Sunday, September 16, 2012

तंत्र और प्रेत सिद्धि (TANTRA AUR PRET SIDDHI)

Field of tantra is full of limitless possibilities ……There is nothing within it which we can ignore by saying it as impossible. Vidhaans one superior to other, unfailing prayogs and unbelievable secrets!!!!! One name came in this series of secrets i.e. of Pret Siddhi……First of all we have to understand what are these prets……Physical body is the most dear and important carrier of soul. That’s why soul likes to remain as much as possible in this body and due to this only; yogis have given importance to physical body for purpose of sadhna. But this body has got its own limits and decorum. And when following this decorum, physical body reaches its last stage then soul is compelled to leave it which we term as death. After leaving physical body, soul in order to fulfil unfulfilled wishes, before acquiring subtle body creates one such body which we call as Vaasna Shareer(Body) or Pret Shareer. Actually, it is one such body which is created completely by Jeev Aatma on its own.Therfore its siddhi rather than being troublesome is favourable to sadhak accomplishing it since once such prets come under your control, they can do your work within moment.

Well it is different subject!!!!!Let’s concentrate on the subject again….Teaching on Mudra subject, Master once told me that to get riddance from life-death cycle , our sages and saints have given the description of 64 Yog aasan and 64 Mudras in various scriptures. Every aasan and its related Mudra has got its own special significance because their combination gives birth to special energy through which these prets ,present in ether, gains power to accomplish your works.

If seen from Tantric point of view, nature is the mixed form of three qualities Sat, Raj and Tam. But whereas these three Guna (qualities) are present in nature in mixed form, they have their own independent existence in universe too. Entire living world is divided into Bhu Mandal, Chandra Mandal and Surya Mandal and these three Mandals sequentially are rulers of Tamsik, Satvik and Raajsik qualities.

On left hand side of Bhu Mandal to Chandra Mandal, there is primacy of Tam Guna and on the right side; there is primacy of Raj Guna. In middle, where these two limits meet, we know it by name of Shunya Maarg which is used by Mahasiddh yogi and sanyasis for going from one place to other. Tamsik souls reside in Tama Guna situated on left side of Chandra Mandal which we know in materialistic world by names of Pret, Betaal and Pisaach.

There is one path parallel to Shunya maarg which is called Daamrottam Maha Path and this path is used by pret yonis for coming on this Bhu Lok (earth).And due to close proximity between these two paths, it is told that whenever you want to go by subtle body, then arrangement should be made in such a way that nobody wake you up in this duration because once deviated from path, then return is impossible. There is one path emerging from Tam Guna path of Prets which is called Maha Divyoodh Maarg because through this Maarg, Yaksha-Yakshini and Gandharv full of Raj qualities come of earth……..this Mahadaamri path and Maha Divyoodh path meet in the centre of Bhu Mandal. Therefore, sometimes it happens that instead of soul whose aavahan is done, some other soul comes because Daamri path is full of transmigration of these souls.

These are some basic facts related to Pret siddhi whose knowledge every sadhak should possess who wants to accomplish prets because it is one such yoni , ignorance about which can make you their servant rather than being their servant. But if these are accomplished successfully for once then in invisible form, they remain with you and not only they do desired work but invisible provides you security and they do not manifest themselves unless their aavahan is done by their master. Once I get permission, I will give its related prayog and sadhna through which sadhna is accomplished definitely.
Up till then

Nikhil Pranaam

तंत्र का क्षेत्र असीम सम्भावनाओं से भरा पड़ा है....इसमें ऐसा कुछ नहीं है जिसे असंभव कह कर नजरअंदाज किया जा सके. एक से बढकर एक विधान, अचूक प्रयोग और अविश्वसनीय रहस्य!!!!! ऐसे ही रहस्यों की श्रंखला में एक नाम आता है प्रेत सिद्धि का.....
  सबसे पहले हमें यह समझना होगा की यह प्रेत होते क्या है....स्थूल शरीर आत्मा का सबसे प्रिय और महत्वपूर्ण वाहक है इसीलिए आत्मा अधिक से अधिक अवधि के लिए इसी शरीर में रहना पसंद करती है और इसीलिए योगियों ने भी साधना के लिए स्थूल शरीर को ही महत्व दिया पर इस देह की अपनी एक सीमा और मर्यादा है और इसी मर्यादा का पालन करते हुए भौतिक देह जब अपनी अंतिम सीमा तक पहुंच जाती है तो आत्मा को विवश होकर इसका परित्याग करना पड़ता है जिसे हम मृत्यु कहते है. स्थूल देह को त्यागने के पश्चात अपनी अतृप्त वासनाओं को पूरा करने के लिए आत्मा सूक्ष्म शरीर धारण करने से पहले एक ऐसे शरीर का निर्माण करती है जिसे हम वासना शरीर या प्रेत शरीर कहते है. वास्तिवकता तो यह है की यह एक ऐसा शरीर है जिसका निर्माण स्वतंत्र रूप से पूर्णतः जीवात्मा ही करती है इसिलए इसकी सिद्धि कष्टदायक ना होकर इसको सिद्ध करने वाले साधक के अनुकूल होती है क्योंकि ऐसे प्रेत यदि आपके वश में आ जाये तो यह आपका हर काम क्षण भर में कर देते हैं.
 खैर यह एक दूसरा विषय है!!!!! विषय पर पुनः ध्यान केंद्रित करते हुए......मुद्राओं के विषय में समझाते हुए मास्टर ने एक बार बताया था की जन्म मरण से मुक्त होने के लिए हमारे ऋषि मुनियों ने ८४ योगासन और ८४ ही मुद्राओं का अलग-अलग ग्रंथों में विवरण दिया है. हर आसन और उससे सम्बंधित मुद्रा का अपना एक विशेष महत्व है क्योंकि इनके संयोजन से एक विशेष उर्जा का जन्म होता है जिससे ईथर में उपस्थित यह प्रेत आपके कार्यों को पूरा करने के लिए शक्ति ग्रहण करते हैं.
 तांत्रिक द्रष्टि से देखा जाए तो सत्व, रज, तम इन तीन गुणों का मिश्रित रूप ही प्रकृति है पर यह तीनों गुण इस प्रकृति में जहाँ मिश्रित रूप से व्याप्त हैं वहां इसी ब्रह्मांड में इनकी अपनी अपनी स्वतंत्र सत्ता भी है. सम्पूर्ण जीवित जगत भूमंडल, चन्द्रमण्डल और सूर्यमंडल इन तीनों मंडलों में बंटा हुआ है और यह तीनों मंडल क्रम अनुसार तामसिक, सात्विक और राजसिक गुणों के अधिष्ठाता है.
भूमंडल से चन्द्रमंडल के बायीं ओर तमोगुण तथा दायीं ओर रजोगुण की प्रधानता है. मध्य में जहाँ इन दोनों की सीमाएं मिलती है उसे हम शुन्य मार्ग के नाम से जानते हैं जिसका उपयोग महासिद्ध योगी सन्यासी एक स्थान से दूसरे स्थान पर आने जाने के लिए करते हैं. चंद्रमंडल के बायीं ओर स्थित तमोगुण में तामसिक आत्माएं निवास करती हैं जिन्हें भौतिक जगत में हम प्रेत, बेताल, पिशाच इत्यादि नामों से जानते हैं.
 इसी शून्य मार्ग के समांतर एक ओर पथ है जिसे डामरोत्तम महा पथ कहते है ओर इसी पथ का उपयोग यह प्रेत योनियां भूलोक पर आने के लिए करती है ओर इन दोनों पथों के इतने पास होने की वजह से ही हमेशा समझाया जाता है की जब भी अपने सूक्ष्म शरीर से कहीं जाना हो तो ऐसी व्यवस्था करके जाओ की कोई आपको उस अवधि में उठाये नहीं क्योकिं एक बार पथ भटक गए तो वापसी संभव नहीं होती. प्रेतों के तमोगुण मार्ग से एक ओर मार्ग निकलता है जिसे महादिव्यौध मार्ग कहते हैं क्योंकि इसी मार्ग के रास्ते राजसी गुण सम्पन्न यक्ष-यक्षिणी, गन्धर्व पृथ्वी लोक पर आते है....इस महाडामरी पथ और महादिव्यौध पथ का संगम भूमंडल के केन्द्र में होता है इसीलिए कभी कभी ऐसा होता है की जिस आत्मा का आवाहन किया जाए उसकी जगह कोई और आत्मा आ जाती है क्योंकि डामरी पथ इन आत्माओं के आवागमन से भरा रहता है.
 प्रेत सिद्धि से सम्बंधित यह कुछ मूल तथ्य हैं जिनका ज्ञान हर उस साधक को होना चाहिए जो प्रेत को सिद्ध करना चाहता है क्योंकि यह एक ऐसी योनी हैं जिससे संबंधित अज्ञान उसको आपका नहीं अपितु आपको उसका दास बना सकती है पर यदि एक बार सफलतापूर्वक इसे साध लिया तो यह अप्रत्क्ष रूप से सदा आपके साथ रहते है और ना सिर्फ आपके मनोवांछित काम करते है बल्कि अदृष रूप से हमेशा आपकी रक्षा भी करते हैं और तब तक सामने नहीं आते जब तक इनके स्वामी द्वारा इनका आवाहन ना किया जाये. अनुमति मिलने पर इससे सम्बंधित प्रयोग और साधना भी दूंगी जिससे प्रेत सिद्ध होता ही है.
तब तक के लिए......
निखिल प्रणाम


Gyanendra Sharma said...

Kya main bhi yeh yantra aur vidhan pa sakta hun?

raj say's said...

kripya mujhe pret sadhna ki puri vidhi aur mantra dene ki kripa karen.