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Monday, October 31, 2011

SHREEM BEEJ SADHNA-MY EXPERIENCE


कुछ समय पहले आरिफ भाई की पोस्ट से प्रकाश मे आयी इस साधना पर मेरा ध्यान गया। इतनी सरल और महत्वपूर्ण साधना को भला कौन नहीं करना चाहेगा। आप इस साधना संबंधी पोस्ट को ब्लॉग पर निम्न लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं।
http://nikhil-alchemy2.blogspot.com/2010/04/tantra-vijay-1shreem-beej-sadhna.html

ब्लॉग पोस्ट मे बताई गयी CD के लिए मैंने बहोत सी जगह संपर्क किया पर कहीं से कोई जवाब नहीं। उस समय Facebook Group ना होने के कारण communication इतना सरल भी नहीं था। 6 महीने लग गए एक CD को ढूँढने मे, किसी प्रकार सफलता मिली और मैंने पूरा विधान स्वयं सदगुरुदेव की दिव्य वाणी मे सुना। जिसमे की सदगुरुदेव ने स्पष्ट बताया है की यह प्रयोग एक ऐसे ग्रंथ से है जो की सर्वथा लुप्त ही हो चुका है। कुछ प्रश्न उठे तो मैं आरिफ भैया के पास अपनी जिज्ञासा लेकर पहुँच गया। आरिफ भैया ने बड़े ही स्नेह से सारी जिज्ञासाओं का समाधान किया और एक बड़े भाई की तरह सारा विधान समझाया। आगे चलकर कुछ और प्रश्न भी मस्तिस्क मे आये तो रघुनाथ भाई ने तत्काल सहयोग दिया। साधना से पूर्व ही जीवन की एक बड़ी सफलता ये मिली की मुझे वरिष्ठ भाइयों का प्रेम और पूर्ण सहयोग मिला, जो की निरंतर मिलता रहता है और अब जीवन भर की एक अमूल्य धरोहर है। अब साधना के लिए सामग्री एकत्रित करनी थी। चांदी की सलाका तो आसानी से मिल गयी पर चांदी के लॉकेट के लिए बहुत घूमना पड़ा। किसी प्रकार एक 2x1.5 इंच का लॉकेट मिल गया। मैंने अनुमान लगाया की 1x1 feet के भोजपत्र से काम चल जाएगा इतना बड़ा भोजपत्र ढूँढना भी एक समस्या थी पर किसी प्रकार वह भी मिल गया। अच्छी गुणवत्ता का केसर भी जरा मुश्किल से ही मिला।  सारी तैयार पूर्ण हो गयी और अब अमावस्या का इंतज़ार था।

अमावस्या की रात्रि आयी और मैं सारी सामग्री अपने साधना कक्ष मे एकत्रित कर के रख रहा था क्योंकि मुझे अंदाज़ा आ गया था की यदि 2 घंटे मे ये साधना सम्पन्न करनी है तो कोई भी चूक नहीं होनी चाहिए। 10:45 हो गए और बस अब 15 मिनट मे साधना प्रारम्भ करनी थी, तभी याद आया की लॉकेट तो रख लिया है पर बाह मे बाधने के लिए धागा तो लिया ही नहीं, ये मेरे लिए बड़ी समस्या थी क्योंकि अब बाज़ार जाकर धागा लाने का समय नहीं था, किसी प्रकार एक पूजन सामग्री के थैले मे धागा मिल गया, मुझे आजतक नहीं पता की वह काला धागा (जो की थोड़ा मोटा था और बांह पे बांधने के लिए ही उपयुक्त होता है) उस थैले मे कैसे आया। मैं खुश था की चलो अब सब तैयार है, तभी 10:55 को मेरे साधना कक्ष की ट्यूबलाइट (tubelight) उड़ गयी और अंधकार हो गया। ट्यूबलाइट जो पता नहीं कितने बरसों से चल रही थी, चलते चलते अपने आप ही बंद हो जाये ऐसा कैसे हो सकता है, उसे ठीक करने का प्रयास किया पर कोई फरक नहीं पड़ा। समय के अभाव को भाँप कर मैंने तत्काल मंद रोशनी वाली एक CFL जो की दूसरे रूम मे लगी थी और एक मात्र विकल्प था उसे निकाल कर मेरे साधना कक्ष मे लगा दिया और 11 बजते ही साधना विधि प्रारम्भ कर दी। सारी व्यवस्था पहले से कर चुका था इसलिए बाद मे कोई समस्या नहीं आयी। मंत्र जाप के साथ भोजपत्र पे श्रीं बीज का अंकन जरा तेज़ी से किया जिससे अंतिम प्रक्रिया के लिए समय बचा सकु। अंत मे सारी प्रक्रिया पूर्ण करके भोजपत्र को मोड़ा तो त्रिगंध की बिंदियाँ लगने से वह थोड़ा भीग सा गया था और फूल भी गया था और लॉकेट मे उसे अंदर डालने मे जरा सी समस्या हुई पर किसी प्रकार मैंने उसे जबरदस्ती अंदर डाल ही दिया, और दाहिनी बाह पर बांध लिया। पूरा विधान सम्पन्न करके देखा तो अभी भी 1 बजने मे 2 मिनट बाकी थे। सदगुरुदेव से साधना मे सफलता के लिए प्रार्थना करके वहीं सो गया।

साधना का प्रभाव देखने के लिए मैं व्याकुल था, कुछ दिनो तक कोई भी अनुभव ना होने से थोड़ा सा उदास हो गया, रघुनाथ भैया से बात की तो उन्होने कहा की.... "हो सकता है प्रकृति ने आपके लिए इस साधना का फल तैयार कर दिया हो पर आप उसे देख नहीं पा रहे हो या तो वह फल अभी आप तक पहुंचा नहीं है। फल का चिंतन छोड़िए वह तो मिलकर ही रहेगा किसी न किसी प्रकार से, आप साधना पूर्ण एकाग्रता और मनोयोग से करो यही बहुत है। साधना तो अपने आप मे एक आनंद है, साधना करने के लिए साधना करो, साधना फल के चिंतन मे ही डूबे रहोगे तो वह साधना कैसे हुई।" बात छू गयी, और मैं फिर से प्रसन्न हो गया, तय कर लिया की फल जब मिलना होगा मिलेगा। मैं अपने दैनिक कार्य मे लग गया और जल्दी ही भूल भी गया। कुछ ही दिनो बाद अनायास ही एक बड़ी धनराशि मिली जिसकी कोई उम्मीद नहीं थी। दूसरे ही दिन और धनराशि किसी ना किसी प्रकार से मिली जो की पहले दिन की अपेक्षा कम थी, मैंने इसे सामान्य घटना तो नहीं माना पर ध्यान गया ही नहीं की ये मेरी की गयी साधना का प्रभाव है, जब यही क्रम तीसरे दिन भी लगातार रहा तो मुझे फिर समझ आ गया की इस धन आगमन के पीछे का रहस्य क्या है। यह सिलसिला चलता रहा और रोज धनराशि कम होती जाती जो की इस बात की सूचक थी की साधना का प्रभाव धीरे धीरे कम हो रहा था। इसी तरह ब्लॉग एवं तंत्र कौमुदी मे पोस्ट की गयी अन्य साधनाएँ भी मैं समय समय पर करता रेहता हूँ अब ये चिंता नहीं करता की किसका कितना प्रभाव या फल मिल रहा है क्योंकि जो मिलना होता है वह तो मिलता ही है भले ही समय कितना भी लगे। इसी अद्वितीय श्रीं बीज प्रयोग जिस प्रकार सदगुरुदेव ने बताया था उसी प्रकार यहाँ स्पष्ट कर रहा हूँ


श्रीं बीज साधना विधान :
यह पूर्णतः तान्त्रोक्त प्रयोग होते हुए भी सरल व एक दिवसीय मात्र 2 घंटे की साधना है। मात्र 2 घंटो मे ही साधना को सम्पन्न करना एक महत्वपूर्ण तथ्य है। 
संक्रांति या किसी भी अमावस्या की रात्रि को ये प्रयोग करे। साधना से पूर्व ही साधना संबंधी सामग्री ला कर रख लें। एक भोजपत्र जो की थोड़ा बड़ा हो जिसमे आप 1008 बार श्रीं बीज लिख सके। एक चांदी की सलाका और एक इतना बड़ा चांदी का लॉकेट जिसमे की ऊपर बताया गया भोजपत्र समा सके, चांदी का लॉकेट इस प्रकार का हो की उसे अपनी बांह पर बांधा जा सके। ये सामग्री किसी भी सुनार की दुकान से मिल जाएगी, या तो order देकर बनवाई भी जा सकती है।

रात्रि मे 11 बजे त्रिगंध (कुमकुम, केसर और कपूर समान मात्रा मे मिलाये, उसमे जल का मिश्रण कर स्याही का निर्माण करें) बनाते हुए निम्न मंत्र का निरंतर जप करें। 

श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः

इसके उपरांत पूर्णतः निर्वस्त्र होकर स्नान करें, शरीर पर किसी भी प्रकार का वस्त्र या धागा ना हो। ना ही कोई यज्ञोपवीत, धागा या मौली हो। स्नान करने के बाद किसी वस्त्र को स्पर्श न करे, कोई आपको ना देखे, आप किसी को न देखें, एकदम एकांत स्थान हो। कहने का तात्पर्य है की स्नान के पश्चात आप अपने साधना कक्ष मे आ जाएँ तब तक ना ही आपको कोई देखे ना ही आप किसी को देखें, इस बात की व्यवस्था पहले से कर लें। पूरा साधना क्रम पूर्ण रूप से निर्वस्त्र ही करे.
साधना कक्ष मे आकर दक्षिण दिशा की ओर मुह कर बैठे, किसी भी प्रकार के आसन का प्रयोग किया जा सकता है यदि आसन ना हो तो जमीन पर बैठे। 
सामने भोजपत्र रखें और भोजपत्र पर चांदी की सलाका से उपरोक्त विधि से बनाए गए त्रिगंध के द्वारा 1008 बार "श्रीं" लिखें और प्रत्येक श्रीं बीज लिखते वक़्त "श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः" मंत्र का जप करें। एक बार मंत्र पढ़ कर एक श्रीं बीज का अंकन फिर दूसरी बार मंत्र पढ़कर दूसरे श्रीं बीज का अंकन इसी प्रकार 1008 बार लिखें। 
1008 बार श्रीं बीज का अंकन किसी भी प्रकार किया जा सकता है जैसा आपको अनुकूल हो, जरूरी नहीं है की उसे गोलाकार आकृति मे ही लिखा जाए। (मैंने इस प्रक्रिया की सरलता के लिए भोजपत्र के size के अनुसार ये अनुमान लगा लिया की एक पंक्ति मे कितनी बार श्रीं बीज अंकित हो पाएगा, यदि 50 बार एक पंक्ति मे हो जाता है तो सीधा सा गणित है की 20 पंक्तियों मे 1000 बार श्रीं बीजांकन हो जाएगा और बाकी 8 तो सरलता से स्वयं गिनकर लिखे जा सकते हैं)
इतना हो जाने के बाद मे निम्न मंत्र की एक माला (108 बार) जप हकीक माला से करें, एक बार मंत्र पढ़ के तर्जनी उंगली (pointer finger) से उसी त्रिगंध द्वारा 10 श्रीं बीज पर बिंदी लगाएँ, इस प्रकार एक माला मंत्र जप पूर्ण होते होते या उससे पहले ही भोजपत्र पर लिखे हुए 1008 श्रीं बीज पर बिंदियाँ लग जायेंगी। माला बाएँ हाथ (left hand) मे ले लें और दाहिने हाथ (right hand) की तर्जनी उंगली से बिंदियाँ लगाएँ।

श्रीं देवत्यै गंधर्व पिशाची कुबेराय हसन्मुखीं आगच्छ सिद्धये ह्रीं श्रीं हुं फट्

तदुपरान्त इसी भोजपत्र को मोड़ कर चांदी के लॉकेट मे डाल दें और लॉकेट के ढक्कन को बंद कर दें। चांदी का लॉकेट अपनी दाहिनी भुजा पर बांध लें, सदगुरुदेव से साधना मे सफलता के लिए प्रार्थना करें और सो जायें। रात्रि विश्राम वहीं भूमि पर निर्वस्त्र रहकर ही करना है। सोने के लिए भूमि पर चादर, चटाई आदि बिछा सकते हैं। सुबह उठकर आप वस्त्र आदि पहन कर अपनी दैनिक दिनचर्या मे लीन हो सकते हैं। और इस प्रकार ये साधना सम्पन्न होती है।
पूरी साधना 11 से 1 के मध्य हो जानी चाहिए, त्रिगंध बनाने से लेकर स्नान करने और पूर्ण साधना करने के बाद भोज पत्र को लॉकेट मे डालने और उसे दाहिनी बांह पर बांधने तक का कार्य 11 से 1 के मध्य हो जाना चाहिए। दिये गए समय मे इस साधना को सम्पन्न करना ही सबसे बड़ी चुनौती है। इस साधना मे किसी भी  चित्र, विग्रह, दीपक, धूप, पुष्प आदि का कोई विधान नहीं है। यह प्रयोग पुरुष या स्त्री कोई भी कर सकता है और इसमे भय जैसी कोई स्थिति नहीं आती। एक महीने के बाद उस भोजपत्र को नदी या सरोवर मे विसर्जित कर दें। चांदी का लॉकेट, सलाका और अन्य सामग्री अनेकों बार उपयोग की जा सकती है।

साधना सम्पन्न होते ही आय के नये आयाम खुलने लगते हैं, और किसी न किसी प्रकार धन आने लगता है। यदि प्रत्येक अमावस्या को ये प्रयोग कर लिया जाये तो धन आगमन होता ही रहता है।
जय सदगुरुदेव
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Before sometime I came across with post and my attention went to this sadhana. Who would not like to attempt this easy and important sadhana. You can read the related article for this sadhana by clicking on the following link

http://nikhil-alchemy2.blogspot.com/2010/04/tantra-vijay-1shreem-beej-sadhna.html
I tried a lot searching at many place for the CD mentioned in the post of the blog but did not have reply from anywhere. At that time communication was not easy as there was no facebook group. However I succeeded finding that CD after 6 months and I heard complete process in divine voice of sadgurudev. In which sadgurudev have mentioned that this process in from a scripture which is completely extinct. When few question rose in mind, I approached Arifbhai with my queries. With co-operation Arifbhai resolved the queries and like a elder brother he made me understood the complete procedure. Further few more questions rose in mind then Raghunath bhai gave support certainly. Before sadhana one of the big success I got was love and co-operation from elder brothers, which continuing and now it is priceless gift of the life. Now it was time to collect sadhana materials. Pen of the silver was easily available but for silver locket I wander a lot. However, I got one locket which was 2x1.5 Inches.  I thoughtfully calculated that bhojpatra sizing 1x1 feet will work but to find such big bhojpatra too was difficult but somehow I arranged that too. With difficulties I also arranged quality saffron. All preparation was done and I was waiting for dark night (amavasya).

Amavasya night came and I was arranging all the sadhana materials collected in sadhana room because I was having estimate that there is no chance of missing anything if this sadhana has to be completed in two hours. 10:45 time it was and 15 minutes were left when I was about to do sadhana; suddenly I recollect that I placed locket but forgot to place thread through which locket could be worn on arm.  It was big problem as there was no time going and purchasing it. However I found one thread in my poojan material bag, till today I don’t know how that thread (which was thick and good enough to wear arm) came to that bag. I was happy as all preparation was done. At the same moment at 10:55 tube light of my sadhana room went off and it went completely dark. Tubelight which was running from several years went off by its own how it went possible; I tried to repair it but it remained same. Understanding the lack of the time I took another deem light CFL lamp from another room and as a single option I arranged it in my sadhana room and I started my sadhana as soon as it was 11PM. Everything was arranged before so there were no further troubles. The process to write shreem beeja on bhojapatra  was done in speed to save time for last procedure. At last when bhojpatra was folded at that time bhojpatra went a bit wet because trigandh bindi done on it and it also went  plim and thus to place it in locket was a bit problematic but I forcefully pushed it in the locket and worn it on my right arm. When I looked after completing the whole process it was still 2 minutes left in 1AM. With a prayer to sadgurudev for success in sadhana I went to sleep at the same place only.

I was very excited to see the effect of the sadhana, but with no experience for some day let me went sad. When I speaked with raghunath bhaiya he said that “it may happen that nature have created the result for you but you are not able to see it or it have not yet reached to you.  Needless to worry for result, for sure it will come to you in any form, if you do sadhana with concentration and heart and soul it is enough. Sadhana is a kind of joy, do sadhana to perform sadhana, if you are doing sadhana concentrating on results how that process acts as sadhana? Words touched and I returned with joyful mind,



I decided that whatever I will going to get I will. I went to my routine life and forgot everything quickly. After few days unintended I received a big amount which was not at all expected. On second day too I received some amount which was lesser in comparison to previous day however; I didn’t take it as normal thing but did not understand that it is the effect of sadhana. When this order remained in third day too then I understood the mystery of the same. This routine continued and daily amount used to be decreased which was sign that effect of sadhana is reducing. This way I keep on doing sadhana of blog and tantra kaumudi on time to time without worrying that what results I am about to get and all because whatever we are suppose to get, we will get however the time factor may be anything. The same unique shreem beej prayog I am describing here as given by sadagurudev.

Shreem beej sadhana process :

Being complete tantrokt prayog though this process is easy one day process and of only 2 hours.  It is basic necessity to complete this process in two hours time.

This process should be done on sankranti or any amavasya. Before staring sadhana place all the sadhana materials required for this. There should be one big Bhojpatra on which big enough to write shreem beej on it 1008 times. A silver pen (salaakaa) and a big enough locket of silver in which above mentioned bhojpatra could be placed, the locket should be in such design which could be tied around the arm. This material could be gain from any gold smith or could be made by giving order.

At 11Pm in night chant the mantra while preparing Trigandha (ink made of red vermillion, saffron and camphor in equal quantity with water)


Shreem Hreem Shreem Mahaalakshmayai namah

After that have a bath being completely naked, there should be no cloth or thread on the body. Neither yognopavit, mauli nor anyother thread. After bath one should not touch any cloth, no one should see you, you should not look any one, the place should be silent. What do I mean to say is after bath when you go to sadhana room no one should look you neither you should look any one, the things should be arranged accordingly. Complete sadhana process should be done naked.

Face sitting south direction in sadhana room, any aasan could be brought to use, if aasan is not available you should sit on floor.
Place bhojpatra in front of you and with pen of silver write 1008 time “shreem” on bhojapatra with ink of trigandh prepared with method mentioned above and with every time shreem beej is written one should chant “shreem hreem shreem mahaalakshmyei namah” mantra. While chanting one mantra write one “shreem” beej and after that second time chant mantra and write “shreem” beej second time and this way 1008 time shreem should be written.

1008 times shreem bej could be written according to your comfort, it is not essential to write it in round shape (for my comfort I made assumption according to size of bhojpatra that how many times shreem could be written in one line. For example if you can write 50 shreem in one line it is simple calculation that in 20 lines you can write 1000 shreem and rest 8 could be written easily counting by self)

After completing this, one rosary (108 times) chanting of the following mantra should be done with hakeek rosary. After chanting one mantra bindi of same trigandh should be done on 10 shreem. This way while completing 108 mantra or before that bindi would be applied in all 1009 shreem written on bhoj patra. Rosary should be in left hand and with right hand’s pointing finger one should apply bindi.

Shreem devatyai gandharv pishachee kuberaay hasanmukhim aagachchh siddhaye hreem shreem hum phat

After that fold the same bhojapatra and place it in silver locket and pack it with cap of it. Locket of the silver should be tied on right arm, pray sadgurudev for the success in sadhana and sleep. Night stay should be done on the same place on floor being naked. Before sleeping one can place sheet or mat on the floor. After waking up in the morning you may wear the cloths and go for your routine. And this way, the sadhana is complete.

Whole sadhana should be completed between 11PM to 1AM, all the process from making the trigandh to having a bath and completing the sadhana by placing bhojpatra in locket and wearing it all processes should be done between 11PM to 1AM. It is biggest challenge to complete the sadhana in given time. In this sadhana there is no necessity of any picture, idol, lamp, joss sticks, flowers etc. this process could be done by male or female anyone and there is no situation to be scared of. After 1 month place that bhojpatra in river or pond. Locket, pen of silver and other materials could be brought into use many times.

After completing sadhana new scope to generate money starts opening and with anyway money will start coming in. if this prayog is done on every amavasya in that condition money will continuously come.
Jai sadgurudev.



   


                                                                                               
 ****NPRU****   

BRAHMRISHI VISHVAMITR PRANEET DIVY DEH SIDDHI SADHNA-POORN AROGYA,ROG MUKTI AUR ASAN SIDDHI HETU


 
 कहा गया है की पहला सुख निरोगी काया-अर्थात स्वस्थ्य शरीर ही जीवन की सबसे बड़ी संपत्ति है और उसी से आप अन्य सुखों का उपभोग कर सकते हैं तथा साधना में आसन की दृढ़ता को प्राप्त कर सकते हैंl
        कायिक सुख,चित्त की स्थिरता और एकाग्र भाव से साधनात्मक लक्ष्य की प्राप्ति के लिए जिस क्रिया का प्रयोग किया जाता है,उसे आसन कहा जाता है l सामान्य बोलचाल की भाषा में सुविधापूर्वक एकाग्रता पूर्वक स्थिर होकर बैठने की क्रिया आसन कहलाती है lजिस प्रकार इस महत्वपूर्ण क्रिया का पतंजलि ऋषि द्वारा जिस योगदर्शन की व्याख्या व प्राकट्य किया गया उसमे विवृत अष्टांग योग में  आसन को उन्होंने तृतीय स्थान दिया है परन्तु इसी आसन की महत्ता को सर्वाधिक बल नाथ संप्रदाय की दिव्य सिद्धमंडलियों द्वारा प्रवर्तित षडंगयोग मे मिला है ,जहाँ पर गुरु गोरखनाथ आदि ने आसन को प्रथम स्थान पर रख कर साधना में सफलता के लिए अनिवार्य माना है l अर्थात जिसका आसन ही नहीं सधा हो भला वो साधना में सिद्धियों का वरण कैसे कर सकता है lमैंने बहुत पहले श्वेतबिंदु-रक्तबिंदु लेख श्रृंखला में इस तथ्य का विवरण  भी दिया था की यदि व्यक्ति साधना काल में मन्त्र जप के मध्य हिलता डुलता है ,पैर बदलता है तो सुषुम्ना की स्थिति परिवर्तित होने से ना सिर्फ उसके चक्रों के स्पंदन में अंतर आता है अपितु मूलाधार और स्वाधिष्ठान चक्र पर तीव्र वेगी नकारात्मक प्रभाव पड़ने से साधक में काम भाव की तीव्रता भी आ जाती है और उसे स्वप्नदोष,प्रदर,प्रमेह जैसी बिमारियों का भी प्रभाव झेलना पड़ता हैl
   आसन का स्थिरीकरण और शरीर की निरोगता साधना का मूल है ,इसके  बाद ही चित्त को एकाग्र करने की क्रिया की जा सकती है और साधना में सफलता प्राप्त होती है ,जब साधक एकाग्र मन से लंबे समय तक जप करने में सक्षम हो जाता है तो “जपः जपात् सिद्धिर्भवेत” की उक्ति सार्थक होती है अर्थात सिद्धि को आपके गले में माला डालने के लिए आना ही पड़ता है l
   परन्तु ये इतना सहज भी नहीं है क्यूंकि जब तक साधक का शरीर रोग मुक्त ना होजाये तब तक वो आसन पर दृढ़ता पूर्वक बैठ ही नहीं सकता,स्वस्थ्य शरीर से ही साधना की जा सकती है ,आसन स्थिरीकरण किया जा सकता है और तदुपरांत ही साधना में सफलता प्राप्त कर तेजस्विता पायी जा सकती है l सदगुरुदेव ने स्पष्ट करते हुए कहा था की “जब शरीर ही सभी दृष्टियों से साधना में सफलता प्राप्त करने का आधार है ,तो स्वस्थ्य शरीर की प्राप्ति के लिए विश्वामित्र प्रणीत दिव्य देह सिद्धि साधना अनिवार्य कर्म हो जाती है ,इस साधना को संपन्न करने के बाद आत्म सिद्धि का मार्ग प्रशस्त हो जाता है,   देहसिद्धि की सम्पूर्ण क्रिया ६ क्रियाओं का समन्वित रूप होती है”-
मष्तिष्क नियंत्रण- साधना के लिए सदैव सकारात्मक भाव से युक्त मष्तिष्क ,जिसमे असफलता का कदापि भाव व्याप्त न हो पाए l
आसन नियंत्रण- हम चाहे जितनी भी माला जप संपन्न कर ले,तब भी हमारे बैठने का भाव और शरीर विकृत न हो l
चक्षु नियंत्रण- साधना काल व अन्य समय हमारे नेत्रो में कोई हल्का भाव ना आने पाए और सदैव हमारी दृष्टि तेजस्विता युक्त होकर सिद्धि प्राप्ति के गूढ़ सूत्रों को देख कर प्रयोग कर सके,आत्म सात कर सके l
श्वांस नियंत्रण- मन्त्र जप के मध्य श्वांस की लय व गति में परिवर्तन ना हो और साधक मंत्र जप सुगमता से कर सकेl क्यूंकि प्रत्येक प्रकार के मंत्र की दीर्घता और लघुता में भिन्न भिन्न प्रकार की श्वांस मात्र की आवश्यकता होती है l
अधोभाग नियंत्रण-साधना में बैठने की क्रिया कमर से लेकर पैरों के ऊपर निर्भर होती है, उनमे दृढ़ता प्रदान करना l
पंचभूतात्मक नियंत्रण- हमारे शरीर में व्याप्त पंचभूत तत्व यथा जल,अग्नि,वायु,आकाश और पृथ्वी की मात्रा को साधना काल में घटा-बढ़ा कर शरीर को साधनात्मक वतावर की अनुकूलता प्रदान की जा सकती है lतब ऐसे में हमारा शरीर बाह्य और आंतरिक रोगों और पीडाओं से मुक्त होता हुआ साधना पथ पर अग्रसर होते जाता है,प्रकारांतर में वो पूर्ण आरोग्य की प्राप्ति कर लेता है l
    इस प्रकार की क्रियाओं के बाद ही शरीर साधना के लिए तत्पर हो पाता है ,और बिना शरीर को नियंत्रित किये या अनुकूल बनाये साधना में प्रवेश करने से कोई लाभ नहीं होता है l
  वस्तुतः रोगमुक्त निर्जरा काया की प्राप्ति आज के युग में इतनी सहज नहीं है ,क्यूंकि आज का युग पूरी तरह से प्रदूषित,शापित और भोग युक्त है ,तब ऐसे में दिव्यदेह सिद्धि साधना हमारा मार्ग सुगम कर देती है l सदगुरुदेव ने इस साधना का विवेचन करते हुए स्पष्ट किया था की साधक जगत को ये साधना ब्रम्हर्षि विश्वामित्र जी की देन है, उपरोक्त ६ क्रियाओं का इस साधना में पूर्ण समावेश है,वस्तुतः इस मंत्र में माया बीज,काली बीज और मृत्युंजय बीज को ऐसे पिरोया गया है की मात्र इसका उच्चारण ही ब्रह्माण्ड से सतत प्राणऊर्जा का प्रवाह साधक में करने लगता है और उसकी आंतरिक न्यूनताओं का शमन होकर उसकी देह कालातीत होने के मार्ग पर अग्रसर होने लगती हैl
   पारद की वेधन क्षमता अनंत है और वो अविनाशी तत्व है ,अतः इस साधना की पूर्णता के लिए महत्वपूर्ण सामग्री पारद शिवलिंग और पंचमुखी रुद्राक्ष है, इस साधना को किसी भी सोमवार या गुरूवार से प्रारंभ किया जा सकता है,सूर्योदय से,श्वेत वस्त्र,उत्तर दिशा का प्रयोग इस साधना के लिए निर्धारित हैl
   प्रातः उठकर पूर्ण पवित्र भाव से स्नान कर सूर्य को अर्घ्य प्रदान करे तथा उनसे साधना में पूर्ण सफलता की प्रार्थना करे,तत्पश्चात साधना कक्ष में जाकर सफ़ेद आसन पर बैठ जाये और सामने बाजोट पर सफ़ेद वस्त्र बिछाकर सदगुरुदेव का दिव्य चित्र, उनकी दाई तरफ भगवान गणपति का विग्रह या प्रतीक रूप में सुपारी की स्थापना करे फिर गुरु चित्र के सामने दो ढेरी चावलों की बनाये अपने बायीं तरफ की ढेरी पर गाय के घृत का दीपक प्रज्वलित करे(याद रखियेगा की सदगुरुदेव के चित्र के सामने दो ढेरी बनानी है और गणपति विग्रह के सामने इतनी जगह छोडनी है जहाँ एक इतना बड़ा ताम्बे का कटोरा रखा जा सके जिसमे आधा लीटर पानी आ जाये) और दाई तरफ तेल का दीपक रखना है l इसके बाद गणपति जी के सामने ताम्बे का पात्र रख कर उसमे रक्तचंदन से एक गोला बनाकर उसमे “ह्रौं” लिख दे और उसके ऊपर पारद शिवलिंग तथा रुद्राक्ष स्थापित कर दे l इस क्रिया के बाद आप गणपति पूजन,गुरु पूजन और शिवलिंग पूजन पंचोपचार विधि या सामर्थ्यानुसार करे और गुरुमंत्र की ११ माला जप करे lतत्पश्चात का ११ बार उच्चारण करे  ताम्बे के पात्र में रखे स्वच्छ जल से (जिसमे गंगा जल मिला लिया गया हो) १-१ चाय के छोटे चम्मच से शिवलिंग के ऊपर दिव्य देह सिद्धि मंत्र का उच्चारण करते हुए जल अर्पित करे, ये क्रिया १४ दिनों तक नित्य १ घंटे करनी है lयाद रहे उपांशु जप करना है ,जो जल आप नित्य अर्पित करेंगे उसे अगले दिन अपने स्नान के जल में मिलकर स्नान कर लेना है l
 दिव्य देह सिद्धि मंत्र-
 ॐ ह्रौं ह्रीं क्रीं जूं सः देह सिद्धिम् सः जूं क्रीं ह्रीं ह्रौं ॐ  ll
OM HROUM HREENG KREENG JOOM SAH DEH SIDDHIM SAH JOOM KREENG HREENG HROUM OM l
 १४ दिनों के बाद आप शिवलिंग को पूजनस्थल पर स्थापित कर दे और रुद्राक्ष को यथाशक्ति दक्षिणा के साथ भगवती काली या दुर्गा मंदिर में अर्पित कर दे तथा बाद के दिनों में मात्र २१ बार मंत्र का नित्य उच्चारण करते रहे,सदगुरुदेव की असीम कृपा से हम सभी के समक्ष ऐसी गोपनीय साधनाए बची रही है है,अतः साधनात्मक उन्नति की प्राप्ति के लिए अपनी कमियों को दूर करे और स्वस्थ्य शरीर के द्वारा साधना करे तथा आसन की स्थिरता को प्राप्त करे जिससे उच्च स्तरीय साधनाओं की सहज प्राप्ति हो सकेl
A Sound Mind Lives In a Sound Body” it means fit body is honored as one of the most important assets of this entire world because without it we won’t be able to enjoy other luxuries of our life and it is our body which helps us to be solidify on our altar i.e. called aasn.
Aasan is what??? Actually it is a means which helps us to enjoy physical comfort, stability of heart and mind so that we can attain our divine destination. Generally if you are able to sit in a single posture without any waving in your and mind than it is called aasan. Saint Patanjali defines and explains this procedure through Yogdarshan and in that too he ranks this process at third position but this process got more sophistication by the changed Shhdangyog divine sidh-mandalies of Nath Sect because in it Guru Gorakhnath regarded this aasan process the first step of success and ranks it at number one position. It means a person who is unable to make his grip strong on his aasan that can never ever have success in the field of sadhnaa. I have already explained this issue in the series of Shvetbindu-Raktbindu that during meditation or sadhnaa if a person moves his body or changes his sitting posture during mantra jaap than it is quite obvious that with his position his spinal will too change its direction and that is wrong as when spinal changes its position then with her it changes the position of our chakras too and not stop here with the changed position of spinal Mooladhaar and Swadhishthaan chakras releases negative energy and this negative energy causes erotic desires in saadhak and he started suffering from the problems as Night fall, Prader, Prameh and all that……….. 
Stability on aasan and fit body these two things are basic requirements for success in sadhnaa because without it, it is impossible to make your mind constant as when a saadhak can seated for a long time without any moment on his aasan then the power of “Japaah Japaat Sidhibhervaet” comes into life and when this position can attain then it is dead sure that he can get what he wants.
But let me remember you that it is not as easy as it sounds because with ill body no-one can get his/her aasan permanent stable but do not forget that if once you will attain this position then nobody can dare to stand between you and your success. Sadgurudev himself told that” it fit body is a fundamental requirement for success in sadhnaa then to have fit and fine body  it is very important to do Divya Deh Sidhi Sadhnaa as this sadhnaa will open the door for the further step i.e. called aatam sidhi. Deh sidhi sadhnaa is a collective form of six different procedures and that are-
Control over mind- during sadhnaa one should keep his mind charged with positive energy…..and there should be no thought of failure.
Control over aasan- during sadhnaa one should not depend upon the counting of rosary as keep on sitting until or unless you can.
Control over eyes- during in or out duration of sadhnaa there must not be cheap or baseless emotions should flow into your eyes…..one should keep his eyes focused on the accessories of sadhnaa so that your inner soul can absorb their qualities.
Controlled breathe- during mantra jaap there must be a deadly combination between the inhaling and exhaling process as your respiration speed depends upon the length and shortness of mantra as in different mantra different type of respiration system used.
Control over body i.e. Adhobhaag Niyantran- how much time you can sit in a single posture during sadhnaa it all depends upon your back and legs so you should pay special attention on this portion.
Control over five basic elements of body i.e. Panchbhootatmak Niyantran- if one comes to know that how he can increase or decrease the quantity of five basic elements i.e. water, fire, air, sky and earth, of his body then easily he can make his body suitable for the environment of his surrounding then slowly- slowly his body gets itself free from external and internal diseases and finally becomes pure.
After all these procedures body becomes suitable for sadhnaas as without this purity there is no use of doing any type of sadhnaa.
But the disturbing fact is that in this present scenario when everything is polluted, mall nourished to have perfect body is just like dream but with the help of Divya Deh Sidhi sadhnaa we can have an ideal body. Once while speaking about this sadhnaa Sadgurudev explained that in the field of sadhnaa this procedure is invented by Bhramrishi Vishwamitra ji which include  all 6 procedure  in it with collective energy of  Maya Beej, Kaali Beej and Mrityunjay Beej  which are  systematically arranged in a single thread and only by enchanting of it divine natural universal power starts entering in sadhak’s body and when this happens all the pit falls get vanishes from his soul and with pure heart, mind and body he gets lost in his sadhnaas.
If we talk about the quality of divines and purity then without any doubt the first name which comes into our mind is Mercury (parad) so in this sadhnaa too the most important useable things are Parad Shivling and Panchmukhi Rudrakshh. This sadhnaa can be started on any Monday or Thursday and in other accessories sun rising time, white clothe and North direction is already decided.
For this sadhnaa one should gets up at early morning and take bath. After bathing he should offer water as divine offering to the sun and gets his blessings for success. Then in your sadhnaa room be seated on white altar and in front of you on wooden slab spread white cloth and put picture of Sadgurudev on it. On the left side of picture put supari in the form of Lord Ganesha. After that make two heaps of rice in front of Sadgurudev’s photo and then lit a lamp (Deepak) of cow’s ghee on the heap of your left side. Remember in front of Sadgurudev’s photo there must be two heaps of rice similarly in front of supari ,which we has been taken as Lord Ganesha , there must be as much place that a copper bowl with half  liter water can be placed there and on right side place oil lamp(Deepak). When all this done then in front of Ganpati ji put copper bowl and in it make a circle with raktchandan and in that circle write “Hroum” and then placed Parad Shivling and Rudrakshh on it. After this you need to do Ganpati Poojan, Guru Poojan and Shivling Poojan with panchopchaar procedure or as per your capacity and then enchant 11 rosary of Guru Mantra. Further while speaking OM (11 times) take water from that copper bowl (in which Ganga jal is already mixed) with the help of small tea spoon and offer that water on Shivling while speaking Divya Deh Sidhi Mantra. Carry on this procedure for 14 days and it will take just an hour. Remember you have to do Upanshu Jap and that water which you offer to Shivling, use that water during your bath on next day.
Divya Deh Sidhi Mantra-
  OM HROUM HREENG KREENG JOOM SAH DEH SIDDHIM SAH JOOM KREENG HREENG HROUM OM l
After 14 days place Shivling at your poojan place and rudraksh at Kaali or Durga Temple with some alms. After this you need to enchant this mantra 21 times daily. It is just because of our revered Sadgurudev that we still have these types of secret sadhnaas so to achieve success in sadhnaas firstly get rid of your short-comings as it is only with healthy body we can make our aasan capacity as much solid and durable as we want.

****NPRU****

Saturday, October 29, 2011

CHARPAT NATH PRANEET-BHAGVATI DHOOMAVATI SADHNA


धूमावती एक एसी महाविद्या है जिनके बारे मे साहित्य अत्यधिक कम मात्र मे मिलता है. इस महाविद्या के साधक भी बहोत कम मिलते है. मूल रूप से इनकी साधना शत्रु स्तम्भन और नाशन के लिए की जाती है. लेकिन इस महाविद्या से सबंधित कई ऐसे प्रयोग है जिनके बारे मे व्यक्ति कभी सोच भी नहीं सकता. चरपटभंजन नाम धूमावती के उच्चकोटि के साधको के मध्य प्रचलित रहा है, चरपट भंजन को ही चरपटनाथ या चरपटीनाथ कहा गया है. चरपटनाथ ने अपने जीवन काल मे धूमावती सबंधित साधनाओ का प्रचुर अभ्यास किया था और मांत्रिक धूमावती को सिद्ध करने वाले गिने चुने व्यक्ति मे इनकी गणना होती है, वे कालजयी रहे है और आज भी वे सदेह है. उनके बारे मे ये प्रचलित है की वह किसी भी तत्व मे अपने आप को बदल सकते है चाहे वह स्थूल हो या सूक्ष्म, जैसे मनुष्य पशु पक्षी पानी अग्नि या कुछ भी. ७५०-८०० साल पहले धूमावती साधना के सबंध मे फैली भ्रान्ति को दूर करने के लिए इस महान धूमावती साधक ने कई ग्रंथो की रचना की जिसमे धूमावतीरहस्य, धूमावतीसपर्या, धूमावती पूजा पध्धति जैसे अत्यधिक रोचक ग्रंथ सामिल है. कई गुप्त तांत्रिक मठो मे आज भी यह ग्रन्थ सुरक्षित है. लेकिन यह साधना पद्धतिया लुप्त हो गयी और जन सामान्य के मध्य कभी नहीं आई. धूमावती अलक्ष्मी होते हुए भी लक्ष्मी प्राप्ति से लेके वैभव ऐश्वर्य तथा जीवन के पूर्ण भोग प्राप्त करने के लिए भी धूमावती साधना के कई विधानों का उन्होंने प्रचार किया था. लेकिन ये साधनाओ को गुप्त रखने की पीछे का मूल चिंतन सायद तब की परिस्थिति हो या कुछ और लेकिन इससे जन सामान्य के मध्य साधको का हमेशा ही नुक्सान रहा है. चरपटभंजन ने जो कई गुप्त पध्धातियो का विकास किया था उनमे से एक साधना एसी भी थि जिसको करने से व्यक्ति अपने सामने वाले व्यक्ति के व्यक्तित्व के बारे मे कुछ भी जान लेता है. जैसे की चरित्र कैसा है, इस व्यक्ति की प्रकृति क्या है, इसके दिमाग मे इस वक्त कौनसे विचार चल रहे होंगे? इस प्रकार की साधना अत्यधिक दुस्कर है क्यों जीवन के रोज ब रोज के कार्य मे ऐसी साधनाओ से कितना और क्या विकास हो सकता है कैसे फायदा हो सकता है ये तो व्यक्ति खुद ही समज सकता है. मानसिक शक्तियो के विकास की अत्यधिक दुर्लभ साधनाओ मे यह साधना अपना एक विशेष स्थान लिए हुए है. चरपटनाथ द्वारा प्रणित धूमावती प्रयोग आप सब के मध्य रख रहा हू.

इस साधना को करने से पूर्व साधक अपने स्थान का चुनाव करे. साधक के साधना स्थल पर और आसान पर साधक की जब तक साधना चले कोई और व्यक्ति न बैठे. इस साधना मे साधक को ११ माला मंत्र जाप एक महीने (३० दिन) तक करना है. माला काले हकीक की रहे. वस्त्र काले रहे. समय रात्रि काल मे ११ बजे के बाद का हो. धूमावती का यन्त्र चित्र अपने सामने स्थापित करे. तेल का दीपक साधना समय मे जलते रहना चाहिए.
यन्त्र चित्र का पूजन कर के विनियोग करे
विनियोग: अस्य श्री चरपटभंजन प्रणित धूमावती प्रयोगस्य पूर्ण विनियोग अभीष्ट सिद्धियर्थे करिष्यमे पूर्ण सिद्धियर्थे विनियोग नमः

इसके बाद निम्न मंत्र का ११ माला जाप करे
ओम धूमावती करे न काम, तो अन्न हराम, जीवन तारो सुख संवारो, पुरती मम इच्छा, ऋणी दास तमारो ओम छू

मंत्र जाप के बाद साधक धूमावती देवी को ही मंत्र जाप समर्पित कर दे.
ये अत्यधिक दुर्लभ विधान सम्प्पन करने के बाद व्यक्ति यु कहा जाए की अजेय बन जाता है तो भी अतिशियोक्ति नहीं होगी.
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Dhoomavati is one of such mahavidhya about which least literature could be obtained. The sadhak of this mahavidya is also least. Basically her sadhana is done to prevent from enemy or to finish them. But in relation to this mahavidya there are so many such prayoga which are un-imaginable. The name ‘Charpat Bhanjan” has remained famous among highly accomplished sadhak of dhoomavati, charpat bhanjan have also been named charpat nath or charpatinath. Charapat nath have studied deeply majority sadhanas of the dhumavati in his life and among few, he holds a place who accomplished mantrik dhoomavati. He has remained deathless and he is in his actual body today even. It is famous about him that he was able to transform himself in any tangible or intangible element like human, animal, water, fire or anything else. Before 750-800 years this great sadhak of dhoomavati created scriptures to remove misunderstandings related to dhoomavati including few fantastic works like dhoomavatirahashya, dhoomavatisaparya, dhoomavatipoojapadhhati. In many secret tantric places these scriptures are safe currently even but the ritual processes have gone extinct and did not come in front of general people. Though being Alakshmi there were so many processes which were made famous by him to have wealth, to generate prosperity and complete house-holding happiness. But to make these processes secret could be circumstances of that time or may be anything else but it have always been a big loss for material sadhaka. The sadhanas developed by charpat bhanjan includes one of the sadhana through which if done by a person can have a power to understand the personality of the person or to know anything about them like character, nature aur what thoughts are going on currently in that person’s mind. Sadhana like this are really very rare. Because with such sadhana what development and benefit one can generate in day to day life could be understand very simply. This sadhana holds a special place in rare sadhana which are meant for the development of the mind powers. I am sharing that charpatnath pranit dhoomavati prayoga.

Before starting this sadhana, sadhak should select their place for sadhana. There should be no one to sit on the aasan or the place of sadhana till the time sadhana days are going on. In this sadhana shadhak needs to do 11 rosary of mantra daily for one month (30 days). Rosary should be black hakeek. Cloth should be black. Time should be after 11 Pm in night. Establish dhoomavati yantra and picture infront of you. Lamp of the oil should keep on burning during sadhana time. Do viniyoga after yantra and picture poojan,
Viniyog: asy shri charapatbhanjan pranit dhoomavatee prayogasy purn viniyog abhisht siddhiyarthe karishyame purn siddhiyarthe viniyog namah

After this chant 11 rounds of the following mantra.

Om dhoomavatee kare na kaam, to ann haraam, jivan taro sukh sanvaaro, purati mam icchha, runi daas tamaaro om chhoo

After mantra chanting offer the chantings to the goddess dhoomavati.
It is not even more if we say that after completing this rare procedure a sadhak becomes invincible.

   


                                                                                               
 ****NPRU****   

Thursday, October 27, 2011

mahakali sadhana to know about nearer future


स्नातक शिक्षा के मध्यकाल के दिनों मे एक ब्राम्हण परिवार के साथ रहता था. वैसे परिवार मे तो कोई था नहीं एक दादी थि जिनकी उम्र करीबन ७० के आसपास रही होगी जो ज्यादातर अकेली रहती थि उस घर मे. उनके पुत्र व् पुत्रवधु दोनों ही व्यवसाय मे व्यस्त रहते थे और ज्यादातर शहर मे अपने दूसरे मकान मे ही रहते थे बस खाना खाने आ जाया करते थे कभी कभी. दादी का मकान बड़ा था. शुरुआतमे जाते ही उन्होंने पूछ लिया था किस खानदान से हो? मेने कहा दादी मे क्षत्रिय हू. अच्छा हम ब्राम्हण हे तो तुम्हे भी उसी प्रकार रहना होगा यहाँ सात्विक अन्न के अलावा कुछ नहीं चलेगा. मेने कहा जी ठीक है. आगे कहा की क्षत्रिय हो तो माता को तो मानते ही होगे. मेने कहा जी मानता हू. उन्होंने कहा की हमारी इष्ट महाकाली है. मुझे ज़रा आश्चर्य हुआ क्यों की उस तरफ ब्राम्हण की इष्ट महाकाली हो ऐसा संभव नही होता है. उन्होंने बात आगे बढ़ाई... कई साल पहले जब हमारे पुरखे यहाँ रहने आए थे तो महाकाली की मूर्ति ज़मीन मे से निकली थि और सभी को प्रत्यक्ष दर्शन दिए थे. माँ ने खुद ही कहा था की मे तुम्हारे वंश की इष्ट हू और तब से हमारे वंश मे से कोई भी यहाँ आता हे तो उस मूर्ति को देखते ही उन्हें महाकाली के प्रत्यक्ष दर्शन होते थे. लेकिन कुछ साल पहले यह सीलसिला बंद हो गया. मेने कहा की क्या आपने उनके दर्शन किये हे प्रत्यक्ष...? उनका जूरियो वाला चेहरा चमचमा उठा. आँखों मे चमक आ गयी और एक मोहक मुस्कान के साथ कहा की हाँ कई बार. आज भी माँ प्रत्यक्ष दर्शन देती रहती है. मेने कहा की क्या आप कोई जाप वगेरा करती हे क्या? उन्होंने कहा की नहीं माता का वरदान है की जब भी उन्हें याद करे वो किसी न किसी रूप मे आ जाती है. इसी के साथ उन्होंने अपने मंदिर वाले कमरे की और इशारा कर दिया. मेने कहा क्या मे जा के देख सकता हू? उन्होंने कहा की ज़रूर इसमें पूछने वाली क्या बात है. घर के अंदर ही छोटासा मंदिर था. तिन चार शुद्ध घी के दीपक जल रहे था साथ ही साथ लोहबान धुप की खुशबू मन मे श्रद्धा का संचार कर रही थि. पीतल की वह छोटी सी मूर्ति थि एक उँगल जितनी लेकिन इतना तेज जर रहा था उस मूर्ति से की बस नज़र हट ही नहीं रही थि. बहोत ही मुश्किल से अपने आप पर नियंत्रण कर के आंसूओ को रोका की पता नहीं दादी क्या सोचेंगी. कुछ दिनों मे ही मेरी इच्छा दक्षिणा साधना करने की हुई. दादी के पास जाके कहा की दादी अगर आप अन्यथा ना ले तो क्या मे मंदिर मे बैठ कर मंत्रजाप कर सकता हू रात को? उन्होंने बड़ी प्रसन्नता के साथ स्वीकृति दे दी. एक रात मंत्रजाप करने के बाद दूसरे दिन दादी ने कहा की कल तो तू सुबह तक बैठा रहा था मंदिर मे माँ का बड़ा भक्त लगता हे और निश्चल भाव से हसने लगी. उनकी हसी मे मेने भी अपनी हसी पूरी तो वह अचानक गंभीर हो गई और बोली आज से मंदिर की जिम्मेदारी तेरी. धुप तुजे ही लगाना है ( उनके घर के ६ कमरों के साथ साथ गलियारे मे धुप करने मे भी आधा घंटे का समय लगता था) और आरती भी तू ही करेगा अब से. मेने खुशी से उनके इस प्रस्ताव को स्वीकार किया. रात को मेरी साधना चलती थि. और यु ही वो धीरे धीरे मुझसे खुलने लगी. इन्ही दिनों मुझे काम के सिलसिलेमे ४ महीने के लिए मुंबई जाना था. मेने कहा दादी मुंबई जा रहा हू ४ महीनो मे लौटूंगा. मेरी तरफ उन्होंने अजीब ढंग से देखा और मुझे ले कर मंदिर मे चली गयी. वे खुद भी बैठी मुझे भी बिठाया थोड़ी देर बाद उन्होंने कहा की माँ कह रही हे की तू कुछ ही दिनों मे वापिस आ जाएगा. मेने कुछ कहा नहीं लेकिन मन अविश्वास विश्वास मे डौल रहा था. क्यों की मेरा चुनाव कार्य लक्षि था और मेरे लिए किसी भी प्रकार से बिच मे लौटना संभव नहीं था. लेकिन जब मुंबई से १५ दिन मे ही लौट के आना पड़ा तो.... खेर इसी तरह समय समय पर वे कई बार मेरी बीमारी कब ठीक होगी या मुझे कैसे और कहा काम मिलेगा या मुझे कब कहा जाना पड़ेगा; नाना प्रकार की भविष्य से सबंधित तथ्य कई बार वो बताती जो की एक दम शटिक ही उतरती. मेने उनसे कहा भी की आप ये कैसे कर लेती है तो वे हमेशा कहती की काल से ऊपर भी महाकाल की जो शक्ति है वो महाकाली है तो क्या काल को जाना नहीं जा सकता... धीरे धीरे तंत्र के क्षेत्र मे मुझे समज आया की महाकाली तो काल को अपनी भृकुटी से भी नियंत्रित कर दे. और कालज्ञान के साधको के लिए महाकाली की साधना अत्यधिक महत्वपूर्ण है. महाकाली सबंधित पूर्ण काल ज्ञान के लिए कई विधान प्रचलित है जो की बहोत ही जटिल व् गुढ़ है. लेकिन निकटत्तम भविष्य को जानने के लिए एक सामान्य विधान इस रूप से है जो की व्यक्ति को भविष्य के ज़रोखे मे जांक कर देखने के लिए शक्ति प्रदान करता है

किसीभी शुभदिन से यह साधना शुरू की जा सकती है. इसमें महाकाली का विग्रह या चित्र अपने सामने स्थापित करे और रात्री काल मे उसका सामान्य पूजन कर के निम्न मंत्र की २१ माला २१ दिन तक करे.

काली कंकाली प्रत्यक्ष क्रीं क्रीं क्रीं हूं

साधना काल मे लोहबान का धुप व् घी का दीपक जलते रहना चाहिए. यह जाप रुद्राक्ष या काली हकीक माला से किया जा सकता है. साधना के कुछ दिनों मे साधको को कई मधुर अनुभव हो सकते है.


While passing through my graduation, I used to live with a bramhin family. Rather there was no one in the family but only an old lady of around 70 years whom I used to call Dadi most of the time she used to remain alone in the house. Her son and daughter in law always used to remain busy in business and were living most of the time in their separate house far in the city sometimes they used to come for meal. The house of daadi was big. When I met first she asked instantly which cast do you belong to? I said I am from kshatriya family. Ok. We are bramhin and neither of the things accept pure vegetation will be approved here. I said all right. Further she told that you are kshatriya then you must be devoted to Maata (goddess). I answered yes. She further said that our Isht is Mahakaali. I felt a bit strange because at that side it was not so often to see bramhins who believe Mahakaali as their Ishta. She went ahead more in talk...before so many years when ancestry people came to this place at that time the idol of mahakaali came itself up from floor and everyone got her glimpse. Mother herself told ‘I am ishta of your family’ and since then whosoever from the family comes here, they get glimpse of mother. But before few years that stopped. I asked her “have goddess ever appeared before you?” her wrinkled face turned to glow. Eyes turned shinier and with a sweet smile she replied yes. Many times. Today even she gives her glimpses. I again asked ‘do you perform any mantra for that?’  She replied that no, mother blessed us that whenever we remember her she will come in either any form. With that she show me figure pointing at her temple room. I asked that should I allowed go in and see? She told me there is nothing to ask about. Temple was inside house only.  3-4 lamps of pure clarified butter were lighting brightly with that lohbaan dhoop was creating a devotional atmosphere. The brass idol of goddess was about 3 inch about but the aura and power was so much so that I was not able to remove my eyes from there. With a big effort I controlled my tears to roll away from my eyes wondering that what dadi will think. In few days my will wanted to do dakshinaa sadhana. I went to dadi and asked that if you don’t mind can I do mantra chanting during night in temple? She very willingly granted my request. When I did chantings for one night on the second night dadi told me yesterday you kept on sitting till early morning seems like a big devotee of the mother and she started laughing lovingly. I too started laughing with her but all of a sudden she stopped and turned to very serious face from today responsibility of the temple is yours. You will offer dhoop (to offer dhoop in 6 rooms and galleries of the house it used to take half an hour.) and aarati will also be done by you. Very willingly I accepted. In the night time, my sadhana used to go on. And slowly her new face came in front of me. In those days I was suppose to go to Bombay for four months. I said Dadi I am going to Mumbai and will return after 4 months. At that time she looked at me in mysterious way and she took me to temple. We both sat there after a short time she told me “mother is telling that you will come back in few days only”.  I didn’t responded but I was in between trust and no trust. Because there was no chance of coming me back in between as my selection was work oriented. But when I returned in 15 days from Mumbai I had to believe….anyways,  like this at many moments she used to predict about future which always used to be completely accurate like when I will be normal from my sickness or where I will get works or at what time I would be going where etc. I even asked her that how can you do that in reply she always used to say that more ahead then kaal; the shakti of mahakaal is mahakaali so cant we know about the kaal(future)?...

Slowly mahakaali can control the time even with her single eye gesture. And for the sadhak of kaal gyan, mahakaali sadhana is very important. Mahakaali related sadhana for to have complete knowledge of the times are there but those are complicated and secret in nature. But to know the nearer future a simple process is a follow which allow a person to see through the window of the future.

This sadhana could be started on any auspicious day. Establish picture or idol of mahakaali in front of you and in the night time do the poojan of the same. After that chant 21 rounds of the following mantra for 21 days

Kaali kankaali pratyaksh kreem kreem kreem hoom

During sadhana time lohbaan dhoop and lamp of the ghee should be kept lighting. Chanting could be done with rudraksha or black hakeek rosary.  In few days of sadhana, sadhak may have nice experiences.


   


                                                                                               
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