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Friday, March 6, 2015

धनदा रतिप्रिया यक्षिणी प्रयोग (भाग २)




अहम् चिन्त्यं मनः चिन्त्यं प्राणा चिन्त्यं गुरौश्वर |
सर्व सिद्धि प्रदातव्यंतस्मै श्री गुरुवे नमः ||

हे इश्वर सिर्फ आपसे एक प्रार्थनाहै कि सदैव मेरा शरीर और जीवन सदैव गुरुदेव का ही स्मरण करता रहे, मेरा मन प्रत्येक क्षण गुरु चरणों में लीन रहे, मेरे प्राण गुरु स्वरुप इश्वर में अनुरक्त रहें, ब्रह्माण्ड में केवल गुरु ही है जो मुझे समस्त प्रकार कि सिद्धियाँ प्रदान कर सकतें हैं | अतः ऐसे सदगुरुदेव को शत् शत् नमन है |

  स्नेही स्वजन,
     होली कि शुभकामनाओं के साथ जय सदगुरुदेव

 उम्मीद ही नहीं पूर्ण विश्वास है के आपने होली पूर्णिमा का साधनात्मक लाभ उठाया होगा और सदगुरुदेव से यही प्रार्थना है कि आप सबको पूर्ण सफलता प्रदान करें |
 जिन साधकों ने कल इस साधना को एक हि दिन में पूर्ण किया है उनके लिए आगे के तीन महत्वपूर्ण प्रयोग दिए जा रहे हैं, जिनसे इस साधना को पूर्णता प्राप्त होगी |


चूंकि रुद्रयामल तंत्र में वर्णित है कि धनदा रतिप्रिया यक्षिणी के साथ यदि काम देव का पूजन किया जाये (जो कि आप सबने किया ही है) तो देवि अत्यंत प्रसन्न होती हैं व साधक के सांसारिक जीवन के सभी मनोरथों को पूर्ण करती है | चाहे वो कन्याओं द्वारा श्रेष्ट पति कि प्राप्ति हेतु हुए हो या किसी भी रोगी के द्वारा शारीरिक दोषों और दुर्बलताओं का नाश करने हेतु हो | कामदेव ओर रतिप्रिया यक्षिणी के समिल्लित पूजन से साधक स्वयं कामदेव के सामान सौन्दर्य व पूर्णता भी प्राप्त कर सकता है |

 लक्ष्मी तंत्र कि सर्वोत्तम साधना मानी जाती है | भाइयों बहनों हम यदि प्राचीन ग्रंथों में भारत कि वैभवता व श्रेष्टता के बारे में पढ़ते हैं तो आश्चर्य लगता है लेकिन यह पूर्ण सत्य है ओर इसका कारण यह है कि उस समय लोगों के द्वारा किया जाने वाला आचार विचार और साधनाओं के प्रति पूर्ण आस्था, तांत्रिक ज्ञान की पूर्ण प्रमाणिक जानकारी की प्रमुखता | जैसे जैसे धर्म अर्थात प्राचीन विद्याओं को लोग भूलते चले गए वैसे वैसे दरिद्रता का आगमन होता चला गया |

 अतः आवश्यकता है इस विशेष ज्ञान को पूर्ण प्रमाणिकता के साथ समझे, परखें, स्वयं प्रत्यक्ष क्रियाओं को संपन्न करें और अपने जीवन को समृद्ध, सुसंपन्न व वैभवशाली बनायें |

 इसी क्रम में इस साधना के तीन प्रमुख प्रयोग-

·        ऋण मोचन प्रयोग
·        आकास्मिक धन प्राप्ति हेतु
·        व्यापार एवं कार्य वृद्धि हेतु

 इस साधना को संपन्न करने के बाद साधक को आवश्यकतानुसार प्रयोग संपन्न करना चाहिए

1.     ऋण मोचन हेतु
||ॐ ह्रीं श्रीं मां देहि धनदे रतिप्रिये स्वहा ||
           Aum hreem shreem maam dehi dhanade ratipriye swaha

2.     आकस्मिक धन प्राप्ति हेतु
||ॐ ह्रीं ॐ माम ऋणस्य मोचय मोचय स्वाहा ||

Aum hreem aum maam rinasy mochay mochay swaha


3.     व्यापार एवं कार्य वृद्धि हेतु
|| ॐ धं श्री ह्रीं रतिप्रिये स्वाहा ||

Aum dham shreem hreem ratipriye swaha

इन प्रयोगों को संपन्न करने के लिए जो नियम मूल साधना के हैं उन्ही को संपन्न करना चाहिए तथा मूल मन्त्र की एक माला करने के बाद सम्बंधित मन्त्र की १०१ माला एक दिन में ही सपन्न करके प्रयोग पूर्ण करें | सदगुरुदेव से यही प्रार्थना है कि आप सभी साधना संपन्न बनें और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पूर्ण सफलता प्राप्त करें |

निखिल प्रणाम

रजनी निखिल


***NPRU***  

Thursday, March 5, 2015

होली का यक्षिणी प्रयोग

         {तंत्रस्य जीवनं धर्म, तन्त्रं ही परिपूर्णता}




स्नेही स्वजन !

           होली की शुभकामनाओं के साथ********

तंत्र, तो जीवन का आधार है, हम तंत्र में ही जीते हैं, ये अलग बात है कि मन्त्र बद्ध न होकर क्रिया बद्ध होकर जीते हैं, किन्तु यही क्रिया शीलता मान्त्रिक होजये तो तंत्र का मूल स्वरुप सामने आ जाता है, भाइयो बहनों ! मेरे विचार में आज के समय में तंत्र की व्याख्या समझाने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि आप सभी बहुत कुछ पढ़ चुके हैं और समझ चुके हैं किन्तु तंत्र तो महा विज्ञान है जिसमें हजारों सिद्धांत है . अब ये तो जीवन की व्यवस्था है जिसमें अभ्यास और व्यवहारिक ज्ञान का समावेश है |

          बस इतना समझना ही काफी है कि तंत्र के माध्यम से सम्पूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त ईश्वरीय शक्ति को आकर्षित कर अपने अनुकूल कर सिद्धि प्राप्त की जा सकती है |

   तंत्र साधक अपने अन्दर उस सिद्ध शक्ति को चुम्बकीय प्रभावशाली और तीव्र उर्जायुक्त बनाता है | ये विज्ञान मानव शरीर के सूक्ष्म शरीर में स्तिथ चक्र और यौगिक ग्रंथियों को जागृत कर शक्तिशाली बनाता है, तंत्र के माध्यम से आम्नव अपने अन्दर की बंधन से मुक्त होकर अपनी शक्तियों का विस्तार कर सकता है , शरीर में रहते हुए भी शरीर से मुक्त होकर अपने आपको विस्तार दे सकता है, इसी क्रम में ब्रम्हांड में स्तिथ अनेक शक्तियां यक्ष, किन्नर, गन्धर्व, एवं अन्य भूत प्रेत प्रकार की योनी को भी अपने अनुकूल बनाकर अपने जीवन को सहजता प्रदान कर सकता है....

 चूँकि होली महानिषा के श्रेणी में आती है अतः तंत्र का विशिष्ट दिवस कहलाता है सभी तंत्र साधक इस दिन का बड़ी बेसब्री से इंतज़ार करते हैं , तो इस बार हम पूर्णिमा से पूरे पांच दिन अलग-अलग साधनाएं सम्पन्न कर अपनी पूर्णता की ओर अग्रसर होंगे |

      मै जानती हूँ कि आप सब अपनी पसंद की साधना करना चाहते हैं और हमारे ब्लॉग सभी तरह का मैटर उपलब्ध है भी किन्तु जो सबसे आवश्यक और और महती आवश्यकता हो आप उसे पहले करिए, और जीवन में सभी मूल भूत आवश्यकताओं की पूर्ती हेतु धन यानि लक्ष्मी की आवश्यकता होती ही है अतः पहले इसी ओर प्रयास करना चाहिए | हैं ना J

भाईयों बहनों ! सद्गुरुदेवजी ने बताया है कि तंत्र और लक्ष्मी आपस में पूर्ण रूप से जुड़े हैं लक्ष्मी प्राप्ति हेतु जिस प्रकार क्रिया शील रहना आवश्यक है उसी अनुरूप तंत्र भी क्रियारूप है हि तंत्र में वह शक्ति है कि वह लक्ष्मी को अपने वष में कर ले | और जहाँ बात आती हो यक्षिणी कि तो लक्ष्मी का सर्वश्रेष्ठ स्वरुप है धनदा रतिप्रिया यक्षिणी | और इस स्वरुप को तंत्र साधना द्वारा जागृत किया जा सकता है |

भाइयो बहनों ! अब प्रश्न आता है कि साधना सामग्री, यानी यंत्र माला वगैरह , तो आप में से अधिकांशतः लोगों के पास तंत्र कौमुदी का अप्सरा यक्षिणी रहस्य खंड और तंत्र मण्डल यंत्र  तो है ही बाकी विधि ये है ही अब आपके ऊपर निर्भर है कि प्रत्यक्षीकरण करना है या आवश्यकतानुसार लाभ प्राप्त करना है |

दारिद्रय सन्हत्री यक्षिणी पाप खंडिनी विद्या के अंतर्गत धनदा रतिप्रिया यक्षिणी साधना साधक को संपन्न करनी चाहिए, यह देवि लक्ष्मी का सर्वोत्तम व एकमात्र स्वरुप है जिसमे तांत्रिक विधान द्वारा सिद्धि प्राप्त कि जा सकती है |

   इस साधना कि सबसे बड़ी विशेषता यह है कि लक्ष्मी के जितने भी स्वरुप होते है, उन सभी स्वरूपों का आवाहन व विशेष पूजा की जाती है, प्राण प्रतिष्ठा प्रक्रिया संपन्न की जाती है, दशों दिशाओं का कीलन किया जाता है जिससे किसी भी बाहरी बाधा से साधना में विघ्न ना पड़े और जो भी संकल्प साधक करें, उसका फल साधक को तत्काल अवश्य ही प्राप्त हो |

 प्राण प्रतिष्ठा से हि शक्तियां चैतन्य होती है | प्राण प्रतिष्ठा का विधान अत्यंत गुह्तम रहा है व इस महान तांत्रोक्त साधना में प्राण प्रतिष्ठा आवश्यक है |

 रुद्रयामल तंत्र  में स्पष्ट वर्णित है कि यदि यह तंत्र साधना पूर्ण विधि विधान से संपन्न कि जाय, तो ऐसा हो हि नहीं सकता कि देवि तत्काल आकर साधक का मनोरथों को पूर्ण ना करे |

 इस तांत्रोक्त साधना का मूल विधान तो एक ही है, परंतु आगे प्रत्येक आर्थिक समस्या के सम्बन्ध में अलग अलग मन्त्र जप है | 


सदगुरुदेव द्वारा प्रदत्त--

        तांत्रोक्त धनदा रतिप्रिया यक्षिणी साधना

     अब साधक सबसे पहले कुबेर पूजन सम्पन्न करें, अपने सामने कुबेर यंत्र स्थापित कर उसका चन्दन से पूजन कर एक माला निम्न कुबेर मन्त्र का जप करें

कुबेर मन्त्र 
                                                    
|| ॐ यक्षाय कुबेराय धनधान्याधिपतये धनधान्यसमृद्धि मे देहि दापय स्वाहा ||
तत्पश्चात् सर्वप्रथम एक थाली में “ॐ ह्रीं सर्वशक्ति कमलासनाय नमः” लिखें और उस पर पुष्प की पंखुड़ियां रखें, तत्पश्चात् इस पर धनदा रतिप्रिया यक्षिणी यंत्र,    या  अप्सरा यक्षिणी मण्डल यंत्र स्थापित कर चन्दन लेपन करें और सुगंधित पुष्प अर्पित कर संकल्प विनियोग संपन्न करें |


   विनियोग में अपने हाँथ में जल लेकर निम्न विनियोग मन्त्र पढ़ कर जल भूमी पर छोड़ दें –

 ॐ अस्य श्रीधन्देश्वरीमंत्रस्य कुबेर ऋषिः पंक्तिश्छंदः श्रीधन्देश्वरी देवता धं बीजं स्वाहा शक्तिः श्रीं कीलकं श्रीधन्देश्वरीप्रसादसिद्धये समस्तदारिद्रयनाशाय श्रीधन्देश्वरीमन्त्रजपे विनियोगः ||


प्राण प्रतिष्ठा प्रयोग –

प्राण प्रतिष्ठा के द्वारा जीव स्थापना की जाती है व साक्षात यक्षिणी का आवाहन किया जाता है, इसमें अपने चारो ओर जल छिड़के तथा निम्न मन्त्रों द्वारा आवाहन करें-

  ॐ आं ह्रीं क्रौं यं रं लं वं शं षं सं हं सः सोऽहं श्रीधन्देश्वरीयंत्रस्य प्राणा इह प्राणाः |     
  ॐ आं ह्रीं क्रौं यं रं लं वं शं षं सं हं सः सोऽहं श्रीधन्देश्वरीयंत्रस्य जीव इह स्थितः |

  ॐ आं ह्रीं क्रौं यं रं लं वं शं षं सं हं सः सोऽहं श्रीधन्देश्वरीयंत्रस्य सर्वेंद्रीयाणि इह स्थितानि |

  ॐ आं ह्रीं क्रौं यं रं लं वं शं षं सं हं सः सोऽहं श्रीधन्देश्वरीयंत्रस्य वाङमनस्त्वक्चक्षु श्रोत्रजिव्हाघ्रापाणिपादपायूप्स्थानी इहैवागत्य सुखं चिरं तिष्ठन्तु स्वाहा ||

                श्रीधान्देश्वरी इहागच्छेहतिष्ठ||

    यह प्राण प्रतिष्ठा प्रयोग साधना का सबसे महत्वपूर्ण कार्य है, यह अपनी साधना में प्राण प्रतिष्ठा में प्राण तत्व भरने कि प्रक्रिया है |

    अब धनदा यक्षिणी लक्ष्मी के ३६ स्वरूपों की पूजा कर उनका आवाहन किया जाता है, प्रत्येक स्वरुप का आवाहान कर ‘ एक तांत्रोक्त लक्ष्मी फल ‘ (लघु नारियल) “जो कि किसी भी पूजा सामग्री की दूकान में प्राप्त हो जाता है”  स्थापित करें, धनदा यक्षिणी के ३६ स्वरूपों पर चन्दन चढ़ाएं,(यंत्र पर हि चन्दन का तिलक करें), प्रत्येक तांत्रोक्त लक्ष्मी फल के आगे एक-एक दीपक जलाएं तथा पुष्प कि एक-एक पंखुड़ी रखें, आवाहन क्रम निम्न प्रकार से है-

ॐ धनदायै नम :
ॐ दुर्गायै नम :
ॐ चंचलायै नम :
ॐ मंजुघोषायै नम :
ॐ पद्मायै नम :
ॐ महामायै नम :
ॐ सुन्दर्यै नम  :
ॐ रुद्राण्यै नम :
ॐ वज्रायै नम :
ॐ कमलायै नम :
ॐ अभयदायै नम :
ॐ उमायै नम :
ॐ कामदायै नम :
ॐ महाबलायै नम :
ॐ कामप्रियायै नम :
ॐ चपलायै नम :
ॐ सर्वशक्तयै नम :
ॐ सर्वेश्वर्यै नम :
ॐ मंगलायै नम :
ॐ त्रिनेत्रायै नम :
ॐ त्वरितायै नम :
ॐ सुगन्धायै नम :
ॐ वाराह्यै नम :
ॐ ॐ कराल भैरव्यै नम :
ॐ सरस्वत्यै नम :
ॐ चामर्यै नम :
ॐ हरिप्रियायै नम :
ॐ वरदायै नम :
ॐ सुपट्टिकायै नम :
ॐ महालक्ष्म्यै नम :
ॐ क्षुधायै नम :
ॐ धनुर्धरायै नम :
ॐ गुह्याश्वर्ये नम :
ॐ लीलायै नम :
ॐ भ्रामर्यै नम :
ॐ माहेश्वर्यै नम :

  इस प्रकार पूजन कर साधक यक्षिणी का ध्यान करे, तथा यक्षिणी यन्त्र व चित्र के सामने खीर का भोग लगाये, इसके अतिरिक्त घी, मधु तथा शक्कर का भोग लगायें |
 कुछ ग्रंथों में यह भी वर्णित है कि साधक धनदा रतिप्रिया यंत्र के नीचे अपना फोटो अथवा अपना नाम अष्टगंध से कागज़ पर लिख कर रख दे |

  अब साधक धनदा रतिप्रिया यंत्र का वीर मुद्रा में बैठ कर मन्त्र जप तांत्रोक्त यक्षिणी माला से प्रारम्भ करे व मंत्रजाप सम्पूर्ण होने के पश्चात हि आसन से उठे |

मन्त्र-
|| ॐ रं श्रीं ह्रीं धं धनदे रतिप्रिये स्वाहा ||

  यह धनदा साधना का मूल मन्त्र है, १०० माला मन्त्र जप करना है, यदि आसन सिद्धा नहीं है अर्थात एक ही दिन में साधना यदि संपन्न न कर सकें तो ,
इस साधना का ११ दिन का संकल्प लें और इसे प्रतिदिन १००८ मन्त्रों का जप यानी ११ माला जप करते हुए ११ दिन में साधना संपन्न करें, इस तरह सम्पूर्ण प्रयोग कुल ११ दिन का हो जायेगा |  तो साधना करने का दृण संकल्प लें और----J


निखिल प्रणाम


***रजनी निखिल***

Sunday, February 15, 2015

महा शिवरात्री अनुष्ठान


महाशिवरात्रि अनुष्ठान

पाशुपतेय साधना 



   जो निर्गुण है, निराकार हैं, निर्मल और शांत हैं जो समस्त जड़ चेतन में विद्यमान है ऐंसे आदि गुरु महादेव को श्रद्धा सुमन अर्पित हैं----- 
महाशिव रात्रि शिव का अति प्रिय दिवस है, और इस दिन यदि जो भी चाहे साधना के माध्यम से भोले नाथ से प्राप्त कर सकता है, हैं न | पर इसके लिए जिद होनी चाहिए, साधना की और पूर्णता प्राप्त करने की, तो ऐंसा क्या है जो आप प्राप्त नहीं कर सकते, और शिव तो हैं ही भोले | बस आपमें क्षमता होनी चाहिए लेने की, और उन्हें तो देना ही है....
स्नेही स्वजन !

           तो आप सब तैयार हैं न J
जीवन में जब रोग, शोक, और पाप बढ़ जाते है तो अनेक तरह की विपत्तियाँ उत्पन्न होती जाती हैं और इन विपत्तियों का निराकरण साधना के माध्यम से संभव है ये जानकर व्यक्ति इस और झुकता ही है | क्योंकि जीवन में उन्नति न होना एक प्रकार का दोष है इसी प्रकार पूर्वजन्मकृत दोष भी व्यक्ति को निर्बल बनाते हैं | तब ,  सदगुरुदेव के शब्दों में कि “जब तक श्रम रूपी भूमि पर  साधना की आहुति संपन्न नहीं की जाती तब तक जीवन में सफलता दूर हि रहती है, ऐसा व्यक्ति अपने जीवन में छोटी-छोटी समस्याओं में ही उलझा रहता है |”

 तो इस प्रकार की समस्याओं से निपटने हेतु ही गुरुदेव ने अनेक साधना रूपी शस्त्र प्रदान किये हैं ऐसा ही एक शस्त्र जो अर्जुन ने शिव से प्राप्त किया था----


               पाशुपतेय  प्रयोग   

 वैसे तो इस सधना को किसी भी महीने की शुक्ल पक्ष कि प्रतिपदा से प्रारम्भ किया जा सकता है, किन्तु महाशिव रात्रि के इस दिवस से यदि प्रारम्भ किया जाये तो सफलता १०० % हो जाएगी .  प्रारम्भ करने से पूर्व साधक को निम्न तथ्यों का दृढ़ता से पालन करना चाहिए –

१.     पुरे पुरे साधना में दाड़ी , बाल न कटवाएं, और क्षौर कर्म न करें |
२.     जमीन पर सोयें  ही उपयोग करें | पूर्णतः ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करें और गायन, संगीत, वाद्य आदि से दूर रहें |
३.     अन्न स्वीकार न करें, केवल दूध या फल लें | मौन रहने का प्रयास करें यानी कम से कम बात चीत करें |
४.     साधना काल में किसी भी प्रकार का व्यसन आदि का प्रयोग न करें | यानी शुद्धता का एवं खान पान का विशेस ध्यान रखें
५.     साधनाकाल में मात्र काले वस्त्र हि धारण करें और वस्त्रों में भी एक काली धोती पहन लें, तथा एक काली धोती ओढ लें, इसके अलावा शरीर पर किसी प्रकार का कोई वस्त्र न हो |
६.     साधना कक्ष में साधक के अतिरिक्त कोई भी अन्य व्यक्ति उस कक्ष में प्रवेश न करे |
७.     साधना काल में किसी भी प्रकार का व्यवधान नहीं होना चाहिए, किसी भी प्रकार कि परिस्थितियों में विचलित न हों |
इस साधना में शिव शक्ति यानी शक्ति रुपी सिंह वाहिनी दुर्गा  और शिव दोनों की साधना एवं पूजा की जाती है, इसे रात्री को ही सम्पन्न की जाती है किन्तु महाशिव रात्रि के अवसर पर प्रातः ही इस साधना की तैयारी कर पूजा प्रारम्भ कर साधना का संकल्प ले लेना चाहिए | अपने सामने बाजोट पर काले रंग का वस्त्र बिछाकर माँ  दुर्गा की सुन्दर पिक्चर स्थापित कर लें साथ ही एक शिवलिंग, जो कि कोई भी  हो सकता है पारद शिवलिंग, स्फटिक शिवलिंग या  नर्मदेश्वर भी हो सकता है | रुद्राक्ष माला, (रुद्राक्ष माला छोटे दानों की हो), कच्चा दूध | और जो भी आप श्रद्धा से अर्पित करना चाहें | 

 अब साधना सामग्री—काले वस्त्र, काला आसन, दिशा पश्चिम | यदि किसी के पास पसुपतेय शिव यंत्र हो तो अति उत्तम या शिव यंत्र हो आप चाहें तो कहीं से प्राप्त कर लें, तो उत्तम होगा अन्यथा पारद शिवलिंग  के होते यंत्र की आवश्याकता नहीं होती |

      अबीर, कुमकुम, केसर मौली सुपारी अक्षत गुलाब के लाल पुष्प और घी क दीपक जो पूरे ११ दिन अखंड साधन काल में जलता रहेगा |
साधन अवधि व जप--- ११ दिन ११ माला प्रतिदिन |


विधान—
         यदि यंत्र हो तो शिव लिंग और शिवलिंग का दूध मिश्रित जल से “ॐ नमः शिवाय” का १०८ बार जप करते हुए, अभिषेक सम्पन्न करें तत्पश्चात माँ दुर्गा के चित्र के चारों ओर कुमकुम रंगे चावल से एक घेरा बना दें | उनका पूजन कुमकुम अक्षत केसर मौली सुपारी पुष्प धुप दीप से समपन्न करें |
उसके बाद मूल मन्त्र का अनुष्ठान प्रारम्भ करें

मन्त्र-

ॐ आं ह्रीं सौं ऐं क्लीं हूं
सौः ग्लौं क्रों एही एही भ्रमराम्बा हि सकलजगन्मोहनाय मोहने सकलाण्डजपिण्डजान् भ्रामाय भ्रामय राजा प्रजावशकरी संमोहय महामाये अष्टादशपीठरूपिणि अमलवरयूंस्फुर स्फुर प्रस्फुर प्रस्फुर कोटिसूर्यप्रभा-भासुरी चंद्र्जटी मां रक्ष रक्ष मम शत्रून् भस्मीकुरु भस्मीकुरु विश्वमोहिनी हुं कलीं हुं हुं फट् स्वाहा ||

“Om aam hreem shaum aim kleem hoom sauh glaum kraum ehi ehi bhramramba hi sakal jaganmohnaay-mohnaay saklaandajpindjaan bhramay-bhramay raja praja vashkari sammohay-sammohay mahamaaye ashtadash peeth roopini amalvar sfur sfur prasfur-prasfur kotisury prabha-bhasuri chandrajati mam raksha-raksha mam shatrun bhasmikoor-bhasmikuru vishva mohini hum kleem hum-hum fatta swaha”|

मन्त्र के पश्चात् जप समर्पण कर क्षमा प्रार्थना अवश्य करें |
भाइयो बहनों हो सकता है ये साधना आपको लम्बी, श्रमश्राध्य लग रही हो किन्तु ये प्रयोग नहीं अपितु साधना है, और साधना तो ऐंसी ही होती है . हैं ना
 किन्तु साधना के पूर्ण विधि विधान से सम्पन्न होते ही साधक को एक दिव्य अनुभूति का अनुभव होता है और किसी भी कठिन से कठिन परिस्तिथि में भी एक बार इस मन्त्र का जाप करने पर उसे मार्ग मिल जाता है और शिव रूपी माँ भ्रम्रराम्बा प्रत्यक्ष उसे सहयोग प्रदान करती है |

    वस्तुतः यह शिवरक्षा प्रयोग है जो कि अद्भुत और तीक्ष्ण होते हुए शीघ्र फलदायी है | अतः संपन्न करें और स्वयम अनुभूत करें |

Nikhil pranam

रजनी निखिल

   ***N P R U***