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Monday, August 25, 2014

श्री पारद काली साधना


   
 

      श्री गुरु चरण कमलेभ्यो नमः 

जय सदगुरुदेव,

       स्नेही स्वजन, मै प्रतिदिन दिन आप लोगों के अनेक प्रश्न पढ़ती रहती हूँ, और मेरी बड़ी इच्छा होती है कि, आपके प्रश्नों का समाधान करूँ परन्तु कर नहीं पाती, इसलिए नहीं कि, जानती नहीं हूँ . अपितु इसलिए कि निरंतर मुझ पर आरोप प्रत्यारोप के प्रहार होते रहते है, इसलिए सोचती हूँ कि जाने इसकी क्या प्रतिक्रिया हो रही होगी.... खैर, जहाँ तक मेरा प्रश्न है, तो मुझे ग्रुप में उठ रहे सवालों के जवाब तो देने ही होंगे, क्योंकि मै देख रही हूँ कि जिसको जो समझ में आता है वो ही लिख रहा है मन्त्र भी उलटे सीधे, मुस्लिम मन्त्र में ॐ तो कहीं कुछ जो की सिर्फ नुकसान देह ही होगा..... मन्त्र हमारे अनुभूत होना चाहिए, चाहिए आपने एक मन्त्र ही क्यों न किया हो, जो आपने किया हो. वो नहीं जो सिर्फ आपने सुना है क्योंकि ये साधना है इसमें सुना सुनाया नहीं चलता, वर्ना नुकसान अपना भी और दुसरो का भी हो सकता है.... अतः ध्यान रखें कि जब तक कोई आपका वरिष्ठ गुरु भाई बहन या साधक न बताये आप कोई भी मन्त्र को न करें..... उसका पूरा विधान सावधानी आदि का पूरा ध्यान रखें..... ओके और रही बात सिद्धि की तो वो आपके गुरु और इष्ट पे निर्भर है और आपकी दृढ़ इच्छा शक्ति और श्रद्धा पर निर्भर करता है .

   भाइयो बहनों, बहुत दिनों से आप लोगों की इच्छा पर आज सोमवती अमावस्या पर पारद काली साधना विधान..... आपके लिए-----
वैसे तो भगवती के अनेक मन्त्र हैं एकाक्षरी से लेकर सहस्त्राक्षरी तक.... किन्तु ये विशिष्ट मन्त्र यदि पारद विग्रह के समक्ष किया जाये तो निश्चय ही अनुकूलता प्राप्त होती है और आज तो अमावश्य और वो भी सोमवार को . अर्थात पारद यानि भगवान भोलेनाथ और माँ काली तो ये संयोग तो सोने पे सुहागा हुआ न | 

रात को १० बजे के बाद अपने सामने पाटे पर पीले कपडे पर पारद काली को स्थापित करें पीले वस्त्र और पीला आसन हो उत्तर दिशा हो सिंदूर और अक्षत तथा सरसों के तेल का एक बड़ा दिया लगा दें ताकि वो रात भर अखंड जलता रहे, अब संकल्प लेकर गुरु, गणेश एवं भैरव पूजन करें तथा चार माला गुरु मन्त्र की करें एवं मूल साधना पर ध्यान करें सबसे पहले ऐं (eng) बीज मन्त्र से तीन बार प्राणायाम करें . महाकाली का ध्यान करें.

ध्यान--  
ॐ ध्यायेत्काली महामाया त्रिनेत्रा बहुरुपिणीम |
चतुर्भुजां चलाज्जिव्हाम पुर्नाचान्द्रनिभाननाम,
नीलोत्पल दल प्रख्यां शत्रुसंघ विदारिणीम .
नरमुंडम तथा खंगम कमलं वरदं तथा
विभ्राणां रक्तवसना दंष्ट्रालीं घोर रुपिणीम,
अट्टाटहासनिरताम सर्वदा च दिगम्बराम ||
शवासनस्तिथाम देवी मुंडमालाविभुसिताम .

अब विग्रह को सिंदूर अर्पण करें और इस को शिव और शक्ति के स्वरुप में घर में स्थापित होने की प्रार्थना करें.... तथा अवाहन करें

आगच्छं वर्दे देवी दैत्यदर्पनिषूदनि
पूजां ग्रहाण सुमुखी नमस्ते शंकरप्रिये ||

अब भगवती  काली को बेसन के लड्डू या घर की बने हुए कोई भी मिठाई का भोग अर्पित करें तथा रुद्राक्ष की माला से निम्न मन्त्र २१ माला मन्त्र करें...............

“ऐं नमः क्रीं ऐं नमः सं क्रीं नमः क्रीं कालिकायै स्वाहा”.

Eng namah kreem eng namah sam kreem namah kreem kaalikaayai namah

    अब फिर से एक माला गुरु मन्त्र की करके मन्त्र गुरुदेव को समर्पित करें.........
साधना संपन्न करें और रिजल्ट स्वयम देखें .....

****रजनी निखिल****

****निखिल प्रणाम****
 





Sunday, August 10, 2014

पारद शिवलिंग स्तापन विधि


       




        ॐ प्रथिव्यै सह दिवौ वै: क्रियते परे वा, 
       श्रिये  न:    सह    वर्तेक्या     पुरौ ||

    हे ईश्वर ! यह सारी प्रथ्वी हम सब की है, हम सब ‘वसुदेव कुटुकम्ब’ की भावना से साथ-साथ रहें, एक दुसरे को सहयोग दें, क्रियाशील हों, लक्ष्मियुक्त हों, और पूरी प्रथ्वी को स्वर्ग तुल्य बनाने में सहायक हों .

  जय सदगुरुदेव,

           स्नेही स्वजन, बहुत दिनों से मेरे पास पारद शिवलिंग, और श्रीयंत्र स्थापन विधि को जानने के मैसेज आ रहें हैं, हालांकि अभी कुछ लोगो ने माहौल बिगाड़ा हुआ है, किन्तु ठीक है,  मुझे तो कार्य करना है बस |
जब भी मुझसे किसी को इस तरह की अपेक्षा होगी मै पूरी कोशिश करुँगी कि आप लोगों की अपेक्षा पर खरी उतर सकूँ |

पारद की अपनी विशेषता है जो आप में से अधिकाँश लोग जानते हैं . पारद शिवलिंग संसार का एक अद्वितीय और देवो का मनुष्यों को वरदान स्वरुप है . यूँ तो आजकल लेड से निर्मित शिवलिंग मिलते हैं जिसे पारद समझ लिया जा रहा है. किन्तु ओके . अपनी-अपनी श्रद्धा और अपने विचार. क्योंकि कोई किसी के विचारों को नहीं बदल सकता. अतः हम सिर्फ अपने विचार ही शेयर कर सकते हैं बस .
      स्नेही स्वजन, क्या आप जानते हैं कि---
‘शिव निर्णय रत्नाकर’- के अनुसार मिटटी या पत्थर से करोड़ गुना अधिक फल स्वर्ण निर्मित शिवलिंग के पूजन से और स्वर्ण से करोड़ गुना मणि, मणि से करोड़ गुना अधिक फल बाणलिंग नर्मदेश्वर की पूजन से और नर्मदेश्वर बाणलिंग से करोड़ गुना फल पारद शिवलिंग के पूजन से प्राप्त होता है | 

   इसमें कोई दो अतिश्योक्ति नहीं कि पारद शिवलिंग आज से नहीं अपितु हजारों-हजारों वर्षों से श्रेष्ठ और वरदायक रहा है और ये हमारा सौभाग्य है कि सदगुरुदेव के माध्यम से हम इस ज्ञान को प्राप्त कर पायें हैं और उसे सुरक्षित रख पा रहें हैं.

  भाइयो बहनों ! इस युग में पारद शिवलिंग एक वरदान ही नहीं अपितु एक चमत्कार ही है, एक साधना हैऔर सफलतादायक उपाय है अर्थ धर्म कम और मोक्ष प्राप्ति का |
कैसे स्थापन करें पारद शिवलिंग----
इसके लिए गंगाजल, चन्दन, कुमकुम, केशर, अबीर- गुलाल, पुष्प, बिल्बपत्र, भस्म, भांग, कच्चा दूध, पंचामृत 
घी का दीपक, कपूर ---

सोमवार या प्रदोष के दिन या पूर्णिमा को जिस दिन भी आप चाहें,प्रातः स्नानादि से निवृत्त होकर पीले वस्त्र धारण करें, पिला आसन उत्तर दिशा की मुह कर बैठें, अपने सामने एक बाजोट रख उस पर पिला ही वस्त्र बिछाएं, एक पात्र जिसमे आप शिवलिंग का अभिषेक कर सकें.... 

सर्व प्रथम पूर्व की पूजन प्रक्रिया करें अपनी शुद्धि आसन शुद्धि, दिग्बन्धन, प्रथ्वी पूजन, कलश स्थापन पूजन, दीपक पूजन गुरु पूजन, गणेश-गौरी पूजन, भैरव पूजन इत्यादि
“भाइयो बहनों मैंने ब्लॉग पर पूजन विधान दिया हुआ है नए साधको को यदि कोई समस्या हो तो कृपया जरुर पूछ सकते हैं”------ अब आप तैयार हैं, इस दिव्य साधना या पूजन स्थापन के लिए....
ध्यान करें –

अथापरं   सर्वपुराण  गुह्यं   निःशेषपपौघहरम   पवित्रं,

जयप्रदम्सर्वविप्राद्विमोचनं वक्ष्यामि शैवं स्थाप्यं हिताय ते|

अब पारद शिवलिंग को किसी पात्र में स्थापित करें और सर्व प्रथम गंगा जल से स्नान करवाएं, तत्पश्चात उन्हें एक स्वक्छ वस्त्र से पोंछ कर सामने पाटे पर बिछे हुए पीले वस्त्र पर स्थापित करें, संकल्प लें---


ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णु: श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य अद्ध श्री ब्रह्मण: द्वतीय परार्द्धे श्वेतवराहे कल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टा विन्शतितमें  कलियुगे कलिप्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भारतवर्षे, अमुक क्षेत्रे, अमुक नगरे, अमुक नाम सवंत्सरे, अमुक अयने, अमुक मासे, अमुक पक्षे, अमुक पूण्यतिथौ, अमुक वासरे,  सर्वेषु ग्रहेषु यथायथं राशीस्थानस्थितेषु, अमुक नाम, अमुक गौत्रौत्पन्नोहं पारदेश्वर महादेव्ये देवता प्रत्यिर्थ्ये, यथा ज्ञानं, तथा मिलितोपचारे पूजनम,स्थापनं करिष्ये.

अब एक पात्र में एक बिल्ब पात्र का आसन देकर शिवलिंग स्थापित करें तथा कलश का जल पंचपात्र में लें और दूर्वा से या यदि कौलाचारी हैं तो वे कुषा के जल से शिवलिंग पर जल अर्पित करते हुए निम्न मन्त्र करें  

ह्रदि वक्ष करतल निधाय ॐ ऐं ह्रीं श्रीं आं ह्रीं क्रों यं रं लं वं शं षं सं हं ळं क्षं सोऽहं हंसः मम प्राणाः इह प्राणाः |
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं आं ह्रीं क्रों यं रं लं वं शं षं सं हं ळं क्षं सोऽहं हंसः मम जीव इह जीवः स्तिथ: |
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं आं ह्रीं क्रों यं रं लं वं शं षं सं हं क्षं ळं सोऽहं हंसः मम सर्वेन्द्रियाणि इह स्तिथानी |
ततः त्रिः प्राणानायम्य, ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री पारदेश्वराय सदाशिवाय नमः |

अब शिवलिंग को अपने बांये हाथ में लेकर दायें हाथ से ढंक लें और---

“ॐ शं शम्भवाय पार्देश्वराय सशक्तिकाय नमः”

मन्त्र का २४  बार उच्चारण करें |
तथा वापिस उसी पात्र में स्थापित करें, और पंचामृत से स्नान करवाएं अब शुद्धोदक स्नान भी करवाते जाये, इस पूरी प्रक्रिया के दौरान उपरोक्त मन्त्र का जप करते रहें.
पंचामृत गंगाजल आदि से अभिषेक के पश्चात् शिवलिंग को पोंछ कर अच्छे से पट्टे पर स्थापित करें और पंचोपचार पूजन करें, तथा कम से कम २१, ५१ या हो सके तो १०८ बेलपत्र अवश्य चढ़ाएं भंग धतुर्फल और इत्र चढ़ाकर प्रार्थना करें कि हे पारदेश्वर महादेव हमारे घर में स्थापित होकर हमें सुख सौभाग्य प्रदान करें और समस्त पाप ताप का शमन करें---- तथा नैवेद्ध अर्पित करें फिर रुद्राक्ष माला से इसी मन्त्र की १ माला मन्त्र  निम्न मन्त्र का जप करें 

“ॐ नमो भगवते रुद्राय पार्देश्वराय नमः”
“Om namo bhagvate rudray paardeshwaraay namah”

फिर कर्पुर और घी के दीपक से आरती सम्पन्न करें और पुष्पांजली समर्पित कर द्रव्य दक्षिणा देकर अर्ध्य परिक्रमाँ संपन्न करें क्षमा याचना कर पूजन अपने गुरुदेव को समर्पित करें |

इस तरह से स्थापित पारद शिवलिंग का नियमित दर्शन ही अनेक जन्मों के पापों को नष्ट कर जीवन में सुख शांति स्थापित करता है |

स्नेही  भाइयो बहनों इस पूजन को देने का तात्पर्य अपने बिजनस का प्रचार प्रसार बिलकुल नहीं है आप इस विधा से परिचित हों बस यही कामना है अगली पोस्ट में श्री यंत्र स्थापन विधि के साथ मिलते हैं........   :)

****निखिल प्रणाम****

****रजनी निखिल****


Tuesday, July 15, 2014

रूद्र साधना


    “ॐ प्रियं वै स्यौ देवत्वं गुरु र्वे सह सिते न”



      हे गुरुदेव ! आप हमारे प्रिय बनें, सूर्य की तरह हमारे ह्रदय में प्रकाश कर अविद्या रूपी अन्धकार को दूर कर, ज्ञान को प्रदीप्त करें, और हर क्षण हमरे साथ रहें | 
जब बार-बार अड़चने आयें, कोई काम न बनें, और सारे रस्ते बंद हों जाएँ तब...... करें ये “रूद्र साधना”
जय सदगुरुदेव, स्नेही स्वजन ! :)

   कल की पोस्ट में कमेंट्स देखकर सिर्फ एक बात कहना चाहती हूँ कि साधना और पूजा में बड़ा अंतर है, साधना मतलब जबरन, हठपूर्वक अपने प्रारब्ध को ही बदल लेना, किन्तु पूजा मतलब मनःशांति के लिए या आत्मसंतुष्टि हेतु या परम्परागत पूजा करना |

   परन्तु एक बात और वो ये कि कोई भी मन्त्र, स्त्रोत कभी विफल नहीं होता, हाँ लोप रहता है लेकिन जब उसी से संबधित कोई साधना कर रहे होते हैं तो उसका पूर्ण फल सामने आता है, अतः ये सोचना कि ईश्वर नहीं है या कुछ नहीं होता गलत है ये सिर्फ आपकी असफलता के कारण आई नकारात्मता है जिसे दूर कर आपको पूर्ण रूप सकारात्मकता की और ले जाने के लिए मै आपको कुछ प्रयोग बताती हूँ आप करिए और उसका रिजल्ट स्वयम महसूस करिए |

१-  पहला प्रयोग चूँकि श्रावण माह है अतः बेलपत्र बड़ी आसानी से मिल जाता है, यदि प्रतिदिन १०८ बिना टूटे फटे त्रिदल वाले बेल पात्र मिल जाएं तो उन्हें धो लें और गंगाजल में फिगो लें फिर उस पर केशर घोलकर और रक्त चन्दन घोलकर मिक्स कर लें और उससे राम लिखें और प्रत्येक बार अपनी मनोकामना एवं “ॐ नमः शिवाय” बोलते हुए शिवलिंग पर चढ़ावें, न केवल इक्छापुर्ती होगी अपितु जो पहले किया हुआ अहि उसका फल भी प्राप्त होगा |

२-   दूसरा प्रयोग- पंचमुखी रुद्राक्ष, जो पूजा दुकान में बड़ी आसानी से प्राप्त हो जाता है, १०८ लेकर उस पर सफ़ेद चन्दन घिसकर एक एक पर अनामिका ऊँगली से लगाते जाएँ और “ॐ नमः शिवाय” बोलते हुए शिवलिंग पर चढाते जाए, पूरे जीवन धन की कमी नहीं होगी सिर्फ श्रावण में इन प्रयोगों को सम्पन्न करें |
 एक बात याद रखिये कि रूपये आसमान से नहीं टपकेंगे किन्तु जो कारोबार आप करते हैं उसमें ही चौगुनी तरक्की महसूस करेंगे....

 खैर अब हम साधना पर आयें----
श्रावण माह में शिव पूजन का विशेस महत्व है—लोग अनेक तरह से भोलेनाथ को मनाते हैं.... मैंने एक बात पर बार-बार जोर दिया है, साधना और पूजा में बहुत अंतर है जैसा कि मैंने ऊपर बताया है.
पूरा महिना हमारा है कभी भी आप इस साधना को प्रारम्भ कर सकते हैं...

   “या ते रुद्र शिवा तनुरघोरा पापकाशिनी”

भोलेनाथ का ही स्वरुप है रूद्र..... भारतीय परम्परा के मूल और आदि देव, आर्य जीवन की पुष्टता के आधार, पापमोचक, वरदायक, समस्त कामनाओं को पूरा करने वाले, महादेव-----------:)

साधना-विधान
सामग्री- शिवलिंग, कच्चा दूध, गंगाजल, पंचामृत-(दूध,दही, घी,शहद, शक्कर) भस्म, चन्दन, केशर, फूल, बेलपत्र, धतुरा के फल-फूल, शमीपत्र, घी का दीपक, अगरबती..... इत्यादि समग्र पूजन सामग्री पहले से ही इकत्रित कर लें ...
आसन-पीला, पीली धोती, उत्तर दिशा--- पूजन समय- सुबह या शाम |

साधक स्नानादि से निवृत्त होकर आसन पर बैठें---
प्रारम्भिक पूजन कर लीजिये.. यानी गणेशपूजन, भैरव पूजन,गुरुपूजन आदि--- अपने गुरुमंत्र की एक माला अवश्य कीजिये |
सामने एक पटे पर पीला वस्त्र बिछाकर पारद शिवलिंग, स्फटिक शिवलिंग, नर्मदेश्वर या जो भी आपके पास हों उन्हें स्थापित कीजिये .
उसके बाद ध्यान करें,

ध्यान--
ध्यायेनित्यं महेशं रजतगिरीनिभं चरुचन्द्रावतंसं
रत्नाकल्पोज्ज्वालंगम परशुमृगवराभिती हस्तं प्रसन्नं |
पद्मासीनं समन्तात स्तुतिममरगणैव्याघ्रकृत्तिं वसानं
विश्वाद्दं विश्ववन्द्धं निखिल भयहरं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रं ||
स्वच्छ स्वर्णपयोद मौक्तिकजपावर्णोंर्मुखैः पंचभि:
त्रयक्षैरंचितमीशमिन्दुमुकुटं सोमेश्वराख्यं प्रभं ||
शूलंटंक कृपाणवज्रदह्नान्-नागेन्द्रघंटाकुशान्
पाशं भीतिहरं दधानममिताकल्पोज्ज्लांगं भजे ||

इसके बाद महादेव का आवाहन करें तथा एक फूल अर्पित करें... उसके बाद शिवलिंग उठाकर किसी बड़े पात्र में स्थापित करें ताकि आप अभिषेक कर सकें |

अब ॐ नमः शिवाय का जप करते हुए गंगाजल में थोडा कच्चा दूध मिलकर १० मि तक अभिषेक करें तब तक कि शिवलिंग पूरा डूब न जाएँ, अब “ॐ नमो भगवते रुद्राय नमः” मन्त्र की एक माला रुद्राक्ष माला से जप करें, तत्पश्चात शिवलिंग बाहर निकालकर किसी दुसरे पात्र में स्थापित कर पंचामृत से अभिषेक करें, तथा शुद्ध जल से धोकर पोंछकर वापिस पाटे पर स्थापित करे तथा चन्दन, अबीर, गुलाल, हल्दी, कुमकुम, अक्षत और पुष्प से पूजन सम्पन्न करें, शमीपत्र तथा भस्म अर्पित कर अपनी मनोकामना बोलें, तथा बिल्ब्पत्र पर केशर से अनामिका ऊँगली से “राम’ लिखकर ॐ नमः शिवाय का जप कर एक-एक कर चढाते जाएँ प्रत्येक बिल्वपत्र चढाते मनोकामना भी बोलना है |

        अब फल, और नैवेद्ध का भोग लगायें और
निम्न मन्त्र की ११ माला जप करें—

मन्त्र—
               ॐ ब्लौं सदाशिवाय नमः
    “Om blaum sadashivay namah”

इसके बाद पुनः एक माला गुरुमंत्र की करें तथा गुरुदेव से अपनी साधना को निर्विघ्न पूर्ण होने तथा सफलता प्राप्ति की प्रार्थना करें, एवं कपूर से आरती सम्पन्न कर मन्त्र समर्पित करें |
स्नेही भाइयो बहनों, इस साधना को पूरे माह यदि इसी क्रम से करना चाहें तो अति उत्तम, वर्ना प्रत्येक सोमवार और इस माह की प्रदोष को अवश्य सम्पन्न करें |

****रजनी निखिल***

Saturday, July 12, 2014

गुरु पूर्णिमा साधना



गुरु पूर्णिमा साधना


               


गुरुर्ब्रह्म्हा  गुरुर्विविष्णु,   गुरुर्देवो  महेश्वरा,
गुरु हि साक्षात् परब्रम्ह, तस्मै श्री गुरुवै नमः|
 स्नेही स्वजन,

     ‘आप सभी गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएं’

      बहनों, भाइयों ये पर्व उनके लिए लिए अति महत्वपूर्ण है जो गुरु परम्परा से जुड़े हैं वैसे तो सभी के लिए महत्व है किन्तु हमारे लिए सर्वोपरि है .
आप सब के लिए, गुरुदेव द्वारा प्रदत्त, गुरुदेव को ही समर्पित है ये प्रयोग-----

        क्योंकि ये पर्व संतों का  और गुरुओं का ही है—इस व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है, आप सभी इस दिन को गुरु को समर्पित करते हुए यदि इस प्रयोग को संपन्न करते हैं तो निश्चित ही गुरु कृपा के पात्र बन जाते हैं, और उनका आशीर्वाद चाहे अद्रश्य या द्रश्य रूप से आपको प्राप्त होता ही है, इस पूजन के पश्चात् तो मेरा स्वयम का अनुभव है कि कई साधनाएं स्वतः ही सिद्ध होती चली जाती हैं |

     ये पूजन यदि प्रति गुरूवार भी या प्रति पूर्णिमा को भी किया जा सकता है----

   वैसे तो गुरुदेव ने ११ प्रकार के गुरु पूजन का बताया है किन्तु उन सबमें इस पूजन का विशेस कर तंत्र साधनाओं में दिलचस्पी रखने वाले साधकों के लिए अति आवश्यक और महत्वपूर्ण है ये विधान |

             तांत्रोक्त गुरु पूजन --

पूजन हेतु सामग्री:-

गुरुचित्र,गुरुयंत्र,गंगाजल,चन्दन,कुमकुम,केशर,अष्टगंध,
अक्षत,पुष्प,बिल्बपत्र,दीप,अगरबत्ती,पुष्पहार,नैवेद्ध,पंचामृत, आदि|

इस साधना हेतु प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि पीले वस्त्र धारण कर पीले आसन पर पूर्व दिशा की ओर मुख कर बैठ जाएँ | अपने सामने एक चौकी रख कर पीला वस्त्र बिछाकर कर उस पर ताम्बे या स्टील की प्लेट रख कर उस कुमकुम या चन्दन से ॐ लिखें और उस पर गुरु यंत्र या गुरु पादुका (जो आपके पास उपलब्ध हो) गंगाजल से धोकर स्थापित करें |

बांये हाथ में जल लेकर दांये हाथ से ढंक कर मन्त्र बोले,
ॐ अपवित्र: पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा|

य: स्मरेतपूंडरीकाक्षं  स बह्यभ्यांतर: शुचिः||

उसके बाद आचमन---
तत्पशचात सूर्य पूजन करें हाथ में कुमकुम एवं पुष्प लेकर---

ॐ आकृष्णेन रजसा वर्तमानों निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च;

हिरण्येन सविता रथेन,   याति  भुवनानि    पश्यन ||

ॐ पश्येम शरदः शतं शृणुयाम शरदः शतं प्रब्रवाम शरदः शतं,

जीवेम शरदः शतमदीना: स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात्|

गुरु ध्यान—
दोनों हाथ जोड़कर ध्यान करें इसमें आपका ध्यान आज्ञाचक्र पर केन्द्रित होना चाहिए----

अचिन्त्य  नादा मम देह दासं ,
मम पूर्ण आशां देह देह स्वरूपं
न जानामि पूजां न जानामि ध्यानं
गुरुर्वे शरण्यं गुरुर्वे शरण्यं ||
मामोत्थवातं तव वत्सरूपं,
आवाहयामि गुरुरूप नित्यं ||
स्थायेद सदा पूर्ण जीवं सदैव,
गुरुर्वे शरण्यं, गुरुर्वे शरण्यं ||   
आवाहन—
ॐ स्वरुप निरूपण हेतवे श्री निखिलेश्वरानन्दाय
गुरवे नमः आवाहयामि स्थापयामि |
ॐ स्वच्छ प्रकाश हेतवे श्री सच्चिदानंद,
परम गुरुवे नमः, आवाह्यामी स्थापयामि |
ॐ स्वात्माराम पिंजर विलीन तेजसे श्री ब्रह्मणे
पारमेष्ठी गुरवे नमः आवाहयामि स्थापयामि |
स्थापन—
इसके बाद गुरुदेव को अपने षट्चक्र में स्थापन करें-
श्री शिवानन्द नाथ परशाक्त्याम्बा, मूलाधार चक्रे स्थापयामि नमः|
 श्री सदाशिवानंद नाथ  चिछ्क्त्यम्बा स्वाधिष्ठान चक्रे स्थापयामि नमः |
श्री ईश्वरानन्दंनाथ आनंद शक्त्यमबा, मणिपुर  चक्रे स्थापियामि नमः |
श्री रूद्रदेवानंदनाथ इच्छा शक्त्यम्बा अनाहत चक्रे स्थापयामि नमः |
श्री विष्णुदेवानन्द नाथ क्रिया शक्त्याम्बा सह्स्त्रारे चक्रे स्थापयामि नमः |
पाद्ध्यम—
मम प्राण स्वरूपं, देह स्वरूपं आत्म्स्वरुपम, चिन्त्यं स्वरुपं
समस्त रूपम रूपं गुरुम आवाहयामि पाद्दम समर्पयामि नम: |
अर्ध्य—
ॐ देवो तव वे सर्वा प्रणतवं परि, संयुक्त्वा: सक्रत्वं  सहेवा: |
अर्ध्य                   समर्पयामि             नमः |
गंधं— निम्न नौ ‘सिद्धोघ’ का उच्चारण करते हुए गुरु चरणों में या यंत्र निम्न सामग्री चढ़ावे----
ॐ श्री उन्मनाकाशानंद नाथ – जलं समर्पयामि
ॐ श्री सम्नाकशानान्दनाथ – स्नानंसमर्पयामि
ॐ श्री व्यापकाशानंदनाथ- सिद्धयोगा जलं समर्पयामि
ॐ श्री शक्त्यम्बाकाशानन्द नाथ- चन्दन समर्पयामि
ॐ श्री ध्वन्याकाशानन्दनाथ – कुमकुम समर्पयामि
ॐ श्री ध्वनिमात्रकाशानन्दनाथ- केशर समर्पयामि
ॐ श्री अनाहताकाशानन्दनाथ- अष्टगंध समर्पयामि
ॐ श्री विन्द्धवाकाशानन्दनाथ – अक्षतान समर्पयामि
ॐ श्री द्वांद्वाकाशानन्दनाथ – सर्वोपचरान समर्पयामि |
पुष्प, बिल्ब पत्र –
तमो स पूर्वां एतोस्मानं सक्रते कल्याण त्वां कमलया सा
शुद्ध बुद्ध प्रबुद्ध सा चिन्य अचिन्त्य वैराग्यं नमिताम,
पूर्ण त्वाम गुरुपाद पूजनार्थे बिल्ब पत्रं पुष्प हारं च समर्पयामि
दीप— निम्न मन्त्र का उच्चारण कर दीप दिखाएँ----
श्री महादर्पनाम्बा सिद्ध ज्योति समर्पयामि
श्री सुन्दर्यम्बा सिद्ध प्रकाशं समर्पयामि
श्री करालाम्बिका सिद्ध दीपं समर्पयामि
श्री त्रिबाणाम्बा  सिद्ध ज्ञान दीपं समर्पयामि
श्री भीमाम्बा सिद्ध ह्रदय दीपं समर्पयामि
श्री कराल्याम्बा सिद्ध सिद्ध दीपं समर्पयामि
श्री खराननाम्बा सिद्ध तिमिरनाश दीपं समर्पयामि
श्री विधिशालिनाम्बा पूर्ण दीपं समर्पयामि
नीराजन –
श्री सोम मंडल निराजनम समर्पयामि
श्री सूर्य मंडल नीराजनं समर्पयामि
श्री अग्नि मंडल नीराजनं समर्पयामी
श्री ज्ञान मंडल नीराजनं समर्पयामि
श्री ब्रह्म मंडल नीराजनं समर्पयामि

भाइयो बहनों इसके बाद आप चाहें तो , पञ्च पंचिका भी
समर्पित कर सकते हैं, जिसमें पञ्च लक्ष्मी, पञ्च कोष, पञ्च कल्पलता, पञ्च कामदुधा, और पञ्च रत्न मंत्रो का प्रयोग कर पुष्प समर्पित करें, चूँकि ये सब  परम्पराएँ हैं जो सब अपनी  परम्परानुसार करें |

तीन बार निम्न मन्मालिनी का उच्चारण करें –
ॐ अ आ इ ई  उ ऊ ऋ लृ लृ ए

ऐ ओ  औ अ अः

क ख ग घ ङ

च छ  ज झ ञ ञ

ट ठ ड ढ ण

त थ द ध न

प फ ब भ म

य र ल व श ष स ह क्षं

हंसः  सोऽम गुरुदेवाय  नमः |

मूल मन्त्र की माला करें, माला यदि मूंगा माला हो तो उत्तम या फिर अपनी गुरु माला से ही निम्न मन्त्र की एक तीन पांच या ग्यारह माला |

मन्त्र—
    “ॐ निं  निखिलेश्वराये ब्रह्म ब्रहमांड वै नमः” |

समर्पण—
ॐ सह्नावतु सह नौ भुनत्तु सहवीर्य करवावहे,

तेजस्विना धीत्मस्तु मा विद्विषावहे

ॐ ब्रह्मार्पणं  ब्रहमहवि: ब्रह्माग्नो ब्र्हम्णा हुतं

ब्रह्मेव तेन गन्तव्यं ब्रह्म कर्म समाधिना ||

   शांति: |  शान्तिः   शांतिः |

  अपने गुरु के लिए अपनी परम्परा नुसार संकल्प लेकर साधना संपन्न करें और गुरुदेव का आशीर्वाद प्राप्त करें अति शुभाकमानों के साथ ----

  *** रजनी निखिल ***

  निखिल अल्केमी