के आकर्षण का केंद्र है क्योंकि भारत में ऐंसे कई अनिर्वचीय उदाहरण हैं जब कई विद्वानों ने कई कई बार पारद से रजत या स्वर्ण निर्माण की प्रक्रिया को प्रत्यक्ष किया |

उपरोक्त श्लोक रसमंजरी ग्रन्थ के प्रथम अध्याय का पंचम श्लोक है जो कि पारद के गुणों के सन्दर्भ में वर्णन प्रदर्शित करता है, पारद के माध्यम से समस्त प्रकार के रोगों की निवृति संभव है | यह खेचरी अर्थात वायुगमन आदि महासिद्धियों को प्रदान कर सकता है तथा यह शिव वीर्य एवं शिव स्वरुप ही है जो कि समस्त मुनि एवं सिद्ध गण के द्वारा उपासित एवं सतत  वन्दित है |

ऐंसे हजरों श्लोक हैं जिसमें पारद की प्रशंसा की गयी है पारद की अशुद्ध से शोधित क्रिया की तरफ यात्रा ही पारद विज्ञानं कहलाता है और इस क्रिया प्रक्रिया को संस्कार कहा गया है वस्तुतः पारद विज्ञानं  आधार भूत दो बातों पर ही है शुद्धि करण और सिद्धिकरण | शुद्धिकरण यानि पारद के समस्त मॉल यानि अशुद्धि को दूर करना विभिन्न पदार्थों के संयोजन से क्रियाओं के माध्यम से पारद को शोधित करना पारद के १८  संस्कार प्रचालन में हैं हालाँकि ये प्रक्रिया बहुत कठिन और श्रमसाध्य है क्योंकि इस प्रक्रिया को करने वाला अजर तथा रस मण्डल एवं आदि रस सिद्धों में शामिल हो जाता है, जैसे की आदि सिद्धि लंकेश, बयाडी, नाग्बोधिजी, नित्यनाथ जी इत्यादि इन सिद्धो के बारे में कहा गया है कि ये आज भी सशरीर जीवित हैं तथा तंत्र की क्रियाओं या सिद्ध आत्मा आवाहन के माध्यम से इनको प्रत्यक्ष कर इनसे आशीर्वाद और मार्गदर्शन प्राप्त किया जा सकता है इसलिए ये १८ संस्कार कठिन और दुस्कर कहे गएँ हैं

सिद्धिकरण— को गुणाधान भी कहा गया है अर्थात जो पारद शुद्ध हो गया उसके गुणों का विकास करना मूल अस्तित्व में आये पारद को सिद्धि की तरफ ले जाना, उसकी क्षमता का विकास करना | पारद के ८ संस्कार को शुद्धिकरण के लिए होते हैं जिसके माध्यम से पारे की मॉल दोष या सप्त कंचुकी को दूर किया जा सकता है क्योंकि दोषयुक्त पारा विष है, किन्तु यही पारद शोधित होने बाद अमृत हो जाता है, और किसी व्यक्ति के लिए ये नवीन जीवन दाता हो सकता है विभिन्न रस रसायन का निर्माण ऐसे हि शुद्ध पारद से किया जाता है जिससे व्यक्ति अपने शारीर को पूर्ण निरोग सिद्ध बना सकता है |

वस्तुतः जब पारद अग्निस्थाई यानि ३५६.७ सेंटीग्रेट पर टिका रहे और उसके वजन में कोई अंतर न आये
पारद के आगे के संस्कार उसके गुणों के के विकास करने एवं जिसके माध्यम से समस्त प्रकार की सिद्धियों को साधक प्रदान करने में सामर्थ्यवान बन सके, ऐंसी प्रक्रियाओं को बुभुक्षिकरण, गंधकजारण, अभ्रक सत्व पतन आदि गूढ़ क्रियाओं का समावेश होता है |

बुभुक्षित पारद के सन्दर्भ में साधकों के मध्य कई प्रकार की जिज्ञासा रही है तथा यह रहस्य का विषय रहा है बुभुक्षित पारद का समान्य अर्थ ऐसा पारद जो कि भूखा हो जो पारद स्वर्ण का ग्रास करे, भक्षण कर ले, खा ले और इनसे हि शिवलिंग आय अन्य विग्रह निर्माण किया तो .... अर्थात इस पारद को यदि किसी विग्रह में ढाला जाये और उसे लक्ष्मी उपनिषद मन्त्रों से प्राणप्रतिष्ठित की जाये जाये तो वह विग्रह पूर्ण लक्ष्मी से युक्त होकर समस्त प्रकार के वैभव प्रदान करने वाला बनजाता है इसी प्रकार अन्य विग्रह जैसे पारद तारा, पारद काली, पारद लक्ष्मी, श्री यंत्र, पारद दुर्गा आदि चामुंडा तंत्र के मंत्रो प्रतिष्ठित किया जाये तो ये विग्रह पूर्ण चैतन्य होकर किसी भी साधना तंत्र को सिद्ध के लिए एवं प्रत्यक्षीकरण के लिए सबसे उपयुक्त माने गए है .


    पारद शिवलिंग, विग्रह :-

आठ संस्कारों से युक्त सम्पन्न पारद पूर्ण रूप से शुद्ध ,चैतन्य और विभुक्षित होता है ऐसे पारद में चंचलता चपलता नहीं होती, इससे निर्मित शिवलिंग अतितेजस्वी, अद्भुत, और वरदायक कहा गया है,ऐसे पारद से निर्मित शिवलिंग सही अर्थों में पारदेश्वर होंगे |
जिस व्यक्ति के घर में ऐंसा शिवलिंग स्थापित है तो उस घर में लक्ष्मी पूर्ण चैतन्य होकर स्थापित होती है, धन धान्य, धरा भवन कीर्ति आयु यश पुत्र पौत्र वहां और सम्पूर्ण सिद्धियों के साथ लक्ष्मी का निवास होता है  ऐसे घर पर तंत्र प्रयोग या किसी भी नकारात्मक उर्जा का प्रभाव नहीं होता या प्रवेश ही हो पता है |
स्वयं शिव उवाच—

पार्देश्वरम स्थापित्यम लक्ष्मीं सिद्धं ताड गृहे |
धन धान्यं धरा पौत्रं पूर्ण शौभाग्यम वे नरः ||

भगवान् शिव ने कहा है कि जिसके घर में ऐंसा शिवलिंग स्थापित होता है उसके घर में मेरे साथ लक्ष्मी कुबेर और सौभाग्य निश्चय हि स्थापित हो जाते हैं
लक्ष्मी उपनिषद में स्वयम लक्ष्मी ने कहा है—

यत्र पार्देश्वरम देवं तत्रऽमवर सिद्धियुतः |
तत्र नारायणे साक्षात् तत्र त्रैलोक्य संपदा: ||

जिस स्थान पा पारद शिवलिंग स्थापत होते हैं वहां पर मई अपने समस्त वरदायक रूप में स्थापित होती होने के लिए विवश हूँ, क्योंकि जहाँ पर भगवान पारदेश्वर हां साक्षात् नारायण भी उपस्तिथ हैं, और जहाँ नारायण हैं वहां मेरी उपस्तिथि अनिवार्य है ही—

ऐंसे एक जगह वशिष्ठ ने अपने ग्रन्थ में कहा है कि—

पारदेश्वरं  स्थापित्यं  सर्व पाप   विमुच्यते |
सौभाग्यं सिद्धि प्रप्यान्ते पूर्ण लक्ष्मी लभेत् नर: ||

अर्थात जिस जगह पारदेश्वर स्थापित हो जाते हैं वहां सभी पाप स्वयम क्षय हो जाते हैं अर्थात व्यक्ति के समस्त पापों एवं दोषों का शमन हो जाता है | ईश्वर ने चाहे उसके जीवन में दुर्भग्य ही क्यों न लिखा हो किन्तु मात्र पारदेश्वर के दर्शन से वह सौभाग्य को प्राप्त कर लेता है |
और मह्रिषी विश्वामित्र ने कहा है –

यः नरः प्राप्यते सिद्धिं पारदेश्वर संस्कारः |
अभावः दुःख दारिद्रय किं पप्यते त्वम् च द |

विश्वामित्र जी ने पारदेश्वर की महिमा कहते हुए कह है कि—आठों संस्कार संपन्न पारदेश्वर को प्राप्त करना ही जीवन का सौभाग्य है, जिसके गृह में ऐंसा पारदेश्वर स्थापित है, उसके जीवन में किसी प्रकार कोई भाव हो ही नहीं सकता |

रावण जो स्वयं रस सिद्ध थे और जिन्होंने पारदेश्वर की से अपनी पूरी नगरी को स्वर्णमयी बना कर ये सिद्ध किया कि पारदेश्वर की साधना से सब कुछ संभव है

पारदेश्वर महादेवः स्वर्ण वर्षा करोति य |
सिद्धियां ज्ञानद  मोक्षं पूर्ण लक्ष्मी कुबेराय: ||

रावन ने एक जगह कहा है कि—मैंने अनुभव किया है कि, पारदेश्वर के स्थापन, पूजन और साधना के आगे अन्य सभी साधनाएं प्रयोग और उपाय तुच्छ हैं, केवल पारदेश्वर के स्थापन से स्वर्ण वर्षा स्वर्ण निर्माण और स्वर्ण नगरी प्रक्रिया संभव है—

ऐंसे अनेक उदाहरण शास्त्र उल्लिखित हैं और पूर्ण प्रमाणिकता के साथ ---

***रजनी निखिल***

***निखिल प्रणाम***

Friday, March 31, 2017

माँ चंडी रहस्य और साधना विधान





सप्तशती महत्व और चंडी रहस्य साधना 

माँ दुर्गा के महात्म्य का ग्रन्थ सप्तशती शाक्त संप्रदाय का सवार्धिक प्रचलित ग्रन्थ है और यह भी निर्विवाद सत्य है कि जितना शाक्त सम्पद्रय में है उतना ही शैव-वैष्णव और अन्य संप्रदाय में भी है सभी संप्रदाय में समान रूप से प्रचलित होने वाला एक मात्र ग्रन्थ सप्तशती है

पाश्चात्य के प्रसिद्द विद्वान और विचारक मि. रोला ने अपने विचारों में सहर्ष स्वीकार किया है कि “सप्तशती के नर्वाण मन्त्र को (ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै) संसार की सर्वश्रेष्ठतम प्रार्थनाओं में परिगणित करता हूँ” |

सौम्या सौम्य तरा शेष सौमेभ्यस्वती सुंदरी ----- “देवि तुम सौम्य और सौम्यतर तो हो ही, परन्तु इतना ही, जितने भी सौम्य पदार्थ है, तुम उन सब में सब की अपेक्षा अधिक सुंदरी हो” |
ऋषि गौतम मार्कण्डेय आठवे मनु की पूर्व कथा के माध्यम से नृपश्रेष्ठ सुरथ एवं वणिक श्रेष्ठ समाधी को पात्र बनाकर मेधा ऋषि के मुख से माँ जगदम्बा के जिन स्वरूपों का वर्णन किया गया है .. वह सप्तसती का मूल आख्यान है |

शक्ति-शक्तिमान दोनों दो नहीं है अपितु एक ही हैं शक्ति सहित पुरुष शक्तिमान कहलाता है जैसे ‘शिव’ में इ शक्ति है---यदि (शिव) में से ‘इ’ हटा दें तो ‘शिव’ शव बन जायेंगे | प्रलय काल में  शिव सृष्टि उदरस्थ कर लेते हैं  व पुनः कालान्तर में सृष्टि निर्माण होता है तब संकल्प शक्ति द्वारा भगवान शिव और शक्ति एक होकर भी अनेक हो जातें .

एकोऽहंबहु श्याम्-----
प्रभु प्रकृति योगमाया का आश्रय लेकर पुनः जगत प्रपंच को चलाते हैं, एस प्रकार प्रवाह से संसार नित्य है सृष्टी प्रलयकाल अनुसार होते हैं अतः काल भी नित्य है | जिस प्रकृति के स्वाभाव के कारण यह संसार चक्र गतिमान है, प्रकृति महामाया ही नित्य है सब कुछ नित्य हि है अनित्य कुछ भी नहीं सम्पूर्ण ब्रहांड में कोई देवी मानते हैं तो कोई देव को | ब्रम्हवेवर्त पुराण के गणेश्खंड में बताया कि सृष्टि के समय एक बड़ी शक्ति पांच नामों से प्रकट हुई – राधा, पद्मा, सावित्री, दुर्गा और सरस्वती |

   जो परब्रह्म श्रीकृष्ण कि प्राणाधिष्ठात्री हैं और उन्हें प्राणों से अधिक प्रिय हैं  वे ही राधा कहलाएगी, जो देवि ऐश्वर्य की आधिष्ठात्री और समस्त मंगलों को करने वाली हैं वे हि परमानन्द स्वरूपिणी हैं देवि लक्ष्मी (पद्मा) नाम से विख्यात है जो विद्या की अधिष्ठात्री और परमेश्वर की दुर्लभ शक्ति हैं और वेदों शास्त्रों पुराणों तथा समस्त योगों की जननी हैं वे सावित्री नाम से प्रसिद्द हैं जो बुद्धि की अधिष्ठात्री देवि हैं सर्वग्यानात्मिका और सर्वशक्ति स्वरूपिणी हैं हैं वे हि माँ दुर्गा हैं जो वाणी की अधिष्ठात्री हैं शास्त्रीय ज्ञान को प्रदान करने वाली और श्री कृष्ण के कंठ से उत्पन्न हुई वे सरस्वती के नाम विख्यात हुई .....

इस प्रकार एक ही देवि या देव अनेकानेक नाम से प्रसिद्द होए हैं यह सृष्टी त्रिगुणात्मिका है | इसमें सत्व, रज-तमो गुण सदा से रहें हैं और रहेंगे सप्तसती में तीन चरित्र के मध्यम से ही तीनों गुणों को दर्शाया गया है मुख्य बात ये है कि कभी सत्व गुण की प्रधानता होती है तो कभी रजोगुण बढ़ जाता है और कभी तमों गुण की वृद्धि होती है इसी प्रकार मनुष्य भी सतोगुणी, रजोगुणी, और तमोगुणी रहें हैं और रहेंगे | जो गुणवान होते हैं उसकी उपास्य देवि भी वैसी ही होती है, भगवान् श्री कृष्ण ने गीता में कहा है कि जो सत्वगुणी प्रकृति के होते हैं वे परमात्मा के साक्षात् स्वरुप देवों की आराधना करतें हैं जो राजसी की प्रकृति के होते हैं यक्षों, राक्षसों की पूजा करते हैं और जो तमोंगुणी पुरुष हैं, वे भूत प्रेत पिशाचादी की पूजा करते हैं |

जिसका जैसा स्वाभाव है जिसकी जैसी प्रकृति है श्रद्धा उसी के अनुसार वह बर्ताव करेगा और वैसी फलश्रुति होगी, जिसके पूर्वजन्म कृत संस्कारानुसार प्रकृति और स्वाभाव होता है और कार्य करता है |
कुछ लोगों का मत है कि, शास्त्रों में मायारूपी भगवती की ही उपासना कही गयी है | यह माया वेदांत सिधान्तानुसार है अतः मुक्ति में उसकी अनुगति नहीं हो सकती अतः भगवती की उपासना अश्रद्धेय है नृसिंहतापिनी में स्पष्ट उल्लेख है नारसिंही माया ही सारे प्रपंच की सृष्टी करने वाली है वही सबकी रक्षा करने वाली और सबका संहार करने वाली है उसी माया शक्ति को जानना चाहिए | जो उसे जानता है  वह मृत्यु को भी जीत लेता है वही अमरत्व को महतीश्री को प्राप्त करता है |
इन सबसे एक ही बात स्पष्ट होती है कि भगवती मायारूपा ही हैं देवि भाग्वातादी के अनुरूप माया स्वयम जड़ा (जड़)है | इसी माया की उपासना का यत्र-तत्र सर्वत्र स्थानों में विधान है | कंतु ऐसा कहना ठीक नहीं है क्योंकि इसका भाव दूसरा है जो निम्न लिखित प्रमाण से सिद्ध है कि देवि साक्षात् ब्रहमस्वरूपिणी  है

सर्वे     वै   देवा   देविमुपस्थु:   कासि  त्वम् महादेविती |
साब्रवीत्-अहं ब्रह्मस्वरूपिणी | मत्त: प्रकृति पुरुषात्मकं जगत् |

अर्थात देवों ने ने देवि  के निकट पहुँच कर उनसे प्रश्न किया—कि आप कौन हैं, देवि ने कहा मै ब्रहम हूँ, मुझसे ही प्रकृति पुरुषात्मक जगत उत्पन्न होता है |

इसी प्रकार ‘अथ द्रयेषां ब्रह्मरन्ध्रे ब्रह्मरूपिणी भुवानाधीश्वरी तुर्यतीता है’ (भुवनेश्वरी उपनिषद) ‘स्वात्मैव ललित’ (भावानैक उपनिषद)  आदि वैदिक ग्रन्थों में भी तुर्यातीत ब्र्हम्स्वरूपा भगवती ही है, यह स्पष्ट है | त्रिपुरातापनी और सुन्दरितापनी आदि उपनिषद में परोरजसे आदि गायत्री के चतुर्थ चरण में प्रतिपाद ब्रहम के वाचक रूप में ह्रीं बीज को बताया गया है कलि तारा आदि उपनिषदों में भी ब्रह्मरूपिणी भगवती की ही उपासना प्रतिपादित है सूत संहिता में कहा गया है---

  अतः संसार नाशायै साक्षिणीमाल्य रूपिणीम् |
 आराध्येत् परां शक्तिं प्रपन्चोल्लासवर्जितम् |

अर्थात् संसार निवृत्त के लिए प्रपंच-स्फुरण शून्य सर्वसाक्षिणी आत्मारूपिणी परा शक्ति कि ही आराधना चाहिए |
सर्व व्याख्यान एवं प्रमाणों से निर्विकार निरंजन अनंत अच्युत निर्गुण ब्रह्म को ही भगवती का वास्तविक स्वरुप बतलाया गया है देवि भागवत में भी कहा में भी कहा गया है कि निर्गुण-सगुण भगवती के दो रूप है | सगुणों के लिए देवि सगुणा और निर्गुणों के लिए देवि निर्गुणा | यथा--- 

स्नेही स्वजन !

अब आपके लिए माँ आदि शक्ति की वो साधना जो त्रिशक्ति के जाज्वल्य मान स्वरुप की साधना है, उसका व्याखान है इन नव दिवस में पूर्व में दी चंडी साधना के साथ इस साधना को भी कर लिया जाये तो माँ की कृपा प्राप्त होती ही है

यूं तो हमारे ब्लॉग पर कुंजिका स्त्रोत आदि के प्रयोग दिए गए है किन्तु अब इसे संपन्न करें |
सिर्फ तीन दिवसीय साधना है

चूँकि नवरात्री में सभी ज्योत जलाते ही हैं और जो नहीं जलाते वो कम से कम तीन दिवस तक अखंड दीपक प्रज्वलित करे लाल आसन, लाल वस्त्र यदि वाम पंथी है तो दक्षिण मुख और दक्षिण पंथी है तो पश्चिम दिशा का उपयोग करे माँ दुर्गा का चित्र लाल आसन पर स्थापित कर सामने दीपक जलाएं और मन्त्र सिद्धि का संकल्प करें ...

गुरु गणेश और भैरव पूजन सम्पन्न कर कुंजिका स्त्रोत का एक बार पाठ करें एवं पूर्ण नवार्ण मन्त्र की ११ माला संपन्न करें --- माला लाल हकिक या मूंगा या रुद्राक्ष का प्रयोग करें ....

मंत्र---

“ॐ एंग ह्रींग क्लीं चामुंडायै   ॐ ग्लों हुम् क्लीं  जूं  सः  ज्वालय-ज्वालय,
ज्वल-ज्वल प्रज्वल-प्रज्वल एंग ह्रींग क्लीं चामुंडायै विच्चे,
ज्वल हं शं लं क्षं फट् स्वाहा”

“Om eng  hreeng  kleeng  chamndaayai  vichchai  om glom hum  kleen  jum  sah
Jwalay-jwala y  prajwal-prajwal  eng  hreeng  kleeng  chamundayai  vichche
Jwal  ham sam  lam  ksham  fatta  swaha” |

साधना आप संपन्न करें और स्वयम अनुभूत भी आप करें क्योंकि मेरा  तो 20 वर्षों अनुभव है आज मै जो कुछ भी हूँ इसी साधना की वजह से हूँ इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं ---

***निखिल प्रणाम***

***रजनी निखिल***