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Tuesday, April 30, 2013

25 TH MAY SEMINAAR - TANTRIK SHATKARM AUR RAS VIGYAN GOODH RAHASYA


एक  महत्वपूर्ण सूचना : 25 मई 2013 को  आयोजित  होने  वाले सेमीनार हेतु
स्नेही मित्रो,
आप सभी इस तथ्य से भली भांती परिचित हैं की ज्ञान की धारा निरंतर गति शील रहती हैं,पर यह  भी एक महत्वपूर्ण तथ्य हैं की केबल तथ्य  ही नहीं बल्कि उस ज्ञान को प्रायोगिक रूप से संभव  किया भी जा सकें, इसके लिए  भी एक स्वथ्य कोशिश होनी चाहिए,अन्यथा  सिर्फ तथ्य और केबल लेखन से ही  सब कुछ संभव हो जाता  तो आज भारतीय संस्कृति के  सर्वोच्च  विज्ञानं  क्षेत्र  की यह अवस्था  न होती, जिन विज्ञानों का  उद्भव हमारी संस्कृति से  ही हुआ हैं आज मानो हास्यास्पद  अवस्था में हैं किसी अन्य की कौन कहें. क्या हम भी इस पर  पूर्ण विस्वास कर पाते हैं यह  विचारणीय तथ्य  हैं .??
तब कैसे  संभव  हो ? तब कैसे  हम वास्तविक  रूप में  स्वीकार कर  पाए की आज भी  प्राचीन विज्ञानों की प्रासंगिकता हैं और यह केबल शब्दों  में  नहीं  बल्कि अनेको ऐसी  गुप्त कुंजिया हैं जिसके माध्यम से  इनको आज भी इन विज्ञानों को विधिवत सीख कर  साकार किया जा सकता हैं. पर यह मानना  की मैं  नहीं मानुगा  और कोई दूसरा  आपको कर करके  दिखाए,तब ही  मैं ????यह तो  मुर्खता  पूर्ण बात हैं,आप ही बताये  आप क्यों नहीं सीखोगे?  कब तक दुसरे के  तर्कों  को आखं  मूंद  कर मानते रहोगे? क्यों  न हम स्वयम ही सीखें  और समझे  और फिर  जो लिखा गया हैं उसके किसी दुसरे के माध्यम से नहीं बल्कि स्वयम ही एक सत्य साक्षी बने तब न अर्थ हैं. अन्यथा सारे समय  करते  रहे  किसी भी अन्य की पोस्ट पर लाइक  और स्वयं यह मानते रहे  की आप कुछ नहीं कर सकते हैं,मात्र एक निरीह  से जीव है.यह  तो सदगुरुदेव प्रदत्त ज्ञान की गरिमा से  सीधा  खिलवाड़  हैं.
आज इस साइबर  जगत में, बातो को घुमाकर अपने  लिए करने वाले  और  तथाकथित शास्त्रों के  एक मात्र प्रवक्ता बने  अनेको  हैं जो हर बात में  सिर्फ  और सिर्फ शास्त्रों की ही दुहाई देते  रहते हैं.वह कभी कभी क्या हमेशा ही  यह भूले रहते हैं की  जितने  ग्रन्थ या ज्ञान  उनके पास  हैं उनसे भी कई कई गुना ज्यादा  तंत्र  का ज्ञान का महासागर का विस्तार हैं और यह  शास्त्रों पर आधारित  नहीं बल्कि   गुरु गम्य  हैं.सदगुरुदेव  ने हमेशा से ही पोथिन देखि की तुलना में आखन देखि  की बात पर  ज्यादा जोर दिया हैं.इसलिए लिखना  एक अलग बात हैं पर अपने भाई बहिनों के  लिए  एक कोशिश लगातार करना यह NPRU  का एक ऐसा इतिहास हैं  जिसको आप सभी प्रत्यक्ष  साक्षी  हैं ही ,और वह भी आज  या कल से नहीं बल्कि  विगत अनेको वर्षों से.
हमारी यह   हमेशा  से  धारणा  रही हैं की अपने  भाई  बहनों  के मध्य  अपनी बार बार  सिर्फ  दुहाई देते  रहने  से, अपने आपको प्रतिस्थापित्र करने  से  कई कई   गुणा  जयादा उचित होगा  की हमारे  अपने भाई  स्वयम ही सीखें  और समझे और उसके  बाद  वह स्वयम   सत्य  को आत्मसात  कर सकते हैं .और सदगुरुदेव जी के  दिव्य ज्ञान की गरिमा  सही अर्थो में सुरक्षित रख सकते हैं.
हमने  पहले  ४० दिवसीय  और  २०  दिवसीय  कार्यशालाओ  का  आयोजन किया, आज  उपस्थित  साइबर  क्षेत्र में  जो स्व नाम  धन्य सिद्धो जो अपने  ही मद में  डूबे  हैं,  का  पता   ही नही  था, पर आज  तो हजारो हैं .
इसके बाद  जब अनेको भाई बहिनों  ने हमसे  यह समस्या  सामने  रखी की, आज की व्यस्तता  के कारण  यह संभव नहीं हो पाता  की हम इतने  दिन  तक लगातार   इन कार्य शालाओ  में  उपस्थित रह सकें, तब बहुत सोच विचार कर हमने  एक दिवस्सीय गोष्ठी  अर्थात  सेमीनार  का  आयोजन किया और इस श्रंखला  में  हम  चार सेमीनार का  सफलता पूर्वक आयोजन कर चुके हैं.
आपने  विगत  दो सेमीनार जिसमे  से  “अप्सरा यक्षिणी साधना  सूत्र”  और दूसरा   “इतर योनी  और कर्ण पिशाचिनी  साधना  सूत्र” से  सबंधित रहे  हैं, हमने पूरी कोशिश की  की आपको  आपके  द्वारा  इस  आयोजन में  भाग लेने  पर, आपके अपनी धन राशि का पूरा पूरा   मूल्य  ही न मिले  बल्कि कई कई गुना बहुमूल्य ऐसी  साधना सबंधित बातो की जानकारी मिले,  जो अपने   आप में  अप्रितम हो ही,  इस  हेतु हमने इन सेमीनार में इनके  विषय सबंधित अद्भुत बहुमूल्य साधनात्मक ज्ञान से सबंधित  किताब आपको सामने  रखी  आज यह हालत हैं की उनका  पहला संस्करण समाप्त हो गया हैं और इनके  दुसरे परिवर्धित   संस्करणों के लिए  कार्य  प्रगति में   हैं. हमने  सिर्फ टाइम पास के  लिए  यह सेमीनार आयोजित   नहीं किये हैं इस बात का  आप सभी स्वयं साक्षी  हैं .अतः  इस बारे में  और क्या लिखा  जाए.
मित्रो  हमने आप के  सामने  यह कहा था,  हम इन सेमीनार के  माध्यम से हर दो या तीन महीने  में आपके सामने  उपस्थित होते  रहेंगे,और यह श्रंखला  लगातार  गतिमान रहेगी ही, जिससे की  हमारे  और आपके बीच  एक सीधा संवाद भी संभव हो सकें और  ज्ञान विज्ञानं की  जो  दिव्य बहुमूल्य सम्पदा सदगुरुदेव द्वारा   हम सबके लिए  एक वरदान हैं उससे भी आपका  परिचय एक सही अर्थो में हो सकें,हमारे पूर्व निर्धारित समय सीमा  में  थोडा सा बिलम्ब हो गया हैं क्योंकी  कार्य की इतनी अधिकता हैं  की  समयाभाव होना  एक स्वाभाविक  सी बात हैं.
अतः  अब समय हैं  सेमीनार का ...इस सेमीनार का  विषय  होगा
तांत्रिक षट्कर्म और रस विज्ञानं से सबंधित  गोपनीय सूत्रों और रहस्यमय साधनाये”
 जो   इन  विज्ञानों से सम्बंधित  होगी.
आज आप सभी षट्कर्म क्या होते हैं, इनके कार्य क्या  हैं इनसे भली भांती अवगत हैं ही . तो इन के बारे में  और आधिक  जानकारी  अगली पोस्ट पर क्रमश आएगी ही.
पर  अभी समय हैं  सेमीनार  में प्रवेश हेतु   नियमो का   और  समय  का.
पर कुछ संक्षिप्त  सी  जानकारी इस सेमीनार की विषय वस्तु से सबंधित  ::
बिना षट्कर्म के जाने  और उन्हें आत्मसात  किये   भला  एक साधक  का  इन क्षेत्र  में  होने  का क्या अर्थ होगा, इनका कोई  गलत उपयोग करे,  वह एक अलग बात हैं पर  किस तरह से  इनका समाजोपयोगी  ही नहीं बल्कि अपने  परिवार  और  अपने  आस पास के  वातावरण को  और भी मनोकुल  बनाया जा  सकता  हैं,  यह षट्कर्म विद्या  यह कर देती हैं.
लोग सालो साल इस आशा में घूमते रहते हैं,भटकते हैं की कोई ऐसा विद्वान् मिल जाए  जो इन विद्याओं में उन्हें   सिद्ध हस्त  करवा  दे,  तो दूर की बात हैं कोई प्रामाणिक  सही जानकारी के  साथ पूर्ण   प्रामाणिक  गुरु परंपरा  युक्त  सही जानकारी, आवश्यक  मुद्राएँ,गोपनीय रहस्य  की जानकारी  भी दे  दे,,,ऐसा हैं आज कहाँ??.
हालकी आज तक का इतिहास  यह बताता  हैं की जैसे ही हमने  कभी भी  किसी भी सेमीनार  की बात करी या  सेमीनार की घोषणा हुयी  हैं  अब ....... तत्काल इन्टरनेट पर   अब आप  देखिये  अनेको सिद्ध  स्वयम  ही जाग्रत  हो जायेंगे ,जो आपको  अब वह सिर्फ इसी की बात करेंगे  ...............पर .यह सब ड्रामा बाजी  आप  ने  भी  तो  कई  कई  भली भांती देखि हैं . पर चलिए उनकी  दाल रोटी का भी  सवाल हैं और  जिनको  हज़म नहीं  हो  रहा होगा तो  बस कुछ दिन में  आपको सामने  कोई न कोई ग्रुप या  कोई id  इस बारे में  सामने  आएगी ही.
मित्रो, हमने यह निश्चित किया हैं की इस बार का  सेमीनार  25 मई  अर्थात  शनिवार   को  अर्थात  बुद्ध जयंती  को होगा  और यह कोई  तीन घंटे  या चार घंटे का  नहीं बल्कि  बल्कि पुरे  छः  घंटे का   होगा. और  अगला  दिन(26 may ) पूरा का पूरा  आप सभी  के साथ  आपसी वार्तालाप के लिए  निर्धारित किया गया हैं.
हमेशा की तरह आप  हमारे  लिए  सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं क्योंकि आप  इन ज्ञान  विज्ञानं को सीखने  के लिए कितनी दूर से  और  वह भी कितनी कितनी  कठिनाई  का सामना  करते  हुए  आते हैं,  यह  हमारे लिए  आप के  स्नेह का  एक  अद्भुत उदाहरण हैं साथ ही साथ एक बिस्वास की किरण भी की आज भी  सदगुरुदेव के  शिष्यों में  सीखने की  क्रिया मंद  कम नहीं हुयी हैं बल्कि  दिन प्रति दिन बढ़ी ही  हैं.
सेमीनार   २५ मई  को  होगा  अगला  दिन और २६ मई  आपसी वार्तालाप के लिए  सुरक्षित  होगा  यदि आप उसमे भाग लेना  चाहेंगे.
तो  आप  में से  जो  भी इस में भाग लेना चाहते है,उन्हें हमेशा की तरह nikhilalchemy2@yahoo.com   पर “एक इ मेल भेजना  अनिवार्य होगा  और उसमे यह विषय “ मई माह  में  आयोजित सेमीनार में प्रवेश हेतु “    स्पस्ट रूप से लिखा होना  चाहिए.
यह  आयोजन  में भाग लेना  **** फ्री नहीं***** हैं अर्थात  जिनको  भी  अनुमति मिलेगी केबल उन्हें  आवश्यक धनराशी जमा करवानी होगी.
आप जो भी  इ मेल हमें  करेंगे , उसमे स्पस्ट रूप से  आप अपनी  हाल में ही  खिची गयी  scan फोटो ग्राफ और  अपनी कोई भी  एक id   की scan कॉपी सलग्न करेंगे .कृपया  यह  न समझे की  उस बार,उस सेमीनार में   भेज दी  थी  तो इस बार भी क्या ?  जी हाँ ... इस बार भी  आप  जो भी  “इ मेल” हमें  भेजेंगे  उसमे  आपका  फोटो ग्राफ आना अनिवार्य हैं  और हमेशा  की तरह आपको  भाग लेने  की अनुमति के  साथ एक  प्रवेश क्रमांक   इसमें  दिया जायेगा   जो आपको जिस समय  इस सेमीनार में  आप आयेंगे  उस समय अपने  साथ  रखना  अनिवार्य होगा.
यह आप जानते हैं ही की  हर किसी   को इसमें  प्रवेश नहीं  दीया  जा सकता  हैं,क्योंकि स्थान सीमा की भी एक सीमा हैं  अतः जिनको अनुमति  हमारे द्वारा  मिलेगी केबल वह भाई बहिन ही  आवश्यक निर्दिष्ट धनराशि जमा करवा  कर,और प्रवेश क्रमांक मिलने पर ही  इसमें  भाग ले पाएंगे .
सिर्फ २५  मई के दिन  प्रातःकालीन नाश्ते  और मध्याह भोजन की व्यवस्था  हमारे ओर   से होगी  शेष समय  और अगले  दिन की व्यवस्था  और इन दोनों  दिन रुकने   की व्यवस्था  का  व्यय  भार  आपको ही स्वयम वहन करना होगा.
अन्य  आवश्यक जानकारी आपको   इ मेल से    आपको उपलब्ध करा  दी जाएगी.
इस सेमीनार आयोजन का स्थान हमेशा की तरह  जबलपुर (मध्यप्रदेश)  ही हैं .
आप सभी जो इस सेमीनार में  भाग लेना चाहते हैं  वह शुल्क  और अन्य  जानकारी हेतु हमसे nikhilalchemy2@yahoo.com  पर संपर्क कर प्राप्त  कर सकते हैं.
एक बार पुनः ...यह सेमीनार  25 may  को आयोजित होना  हैं,26 may  आपसी वार्तालाप के लिए  निर्धारित  हैं .
****NPRU****

Thursday, April 25, 2013

BHAGVATI MAHAKALI TEEVRA KAAMNA POORTI PRAYOG - CHANDRA GRAHAN VIDHAAN




KaalahPachtiBhootaani, KaalahSamhartePrajaah
KaalahSupteshuJaagarti, Kaalo Hi Durtikramah
Each and every person understands the importance of a particular time potion or Kaal in his life according to his own level of understanding. There is no doubt in the fact that without particular time portion, existence of human is impossible. Not only humans but existence of anyone is impossible. For existence, time is not only necessary but it is also must. Our complete life stands on the speed of time and Kaal. At a particular time, one particular Shakti (power) spreads completely in entire universe and it is then transformed into various rare powers. This happens each and every moment. For example, at particular moment, Bhagwati Aadya Shakti is present in universe with its diverse forms. But at the same time, she keeps on accepting various forms in energy form. In one moment itself, she become Praan energy of some creature, mental energy for some, physical strength for some, health for some and somewhere that energy is becoming destructive and performing death of some. But it is possible that in one small unit of time i.e. moment power is completely transformed. It is possible that person at verge of death gets a new life and contrary to it, it is also possible that a completely healthy person dies. It all depends on particular time which is under the control of a particular power. Therefore in above verse, significance of time has been described that time is capable of swallowing all creatures. In other words, it is in hidden form in which all elements disappear. If we use modern science vocabulary, this concept is known by the name of ‘black hole’. It has been said further that Kaal is the one which destroys all the entities which have taken birth/originated. In other word, it signifies destruction procedure; it has primacy of Tamas character. When everything is in state of sleepiness i.e. in case of illusion or when indefiniteness pervades over, Kaal is alive at that time. It only means cremation ground because cremation ground is also alive and conscious in the night. Abstract meaning of it is Mahanisha too because night (after 11:30p.m) is conscious when all procedures and creatures have slept. It has been said further in verse that time is inaccessible, invincible and cannot be comprehended. Except time, hypothesis of any other universal creature is impossible.
In fact, it is not merely a verse rather it is very intense procedure, full of abstruse secrets which can be done only in eclipse time. If this sadhna procedure is decoded it can be understood that this verse describes various forms of Mahakaali. First line represents Dakshin Kaali form of Bhagwati which contains entire creature with in her. Second line is related to Samhaar Kaali, ruler of destruction. Nisha Kaali represents Mahanisha, as told by third line. On the other hand, fourth line is related to Guhya Kaali. In this manner, this verse describes about quadruple Beej Mantra of Mahakaali.
In fact, this mantra is king of mantra in it because it is capable of providing four virtues of human life as per Hindu tradition viz Dharma , Artha, Kaam and Moksha.These four beejs are full of power of four diverse forms of Mahakaali. Dakshin Kaali provides strength to person’s life in field of attraction and hypnotism. Bhagwati Samhaar Kaali paralyses all the enemies of sadhak. Alongwith it Bhagwati Nisha Kaali provides fame and reputation in sadhak’s life and Bhagwati Guhya Kaali open the door of progress for sadhak in various spiritual aspects. In this manner, this mantra provides sadhak various fruits to sadhak. Since it is related to a particular moment of time, effect of Mahakaali and it power increases multiple times during eclipse time. Procedure and sadhna done during this time provides special success to person. Eclipse time is very special for any sadhak irrespective of his sect. When energy created by special procedures comes in contact with the special energy emitted during eclipse time, sadhak gets quick results.
If this quadruple beej mantra related to Bhagwati is chanted during eclipse duration then sadhak not only attains above said special benefits but along with it, it gets transformed into very special procedure for sadhak.
This procedure is unparalleled in this respect because it is desire-fulfilment procedure which can be done only in eclipse. Every person has got special desire in his life. Many times, despite trying so hard for fulfilment of wish, when person is not successful then person should take help of divine powers. If we have any desire which is ethically right and we do not have any intention to harm anyone then fulfilment of such desires is approved by Tantra. Tantra path has various types of special procedures for fulfilment of such desires. And if out of these sadhnas, this sadhna is said to be Kohinoor, it won’t be an exaggeration because it is very easy and simple procedure which can be done by any sadhak.
Sadhak should do this procedure during the eclipse time. Sadhak should at least start this procedure during eclipse duration. Sadhna may be continued even if eclipse is over. For example, if eclipse duration is of 20 minutes then it is not possible to complete entire procedure in 20 minutes. But at least one should start sadhna during eclipse duration. There is no problem even if procedure continues for more than 20 minutes.
Sadhak should take bath and sit on aasan facing north direction. There are no special rules for Aasan and dress etc. Sadhak can sit on any aasan. First of all sadhak should do Guru Poojan, chant Guru Mantra and attain blessings from Sadgurudev for success in sadhna.
Sadhak should light a mustard oil lamp in front of him and mentally utter his desire 3times. Sadhak should meditate on four forms of Bhagwati Shri Mahakaali and chant quadruple Beej Mantra. Sadhak has to chant 21 rounds of mantra. Sadhak can use Rudraksh, coral or Shakti rosary for chanting. If sadhak does not have rosary, he can do this procedure without rosary too.

After completion of chanting, sadhak should pray to goddess for her blessings. In this manner, this very easy procedure is completed. But sadhak can feel intensity of this mantra during chanting time. Upon analysing the mantra, sadhak can himself guess the intensity of this mantra. Sadhak should completely utilize auspicious occasion of eclipse and do such amazing procedure for both materialistic and spiritual upliftment and gain complete pleasure in life.

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कालः पचति भूतानि, कालः संहरते प्रजाः   
कालः सुप्तेषु जागर्ति, कालो हि दुरतिक्रमः
हर एक मनुष्य अपने जीवन में समय के विशेष खंड या काल का महत्त्व अपने अपने स्तर पर अवश्य समजता है तथा यह स्वीकार करने में किसी को भी कोई आपत्ति नहीं होगी की बिना समय के एक विशेष खंड अर्थात विशेष काल के बिना मनुष्य का अस्तित्व असंभव है. और मनुष्य के साथ साथ किसी का भी अस्तित्व असंभव है. अस्तित्व के लिए काल का होना आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी है. काल और समय की गति के ऊपर ही तो हमारा पूरा जीवन टिका है. विशेष समय  में एक विशेष शक्ति का पूर्ण रूप से ब्रह्माण्ड में प्रसार होता है तथा विविध दुर्लभ शक्तियों में उसका रूपांतरण होता रहता है. यह हर क्षण में होने वाली घटना है. उदाहारण के लिए एक विशेष क्षण में ब्रहांड में भगवती आद्य शक्ति अपने विविध स्वरुप के साथ विद्यमान रहती है. लेकिन उसी समय वह उर्जा रूप में अपने विविध स्वरुप को ग्रहण करती है. एक ही क्षण पे वो कहीं किसी जिव की प्राण उर्जा बनती है, तो कहीं मानसिक उर्जा, कहीं शारीरिक बल, कहीं स्वास्थ्य, तो कहीं वह उर्जा संहार शक्ति बन कर किसी को मृत्यु की क्रिया को भी संपन्न कर रही है. लेकिन हो सकता है काल के एक छोटे से एकम में अर्थात क्षण में ही शक्ति का पूर्ण परिवर्तन हो जाए. यह संभव हो सकता है की एक मरता व्यक्ति पूर्ण स्वस्थ हो जाए और यह भी हो सकता है की एक पूर्ण स्वस्थ व्यक्ति मृत्यु को प्राप्त हो जाए. यह सब काल विशेष का ही खेल है जो की वो एक विशेष शक्ति के माध्यम से सम्पादित होता है. इसी लिए तो उपरोक्त श्लोक में काल की महत्ता के बारे में विवरण दिया गया है की काल सर्व भूत अर्थात सर्व जिव को अपने आप में निगलने की क्षमता रखता है, अर्थात वह गुह्य रूप में है जिसके अंदर सर्व तत्व का लोप हो जाता है. अगर हम आज के आधुनिक विज्ञान की भाषा का उपयोग करें तो इस तथ्य को ‘black hole’ के नाम से पहेचाना जाता है. इसके आगे कहा गया है की काल वह है जो की प्रजा अर्थात जो भी उत्पित है उसका का संहार करता है, अर्थात यह संहार क्रम है, तम गुन प्रधान है. जब सब कुछ निद्रा में है अर्थात भ्रम है है या अनिश्चितता से गर्त है उस वक्त काल जागृत है, इसका एक अर्थ स्मशान भी होता है, क्योंकि वह रात्री में चेतन है, तथा गुढ़ रूप से इसी का एक अर्थ महानिशा होता है क्योंकी महानिशा ही सर्वचेतन होती है जब अन्य सभी क्रिया तथा जिव शांत हो जाते है. और आगे श्लोक में यही कहा गया है की काल दुर्गम है, अजेय है, अतिकठिन है जिसे समजा ही नहीं जा सकता है. क्यों की काल के अलावा किसी भी ब्रह्मांडीय जिव की परिकल्पना ही असंभव है.
वस्तुतः यह मात्र एक श्लोक नहीं है लकिन गूढार्थ से भरीहुई अपने आप में एक अति तीव्र प्रक्रिया है, जिसे ग्रहणकाल में सम्प्पन किया जा सकता है. वस्तुतः इस साधना विधान को अगर ध्यान से गुढ़वाचन किया जाए तो समजा जा सकता है की यह श्लोक महाकाली के विविध स्वरुप के बारे में वर्णन करता है. प्रथम पंक्ति भगवती  भगवती के दक्षिणकाली स्वरुप का प्रदर्शन करती है जो की सर्व जिव को अपने अंदर समाहित कर लेती है. दूसरी पंक्ति संहार क्रम की अधिष्ठात्री संहारकाली से सबंधित है. महानिशा का प्रतिरूप शक्ति स्वरुप निशाकाली है जो की तीसरी पंक्ति बताती है, जब की चतुर्थ पंक्ति गुह्यकाली से सबंधित है. इस प्रकार श्लोक महाकाली के चतुर्बीजोक्त मन्त्र के बारे में विवरण देता है.
वस्तुतः यह मन्त्र अपने आप में मन्त्रराज है क्यों की यह साधक के जीवन के चार पुरुषार्थ युक्त पूर्ण जीवन प्रदान करने में समर्थ है. यह चार बीज महाकाली के चार विविध स्वरुप की शक्तियों से युक्त है, जहां भगवती दक्षिणकाली व्यक्ति के जीवन में आकर्षण, सम्मोहन आदि क्षेत्र में विशेष बल देती है वहीँ भगवती संहारकाली साधक के सभी शत्रुओ का स्तम्भन करती है. साथ ही साथ भगवती निशाकाली साधक के जीवन में यश एवं कीर्ति की प्राप्ति करवाती है एवं भगवती गुह्यकाली साधक के जीवन में विविध आध्यात्मिक पक्ष से सबंधित उन्नति के द्वार को खोल देती है. इस प्रकार यह मन्त्र साधक को विविध फल की प्राप्ति करवा देता है. लेकिन यूँ भी यह काल से सबंधित तथा समय के एक विशेष क्षण जहां पर महाकाली और भी तीव्र हो जाए तथा काल में शक्ति का प्रवाह अर्थात भगवती आद्याशक्ति का विशेष संचार तो ग्रहणकाल में ही संभव होता है. इस समय पे किये गए प्रयोग तथा साधना पद्धति व्यक्ति को विशेष सफलता प्रदान करने में समर्थ है. ग्रहण का समय अति विशेष होता है किसी भी मार्ग और मत के साधक के लिए. विशेष प्रक्रियाओ से निर्मित उर्जा जब ग्रहण समय में निसृत विशेष उर्जा के साथ संपर्क में आती है तो साधक को तीव्र गति से परिणाम की प्राप्ति होती है .
भगवती से सबंधित यही चतुर्बीज मन्त्र को अगर ग्रहण समय में जाप किया जाए तो साधक उपरोक्त विशेष लाभों को तो प्राप्त करता ही है लेकिन साथ ही साथ साधक के लिए यह एक अति विशेष प्रयोग में भी परावर्तित हो जाता है.
यह प्रयोग इस द्रष्टि से अति बेजोड है क्यों की यह इच्छापूर्ति प्रयोग है जिसे ग्रहण काल में ही किया जा सकता है. हर एक व्यक्ति के जीवन में अपनी विशेष इच्छा एवं आकांशा होती है, कई बार उसी इच्छा की पूर्ति के लिए कई प्रकारसे कोशिश करने पर भी तथा परिश्रम करने पर भी इच्छा की पूर्ति जब संभव नहीं होती तो व्यक्ति को दैवीय शक्तियों का आधार लेना चाहिए. अगर हम किसी भी इच्छा को रखते है जो की नैतिक द्रष्टि से उचित है तथा हमारे मन में किसी को भी अहित पहोचाने का विचार नहीं है तो उस इच्छा की पूर्ति तंत्र सम्मत है, तंत्र मार्ग एसी इछाओ की पूर्ति के लिए कई प्रकार के विशेष विधानों को अपने आप में समाये हुवे है. और फिर ऐसे विधानों के नगीने से सब से अनमोल रत्न भी इस साधना को कहा जाए तो भी यह अतिशियोक्ति नहीं होगी क्योंकी यह अति सहज एवं सरल विधान है जिसे कोई भी साधक कर सकता है.
यह विधान साधक को ग्रहण समय में करना चाहिए. साधक को यह प्रयोग ग्रहण समय में शुरू कर देना चाहिए, भले ही फिर ग्रहण समाप्त हो जाए लेकिन साधना चल सकती है, अर्थात अगर २० मिनिट का ग्रहण समय है तो उस समय में पूर्ण साधना प्रक्रिया कर लेना तो संभव नहीं है, लेकिन ग्रहण काल में उस साधना को शुरू कर देना चाहिए. फिर २० मिनिट से ज्यादा भी प्रक्रिया चलती रहे तब कोई समस्या नहीं है.
साधक स्नान आदि से निवृत हो कर उत्तर दिशा की तरफ मुख कर बैठ जाए. इसमें आसन वस्त्र आदि किसी भी प्रकार का दूसरा विधान नहीं है, साधक कोई भी आसन पर बैठ सकता है. साधक को सर्व प्रथम गुरुपूजन एवं गुरुमन्त्र का जाप कर सदगुरुदेव से साधना में सफलता के लिए आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए.
साधक को अपने सामने सरसों के तेल का एक दीपक जलाना है तथा अपने मन में मनोकामना को ३ बार बोलकर भगवती श्रीमहाकाली को तथा उनके चारों रूप का ध्यान कर साधक उनके चतुर्बीजमन्त्र का जाप करें. साधक को २१ माला मन्त्र का जाप करना चाहिए. साधक रुद्राक्ष माला मूंगामाला या शक्ति माला का प्रयोग कर सकता है. अगर साधक के पास यह माला न हो तो साधक बिना माला के भी यह प्रयोग कर सकता है.
क्रीं क्रीं क्रीं क्रीं फट्  
(OM KREENG KREENG KREENG KREENG PHAT)
मन्त्रजापपूर्ण होने पर साधक देवी को प्रणाम कर उनसे आशीर्वाद प्राप्ति की एवं सफलता प्राप्ति की प्रार्थना करे. इस प्रकार यह अति सहज प्रयोग पूर्ण होता है लेकिन मन्त्रजाप के काल में ही साधक इस मन्त्र की तीव्रता को अनुभव कर सकता है. साधक मन्त्र के विश्लेषण से ही अनुभव कर सकता है की यह प्रयोग कितना तीव्र है. साधक को ग्रहणकाल जैसे दुर्लभ योग का पूर्ण लाभ प्राप्त करना चाहिए तथा ऐसे दुर्लभ प्रयोग को सम्प्पन कर अपने जीवन के भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों पक्षों को पूर्ण रूप से उत्थान कर जीवन के सुख भोग एवं आनंद को प्राप्त करने की और गतिशील होना चाहिए.

****NPRU****