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Wednesday, February 29, 2012

बीजोक्त तंत्र- वाग्बीज द्वारा पूर्ण शनि कृपा प्राप्ति अभ्युदय प्रबोध विधान (Beejokt Tantra- Vaagbeej dwara poorn Shani Kripa Prapti Abhyuday Prabodh Vidhaan )g


शनि......भय,पीड़ा,अभाव और असंतुष्ठी क्या यही पहचान है शनि देव की ??
जो तथाकथित पोंगापंथियों ने निरुपित कर दिया है शनि देव के लिए. नहीं ,ऐसा नहीं है.आलोचना तभी स्वीकार्य होती है जब वस्तुतः हम कुछ क़दमों की गति उस और कर चुके हों, बगैर परिक्षण किये किसी भी तथ्य को निर्धारित करना सदैव त्रुतियोक्त और भ्रामक ही होता है, सदगुरूदेव ने शनि देव के रूप को परिभाषित करते हुए कहा था की ये रूप अभिव्यक्ति है ज्ञान की,न्याय की और जीवन में सदैव और संतुलित गति का.
अबोध बच्चों या व्यक्तियों को अपने न्याय क्षेत्र से बरी रखना,क्या इसी तथ्य को निरुपित नहीं करता है. किसी की नक़ल करना और समझदार मष्तिष्क के होते हुए भी निरंतर गलतियों को करते रहना अपराध की श्रेणी में आ जाता है. क्यूंकि विकसित मष्तिष्क अच्छे बुरे का भली भांति ज्ञान रखता है और उसे ये पता होता है की हम जो कर रहे हैं वो कितना हानिकारक हो सकता है समाज के लिए,स्वयं के लिए,परिवार के लिए या फिर राष्ट्र के लिए. और इन कर्मों को सकारात्मक तो नहीं लिया जा सकता.
ऐसे में अपनी न्याय दृष्टि से सत्य न्याय प्रदान करना मात्र शनि के ही अधिकार क्षेत्र में आता है, यहाँ तक तो सभी जानते हैं,हैं ना.....
किन्तु कभी सोचा है की इस तठस्थ न्याय दृष्टि का अनुपालन करने के लिए जिस ज्ञान और विवेक की आवश्यकता होती है उसका कारण बिंदु कहाँ होता है ,अर्थात कहा से उस ज्ञान का अभ्युदय होता है जिससे सत्य न्याय का बोध हो और तदनुरूप ही न्याय किया जा सके. हम में से सभी ने ये सुना ही होगा की जब श्री हनुमान जी ने लंकेश रावण के कारागार से शनि देव की मुक्ति कराई थी,तब उन्होंने शनि देव से ये वचन लिया था की मंगलवार या शनिवार को जो भी मन,वचन,कर्म से मेरी या मेरे हृदयाराध्य प्रभु राम की आराधना करेगा आप उसे त्रास नहीं दोगे.परन्तु समय साक्षी है की जितने भी लोग इन दोनों दिवसों में पूजन क्रम करते हैं वो लोग ज्यादा परेशां होते हैं.
क्या वो वचन गलत थे?? नहीं,वास्तविकता ये है की हमने उस पूर्ण वाक्य पर ध्यान ही नहीं दिया है,उसमे कहा तो गया है की मन,वचन,कर्म से पूर्ण पूजन करने पर......... अब खुद ही सोचिये घर से नहा-धोकर मंदिर के लिए निकलते हैं ..पर मार्ग में किसे देख कर क्या चिंतन करते हैं...कभी सोचा है,और तो और असत्य भाषण,धोखा देना,अशुचिता युक्त जीवन जीना आदि कर्म और विचारों से क्या आप मुक्त रह पाते हैं ,नहीं ना.
वस्तुतः हमारा चिंतन तो होता है पूजन का और उससे प्राप्त लाभ के रूप में सम्पूर्ण सुखों की प्राप्ति का परन्तु जानते बूझते अशुचिता पूर्ण व्यव्हार से क्या हम लाभ पा पाएंगे ..नहीं,अपितु दंड की १० गुनी मार आप पर ज्यादा पड़ेगी .क्यूंकि ज्ञान का प्रबोध तो था,किन्तु अशुद्ध ज्ञान का. तब असत्य ज्ञान से उत्पन्न विवेक दूषित ही होगा ना.
और एक महत्वपूर्ण बिंदु हमेशा ध्यान रखियेगा की ९ ग्रह और माता मुंथा की उत्पत्ति का मूल कारण भी बीज मन्त्रों में ही छुपा हुआ है ,अर्थात प्रत्येक ग्रह की उत्पत्ति और शक्ति का रहस्य किसी विशेष बीज मन्त्र में ही विद्यमान होता है .
जैसे शनि देव ऐंबीज से उत्पन्न हैं. उनकी न्याय दृष्टि इसी वाग्बीजसे उत्पन्न होती है. और स्मरण रखने योग्य तथ्य ये है की जब भी श्रृष्टि का क्रम सृजित करना हो तब हमें इसी वाग्बीजका सहयोग लेना ही होगा. कहा भी गया है की ऐंकारी सृष्टिरुपायै
अर्थात वाग्बीजसृष्टिकर्ता है.और सृजन के लिए ज्ञान और बोध की आवश्यकता होती है ,याद रखिये सत्य बोध के द्वारा ही पूर्ण सत्य और चिरस्थायी सुख की प्राप्ति संभव है ,भगवान शनि के विविध मन्त्रों का तांत्रिक ग्रंथों में वर्णन है ,किन्तु किस क्रम द्वारा कैसा लाभ प्राप्त किया जा सकता है,प्रायः इसका अभाव ही दृष्टित होता है.तब ऐसे में सद्गुरु प्रदत्त मार्ग का अनुसरण करना ही उचित है,जिससे मार्ग भटकने और हानि का भय नहीं होता है. उत्पत्ति रहस्य तो बहुत विस्तृत है है,परन्तु यहाँ पर मात्र उस प्रयोग को अंकित करने का प्रयास कर रही हूँ जिसके द्वारा शनि देव के वास्तविक रूप का तो हमें बोध होता ही है साथ ही उस रूप को समझकर हम उनके वरदायी प्रभावों से अपने जीवन को अपराधऔर त्रुटि मुक्त करके जीवन सुखों को अक्षुण रख सकते हैं और अपना सम्मान,संपत्ति,प्रेम,परिवार को स्थायित्व दे सकते हैं और स्थायित्व दे सकते हैं अपनी स्थिरप्रज्ञा को ,जिसके सदुपयोग से आत्म शक्ति को मजबूत किया जा सकता है और अभीष्ट लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है.
बुधवार की सुबह सूर्योदय के बाद श्वेत वस्त्र पहन कर सफ़ेद आसन पर बैठकर सामने ताम्बे की थाली में सफ़ेद चन्दन से अनामिका अंगुली के द्वारा ऐं अंकित करे और उसका पूजन,अक्षत, धुप,आटे के चौमुखे दीप,पुष्प, खीर और लॉन्ग से करे. दिशा पूर्व होगी. इस पूजन के पूर्व,सदगुरुदेव,सूर्य और भगवान गणपति का पंचोपचार पूजन और गुरु मंत्र का जप कर लीजिए. ये प्रत्येक साधना में अनिवार्य क्रम है. तत्पश्चात स्फटिक माला या रुद्राक्ष माला से ऐं “AING” मंत्र की ११ माला करे. ये क्रम शनिवार तक करना है,शनिवार को इस क्रम के बाद काले वस्त्र धारण कर या स्वच्छ वस्त्र धारण कर सामने ७ कील,काले तिल,काजल,सरसों के तेल,काले वस्त्र को सामने रखकर उनका पूजन सरसों के तेल का दीपक,गुग्गल धुप,तिल लड्डू,लौंग,काले तिलों से करके ११ माला काले हकीक या रुद्राक्ष माला से निम्न मंत्र की करे. मंत्र के पहले निम्न ध्यान मंत्र ९ बार उच्चारित करें.
ध्यान मंत्र-
नीलांजन समाभासं सूर्य पुत्र यमाग्रजम |
छाया मार्तण्ड संभूतं तं नमामि शनैश्चरम् ||”
इसमें जिस मंत्र का प्रयोग जप करने के लिए होता है ,वो वाग्पीज से ही उत्प्रेरित है और माया से मुक्त कर श्री का अभ्युदय जीवन में करवाता ही है और उचित तथा सत्य ज्ञान का प्रबोध करवाकर न्यायायिक विवेक भी प्रदान करता है,जिससे बुद्धि कुशाग्र होती है और चरित्र की शुद्धता के साथ पूर्ण यश,सम्मान और धन की प्राप्ति होती है तथा भगवन शनि का वरदायक प्रभाव जीवन में प्राप्त होता है.
मन्त्र-
ऐं ह्रीं श्रीं शनैश्चराय नमः
“AING HREEM SHREEM SHANAISHCHARAAY NAMAH”
इस क्रम को करने के बाद पुनः रविवार,सोमवार,मंगलवार और बुधवार को मूल वाग्बीज मंत्र का उपरोक्त क्रम ही करना है और प्रयोग की समाप्ति पर किसी भी कन्या को माँ वाग देवी मानकर पूर्ण,भोजन,उपहार और दान दक्षिणा से तृप्त कर प्रयोग को पूर्णता दे.
प्रयोग सिर्फ संचय करने के लिए नहीं है अपितु इसे संपन्न कर इस प्रयोग का लाभ लेकर दुखों को दूर भाग्य जाये,इसी में सार्थकता है.
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Shani…..fear, pain, incompleteness and unsatisfaction…..is this all true recognition of SHANI DEV?????
No these all are stupid ideas which were developed by fake people just to earn money on His name. Criticism can be accepted only then when you himself has done some work to the related field otherwise things which are blindly followed are usually faulty and play good for nothing role in anyone’s life. Sadgurudev himself provided a wonderful definition of Shani’s form which symbolizes Knowledge, Justice and continuous betterment of life and its classical example is that innocent children and mentally retarded persons don’t come under his jurisdiction.
But to copy someone else style or doing mistake after mistake that too while having healthy mind falls in crime’s category because sound mind can judge that whatever is done by him can be destructive for his family, society, nation and for himself as well and this type of activities can’t be entitled positive activities.
 And in these types of matters to give proper justice comes under his legislation ….till here is common information about him which we all know……..isn’t it!!!!
But do we ever think about that basic central point which gives essential knowledge required to give true justice means where is that resource situated which provides this type of hi-fi knowledge which further plays an important role in the field of justice. We all know that once when Lord Hanuman released Shani Dev from the prison of Lankesh he (Hanuman ji) acquired a promise from him that who so ever offer true devotion to his Lord i.e. Lord Rama or to him (Hanuman ji) as well from his true Mann, Vachan and Karma, Shani will never do any harm to him but unfortunately time is witness that any devotee who follow this procedure remains in more problems than anybody else.
Did that promises were false?? No, it’s our fault that we don’t pay proper attention to that complete sentence which has three conditions i.e. Mann, Vachan and Karma……now it is up to you to decide are we following that conditions…..on the way to temple countless corrupted thoughts come into our mind for other people…and moreover is our life is free from jealous, cheating, ill deeds and telling lies….and the answer is BIG NO….


No doubt by doing all these meditations and prayers we want to have all comforts and luxuries but let me know by doing ill deeds that too with conscious mind how can we imagine to have fruitful result of all these holy jobs….but the thing which will surely we get is punishment that too with increment-i.e. basic multiply by 10 because at the time of committing that sin we had its incomplete and false knowledge and the we all know “Little Knowledge Is A Dangerous Thing” 
 Another thing which we need to aware about is that the mystery behind the origin of every planet and Mother Muntha is hidden in all these Beej Mantras means there is a particular Beej Mantra responsible for the origin of a particular planet and its power.
 Like “AING” beej is behind the origin of Shani Dev, his justice power is also originated from this “Vaagbeej” and the point which should keep in mind is that at the time of universal creation it is this “Vaagbeej” without which nothing can be produced. This is also rhymed as “AING SHRISHTIRUPAAY”
 It means “Vaagbeej” is creational and to create something knowledge and consciousness is must and always remember it is only through complete truth one can have permanent happiness. In ancient literature we have multiple Mantra about Shani Dev but through which Mantra we can have what type of benefit this knowledge is missing and in this type of situation Sadgurudev himself can enlighten your way to avert harm and loss you can face. Creational mystery is vast that’s why here I am giving only that proyog through which one can have glimpse of Shani Dev’s original form and his blessings as well which further helps you to get rid of your life from the feeling of guilt and can give stability to your finance, social status, love and family life…..above of all this proyog can give you mental stability which promote your spiritual stability to attain your destination. 
At Wednesday morning after sunrise take bath and wear white clothes, sit on white altar (aasan), place copper plate in front of you and on it with your Anamika finger ( second last) while using white sandal write “AING” on it and offer Akshatt (rice), incense, four faced flour lamp ( aate ka chomukha deep), flowers, kheer and Clove (loung) on it. Your direction should be East. Before doing this poojan do Sadgurudev, Surya (Sun) and Lord Ganesha’s panchopchaar poojan first and enchant Guru Mantra because this is the base of every sadhna. Then do 11 rosaries of “AING” Mantra with Sfatik or Rudraksh rosary. This procedure should be carry on till Saturday and on Saturday after completing of procedure wear black or any other color’s but neat and clean clothes and put 7 nails (keel), black till, kajal, mustard oil, black cloth in front of you and offer mustard oil’s lamp, guggal incense, till ke laddu, clove (loung) black till and do 11 rosaries of given mantra with black hakeek or Rudraksh rosary.   
Dhyaan mantra-
नीलांजन समाभासं सूर्य पुत्र यमाग्रजम |
छाया मार्तण्ड संभूतं तं नमामि शनैश्चरम् ||”
 Mantra used in it gets its origin from Vaagbeej itself which helps you to release yourself from the veil of Maya i.e. outer false happiness and make sure the entry of SHRI (goddess laxmi) in your life while giving you true spiritual knowledge and mind which has the capacity to do justice, purity of character as well. By doing this proyog one can have Lord Shani Dev’s blessings for his whole life.
Mantra-
ऐं ह्रीं श्रीं शनैश्चराय नमः
“AING HREEM SHREEM SHANAISHCHARAAY NAMAH
After the completion of this procedure follow the basic Vaagbeej Mantra procedure again for next Sunday, Monday, Tuesday and Wednesday and on its completion offer any small girl (kanya) food with gifts and money as per your capacity.
This proyog can open the door of success and comfort for you so it’s up to you to follow it and take advantage….
  
   

                                                                                               
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सिद्धकाली क्रिया चेतना प्रयोग (SIDDHKALI KRIYA CHETNA PRAYOG)


 ज्ञान इच्छा और क्रिया शक्तियो के क्रम मे हमने पहले मातंगी प्रयोग से ज्ञान चेतना के विकास तथा इच्छा शक्ति के विकास के लिए कमला प्रयोग के बारे मे जाना. इससे भी आगे चेतन ज्ञान का स्तर ऊपर लाने के लिए ज्ञान शक्ति के लिए ज्ञानमयी भुवनेश्वरी साधना का क्रम दिया. चेतन ज्ञान से इच्छाशक्ति का विकास तीव्र होता है तथा इसके बाद ज्ञानमयी साधना करने पर निहित ज्ञान को तुरंत इच्छा मे परावर्तित किया जा सकता है. पहले ही ज्ञानमयी साधना क्रम अपनाने पर इच्छाशक्ति की साधना तथा शक्ति संचार मे साधक का समय ना जाए इस लिए यह क्रम इसी प्रकार से किया जाता है. जब ज्ञान से इच्छा तथा इच्छा से क्रिया शक्ति का एक संचार बनता है तब नूतन ज्ञान की प्राप्ति होती है. यह तथ्य को समजना नितांत आवश्यक है क्यों की यह अपना साधना स्तर ऊपर उठाने की मूल पध्धति है. अगर व्यक्ति एक ज्ञान को प्राप्त कर ले, उसके लिए निश्चित स्तर पर इच्छा भी रखे लेकिन कभी उसकी प्रक्रिया हो ही नहीं तो? परिणाम शून्य. एक व्यक्ति को भूख लगती है, उसे शरीर मे भोजन की अतृप्ति का ज्ञान हुआ उसे भोजन की इच्छा हुई, अत्यधिक वेग से यह इच्छा तीव्र हुई, लेकिन अगर वह भोजन करने की क्रिया नहीं करेगा तब ज्ञान व् इच्छा व्यर्थ है. और इसी क्रिया के माध्यम से जो भोजन तृप्ति का ज्ञान होने वाला था वह नहीं होता. और वह ज्ञान से वंचित हो, उसी स्तर पर रहता है. हमारे जीवन मे कई प्रकार की इच्छाए हमें होती रहती है. लेकिन उसकी पूर्ती की क्रिया हम नहीं करते है. या फिर किन्ही कारणों से नहीं कर पाते है. इन सब के मूल मे क्रिया शक्ति की अचेतना है. अगर किसी प्रकार से क्रिया शक्ति को चेतना दी जाए तो हम उस इच्छा के सबंध मे क्रिया करने के लिए पूर्ण मनोबल की प्राप्ति होती है. साथ ही साथ प्रक्रिया मे सफलता की संभावना भी बढ़ जाती है. यह हमारे भौतिक तथा आध्यात्मिक दोनों पक्षों के लिए अत्यधिक ज़रुरी है की हम हमारी इच्छा शक्ति के सबंध मे क्रिया शक्ति को भी स्थान दे, जिससे की नूतन ज्ञान को आत्मसार कर सके. कई बार ये भी देखा गया है की साधक को पूर्ण ज्ञान होता है, उसे साधना करने की तीव्र इच्छा भी होती है लेकिन साधना की प्रक्रिया नहीं कर पाते. इन सब के समाधान मे सिद्धकाली क्रिया चेतना प्रयोग है.

महाकाली के सभी रूप अपने आप मे निराले है. इसी महाविद्या के एक रूप है सिद्धकाली. सिद्धकाली क्रियाशक्ति की चेतना का विकास करती है. इस प्रयोग के माध्यम से साधक को क्रिया के लिए स्पष्ट भावभूमि तथा क्रिया के लिए योग्य वातावरण की प्राप्ति भी होती है. इस प्रयोग को करने पर साधक की ज्ञान तथा इच्छा शक्ति के पूरक के रूप मे क्रियाशक्ति भी जागृत होती है तथा नूतन ज्ञान प्राप्त कर साधना क्षेत्र मे साधक अपना स्तर ऊपर उठाता रहता है.
इस साधना को साधक रविवार रात्री मे १० बजे के बाद से करे. अपने सामने देवी सिद्धकाली से सबंधित यन्त्र चित्र रखे तो उत्तम है. साधक का मुख उत्तर की तरफ रहे. वस्त्र और आसान आदि लाल या सफ़ेद रहे. देवी का सामान्य पूजन कर सदगुरुदेव तथा देवी से क्रियाशक्ति के जागरण तथा साधना मे सफलता के लिए प्रार्थना करे. इसके बाद साधक निम्न मंत्र की २१ माला जाप रुद्राक्षमाला से या मूंगा माला से करे.
 क्रीं सिद्धकालिके क्रियासिद्धिं क्रीं नमः
 साधक यह प्रयोग अगले रविवार तक (कुल ८ दिन) करे. साधना समाप्ती पर माला को किसी देवी मंदिर मे चडा दे. इस प्रयोग मे साधना काल मे सिरदर्द तथा बदनदर्द होना या पसीना आना स्वाभाविक है अतः साधक विचलित ना हो.
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In the sequence of the gyana ichchha and kriya powers we first understood about development of knowledge development through Maatangi process followed by kamala prayog for ichchha shakti development. Further the process related to gyanmayi bhuvaneshwari sadhana was given to develop and move ahead conscious level of the gyan shakti. With a conscious knowledge, development of the ichchha power or will power would be quick and after that by accomplishing gyanmayi sadhana, it becomes easy to transform knowledge power into the will power. In starting only, if gyanmayi sadhana is done then that will result in a big time duration for power generation and will generation to do the sadhana that is the reason why this sequence has to be done as given. When the sequence becomes from knowledge to will and from will to process in that condition new knowledge could be gained. This is very essential to understand this as it is the base procedure to uplift the sadhana level. If one have the knowledge, for the same the one have desired will too but if there is no process in that regard; then? No result. If one feels hunger, one has knowledge of hunger in the body, this went to extreme will but if one does not do the process to have food then that knowledge and will has no mean. And with this process the knowledge of the satisfaction which was about to be gained could not be received. And the person remains on the same level of knowledge. We have many will and desires in our life. But we become not able to complete those wishes. Or with many reasons we do not fulfil it. In the root of all these, unconsciousness of the kriya shakti or the process power is responsible. If with any process consciousness to the process power is given then that will result in we gain mental strength to do the process in regards of that will. And to gain success in that process could be gained. It is essential for our material and spiritual aspects that with will we even provide place for the process too in our life, with which a new knowledge could be gained. Sometimes it has also been seen that sadhak haves the knowledge, even will to do sadhana is also there but the process could not be done. For the solution of all these there is a siddhkaali kriya chetna process.
Every form of Mahakaali is incomparable. This mahavidya has her one form Siddhakaali. Siddhakaali develops consciousness of Kriya shakti or process power. With this process, sadhak gains mental state and platform to accomplish the process. By accomplishing this prayog, sadhak’s kriya shakti gets activation as a supplement of knowledge and will power and can uplift the sadhana level by acquiring new knowledge.
This sadhana should be started after 10PM in night on Sunday. It is better if someone establish yantra and picture related to siddhakaali. Direction should be north. Cloths and aasan should be red or white in color. After doing normal poojan of devi, sadhak should pray to sadgurudev and goddess for kriyashakti activation and success in sadhana. Sadhak should then chant 21 rounds of the following mantra with rudraksha aur Munga rosary.
Om Kreeng Siddhhakaalike KriyaSiddhim  Kreeng Namah
Sadhak should do the process till next Sunday (total 8 days.) when sadhana is completed, rosary should be places in any goddess temple. During the sadhana day’s headache, body pain and sweating is natural therefore sadhak should not worry in this regard.


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Saturday, February 25, 2012

अघोरेश्वर प्रत्यक्षीकरण साबर प्रयोग (AGHORESHWAR PRATYAKSHIKARAN SAABAR PRAYOG)


साबर साधनाओ के अद्बुध करिश्मो के बारे मे तो सब परिचित ही है. अघोर मार्ग का उद्धार करने वाले भगवान श्री दत्तात्रेय और साबर मंत्रो का सबंध अपने आप मे अटूट है. श्री दत्तभगवान की प्रेरणा तथा आशीर्वचन से नाथ योगियो द्वारा साबर मंत्रो का प्रचार प्रसार हुआ था. इस प्रकार अघोर साधनाओ मे भी साबर मंत्रो का प्रयोग प्रचुरमात्रा मे होने लगा था. अघोरी के लिए भगवान अघोरेश्वर मुख्य देव है, जिनके मुख से समस्त तन्त्रो का सार निकलता रहता है. जो शिवतत्व को अपने अंदर स्थापित कर सदा शिव आनंद से युक्त हो कर अपने आप मे ही लिन रहता है वही अघोरी है. सिद्ध अघोरी की यही पहचान है जो अघोरेश्वर की तरह ही निर्लिप्त रहता है समस्त विकारों भेदभाव तथा पाशो के बंदन से छूट गया है. ज़रुरी नहीं की वह स्मशान भष्म से युक्त हो, नग्न रहे या घृणा पर विजय होने का प्रदर्शन करे. जो इन सब से ऊपर उठ चूका हो, जिसके लिए ये भेद ही न हो, वही तो है अघोरी. किसी समय मे इनका घर मे आना, स्वयं शिव के आने जितना सौभाग्यदायक माना जाता था लेकिन कुछ स्वार्थपरस्तो ने तो कुछ हमारी अवलेहना भ्रम और कुतर्क ने इस मार्ग का ग्रास कर उसे भय का रूप दे दिया. खेर, अघोरी के लिए यह ज़रुरी है की वह अघोरेश्वर के चिंतन मे लिन रहे. भगवान अघोरेश्वर स्मशान मे बिराजमान है, सर्पो से लिप्त वह स्मशान भस्म को धारण किये हुए है. जिनके चेहरे पर आनंद ही है तथा और कोई भाव हे ही नहीं. ऐसे अघोरेश्वर के श्रेष्ठ रूप का ध्यान करना साधक के लिए उत्तम है. प्रस्तुत साधना भगवान अघोरेश्वर के इसी रूप के दर्शन प्राप्त करने की साधना है. वस्तुतः यह अपने आप मे अत्यधिक महत्वपूर्ण साधना है जिसको करने के बाद साधक का चित हमेशा निर्मल रहता है, भेद से मुक्ति मिलती है तथा सर्वसर्वात्मक भाव का उसमे उदय होता है. साथ ही साथ अघोरेश्वर के वरदान से साधक अष्टपाशो से मुक्त होने लगता है. इस प्रकार की भावभूमि प्राप्त होते साधक को विविध प्रकार की साधनाओ मे सफलता प्राप्त होने लगती है. वैसे भी अघोरी के लिए यह एक अत्यधिक महत्वपूर्ण क्रम है की साधनामार्ग के इष्ट के दर्शन कर उनके आशीर्वाद प्राप्त करना.
साधक को चाहिए की वह इस साधना को स्मशान मे ही सम्प्पन करे. रात्री मे ११:३० के बाद इस साधना को शुरू करना चाहिए. साधना को सोमवार से शुरू करे. साधक को स्नान कर अघोर गुरु पूजन सम्प्पन कर विशेष शाबर मन्त्र का ५१ माला जाप करना चाहिए. मंत्र जाप के लिए साधक को रुद्राक्ष माला का प्रयोग करना चाहिए. आसान तथा वस्त्र काले हो. आसान के निचे चिता भष्म को बिछा देना चाहिए. इस क्रम को ११ दिन तक करने पर विविध अनुभूतिया होने लगती है, साधक जब इसे २१ दिन कर लेता है तब उसे भगवान अघोरेश्वर के दर्शन होते है.
 अघोर अघोर प्रत्यक्ष वाचा गुरु की अघोरनाथ दर्शय दर्शय आण सिद्धनाथ की
साधक को भयभीत ना हो कर वीर भाव से यह साधना करनी चाहिए.
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Everyone knows about miracle effects of sabar sadhana. There is a strong relation between up lifter of aghora way shri dattatreya and sabar mantra. With blessings and order of bhagwan datt, Nathyogi Disseminated sabar mantras.  This way, in aghor sadhana also use of sabar mantra started widely. For aghori, god Aghoreshwara is major diety from whose holy mouth abstract of all tantras keeps on coming. The one who have established Shivtatva within and being merged with Shiva joy remain lost on one’s internal self is true Aghori. Identification of true Aghori is the one who stays detached mind from all the disorders & discriminations and those who have left all the boundations. Not require that he remains with smashana ash, naked or exhibits his victory over disgusts. One who has become above all these, the one who do not have these differentiations, that one is Aghori.  At some era, it was counted a great boon like visiting Shiva, if aghori visit the home but this great way became defected and re presenter of fear by few selfish and somewhat our ignorance, fallacy and sophism. Anyways, for aghori it is essential to remain in contemplation of Aghoreshwara. God Aghoreshwar is seated in Smashana, wearing smashana bhasma he is accompanied with snakes. The one who have only joy on the face and no more expression. Such meditation of aghoreshwara is boon full for sadhak. The presented sadhana is sadhana to have glimpses of the same meditated aghoreshwar. Literally this sadhana is very important sadhana when accomplished will give internal purity of the soul, get relief from differentiations and gets humour development in Sarvasarvaatmak thinking. With that blessing of Aghoreshwar is gain to get relief from eight basic loop traps or Astapasha. Reaching such mentality level, sadhak will start getting success in various sadhana. With that this is an important order for aghori to get blessings through glimpses of Isht Aghoreshwara in the long way of sadhana.
Sadhak should do this sadhana in Smashana only (cremation ground). One should start this sadhana after 11:30 in night. Sadhana could be started from Monday. Sadhak should take bath and complete Aghor Guru Poojan, after that one should chant 51 round of special sabar mantra. For mantra chanting one should use rudraksha rosary. Aasana and cloths should be black in colour. One should spread ash of cremation under aasana. If this process in continues for 11 days, one will start having divine experiences, when sadhak completes 21 days of the process at that time god Aghoreshwar will give glimpse to sadhak.
Om Aghor Aghor Pratyaksh Vaachaa Guru Ki Aghoranaath Darshay Darshay Aan Siddhanaath ki
Sadhak should not get scare and with courage one should proceed in sadhana.
   

                                                                                               
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बीजोक्त तन्त्रम् – शक्ति समन्वित गुरु पादवंदन अनाहत कल्प(Beejokt Tantram- Shakti Smanivat Guru Paddvandan Anahat Kalp )COMPLETE


“भुक्तिमुक्ति प्रसीद्धयर्थ मीयते सद्गुरुं प्रति”
मालिनिविजय तन्त्रं”का ये श्लोक उन रहस्यों को विवेचित करता है जो गूढ़ है,सामान्य अर्थों से इस श्लोक का गूढार्थ समझा ही नहीं जा सकता है | अभिन्न भाव से भोग और मोक्ष की प्राप्ति’  सद्गुरु का आश्रय लिए बिना कदापि संभव नहीं है |
स्मरण रखने योग्य तथ्य ये है की अवसाद युक्त मष्तिष्क,कपट से भरे विचार और अस्थिर चित्त के होते हुए यदि हम सद्गुरु का आश्रय मात्र जिव्हा के द्वारा या अपनी तथाकथित छवि को बचाने के लिए स्वप्रशंसा हेतु प्रयोग करते हैं तो समर्पण हुआ कहाँ,और जब समर्पण ही नहीं हुआ तो पूर्णत्व के पथ पर भला वो परम तत्व जो की कालातीत गुरु तत्व है हमें कैसे अग्रसर कर सकता है | हमें समर्पण का मूल नियम ही नहीं पता है |वो नियम जिसे समझे बिना हम सद्गुरु की कृपा प्राप्त कर ही नहीं सकते और जब कृपा प्राप्ति’  ही नहीं हुयी तो आगम-निगम,वेद-वेदान्त, साधना और सिद्धियों की प्राप्ति’  तो बहुत दूर की बात है अनुभूति का धुआँ भी आपको सूंघने को नहीं मिलेगा | और वो नियम है सब कुछ छोड़कर मात्र उनके समक्ष चले जाना |शायद पढ़ने में ये बहुत आसान लग रहा हो पर है ये अत्यधिक कठिन, क्यूंकि हम धन छोड़ सकते हैं,परिवार से भाग सकते हैं,भय से मुक्त हो सकते हैं,त्याग कर सकते हैं,किन्तु क्या आपको पता है की स्वयं से स्वयं को मुक्त करवा लेना इतना सहज नहीं है |इसका सीधा सा अर्थ है की हमारा समर्पण बहुत ही नापा तुला होता है और हमने स्वयं के समर्पण के लिए एक सीमा रेखा अर्थात dead line भी तय कर ली होती है,की हम मात्र इतना दे सकते हैं.इससे ज्यादा यदि हमारा गुरु मांगेगा तो वो हमारे वश का नहीं है |याद रखिये गुरु को आपका धन नहीं चाहिए होता है,आपका ऐश्वर्य उनके लिए अर्थहीन होता है,उन्हें मात्र आपका पूर्ण समर्पण चाहिए होता है,और जब ऐसा होता है तो वो आपको तराश कर अनमोल रत्न बना देते हैं की जिसके पाने के लिए ये दुनिया ही पागल हो जाती है |
मात्र डेढ़ वर्ष पहले जब मैं मेरे मास्टर से मिली तो मैंने बहुत से तर्क वितर्क तंत्र और गुरु को लेकर किये, किन्तु उन्होंने मुझे अत्यंत धैर्य से समझाया और जिन तथ्यों को उन्होंने मुझे समझाया था उसके अंत में उन्होंने यही कहा की मैंने जिन तथ्यों को समझाया है वो मुझे मेरे प्राणाधार सदगुरुदेव से प्राप्त हुए हैं और मैंने इन तथ्यों के बल पर ही आज तक सब कुछ पाया है और भविष्य में भी प्राप्त करता रहूँगा,और उसी विश्वास से यह कह रहा हूँ की यदि तुम भी इन नियमों को अपने जीवन में अपनाओगे तो तुम्हारे जीवन में रिक्तता नहीं रह सकती | समर्पण से ही प्राप्ति’ हो सकती है |प्राप्ति’ जो अष्टादश सिद्धियों में से एक है और इस प्राप्ति’ सिद्धि की प्राप्ति’ का मार्ग समर्पण से ही संभव है | तब ना तो जीवन में कोई अवसाद होता है,ना कोई ईर्ष्या और ना ही पतन का डर |तब मात्र अवसर की प्रचुर उपलब्धता ही हमारे चहुँ और रहती है |सदगुरुदेव कहते थे की पराजय के डर से भरा हुआ मनुष्य वस्तुतः ये भूल जाता है की उसने अपने जीवन का प्रारंभ ही विजय से किया होता है अर्थात उसका जन्म प्रकृति के व्याघातों से लड़कर और जन्म के प्रतिकूल वातावरण से लड़कर ही होती है और जीवन एक विजय से दुसरे लक्ष्य के मध्य की मात्र यात्रा ही तो है,और वो लक्ष्य होता है मृत्यु पर जीत का,जीतने का अर्थ ना मरने से नहीं है अपितु अपनी इच्छा से अपनी देह,आत्मा और कीर्ति को विस्तारित करने से है, और इस यात्रा के मध्य प्रचुर अवसर आते ही हैं किन्तु तब जब मार्गदर्शक हो आपको जीवनमार्ग की कठिनाइयों को पार करने का कौशल सीखने वाला |और ये मार्गदर्शक मात्र सद्गुरु ही तो होता है जिसने स्वयं उस परम तत्व को अपने अंदर आत्मसात कर लिया हो और स्वयं ही निखिल तत्व में परिवर्तित हो गया हो| मात्र वही बता सकते है की जीवन में प्राप्त अवसरों का कैसे सदुपयोग किया जाए,अवसर के अनुकूल हम अपने मनोभावों को कैसे परिवर्तित करे जिससे प्रगति और आनंद की प्राप्ति’  हमारे लिए सहज हो जाये ये मात्र वही बता सकते हैं,तब हम किसी भी क्षेत्र में क्यों न हो,कैसे भी कार्यों को हाथ में ना लें,विजय हमारा ही वरण करेगी | याद रखो कार्य का संभव होना या न होना मनोभावों पर निर्भर करता है और इसे स्थिति को प्रारब्ध या ‘प्राप्ति’ ’ के नाम से जाना जाता है | 
और मैं आज पूर्ण गर्व से कह सकती हूँ की मैंने मास्टर की बात और आत्मविश्वास को हृदयंगम किया  अपने आपको सदगुरुदेव के श्री चरणों में पूरी तरह उड़ेल देने से नहीं रोका,मेरा ध्येय मेरा लक्ष्य मात्र मेरे सदगुरुदेव ही बन गए और तब इन्ही सूत्रों के क्रमशः पालन ने मुझे अवसाद और हीन भावों से मुक्ति दिलाई,अवसरों का सदुपयोग करने की कला सिखाई जिससे आज आत्मविश्वास और सफलता की प्राप्ति मेरे लिए कही सहज है,कैसे विपरीत स्थितियों से निकल कर आज तक की यात्रा मैंने की है ये बताना कही ज्यादा कठिन है,आज मुझे स्वयं को विश्वास नहीं होता है की ये मैं हूँ | और इन क्रियाओं के बाद ज्ञान और अनुभूतियों का जो मार्ग सदगुरुदेव की कृपा से मेरे लिए खुला उसकी तुलना विश्व के किसी खजाने से नहीं की जा सकती है |    
 मास्टर ने बताया था की सदगुरुदेव हमेशा कहते रहे हैं की गुरु ध्यान के लिए अक्सर हम एक वाक्य सुनते हैं की जब भी गुरु का ध्यान करना हो अपने त्रिकूट में अर्थात भ्रूमध्य में करना चाहिए | किन्तु क्या वास्तव में नासिकाग्र अर्थात जहाँ से नाक का प्रारंभ होता है या ललाट पर जहाँ बिंदी लगायी जाती है वहाँ गुरु का ध्यान किया जा सकना सहज और पूर्ण ध्यान है ??  नहीं क्यूंकि गुरु का ध्यान क्रमिक रूप से श्री गुरु,श्रीमत गुरु और तदुपरांत सद्गुरु के रूप में किया जा सकता है | क्यूंकि सामान्य रूप से गुरु का बिना शक्ति युक्त ध्यान करना अपूर्ण ध्यान ही होता है और तब मात्र उनकी देह का चिंतन ही हम करते हैं किन्तु पूर्ण शक्ति युक्त ध्यान गुरु का ब्रह्मांडीय ध्यान होता है | और उस ध्यान तक या गुरु की उस विराटता तक हम तभी पहुच पाते हैं जब पहले हमने उनका दर्शन अपने ह्रदय में किया हो अर्थात अनाहत चक्र में उनकी स्थापना की हो,तदुपरांत विशुद्ध और फिर आज्ञा चक्र में | इसी क्रमिक ध्यान द्वारा हम सद्गुरु के दिव्य चरणों का बोध कर पते हैं और उनके वास्तविक स्वरुप और उनसे अपने संबंधों की सत्यता और पुरातनता भी | इसके बाद कोई अवसाद,कोई ईर्ष्या,कोई असफलता या मलिनता हमारी साधनात्मक,मानसिक,शारीरिक या आर्थिक उन्नति को नहीं नहीं रोक पाती है | अनाहत चक्र पर गुरु का ध्यान उनकी परांगत मूल शक्ति का उनसे योग कराती है अर्थात यहाँ पर हम ध्यान कर हमारे गुरु के मूल शक्ति स्त्रोत के उनकी करुणामयी ममता का,उनके स्नेह का और उनके तेज का दर्शन करते हैं जिससे हमारे मॉल शिथिल होकर भस्मीभूत हो जाते हैं |
अनाहत पर किया गया ध्यान गुरु के प्रति हमारे मलिन भाव का और संबंधों के संशय का नाश करता है जिससे भावनागत शुद्धि आती है,चित्त की निर्मलता की प्राप्ति होती है |यहाँ वे श्री गुरु के रूप में विराजमान होकर अपने दर्शनों के द्वार खोलते हैं |   
इसके बाद विशुद्ध पर किया गया ध्यान निर्मल भावनाओं को वाणी की सत्यता और शब्द शक्ति का बल देता है ,जिससे मंत्र जप में अतिशीघ्र सफलता और पूर्ण तेज की प्राप्ति होती है | यहाँ वे श्री मत गुरु के रूप में शिष्य को अपने प्राणांश से जोड़कर सफलता का योग करा देते हैं |
तदुपरांत आज्ञा चक्र पर किया गया ध्यान जिव्हा और मन द्वारा किये गए जप को सिद्धि प्रदान करते हैं जिससे सभी क्षेत्रों में सफलता प्राप्त होती ही है , मंत्र पुरुष के दर्शन यही होते हैं,यही सदगुरुदेव की विराटता से शिष्य का परिचय होता है और उनका अनुग्रह भी |
    इन्ही क्रमों का मैंने खुद प्रयोग किया और सफलता भी पायी है,मुझे मास्टर ने इन क्रमिक ध्यान प्रयोग में से प्रथम प्रयोग को लिखने की अनुमति दी जिससे मेरे सभी भाई-बहनों को सफलता प्राप्त हो और उनका चित्त पूर्ण निर्मल भाव की प्राप्ति कर समर्पण का अर्थ न सिर्फ समझ सके अपितु उसे साकार भी कर सके | आप स्वयं अनुभव करेंगे की आपके भीतर छुप कर बैठे विभिन्न मलिन पक्ष कैसे उभर उभर कर सामने आते हैं और तभी आपको ज्ञात भी होगा की जीवन यात्रा पर अभी तक आपकी किये गए प्रयास क्यूँ नकारात्मक परिणाम देते रहे हैं,और आप को क्यूँ बार बार असफलता मिलती रही,मात्र इतना ही नहीं इस प्रयोग के बाद आप स्वयं ही इन नकारात्मक भावों का सकारात्मक परिवर्तन होते हुए देखंगे और देखंगे परिस्थितियों को अपने अनुकूल होते हुए भी.
किसी भी गुरूवार या रविवार की सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण कर उत्तर दिशा की और मुख कर सफ़ेद आसन पर बैठ जाएँ,सामने गुरु चरणों का और सदगुरुदेव तथा माता जी का संयुक्त चित्र हो,यदि गुरु यन्त्र और गुरु पादुका हो तो और अच्छा और यदि ना हो तब भी चित्र तो अनिवार्य ही है.
फिर निम्न गुरु ध्यान का उच्चारण ५ बार करें-
“अखंड मंडलाकारं व्याप्तं येन चराचरम् |
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरुवे नमः ||”
ये ध्यान मंत्र कई कारणों से विशिष्ट है,इसके इसके द्वारा श्री गुरु के चरण कमल के दिव्या दर्शनों का सौभाग्य प्राप्त होता है,उनके मूल स्वरुप से परिचय की और पहला तथा अनिवार्य क्रम जहाँ हम जिज्ञासु से शिष्यता की और मुड़ते हैं |
इसके बाद उन दिव्य चित्रों और यंत्रादि का पूर्ण पूजन करे और सफलता की प्रार्थना करे और गुरु मंत्र के द्वारा ११ बार प्राणयाम करे और बाद में गुरु मंत्र की १६ माला जप करे और
“ओम गुं गुरूवै नमः” 
का उच्चारण कर हल्दी मिश्रित पीले अक्षतों को १० मिनट तक उन दिव्य चरणों पर १-१ करके अर्पित करते रहे और तब स्थिर देह के साथ किसी भी सुखासन में बैठकर अनाहत चक्र पर ध्यान केंद्रित कर
“ह्रीं ग्रीं ह्रीं” (HREEM GREEM HREEM) मंत्र का जप ४५ मिनट तक करे,धीरे धीरे आपको पूर्ण निस्तब्धता और शांति की प्राप्ति होने लगेगी आगे के दिनों में अनाहत चक्र में गुरुचरणों का पूर्ण बिम्ब दिखाई देने लगेगा, किन्तु साथ ही साथ मलिन भावों का उद्वेग भी अनुभव होगा जिससे सामान्य दैनिक जीवन और संबंधों में साधना के प्रति अरुचि और संशय भाव की जागृति होगी,लेकिन आप अपनी क्रिया संपन्न करते रहे,अंतिम दिन तक आपको पूर्ण प्रकाश और अनाहत कमाल पर सदगुरुदेव का विराजमान स्वरुप दिखाई देने लगेगा और ये कोई अहसास न होकर वास्तविकता ही होगी और इसके साथ साथ आपके चित्तगत सभी मलिन भावों की निवृत्ति भी प्रारंभ हो जायेगी |तब न तो भावों में नकारात्मकता होगी और ना ही आत्मबल का आभाव ही दृष्टि गोचर होगा |तब रह जायेगा तो मात्र पूर्ण आत्मविश्वास और सदगुरुदेव की करुण कृपा से युक्त आपके निर्मल भाव,आपका समर्पण और जीवन में सफल होने के दिव्य सूत्रों का जीवन में साकार उदय | ये साधना १४ दिनों की है और माला के रूप में आप गुरुमाला का प्रयोग कर सकते हैं,रही बात प्रभाव की तो यही कहूँगी की प्रयोग करके स्वयं ही देख लीजिए | यदि भविष्य में अनुमति मिली तो अन्य दोनों क्रम भी अवश्य आप सभी के समक्ष रखूंगी |
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 भुक्तिमुक्ति प्रसीद्धयर्थ मीयते सद्गुरुं प्रति
This shlok from “Malinivijay Tantra” depicts that mysteries which always remain behind the veil and it is impossible to understand this shlok in vernacular meaning. To get Bhog and Moksha that too in varied forms without Guru is impossible.
Point which should keep in mind is that while having unstable thoughts, selfish soul, depressed mind……and moreover just to make our social image healthy among others we keep on saying lie that I am a true disciple of my Guru…..i have given my life to Him is nothing but an empty and false show off…..Guru only needs our factual devotion because without it He can’t let us walk on the way of Salvation. But the fact is that we don’t know basic rule of this devotion which is refered as Samarpan….as without this we can’t get the blessings of our Guru and without Guru’s blessing it is next to impossible even to think about Aagam-Nigam, Ved-Vedants, Sadhna and Sidhi….to get them is another worlds talk….and that rule is leave everything behind and give yourself to your Guru without any demand or expectation. May it seems easy at first stance but it is the toughest job that a person can perform because we can leave our money, comforts, family and sometime make ourselves free from our inner fear but to liberate yourself from you seems herculean task. It means we have mark a line between our Guru and us as we have our personal measurements that if Guru asks than we will give this and that but not beyond our deadline. But it’s our misfortune that we forget our Guru didn’t ask for our money or luxuries of life as all these are nothing to Him, He only needs our true affection and when we give it to Him…..than like a potter He carves His best creations on us and make us priceless diamond which can be dream of anyone’s eye.
 Just one and half year back when first time I met with my Master I discussed each and every point as per my knowledge about Guru and Tantra and without any second thought and hesitation he explained everything to me and let me know that “ Whatever I am conveying to you is all that I got from divine Master i.e. our Sadgurudev and it is because of His knowledge that I am getting and will get everything my life”, he further explained that if you too follow these rules than your life will become fruitful as well. 
“Prapti” which is one out of Ashttdshh Sidhis can be attained only through Samarpan because when we attain this feeling then all strains, jealous and fear of annihilation remains no more…..which remain behind is “success and only success”. Our Sadgurudev always told that it is nothing but the feeling of failure which frighten us but we forget that our first outcry in this world was the symbol of our success as out of millions one sperm had to fight hard to get life…..and life is nothing but a journey between one goal to another and this second goal is Victory over Death…..this victory doesn’t mean that we become immortal but its meaning is to get enlarge one’s body and soul according to one’s will. But this can happen only when you have a true guide in the form of your Guru…..Guru who knows this way very well…..who is nothing but kind of NIKHIL in himself…….as it is only NIKHIL who can tell us how we can make situations favorable to us, how we can change our feelings to achieve lifelong happiness and success…..and when this all done hardly matters which type of work we are doing and what type of situations are…success is bound to meet us. One thing which we should always keep in mind is that it is our mind which makes situations favorable and against to us…and this state of mind is called Prarabdh or Prapti.
And now today I can proudly say that whatever I learnt from my Master I truly obeyed all that and give my life to my Sadgurudev. He become my soul and breath…..and the result this that now there is no depression, inferiority and failure exists in my life….now I get what I want….it is hard to explain my whole hardship but now whenever I look at myself I always thrills with joy that “this is me” and after all these procedures with the blessings of Sadgurudev an ocean of knowledge   opens its way for me which is priceless and matchless.
Master told me that about the meditation of Guru one thing which we always learnt that HIS meditation should be done at Trikut means at Bhrumadhya. But is it really true that meditation which is done at Nasikaagrh or centre of eyes is easy and beneficial in itself?? And the answer is “NO “because meditation on the name of Guru can be done in form of SHRI GURU, SHRIMATT GURU and then SADGURU respectably. And we get the glimpse of Guru’s universal form only when we get Him establish and have His divine look firstly in our heart i.e. our Anahatt Chakra and then in our Vishudh and Aagya Chakra. By this systematic procedure we can realize Sadgurudev’s presence as well as His love behind His relations to us.  When all this done then neither depression nor jealous, failure can hinder our spiritual, mental, physical and financial development. By meditating on Anahatt Chakra we can feel the basic divine power which helps us to be one with our Guru and can have His love, feel His divine aura which has the power to get destroyed our all spiritual and mental illness.
  By meditating on this chakra we get rid of every doubt which remains as a obstacle between us and our Sadguru….our emotional thoughts become completely pure and at this point He seated as SHRI GURU and open the door from where we can see Him.
 After that when we meditate at Vishudh Chakra it strengthen truthfulness ( Vaani ki satyata) and gives power to Shabad Shakti….and with the help of this power one gets easily success in Mantra Jap. At this point Sadgurudev gets established in the form SHRIMATT GURU and be one with HIS disciple and gives success to him.
 After that meditation on Aagya Chakra opens the door of success in every field as by concentrating on it one gets Sidhi for the vocal mantra jap( jihwa dwara kiya gya jap ) and soul mantra jap ( mann mein kiya gya jap) and this is the same point where a shishya can have the golden opportunity to see his Sadgurudev.
 I followed these procedures and got success as well…..but here out of these three procedures my Master allowed me just to write the first one so that my guru bhai bahen can come to know the true meaning of Samarpan ….and give their best to be one with our honored Sadgurudev. By doing this proyog you will face to face countless negative aspect that are hidden in your inner personality…..not only this you also come to know the reason behind your every failure till the date……but! but! but!  Once as you start the proyog you’ll see how internal and external negativities and situations will convert into positive one. 
 On any Thursday or Sunday after getting bath wear neat and clean clothes and seated on white altar (aasan) by facing south direction, in front of you there should be photo of Guru Chran and Sadgurudev with Mata ji. If you have Guru Yantra and Guru Paduka then its fine but if you don’t then too will be ok.
After that keep on concentrating on the following Mantra for 5 times
 अखंड मंडलाकारं व्याप्तं येन चराचरम् |
 तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरुवे नमः ||”
This Mantra is very much important for multiple reasons as by this we not only see the divine feet of our Sadgurudev but also it changes our inner soul from a curious one to shishya.
After doing the pooja of that divine photos and yantra make prayer for success and do the Pranayaam for 11 times with Guru Mantra and then do 16 rosaries of Guru Mantra and then by chanting given mantra offer turmeric mixed yellow akshatt for next 10 minutes.
ओम गुं गुरूवै नमः
When all this done you can sit in any posture comfortable to you and try to concentrate on your Anahatt Chakra by chanting-
ह्रीं ग्रीं ह्रीं” (HREEM GREEM HREEM)
Mantra for next 45 minutes. Slowly-slowly you will realize complete peace and satisfaction and Holy Feet of our Pranadhaar Sadgurudev’s on your Anahatt Chakra but one thing which I need to clear is that as you will carry on this proyog it is quite possible that your routine life and relations your mind will divert against the sadhna and mantra jap but you have to get out of this feeling and continue your sadhna till the last day….on the final day you will see Sadgurudev is sitting on your Anahatt chakra and that will not a sort of feeling or mere illusion but a fact and by doing so you will also feel yourself liberating from negativity. Then there will be no failure, the thing which remain behind will be success, self confidence and pure devotion. This sadhna is of 14 days and use guru mala for this…..effects can be seen by you. In future if my Master will allow I’ll give next two procedures as well….
 
   

                                                                                               
 ****NPRU****   
                                                           
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