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Friday, May 8, 2015

वलगा माला मन्त्र साधना




सौन्दर्य सार मपरं तन्त्रं विधेयं,
तंत्रात्मकं विश्वमिदं चराचरम |
सूर्य: लयं समुदयं प्रकरोति तेन,
तंत्रेण शास्ति अखिलं प्रकृति: पराद्धा ||

    सम्पूर्ण जीवन के सौन्दर्य का सार तंत्र है | यह समस्त चर और अचर जगत तंत्रमय ही है सूर्य का प्रतिदिन उदित होना और अस्त होना भी तंत्रात्मक प्रक्रिया ही है . पराशक्ति प्रकृति तंत्र के माध्यम से ही सम्पूर्ण विश्व को नियंत्रित करती है ------



जय सदगुरुदेव , स्नेही भाईयो- बहनों !


   जब भी किसी विशष्ट विषय पर लिखा जाता है तो कही से या तो अध्ययन करके या अपने अनुभव से, किन्तु बिना अध्ययन या गुरु निर्देशन के आप ना तो कुछ लिख सकते हैं और न ही बता सकते हैं, फिर किसी ने नेट से पढ़कर लिख हो या साहित्य से---- J हैं  ना क्यों कि कोई भी व्यक्ति माँ के पेट से सीख नहीं आ सकता क्योंकि ये युग महाभारत कालीन नहीं है | एक बात और हमें कुछ भी क्रियान्वित करते रहना चाहिए चाहे आप कहीं से भी देख कर करें, पढ़कर करें, बस अपनी विचारधारा सकारात्मक रखें सफलता या असफलता तो बाद में है---


  इस ग्रुप में बहुत सारे  प्रश्न आते हैं किन्तु सही उत्तर देने की अपेक्षा लोग टीका टिप्पणी ज्यादा करते हैं , सिर्फ एक निवेदन है, हम एक सकारात्मक सोच लेकर प्रत्येक लेख को पढ़ें समझें और यदि आपकी इच्छा है तो एक बार प्रयास अवश्य करें किन्तु उस साधना पर मन्त्र पर टीका टिप्पणी न करें, हाँ यदि शंका है कहें जरुर , क्योंकि शंका होगी तो ही समाधान भी संभव होगा| 


   एक बात मेरा उन गुरु भाइयों से भी निवेदन है जिन्होंने तंत्र को बड़ी गहराई से समझा है, वे जानते हैं कि तंत्र एक क्रमबद्ध क्रिया है या निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है या इत्यादि---- तो उनसे अनुग्रह है कि जिन्हें नहीं पता या भ्रमित हैं तो उनका भ्रम दूर करें या सिखाने हेतु आगे आयें सभी साधना साधन में उपलब्ध करवाने हेतु सदैव तत्पर हूँ ----



  अब मै आगे के क्रम अप्सरा यक्षिणी की साधना देने से पहले कुछ महत्वपूर्ण प्रयोग जिनकी आवश्यकता है दे रही हूँ ----

भगवती बागला मुखी की जयंती अभी कुछ दिनों पूर्व निकल गयी किन्तु प्रकृति के प्रकोप की वजह से न केवल नेपाल अपितु भारत के कुछ क्षेत्र भी प्रभावित थे अतः जिससे मन खिन्न था कि कुछ लिखने या देने का मन ही  नहीं बना पाई |

 किन्तु अभी एक भाई कहने पर सदगुरुदेव प्रदत्त बगलामाला मन्त्र

साधना---- 



स्नेही भाइयो बहनों !


 माँ बागला मुखी तंत्र की षट्कर्म साधन की अधिष्ठात्री हैं सम्पूर्ण सम्मोहन, वशीकरण, स्तम्भन, विद्वेषण, उच्चाटन, और मारण इन सभी कर्मों को सिर्फ एक ही साधना से सीख या किया जा सकता है, माँ बागला के बारे में हालांकि मेरे ख्याल से सभी जानते हैं क्योंकि तना ज्यादा लिख जा चूका है कि अब किसी भी तरह के लेख की आवश्यकता नहीं है अतः सीधे ही मूल विधान पे आ रही हूँ |



साधना विधान


v  प्रस्तुत साधना में पूर्ण पवित्रता ब्रह्मचर्य का पालन करना है |


v  साधक को दिन में नींद नहीं लेनी है, न व्यर्थ कि बातचीत करे, पूर्ण ब्रहमचारी व्रत का पालन करें


v  साधना काल में साधक बगलामुखी यंत्र , या चित्र स्थापित कर उसके सामने मन्त्र जप करे |


v  साधना काल में ही साधक न तो बाल कटवाए ना ही किसी प्रकार का क्षौर कर्म करे|


v  यह साधना या मन्त्र जप रात्री में ही होता है अतः साधक मन्त्र जप कि क्रिया रात्री १० बजे से प्रातः ४ बजे के बीच करे परन्तु जो साधना संपन्न कर चुकें हैं वे साधक दिन में भी मन्त्र जप कर सकतें हैं |


v  साधना काल में दीपक के लिए जिस रुई का उपयोग करें उसे पहले ही पीले रंग में रंग कर सुखा ले व दीपक के लिए गौ के घी में हल्दी मिला ले या फिर पीली सरसों का तेल उपयोग में लायें |



v  जो कौल साधक हैं वे साधना में कुलाचार का पूजन, वीर साधना, चक्रानुष्ठान अवश्य ही करें जिससे पूर्ण सफलता प्राप्त हो सके |

पीले वस्त्र, पीला आसन, उत्तर दिशा जप संख्या १,२५००० या लघु अनुष्ठान ५१,०००, ३१,००० २१,००० का भी संपन्न कर सकते हैं |  ये बगला साधना है, प्रयोग नहीं, यदि प्रयोग करना हो तो हि ३१ २१ का विधान करें किन्तु साधना तो सवा लक्ष से हि संपन्न होती है और उसी अनुसार नियम संयम का ध्यान रखें |



विनियोग :-


अस्याः श्री ब्रह्मास्त्र-विद्या बगलामुख्या नारद ऋषये नम: शिरसि | त्रिष्टुप् छन्दसे नमो मुखे | श्री बगलामुखी देवतायै नमो हृदये | ह्रीं बीजाय नमो गुह्यो | स्वाहा शक्तये नम: पादयो: | ॐ नम: सर्वांगे |श्री बगलामुखी-देवता-प्रसाद सिद्धयर्थे न्यासे विनियोगः |


Asyaah  shree  brahmaastr-vidya  bagalaamukhyaa  naarad  rishaye  namah  shirasi .  trishthup  chandase  namo  mukhe .   shree bagalaamukhi  devataayai  namo  hridaye .  hreem  beejaay  namo  guhyo .  swahaa  shaktaye  namah  paadayoh .  aum  namah  sarwaange .  shree  baglaamukhi-devataa-prasaad  siddhyarthe  nyaase  viniyogah .  




आवाहन :-


ॐ ऐं ह्रीं श्रीं बगलामुखी सर्व-दुष्टानां मुख स्तम्भिनी सकल-मनोहारिणी

अम्बिके इहागच्छ सन्निधिं कुरु सर्वार्थं साधय साधय स्वाहा |


Om ang hreem shreem baglamukhi sarv-dushtanam  mukh
 stambhini
Sakal-manoharini ambike ihagacch sannidhim kuru sarvartham sadhay 

Sadhay  swaha  .




ध्यान :-


ॐ सौवर्णासनसंस्थितां त्रिनयनं पीतांशुकोल्लासिनीं हेमाभांगरूचिं

शशांकमुकुटां सच्चम्पकस्त्रग्युताम् | हस्तैर्मुद्गरपाशवज्ररशनाः सविंभ्रतीं

भूषणैर्व्याप्तागीं बगलामुखीं त्रिजगतां संस्तम्भिनीं चिन्तयेत् ||




Om sauvarnsansansthitaam  trinayanam pitamshukollasinim hemabhangruchi

Shshankmukutam sacchmpakstrgyutam . hastaymurdgarpaashvjrarshnah  savimbhratim

Bhushnayvyarptaagim baglamukhim trijagatam sanstambhini chintyet .






माला मंत्र :-  
    

ॐ नमो भगवती, ॐ नमो वीरप्रतापविजय भगवती, बगलामुखी!

मम सर्वनिन्दकानाम् सर्वदुष्टानाम वाचम् मुखम् पदम् स्तम्भय,

जिव्हाम मुद्रय मुद्रय, बुद्धिम् विनाशय विनाशाय, अपरबुद्धिम कुरु,

कुरु, अत्मविरोधिनाम् शत्रुणाम् शिरो, ललाटम् मुखम्, नेत्र, कर्ण,

नासिकोरू, पद, अणु-अणु, दन्तोष्ठ, जिव्हा, तालु, गुह्य, गुदा, कटि,

जानु, सर्वांगेषु केशादिपादान्तम् पादादिकेश्पर्यन्तम् , स्तम्भय स्तम्भय,

खें खीं मारय मारय, परमंत्र, परयंत्र, परतन्त्राणि, छेदय छेदय, आत्ममन्त्रतंत्राणि

रक्ष रक्ष, ग्रहम निवारय निवारय , व्याधिम् विनाशय विनाशय, दुखम् हर हर,

दारिद्रयम् निवारय निवारय, सर्वमंत्रस्वरूपिणि, दुष्टग्रह, भूतग्रह, पाषणग्रह,

सर्वचाण्डालग्रह, यक्षकिन्नरकिम्पुरुषग्रह, भूतप्रेत पिशाचानाम्, शाकिनी

डाकिनीग्रहाणाम, पूर्वदिशम् बंधय बंधय, वार्ताली! माम् रक्ष रक्ष, दक्षिणदिशम् बंधय

बंधय किरातवार्ताली! माम् रक्ष रक्ष, पश्चिमदिशम् बंधय बंधय, स्वप्नवार्ताली! माम्

रक्ष रक्ष, उत्तरदिशम् बंधय बांधय भद्रकालि! माम् रक्ष रक्ष, ऊर्ध्व दिशम् बंधय

बंधय उग्रकाली! माम् रक्ष रक्ष, पाताल दिशम् बंधय बंधय बगला परमेश्वरी! माम्

रक्ष रक्ष, सकल रोगान् विनाशय विनाशय, शत्रु पलायनम् पंचयोजनम्ध्ये

राजजनस्वपचम् कुरु कुरु, शत्रून दह दह, पच पच, स्तम्भयस्तम्भय, मोहय मोहय,

आकर्षय आकर्षय, मम शत्रून् उच्चाटय उच्चाटय हुम् फट् स्वाहा |



Om namo bhagvati, om namo virpratapvijay bhagvati ,baglamukhi !

Mum sarvnindkanam sarvdushtanam mukham padam stambhay

Jivham mudray mudray buddhim vinashay vinashay aparbuddhim

Kuru kuru aatmvirodhinam shatrunam shiro lalatam mukham netra karn

Nasikoru pad anu-anu dantoshth jivha talu guha guda kati janu sarvangeshu

Keshadipadantam padadikeshparyantam stambhay stambhay, kem khim

Maray maray parmantra paryantra partantrani cheday cheday  aatmamantratantrani

Raksh raksh , graham nivaray nivaray sarnmantraswarupini dushtgrah, bhutgrah, paashangrah,

Sarvchandalgrah, yakshkinnarkimpurushgrah , bhutpret pishachanam , shakini

Dakinigrahanam  purvdisham bandhay bandhay,  vaartaali  maam raksh raksh,  dakshindisham  bandhay

bandhay swapnvaartaali  maam raksh raksh,  paschimdisham  bandhay bandhay,  ugrakaali  maam raksh

raksh,  paataaldisham bandhay bandhay,  baglaa parmeshwari  maam raksh raksh, sakal rogan

Vinaashay vinaashay, shatru palaayanam panchyojanmadhye  rajajanaswapacham kuru kuru,

Shatroon dah dah, pach pach, stambhay stambhay, mohay mohay, aakarshay aakarshay, mam

Shatroon ucchaatay ucchaatay,  hum fat swaha.




चूँकि ये माला मन्त्र साधना है अतः इसमें हवन विधान नहीं है , तथा पूर्णाहुति के लिए अंतिम दिवस बेसन के लड्डुओं का भोग लगाकर पूर्ण विधि विधान से पूजन आरती संपन्न करें व तीन पांच या नौ कन्याओं को भोजन वस्त्र व दक्षिणा देकर विदा करें | शेष सदगुरुदेव कृपा ही केवलं----- J

निखिल प्रणाम

रजनी निखिल

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Monday, April 20, 2015

गुरु रहस्य सिद्धि साधना-


              



                गुरु रहस्य सिद्धि साधना-

ऐंकार ह्रीमकार श्रींमकार गूडार्थ महाविभूत्या
ओमकार       मर्म     प्रतिपादिनीभ्याम
नमो   नमः   श्रीगुरु        पादुकभ्याम

गुरु चरणों की बात तो अलग ही जबकि गुरु पादुकाओं में ही कई-कई रहस्य छुपे होते हैं,|  और उन रहस्यों को शिष्य अपनी साधना से अपने समर्पण से उजागर कर ही लेते हैं ऐंसा ही एक अद्भुत साधना रहस्य | जो जीवन में अति आवश्यक हैं, गुरु तत्व के अनोखे रहस्यों को इस साधना के माध्यम से जाना जा सकता है, और इसके बाद मेरे ख्याल से अन्य साधना की आवश्यकता नहीं रह जाती | सदगुरुदेव के अवतरण दिवस पर क्यूँ न हम सभी शिष्य इस साधना के माध्यम से उनके श्री चरणों तक पहुँच सकें | और अपना एक साधना क्रम पूरा कर सकें इन्हीं विचारों के अन्तरगत ये साधना देने का मन बना है और चाहती हूँ कि आप सभी इस साधना क्रम को अपनाएँ |

भाइयो बहनों! किसी कारणवश यदि आप प्रातः इस साधना को नहीं कर पायें तो किसी भी गुरुवार के प्रातः ४ भी यानि ब्रह्म मुहूर्त में भी कर सकते हैं या २१ ता. को भी |

 प्रातः ५ से ७ के बीच स्नान आदि से विर्वृत्त होकर पीले वस्त्र धारण करके पीले हि आसन पर उत्तर दिशा कि ओर मुह करके बैठे एवं सामान्य गुरु पूजन व गौरी गणेश पूजन संपन्न करें तथा तट संकल्प बद्ध होकर गुरुदेव से गुरुतत्व रहस्य सिद्धि की प्रार्थना करें एवं गुरु रहस्य सिद्धि माला से निम्न मन्त्र की ५१ माला संपन्न करें | तदोपरांत कपूर से आरती करें व जप समर्पण करें | 
  
|| ॐ ऐं ह्रीं गुरुत्वै नमः ||

OM  ANG  HREEM  GURUTVE  NAMAH

स्नेही भाईयों व बहनों,
  यह साधना मेरी अनुभूत साधना है और मैं दावे से कह सकती हूँ इस साधना के बाद साधक को गुरु तत्व के रहस्योद्घाटन ना हो | यकीन न हो तो स्वयं करके देखें व लाभ उठायें |

रजनी निखिल

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अक्षय तृतीय की सुवर्ण गौरी साधना





नमो  शांत रूपं,  ब्रह्म रूद्र  महेशं |

निखिल रूप नित्यं शिवोऽह-शिवोऽहं ||


हे गुरुदेव स्वामी निखिलेश्वरानंद जी ! आप शांत स्वरूप हैं, ब्रह्मा, विष्णु, और रूद्र के साक्षात् साकार चिन्तन हैं, आप का मोहक रूप नित्य मेरे ह्रदय में बसा रहे, और मेरे चिन्तन में शिव स्वरुप में रहें |


भाइयो बहनों,
सबसे पहले तो क्षमाप्रार्थी हूँ कि आपको मै इस अमावश्या पर कोई भी प्रयोग या साधना नहीं दे पाई, कारन मै स्वयं साधना में थी, और समयाभाव के कारण कुछ लिख नहीं पाई जबकि प्री प्लानिंग की थी, किन्तु लिखने का समय नहीं मिल पाया | सॉरी------ जबकि जानती हूँ आवश्यक था पर-------
अक्षय तृतीय एक विशिष्ट दिवस है और इसका तात्पर्य ही है अक्षय यानी जिसका क्षय न होना अर्थात समाप्त न होना.
तो क्यों ना हम कुछ ऐसा करें जिसका प्रभाव पूरी जिन्दगी रहे या जिसका प्रतिशत यदि साधक को ६० भी मिलता है तो २-५ वर्ष तो रहे |

स्नेही स्वजन
 मैंने अभी कुछ दिन पहले एक अप्सरा यक्षिणी श्रृंखला प्रारम्भ की है जिसमें यह पता चलता है कि आप लोगों का रुझान किस ओर है अतः किसी भी वेशेष दिवस की दी जाने वाली साधनाओं को ध्यान में रखते हुए देना होगा क्योंकि तभी आप लोग साधनाओं कि ओर अग्रसर हों पायेंगे |

  अक्षय तृतीय वर्ष की साढ़े तीन मुहूर्तों मैं से एक पूर्ण मुहूर्त है जो पूर्ण सिद्धिप्रदायक है और अक्षय है जिसमें कि गयी चाहे साधनाएं हो या पुण्य कर्म हो या दान, ताप, जप आदि हों उनका कभी क्षय नहीं होता अर्थात उनके फल पूर्ण प्रभाव जीवन पर्यंत रहता है | किन्तु इसका अर्थ यह नहीं की हम कोई भी साधना एक हि बार करें |
J
   इसी क्रम में अप्सरा यक्षिणी जैसी ही अद्भुत शक्ति जो महादेव कि शक्ति है और साथ ही साधक की सखी या प्रिया रूप में सिद्ध होने वाली शक्ति है और यह साधक को कोई हानि भी नहीं पहुंचा सकती जैसा कि आप लोगों का मत है |

  स्नेही स्वजन, प्रत्येक साधना के विशेषतः अप्सरा यक्षिणी, भूत प्रेत, चंडालिनी, शाकिनी, डाकिनी आदि के दो पक्ष होते हैं- एक वाम मार्गी व एक दक्षिण मार्गी | उसी अनुसार प्रतिफल प्रदान करती है, जिस मासिकता से, संकल्पबद्ध हो कर व जिस विधि से आप साधना करतें है |

 चूँकि इस बार कि अक्षय तृतीया २१ अप्रैल को आ रही है जो हमारे पूज्य गुरुदेव का अवतरण दिवस है और हम शिष्यों का प्रिय त्यौहार तो आप सब लोगों को उपहार स्वरुप दो साधनाएं –

1.     अक्षय तृतीया की सुवर्ण गौरी सिद्धि साधना
2.     समस्त गुरु भाइयों के लिए गुरु रहस्य सिद्धि साधना

 सुवर्ण गौरी सिद्धि साधना -

स्वर्ण गौरी शक्ति का सौभाग्य स्वरुप है | जो जीवन में अति आनंद, वैभव, अक्षय धन दात्री सोभाग्य प्रदात्री देवि है, इनकी सिद्धि के बाद जीवन में निरंतर उत्साह, सफलता तथा पारिवारिक सुख शान्ति अनुकूलता प्राप्त होते रहतें हैं |

 सुवर्ण गौरी साधना जीवन के रगिस्तान में अमृत कुंद के सामान है किन्तु एक बार सिद्ध हो जाने पर साधक के जीवन में प्रत्येक क्षण अपना प्रभाव देती रहती है | सुवर्ण गौरी अप्सरा कहीं जाती है इनका एक विशेष नाम शिव दूती भी है जो भगवान् शिव की कृपा एवं वर प्राप्त कर अपने सर्वांग स्वरुप में प्रिया है |

  महदेव की विशिष्ठ शक्तियों के सम्बन्ध में एक विशिष्ठ ग्रन्थ आनंद मंदाकिनी है जिसमे इस साधना के सम्बन्ध में पूर्णतः व प्रमाणिकता से विधि विधान के साथ लिखा गया है इस ग्रन्थ में सुवर्ण गौरी के सम्बन्ध में लिखा गया है कि जो साधक इसकी सोलह शक्तियों को सिद्ध कर लेता है वह संसार का सौभाग्यशाली व्यक्ति हो जाता है |
 इनके सोलह स्वरुप हैं

·        अमृताकर्षणिका

·        AMRITAKARSHNIKA

·        रूपाकर्षणिका

·        RUPAKARSHNIKA

·        सर्वासाधिनी

·        SARVASADHINI

·        अनंगकुसुम

·       ANANGKUSUMA

·        सर्वदुखविमोचिनी

·        SARVDUKHVIMOCHINI

·        सर्वसिद्धिप्रदा

·        SARVSIDDHIPRADA

·        सर्वकामप्रदा

·        SARVKAAMPRADA

·        सर्वविघ्ननिवारणी

·        SARVVIGHNANIVARINI

·        सर्वस्तम्भनकारिणी

·        SARVSTAMBHANKARINI

·        सर्वसंपत्तिपूर्णी

·        SARVSAMPATTIPURNI

·        चित्ताकर्षणिका

·        CHITTAKARSHNIKA

·        कामेश्वरी

·        KAAMESHWARI

·        सर्वमंत्रमयी

·        SARVMANTRAMAYI

·        सर्वानन्दमयी

·        SARVANANDMAYI

·        सर्वेशी

·        SARVESHI

·        सर्ववाशिनी

·        SARVVASHINI


विधि-  व सामग्री -- पीले वस्त्र पीला आसन , घी का दीपक अष्ट गंध, पीले ही पुष्प, नैवैद्ध हेतु लड्डू केवड़ा मिश्रित जल ताम्र पात्र, अक्षत यानी बिना टूटे चावल इत्र, और सुगंधित अगरबत्ती  | साथ ही सोलह सुपारी जो सोः शक्तियों को अर्पित की जाएगी , ये साधना रात्री कालीन है १० बजे के बाद स्नानादि से निवृत्त होकर पूर्व दिशा की ओर मुंह कर बैठ
 जाएँ तथा गुरु गौरी एवगणेश पूजन संपन्न करें तथा संकल्प लेकर एक माला गुरु मन्त्र की अवश्य करें,
तत्पश्चात हाथो में पुष्प और चावल लेकर सुवर्ण गौरी का आवाहन और स्वागत करें . आवाहन के बाद इस स्वागत मन्त्र का पांच बार उच्चारण जोर से करें इसके बाद यदि
 आपके पास कोई भी स्वर्ण का आभूषण हो तो उसे एक कटोरी में धोकर रखें तथा उपरोक्त मन्त्र से सोलह
 शक्तियों का पूजन पुष्प केवडा मिश्रित जल और अक्षत से करें | इसके बाद मिटटी के सात दिए जो घी के होंगे प्रज्वलित करें व  की ७ माला जप करें मूल मन्त्र की  ७ माला मन्त्र जप करें | ये मन्त्र जप रुद्राक्ष या पीले हकीक, या हल्दी माला से करें | प्रत्येक माला के बाद केवड़ा मिश्रित जल से निम्न संकल्प लेना है
       " त्रेलोक्यमोहने चक्रे इमा: प्रकट स्वर्ण गौरी " . इस साधना के बाद साधक वहीँ पर भूमि शयन करें 



स्वागत मन्त्र-
गौरी दर्शनमिच्छन्ति देवाः स्वामीष्टसिद्धये |
तस्ये ते परमेशायै स्वागतं स्वागतं च ते ||
कृतार्थेनुग्रहितोऽस्मि सकलं जीवितं मम |
आगता देवि देवेशि सुस्वागत]मिदं पुनः ||

GAURI  DARSHANMICHANTI  DEVAH  SWAMISTSIDDHYE
TASYE  TE  PARMESHAAYE  SWAGATAM SWAGATAM  CH TE
KRITARTHENUGRAHITOSMI  SAKALAN  JIVITAM  MAM
AAGATA  DEVI  DEVESHI  SUSWAGATMIDAM  PUNAH
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ॐ सुवर्ण गौरी अमृताकर्षणिका पूजयामि नमः |
ॐ सुवर्ण गौरी रूपाकर्षणिका पूजयामि नमः |
ॐ सुवर्ण गौरी सर्वासाधिनी पूजयामि नमः |

OM  SUVARN  GAURI  AMRITAKARSHNIKA  PUJYAMI  NAMH
OM  SUVARN  GAURI  RUPAKARSHNIKA  PUJYAMI  NAMH
OM  SUVARN  GAURI  SARVASADHINI  PUJYAMI  NAMH

                --------------------------क्रमशः


सुवर्ण गौरी मन्त्र –

युं क्षं ह्रीं सुवर्ण गौरी सर्वान्कामान्देही यं कुं ह्रीं युं नमः ||

YUM  KSHAM HREEM  SUVARN  GAURI  SARVANKAMANDEHI  YAM  KUM HREEM  YUM  NAMAH

इस प्रकार साधना सम्पन्न होने पर साधक को कभी-कभी क्रम के दौरान हि अनुभूतियाँ होने लगती हैं | 
चूँकि अक्षय तृतीय है अतः एक ही दिन क प्रयोग है ----- अब साधना सम्पन्न करें साधन संपन्न बनें यही सदगुरुदेव से प्रार्थना है | 

रजनी निखिल 


***NPRU***