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Thursday, September 29, 2011

Vashikaran Prayog through Bhagwaan Ganesh Sadhana


"वशीकरण एक मंत्र  हैं तज दे वचन  कठोर ", पर  मीठी  बोलने  वाले  को या  तो चापलूस कहा जा ता हैं या फिर कमजोरी  की संज्ञा  दी जाने लगी  हैं , तो अब क्या  किया  जाये , यह सत्य हैं पौरुषता   और जीवन पर व्यक्ति का दृढ़  नियंत्रण   होना ही  चाहिए , पर  मधुर वाणी का  अपना ही सौन्दर्य हैं ही , पर  कभी कभी परिस्थिति ऐसी निर्मित हो जा ती हैं  की  आपके सभी  तीर निशाने पर नहीं लग रहे हो , तब आप क्या करेंगे  
कितना समझाए , कितना मनाये , पर जब आपका  कोई प्रिय आपकी बात समझने  को तैयार ही न  हो रहा हो ,और ठीक  ऐसा ही   ही तब जब हमारा कोई सहयोगी  हमारी कार्यों  में अपेक्षित  सहयोग  न दे रहा हो , तब क्या करें . जहाँ साम  दाम दंड  भेद सभी   विफल  होते  दिख रहे हो ,  तब जीवन  की , अपने परिवार की , अपनी खुशियों की सुरक्षा करने के लिए यदि आप इन  प्रयोगों   का सहारा ले ते हैं तो यह किसीभी दृष्टी से अनुचित  नहीं होगा , हम किसी की ख़ुशी छीन तो नहीं रहे हैं न 
 सदगुरुदेव   कहते हैं  इन प्रयोंगो की एक अपनी  ही सत्ता हैं एक अपना  ही संसार हैं और  उन्हें हेय दृष्टी से नहीं देखना  चाहिए , यदि हम किसी  की बेबसी और कमजोरो का फायदा यदि  इन प्रयोगों के माध्यम से नहीं उठा  रहे  हैं तो , यदि अपने  जीवन को अनुकूल बना रहे हो तो ..

सदगुरुदेव ने अनेको प्रयोग इस सन्दर्भ  में  दिए हैं  ही आप मंत्र तंत्र यन्त्र विज्ञानं  के अनेको अंक में देख सकते हैं

किसी भी प्रयोग को करते समय आपकी मनोभाव कैसी  हैं उस पर  ही तो टिका  हैं साधना  का सौन्दर्य , और  हम सभी सदगुरुदेव के  आत्मंश  हैं  तो भला  हम कभी कैसे ,सामाजिक मर्यादा , के अनुचित कोई काम करेंगे , सदगुरुदेव  भगवान् ने हमें हमेशा  एक सुसंश्कारित  ,सभ्य , योग्य  और स्नेह भरे साधक  बनने  को कहाँ हैं  ,न  की अपने घमंड में  डूबे हुए गलिया  दे दे कर बात  करने वाले , पर हमें यह भी नहीं भूलना  चाहिए  की  उन्होंने सर्वाधिक  किसी व्यक्ति का  उदाहरण  दिया हैं तो वह भगवान् श्री कृष्ण  का  ही वह इसलिए  की  एक सीमा के बाद .. फिर ... 

हमसभी के  लिए  तो हमारे पिता (सदगुरुदेव )का  जीवन से ज्यादा और  क्या मार्ग दर्शन दे सकता हैं . उनके  जीवन का एक एक पन्ना , एक एक अक्षर , एक एक पल  हमारे लिए  तो ही था  न ..उनका पवित्र जीवन स्वयं  ही हम बच्चो के जीवन की दिशा  को मार्ग दिखाते  रहेगा  , इसी भावना  को सामने  रख कर  यह अत्यधिक सरल   प्रयोग  आप सभी  भाईबहिनों के लिए .. 

ॐ ग्लौं  रक्त गणपतये नमः

साधनात्मक नियम :
·         आपकी दिशा  :उत्तर/पूर्व होनी चाहिए .
·         यह प्रयोग आप , चूँकि यह  भगवान् गणेश से सम्बंधित हैं  अतः बुध वार से प्रारंभ किया  जा सकता हैं . 
·         आसन और  वस्त्र लाल  रंग के  होना चाहिए 
·         .इस मंत्र का मूंगा की माला से   होना   चाहिए .
·         आपको प्रतिदिन १० माला मंत्र जप १० दिन करने चाहिए ,
इस प्रयोग को सफलता  पूर्वक  करने के बाद  जब ज़रूर पड़े तब इच्छित व्यक्ति की तस्वीर सामने रखते हुए १० माला का इस मंत्र से जाप करने पर व्यक्ति मनोकुल हो जाता है
आज के लिए बस इतना ही 
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        “vashikaran ek mantra hain taj  de bachan kathor “  roughly meaning is that ,if  you are a  soft and polite spoken  so definitely people  attracts towards   you,   so secret of  vashikaran is that  avoid  harsh and  rough  word  to anyone., but   the person who speak  very  softly sweetly often consider weak. Or  this is  consider as a sign of his/her weakness. It’s  true that person should  speak forcefully   but  sweet  spoken  style  has a own beauty . but sometimes such a  scene or circumstances created that all your effort fails  or  not producing the result. Than what you will  do.
 How many  times  or how much ,you can give  explanation to your near and dear one  but when he/she  refused to listen. And  that also applicable  to   your colleague  , in work place  ,when he  is not willing to help you.  Than what to do?? .where nothing seems to work, then to protect your family,  your life ‘s happiness , if you go for  such a prayog than  nothing  wrong in it . we are  not snatching happiness  from any other.
Sadgurudev  used to say that  theses  prayog  has  their  own value , a unique  world  and  should  not consider that  with   low respect. If we are not taking undue advantage  of any one’s  problem and  circumstances , we are  just  making our life little easier than..
Sadgurudev   has  given so many prayog in this  relation   in the  magazine mantra  tantra yantra vigyan. You can see your self.
While attempting any  prayog,   what is  your feeling  and will  and  mindset  is  the basic foundation on  that depends the beauty of sadhana, and if we are  the  soul part  of Sadgurudev ji  than  how can, we ever  do  any  work .that is  not as per common  society rules, Sadgurudev Bhagvaan always advised  us  to be a sadhak who  well cultured, polite , and  filled with sneh/love, so he never advocated that  we should be like those sadhak who  used to abuse any body and  totally immersed in their  own ego. But  this also be remember that   the one person  about whom, he  give many example is  Bhagvaan shri Krishna , that is  only ,,since up to a point  everything is fine  and ok , if any one crosses the limit than…
 For all of us  what more  be valuable,  what  will be more guiding star  compare to our common father life (Sadgurudev). each moment ,each minute, second , and each page of his divine  life is only and only  for us. his  such a pure divine  life itself a  guide light  for all of  his children  like us, keeping this  feeling  this simple prayog  for all  of you.
 Om  gloum  rakt   ganpatye   namah

General  rules:
·         Direction should be  north east facing.
·         As this  prayog is related to  Bhagvaan ganesh   than  start with any Wednesday.
·         Clothes and  aasan  should be  of red color.
·         Each day you have  to  chant 10 round of rosary (10 mala)per day  for  10 days.
·         Mantra jap should be done by  red colored  munga  mala.
When this  prayog successfully completed  than  place  any desired person’s photograph in front of you  and do only 10  round of rosary , than  he will be  more cooperative to you.
 This is enough for today
****NPRU****

Wednesday, September 28, 2011

TANTRA KOUMUDI- RAHASYA KHAND


अत्यंत हर्ष के साथ आपको यह जानकारी देना चाहूँगा की तन्त्र कौमुदी के प्रथम अंक रहस्य खंड का प्रकाशन शीघ्र ही होने जा रहा है. हमारा विचार है की इसे सन्यास दिवस पर वोमिचित कर दिया जाए. इस अंक मे जैसे शीर्षक इंगित करता है उसी प्रकार से तन्त्र जगत के अत्यधिक दुर्लभ व् अप्रकाशित रहस्यों को आप सब के मध्य रखने का यह प्रयास है, जिसमे उच्चतम तन्त्र साधनाओ का समावेश किया गया है. इस खंड हमने मुख्य रूप से  महाविद्या साधनाओ से सबंधित गोपनीय रहस्य, महालक्ष्मी की दुर्लभ साधनाओ, विविध शक्ति की अज्ञात तन्त्र साधनाए का समावेश किया है, इसके अनुपूरक, सबंधित प्रक्रियाओ से जुड़े सभी रहस्यों को भी जोड़ा गया है जो की अत्यधिक गुप्त रूप से गुरुमुखी प्रणाली से गतिशील है. साथ ही साथ जो देवी देवता के विभ्भिन रूप जिनके बारे मे सामान्य जनमानस को पता भी नहीं है तथा उनकी साधना पद्धतियो को भी जोड़ने का प्रयास किया गया है. यंत्रो के बारे मे मात्र विवरण ना देते हुए, प्रकाशित साधनाओ मे जहा यन्त्र का विवरण है उससे सबंधित निर्माण, प्रतिष्ठा और चेतना विधि को भी स्पष्ट किया जाएगा. पारद विज्ञान तन्त्र से सबंधित कई प्रकार के रहस्यों को इस खंड मे प्रथम बार उजागर किया जाएगा जो की मात्र उच्चकोटि के सन्यासीओ के मध्य ही प्रचलित रहे है, उन दुर्लभ प्रक्रियाओ का भी इस खंड मे पहली बार प्रकाशन होगा. साधको के मध्य आज सूर्य विज्ञान से सबंधित साहित्य की कमी मूल रूप से देखि जाती है और यह विद्या को जनमानस से लुप्त ही कहा जा सकता है इसे ध्यान मे रखते हुए सूर्य विज्ञान तंत्र से सबंधित कई रहस्यों को भी इस अंक मे जोड़ा गया है. इन मुख्य विषयो मे वनस्पति शास्त्र के प्रयोग भी सामिल है. इसके अलावा भी साधना जगत के कई गोपनीय पक्ष और उनके रहस्यों को प्रकाश मे लाने का प्रयास किया है. Journal size मे यह रहस्य खंड अभी मुद्रण की प्रक्रिया मे भेजा जा चूका है.बड़े आकार के  450 पेजों की इस पुस्तक का शुल्क 65  $ ( US Dollars ) / 3200 Indian rupees रखा गया है. हमारे ब्लॉग/ याहू ग्रुप तथा facebook के भाई बहेनो को इस पुस्तक को उपलब्ध करने मे प्राथमिकता दी जाएगी. साथ ही साथ प्यारे सभी भाई बहेन जो की ब्लॉग/ याहू ग्रुप तथा facebook group के सभ्य है उन्हें शुल्क मे अवहार दिया जाएगा जिससे आप सभी सभ्यो के लिए इस खंड का शुल्क 2500 Indian rupees / 51 US $ है. आशा करता हू की आपकी साधनात्मक प्रगति मे यह प्रथम खंड साधना जगत के कई रहस्यों को उजागर कर आपकी आशाओ पर खरा उतरेगा.
जय सदगुरुदेव
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I feel pleased to share this information with you that very soon first volume of the Tantra Kaumudi is going to be published. We have a thought to release this on Sanyash Divas. As title indicates, in this volume it is an effort to keep very rare and unpublished secrets of the sadhana world in front of you which includes rare tantra sadhanas. In this volume rare secrets of mahavidya sadhanas, unknown lakshmi sadhanas various shakti sadhana of unknown tantra processes are included. With supplement of this, all the secrets related to processes are provided which are secretly running through Guru-disciple tradition. With this, to attach sadhanas about various unknown to the general public forms of gods and goddesses has also been involved.  Not just a summery about yantras but where there is yantra process mentioned in the published sadhana of the book, related process to create establish and  activation processes are also been given. About paarad vigyan tantra; there are so many secrets coming in this volume which had been famous in between highest accomplished sanyashi, those rare processes are also been included.  It is always a lack of material for the sadhaka to proceed in surya vigyan tantra and this knowledge could be classified as extinct in general people. Keeping this in mind, many secrets related to surya vigyan tantra has also been included.  Among these main topics, processes of vanaspati (plants and ayurveda) even have the place. Apart from this we have tried to reveal secrets of various fields of tantra. Journal size this volume has been started with the printing process. The price of this book would be 65 $ (US Dollars) / 3200 Indian Rupees( for the book of 450 big sizes pages).  Our blog/group and facebook brothers and sister will be given priority for the book to be available. With that beloved brothers and sisters who are members of the Blog / yahoo group / facebook group will have a discounted rate which is 2500 Indian Rupees or 51 US $. With a hope that this first volume will reveal many secrets and mysteries of sadhana world for your sadhana progress…
Jai sadgurudev
****NPRU****

Tuesday, September 27, 2011

FOR HIGH INCOME- RATIPRIYA SADHNA


इस युग मे धन की आवश्यकता कदम कदम पर पड़ती है. जीवन मे धन और ऐश्वर्य की प्राप्ति हमें हो पाए और हमारे भौतिक और आध्यात्मिक पक्ष मे किसी भी तरह की बाधा ना आए यह चिंतन कोई गलत नहीं है. यु यहाँ पर धन प्राप्ति से सबंधित प्रयोगों को देने का उद्देश्य भी यही है की व्यक्ति अपनी धन सबंधी समस्याओ का निराकरण प्राप्त कर सके.
यक्षिणी व् अप्सराओ की साधना यु इस द्रष्टि से महत्वपूर्ण है, कई लोगो को ये कहते सुना है की जिनकी शादी हो गयी हो उन्हें इन साधनाओ से दूर रहना चाहिए. ये बात तथ्य हिन् है. इनकी साधनाओ के कई विधान है जिनमे कुछ एक विधान सन्याशी साधको के लिए ही ज्यादा योग्य है लेकिन उन कुछ विधानों के सबंध से इनकी सभी साधनाओ के बारे मे ये कहना योग्य नहीं है की यह साधना गृहस्थों के लिए हे ही नहीं. तन्त्र मे भोग पक्ष और मोक्ष पक्ष को सामान रूप से महत्व दिया गया है. भोग का अर्थ सिर्फ शारीरिक धरातल पर नहीं होता. भोग का अर्थ है उन्नति पूर्वक अपने भौतिक जीवन को पूर्ण रूप से जीना. भौतिकता का आनंद लेना. और उसी क्रम मे कई देवी देवता या देव वर्ग सहायक होते है, जिनमे अप्सरा एवं यक्षिणी दोनों का समावेश होता है. रति प्रिया यु एक देव वर्ग की यक्षिणी का नाम है जो की अपने साधक को शीघ्र फल देने मे सक्षम है. आदि काल से इनकी साधनाओ का प्रचालन धन व् ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए होता आ रहा है. इसके लिए कोई ज़रुरी नही है की यक्षिणी आ कर आपको खुद ही सोने के सिक्के दे जाए. वरन वह तो एसी परिस्थितियो का निर्माण कर देती है की साधक को अपने आप ही धन और आय के स्त्रोत मिलते रहते है, अपने आप ही परिस्थिति मे बदलाव आने लगता है, रुका हुआ धन प्राप्त होता है, नोकरी मिलती है या मंद हुआ व्यापर वापस चलने लगता है, कहने का अर्थ यह है की इस साधना को करने पर किसी भी रूप मे यक्षिणी आर्थिक उन्नति का मार्ग खोल देती है, जिससे साधक के धन सबंधी सभी प्रश्नों का निराकरण प्राप्त होता है.
इस साधना को शुक्रवार या रविवार की रात्रि मे १० बजे के बाद शुरू करना है. इसके लिए साधक रुद्राक्ष या स्फटिक माला का उपयोग कर सकता है. किसी भी वस्त्रों का चुनाव करने के लिए साधक स्वतन्त्र है. दिशा उत्तर या पूर्व रहे. साधक को इत्र लगाना चाहिए. मिठाई का भोग लगाए जो की मंत्र जाप के बाद खुद ग्रहण करना चाहिए. इसके बाद मन ही मन रतिप्रिया को प्रिया या मित्र रूप मे मदद करने के लिए निवेदन (प्रार्थना नहीं) करना चाहिए.
इसके बाद साधक निम्न मंत्र की ३ माला जाप करे.
ओम ह्रीं रतिप्रिये नम:
यह क्रम सिर्फ ८ दिन करना है. दिखने मे ये भले ही साधारण साधना लगे पर इसका प्रभाव अचूक है. ८ दिन बाद माला को धारण कर ले और एक महीने बाद नदी या तालाब मे विसर्जित कर दे.
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n this era one needs money at every step of life. The thought of being prosperous to stop obstacles in our material and spiritual life is not wrong from any view. This way, to give processes related to the monetary problems are part of the objective that sadhak can have solutions of their problems.


Sadhana of yakshini and apsara are important from this point of view, heard from many people that married people should stay far from these sadhana. This is not a fact. There are so many processes related to them in which few peocesses are only suitable for sanyashi sadhaka but relation to those few processes it is wrong to say that these sadhanas are not for married people. In tantra bhoga and moksha have equal significance. The meaning of bhoga is not only in body pleasure. The meaning of bhoga is to progress in the material life with living it at its best. To have the joy of material life. In this relation, there are so many god goddesses and demy gods who may help, including apsara and yakshini both.

Rati Priya is classified under demy goddess who is capable to benefit their sadhaka quickly. From long time their sadhana has remained famous to have prosperity. It is not essential in this sadhana that yakshini herself will come to you and give gold coins. But actually, she creates situations that lead sadhaka to have prosperity itself. Conditions get change, the money traped will release, getting a job orr slow business will have a bust, the base meaning is in one or another way, yakshini opens the gate of fortune for prosperity development by which sadhaka will have answers for all his monetary troubles.

This sadhana could be start after 10pm of Friday or Sunday. For this sadhana, sadhak can use rudraksha or sfatika rosary. Cloth could be any. Direction should be north or east. Sadhak should use perfume. Offer sweets which should be taken by sadhaka only when mantra chanting is done. After that sadhaka should request (not pray) mentally to help in form of lover or friend

After that sadhak should chant 3 rosaries of the following mantra

Om hreem Rati Priye namah

This process should be done for 8 nights. Though it seems like ordinary process but it have a sharp result. After 8 days wear that rosay around neck for 1 month and then drop it in river or pond.
****NPRU****

Monday, September 26, 2011

SOUBHAGYAVARDHAK SHRI KRISHNA PRAYOG


भाग्य का अर्थ है प्रारब्ध रचित. हमारे कर्मो के अनुसार हमारे जीवन की जिस गति का निर्माण होता है वही है भाग्य. उसी के अनुसार हमारे जीवन के काल खंड मे घटनाओ का एक क्रम बनता है जिसमे अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियो का समावेश होता है और वही हमारा जीवन है. हमारे लिए जो भी अनुकूल होता है उसे हम सौभाग्य का प्रतीक मानते है. उसी क्रम मे मनुष्य अपनी गति के अनुसार सौभाग्य को प्राप्त करता है.
कर्म बंधन से मुक्त होने के लिए ही तन्त्र का चयन आदि काल से रहा है. किस प्रकार से प्रकृति को अपना सहयोगी बनाया जाये यही मूल चिंतन रहा. दुर्भाग्य को सौभाग्य मे बदलने के लिए कई प्रकार के विधानों का निर्माण हुआ. उसी प्रकार सौभाग्य की वृद्धि के लिए भी सरल विधानों का संकलन हुआ. भाग्य आपके अनुकूल है तो जीवन भी आपका अनुकूल ही रहेगा. श्रीकृष्ण का व्यक्तीत्व हमेशा मायामाय रहा है, सम्पूर्ण सृष्टि को अपने अंदर समाहित किए हुए भी वह जीवन भर अत्यधिक सामान्य बने रहे. उन्होंने योग का प्रचार किया और कर्म को समजाने के लिए मानव जन्म लिया. लेकिन साथ ही साथ उस कर्म से प्राप्त भाग्य की वृद्धि के लिए भी कई विधानों का समावेश किया था. श्रीकृष्ण से सबंधित कई ग्रन्थ है जो की अब लुप्त है जिसमे योग, तन्त्र, पारद, सूर्य विज्ञान व् तन्त्र से सबंधित साधनाए सामिल है. ऐसा ही एक ग्रन्थ है कृष्णयमल. जिसमे उन सरल व् अचूक प्रयोगों का समावेश किया गया है जो की कृष्ण से सबंधित अत्यधिक तीव्र विधान है.
इसी क्रम मे जीवन मे सौभाग्य की वृद्धि के लिए भी एक अत्यधिक प्रभावकारी प्रयोग है जो की आप सब के मध्य रखना चाहूँगा
इस साधना को दिन या रात किसी भी समय किया जा सकता है, लेकिन समय रोज एक ही रहे. इसके साथ ही साथ मंत्रजाप की संख्या भी रोज एक ही रहे. साधक इस साधना को किसी भी दिन शुरू कर सकते है
वस्त्र सफ़ेद रहे दिशा उत्तर, साधक अपने सामने कृष्ण का विराट रूप का कोई चित्र स्थापित करे और सामान्य पूजन करे उसके बाद निम्न मंत्र की ३, ७ या २१ माला मंत्र जाप करे. इसमें स्फटिक माला का उपयोग किया जाता है.
जगतगुरु सर्व सुख सौभाग्य वृद्धिं नमः

मन्त्र जाप के पहले और बाद मे गुरु मंत्र की १ – १ माला करना ना भूले.
यह क्रम २१ दिन तक चलता रहे. साधक इन २१ दिनों मे परिणामों का अनुभव खुद ही करने लगेगा, और २१ दिनों बाद सौभाग्य की वृद्धि सभी दिशाओ मे नज़र आएगी चाहे वह सबंध, व्यापार, सहकार या फिर किसी भी पक्ष से सबंधित हो.
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Fate is composing of destiny. The way of our life which has been designed based on our deeds is the fate. This way only, with favorable and non favorable situations, there becomes a series of incidents in our live and that is our life. Whatever is ‘in-favor’ to us, we count it as good fortune. With this way human receives good fortune based on his deeds.


To get relief from ‘karma bandhana’ the selection of the tantra had remained from ancient time. How nature could be associate for our benefit had remained major objective. Innovations of processes to convert bad fortune to good came to existence. This way to increase good fortune few easy processes even came to Compilation of them. If your fate is in your favour, your life will also be in your favour. The personality of shri Krishna had always remained mysterious, while merging whole universe in himself, he lived completely normal for his complete life time. He promoted various yoga and took birth to make us understand about karma. But with this, he even described processes for the development of good fortune generated through karma. There are so many scriptures related to shri Krishna which are now extinct including processes related to yoga, tantra, paarad vigyana, Surya vigyana & tantra. One of such scripture is Krishnayamal. In which those processes are included which are realted to krishana and very effective in nature.

In this way, there is one very effective process for the development of good fortune which I would like to share with you all.

This sadhana could be done at any time of day or night, but daily the time should remain same. With that no. of mantra chanting should also remain same daily. Sadhak can start this sadhana from any of the day.

Cloth should be white in colour and north direction, sadhak should place picture of Krishna with his virat swaroop in front of him and after doing normal poojan of the same, one should chant following mantra’s 3, 7 or 21 rosaries. In this process sfatik rosary should be brought in use.

Om Jagataguru Sarv Sukh Saubhagya Vruddhim namah

One should not forget to chant one rosary of guru mantra after and before mantra chanting is done.

This procedure should be continuing for 21 days. Sadhak will start experiencing results of this sadhana in these 21 days, and after 21 days increment in good fortune will come from all directions however it may b related to anything for example relations, business, co-operation or it may be anything else.
****NPRU****

Saturday, September 24, 2011

VIGYAAN VA TANTRA BHED- 4(RAS VIGYAN VA TANTRA-2)


पारद क्षेत्र से सबंधित पुरातन विज्ञान नियमों के बारे मे हमने पिछले लेख मे जाना. यहाँ पर पारद विज्ञान के बहुचर्चित शब्द वेधन के बारे मे जानना आवश्यक है. सामान्य रूप से वेधन का अर्थ रस विज्ञान के क्षेत्र मे रूपांतरण से सबंधित है. लेकिन इसके साथ ही साथ वेध के गूढार्थ है. वेध से पारद के परिवर्तन करने की क्षमता का पता चलता है. परिवर्तन के साथ ही साथ एक नया तत्व सृजन के रूप मे भी सामने आता है. मृत्यु के बाद मनुष्य का शरीर पंचमहाभूत मे विलीन हो जाता है और उसके साथ ही साथ आत्म तत्व से उसका वापस जन्म लेना एक सृजन की प्रक्रिया है. लेकिन यूँ  मूलतः ये सृजन, परिवर्तन के नियम से ही आकार लेता है. वेध की क्षमता जीस प्रकार रस मे होती है उसी प्रकार चेतना धारण करने वाले सभी तत्वों मे वेध क्षमता होती है. वो क्षमता बीज मे समाहित रहती है, उसी द्वारा वेध कर के मनुष्य अपने जैसे किसी मनुष्य को जन्म दे सकता है. उस बीज मे निहित वेध क्षमता के माध्यम से वह एक परिवर्तन करता है, जिससे सृजन संभव हो पता है. पारद तो शिव बिंदु है, इसी लिए उसमे सब से ज्यादा वेधन क्षमता का होना स्वाभाविक है यही नियम से वह अपने से अनंतगुना वेध कर सकता है, मतलब की परिवर्तन कर सकता है. वेध के पांच प्रकार है लेप, क्षेप ,कूप, शब्द और धूम्र, इसके बारे मे संक्षिप्त वर्णन पहले ही दे दिया गया था. वेध की क्षमता का एक निश्चित स्तर तो हमारे पास होता है, लेकिन पारद से उसी वेध क्षमता को आगे बढ़ाया जाता है और अनंतगुना किया जा सकता है. धातु रूपांतरण के पक्ष मे यही तथ्य है की अगर पारद धातु का वेध कर उसकी क्षमता को बढ़ा सकता है तो वह मनुष्य का भी आतंरिक वेध कर उसकी क्षमता को बढ़ा सकता है. इसी लिए पारद के विविध कल्प है जिसके बारे मे रससिद्ध नागार्जुन ने कहा है की पारद के विशेष कल्पों का सेवन करने वाले व्यक्ति के मूत्र से भी वेधन संभव है. रस सिद्ध नित्यानाथ ने तो यहाँ तक कहा है की ऐसे व्यक्तिओ के पसीने मात्र से भी वेध संभव हो जाता है. उनका तात्पर्य तो मनुष्य मे वेधन क्षमता का विस्तार पारद किस हद तक कर सकता है ये बताना था लेकिन इन प्रक्रियाओ को हमने स्वर्ण निर्माण से जोड़ दिया है. वस्तुतः यह पारद विज्ञान या रस विज्ञान पूर्णतः शुद्दीकरण, वेधन और गुणाधान के पुरातन वैज्ञानिक नियमों पर ही आधारित है. आगे के लेख मे हम रस के तन्त्र पक्ष पर कुछ चर्चा करेंगे.
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We understood about concepts of ancient science related to the paarad field in last article. Here it is essential to know about one famous word in paarad field ‘Vedhana’. In general the term in rasa vigyana is related to the transformation. But with that there are secret meanings related to vedha. With vedh, the power of mercury could be measure. With transformation a new thing comes to the existence in the form of creation. After death, human body get dissolve in five basic elements and with that holding aatma tatva the new birth is the process of creation only. But in actual, this creation does take place with the bounding concepts of transformation only.  The way rasa have power of transformation, the same way every conscious being owns the power of transformation. What so ever holds that power of transformation, with the same performing vedha human can give birth to another human. One creates a transformation of the beeja, with which creation becomes possible.  Paarad is shiv bindu, this way; it is natural to have biggest power of vedhana. With the same concept it can transform or in other words can do vedhana infinite times than its own.  Vedha are basically five types; lep, kshep, kup, shabd and dhumra about which a short description has previously given. A limited stage of vedhana power we humans even do have, but with paarad the same vedhana power could be increase and could be taken to infinite time. On the metal transformation side, the final fact is the parad which can increase capacity and power of metals through vedha therefore it can cause inner vedhana in humans and increase our capacity of infinite time too.  For which there are so many paarad kalpa about which ras siddha nagarjuna said that the one who consume special kalpas of paarad even urine of that person can cause vedhana. Ras siddh nityanath said that the sweat of such person even can cause vedha. Their aim was to describe about paarad’s capacity to transform human powers but we relate these processes with metal preparations. Literally, this paarad vigyan / ras vigyan is completely depended on the ancient scientific concepts and rules of complete purifications, vedhana and gunadhana (power increment). In next part we’ll discuss about tantra side of ras.
****NPRU****

Thursday, September 22, 2011

VIGYAN VA TANTRA-3 (RAS VIGYAN VA TANTRA-1)



पिछले दो लेखो मे हमने ये जाना की विज्ञान क्या है, विज्ञान की ज्ञानप्राप्ति के पीछे का चिंतन, विज्ञान का मूल क्या है, प्रकृतिभेद और विज्ञान और तन्त्र का आपसमे क्या सबंध है और इन विषयो की महत्ता किस प्रकार से है. इस शृंखला मे विज्ञान और उसके तन्त्र भेद पर सामान्य प्रकाश डालना ही मुख्य उद्देश्य है, पूर्ण रूप से एक एक विज्ञान और उसके तन्त्र भेद को समजने के लिए पूरा जीवन भी कम पड़ जाए, ये कोई दो दिन मे पूर्णता प्राप्त करने की वस्तु नहीं है. रहस्य के प्रति आकर्षण होना मनुष्य का सामान्य स्वभाव है, लेकिन उसे समजने के लिए जो समर्पण, ललक, धैर्य और कड़ी मेहनत की ज़रूरत होती है उसके बारे मे सोच विचार कर के ही साधक अपने बारे मे खुद मंथन कर ले. आज के युग मे सम्पूर्ण रूप से साधक का भी दोष नही है, जिनको इन विद्या का ज्ञान है वो बताने को तैयार नहीं है और जिनको साधना का पहला अक्षर भी ज्ञात नही है उनके पीछे हजारो लोग दौड के खड़े हो जाते है चने के जाड़ पर बिठाने के लिए. सिखने वाला मे इतनी हिम्मत होनी चाहिए की वो दावा कर सके की वो विद्याप्राप्ति का अधिकारी है लेकिन जिनके पास सिखने समजने के लिए जाए उसके पास कमसे कम ५० ग्राम तो ज्ञान हो, अंधी दौड से पूर्णता का भ्रम मिल सकता है लेकिन पूर्णता नहीं. पूर्णता तो कड़ी महेनत मात्र से मिलती है वो भी सद्गुरु से. खेर, विषयान्तर के लिए माफ़ी चाहूँगा, आज के युग मे हमारी प्राचीन धरोहर की जो दुर्दशा सदगुरुदेव की आँखों ने देखि थि, वही वेदना युक्त आँखे याद आजाती है तो रोक नही सकता.
इसी शृंखला मे कुछ महत्वपूर्ण विज्ञान और उनके तन्त्र भेद के बारे मे प्राथमिक चर्चा करेंगे, जैसे की काल व् क्षण, रस या रसायन, सूर्य, ध्वनि, पंच तत्व इत्यादि.

इससे पहले हम ये जान ले की जैसे विज्ञान के मूल मे सिद्धांत है उसी प्रकार तन्त्र के मूल मे ‘प्रक्रिया’ है. किसी भी प्रक्रिया को करने पर उसका एक निश्चित परिणाम प्राप्त होता है. सिद्धांत और प्रक्रिया मे एक हल्का सा भेद है. जैसे की आपने कागज़ के टुकड़े को उसके स्थान से हटाया. तो उसका सिद्धांत ये है की शक्ति लगाने पर आप उस चीज़ को अपने मूल स्थान से हटा सकते है. लेकिन तन्त्र ये है की किस प्रक्रिया से इसे हटाया जाये. हाथ से, पैर से, मुख से, फूंक मार के इत्यादि. तो तन्त्र की यही प्रक्रियाए मूल आधार बनती है एक क्रम का, जो की उस सिद्धांत को एक विशेष माध्यम द्वारा ज्ञान रूप मे अपने अंदर स्थापित कर देता है.
रस विज्ञान : (यहाँ हम पहले रस के विज्ञान पक्ष  से सबंधित चर्चा करेंगे और बाद मे रस तन्त्र के पक्ष मे.)  
इसी विज्ञान को पारद विज्ञान रसायन विज्ञान या स्वर्ण विज्ञान भी कहा गया है. पारद शिव का वीर्य है. शिव और शक्ति के संयोग से इस सृष्टि की विकास हुआ उसके मूल मे पारद ही मुख्य आधार है. रस को चेतनावान कहा गया है, समस्त धातुओ मे ये एसी धातु है जिसमे चेतना है, मतलब उसकी स्वयं के बोध का ज्ञान. यु उसे सजीव धातु भी कहा जा सकता है. मूल रूप ये एक एसी धातु है जो की सभी धातु से भिन्न गुणधर्मो से युक्त है.
रस विज्ञान मे मुख्य पुरातन विज्ञान सिद्धांत –
धातु मे निहित अशुद्धि चेतना को कमज़ोर करती है, मतलब की आत्म बोध को कमज़ोर करती है
जिसमे चेतना है सिर्फ उसकी आतंरिक क्षमता का विकास किया जा सकता है
चेतना से प्राप्त क्षमता का विकास परिवर्तन को जन्म दे सकता है जिसमे परिवर्तन के प्रमाण का आधार  चेतना और निहित क्षमता के ऊपर होता है.
पारद विज्ञान से सबंधित सेकडो लेख ग्रुप और ब्लॉग मे पहले से ही दिए जा चुके है अतः वही तथ्यों को वापस यहाँ देने के लिए कोई चिंतन नहीं है, जिज्ञासु गुरु भाई बहेन इस सबंध मे पुरानी लेखमालाओ को देख सकते है. यहाँ पर इस विषय के कुछ मूल तथ्यों को ही सामने रख रहा हू. रस को चेतनावान कहा गया है, समस्त धातुओ मे ये एसी धातु है जिसमे चेतना है. यहाँ पे विज्ञान का पहला सिद्धांत ये लागु होता है की धातु मे निहित अशुद्धि चेतना को कमज़ोर करती है, मतलब की आत्म बोध को कमज़ोर करती है इसी लिए उसे विशेष संस्कारो से शुद्ध करने का विधान है. इस विज्ञान से सबंधित दूसरा सिद्धांत यह है की जिसमे चेतना है उसकी क्षमता का विकास भी किया जा सकता है. अगर हम बीमार है तो धीरे धीरे हमारी चेतना कमज़ोर पड़ने लगती है. लेकिन अगर हम पूर्ण स्वस्थ है, कोई दोष नहीं है तो फिर हम अपनी क्षमताओ का विकास कर सकते है ये बात आप सब लोग जानते ही है. इस प्रकार पारद का विभ्भिन पदार्थो के साथ कई प्रकार से संयोग करा कर उसकी क्षमताओ का विकास किया जाता है. तीसरे नियम के अंतर्गत पारद के ऊपर की गयी प्रक्रियाओ से उसके परिवर्तन करने की शक्ति का प्रादुर्भाव होता है और उसी क्रम मे उसकी परिवर्तन करने की शक्ति को वेध क्षमता के नामसे जाना जाता है जिसके ५ प्रकार है . (क्रमश:)


In last two posts we came to know that what does science means, basic importance of generating science knowledge, base of science, type of nature and relation in-between tantra & science, and what does the importance they carry in the subject. The basic motto of this series is to throw light on basic of sciences and their tantra differentiation.to understands one single science and the tantra differentiation completely, the life may act less, this is not a two day show.  To be attracted toward mysteries is basic human nature, but to understand that one needs devotion, passion, patience and hard work after wondering all this sadhak can check them self and decide. In this time duration, it’s not always sadhhak’s fault, those who have knowledge of this science are not ready to speak on this subject at all and those who do not knew any single thing about sadhana, thousands of people run behind those with a crown in their hand to make them king. The learner should have courage to put forward his right to have knowledge but  one should go in front of those who do have at least a  bit knowledge of it, in the blind race you may have illusion of completeness but not completeness itself. Completeness could only be gain through hard work and that too from sadguru only. Anyways, I apologizes for digress, in this era the plight of our nation’s teasure knowledge which was seen by sadgurudev’s eyes, whenever those eyes comes in my memory it is hard to stop feelings.

In this series, we’ll discuss about basic concepts of some important sciences and their tantra differentiation. Like kaal & kshan, ras or rasayan, surya, dhwani, pancha tatva etc.

Before this, we should know that the way concept is the base of science; the base of tantra is ‘processes’. Any process done will definitely give a kind of result. There is a light difference between concepts and processes. For example you moved a piece of paper from its place. So in this, the concept is you can move that thing from its original place if a kind of power is applied. But tantra deals with the process which can make it move. With hand, with foot, with mouth, with puff etc. So, these processes of tantra act as a base of an order which allows that particular concept to establish inside us in the form of knowledge.

Ras Vigyan : (here first we will discuss about science side of rasa and then tantra side of the same. )
This science has also been termed as paarad vigyan, rasayan vigyan or swarn vigyan. Paarad is semen of the shiva. Paarad is main base for the development of world when shiva and shakti gets involves in merging. Ras is termed holder of conscious, in all metals, this is the metal which have consciousness means it has knowledge of its own. This way it is also termed as living metal. Actually, this is the only metal which owns properties of all metals.

Basic ancient science concepts in ras vigyan –

Impurity of the metal can feeble the consciousness, means can cause weakness in self knowledge

Those who have consciousness could only be developed internally

Power generated through consciousness can give birth to the development in which quantity of development depends on the consciousness and the Inherent ability.
Hundreds of articles related to the parad has been given in the blog and group previously, thus, there is no need of repeating those here again. Guru brother/sister who owns will to know brief can go through old articles. Here I am sharing some basic facts related to the subject. Only Rasa is called conscious among all metals. Here first concept of the science is applicable that Impurity of the metal can cause weakness in consciousness for that only there are purification samskaras. Relating this science the second concept is those who have consciousness could only be developed internally. If we are sick, then our consciousness becomes dull gradually but if we are completely healthy than we can develop our abilities this you people are aware of. This way parad is incorporate with various items and development of the basic ability of paarad is increased. Under the third rule with the processes done on the parad cause the development of the abilities which can cause transformation and this way the transformation power of the same is known as Vedha power which has five types.

****NPRU****

Tuesday, September 20, 2011

VIGYAAN VA TANTRA BHED- PRAKRITI BHED


पहले लेख मे हमने ये जाना की विज्ञान का मूल क्या है. विज्ञान पूर्ण रूप से प्रकृति के सिद्धांतों पर आधारित है. अब यहाँ पे ये सवाल उठता है की आखिर इन विज्ञानों को समझने की क्या आवश्यकता थि.
सृष्टि के मूल मे पुरुष और प्रकृति है. साधक के लिए प्रकृति का क्या महत्व है ये एक साधक भली भांति समझसकता है. साधक का उद्देश्य मूलप्रकृति को अपने आप मे समाहित कर लेना ही है. प्रकृति के मुख्य रूप से दो प्रकार होते है, आंतरीक व् बाह्य. इस मुख्य भेद के भी कई उपभेद है, जिसमे बाह्य प्रकृति की बात की जाए तो वो मूल प्रकृति है जबकि  आतंरिक प्रकृति परावर्तित है. बाह्य प्रकृति का स्वभाव स्थिर है और आतंरिक प्रकृति गतिशील. क्यूँ की साधक की यात्रा ब्रम्ह मे समां जाने की होती है, यह यात्रा दूसरे अर्थो मे अपने मूल को प्राप्त करने की है. हम जिसके अंश है उसी मे ही समां जाना और इससे भी आगे उसे अपने अंदर समां लेना. एक पत्थर का टुकड़ा पहाड पर स्थिर है तो वो अपने आप मे पहाड़ ही है. या यु कहा जाए की उसकी सत्ता का विराट रूप पूरा पहाड है. लेकिन जब वह उससे अलग होता है तो उसकी सत्ता मे परिवर्तन आ जाता है और उसके विभ्भिन प्रयोग किए जा सकते है, क्यूँ की उसकी प्रकृति मे बदलाव आ गया है, वह अब अपनी मूल प्रकृति मे नहीं रहा जो की स्थिर थि. जब तक हम ब्रम्ह मे समाहित रहते है तब तक हम उसकी मूल प्रकृति को धारण किए रहते है लेकिन विखंडन के बाद हमारी मूल प्रकृति मे परिवर्तन आ जाता है. विज्ञान का अर्थ है उस प्रकृति के मूल सिद्धांत को जानना और समजना. ताकि हमें ज्ञान हो सके की हमारी अपनी विराटता कितनी प्रचुर है. जब मनुष्य प्रकृति के सिद्धांतों को जनता है तब उसकी ज्ञान प्रकृति मे भी बदलाव आता है और उस मूल प्रकृति को धारण करने के लिए कदम बढाता है.
फिर इसका अर्थ ये हुआ की प्रकृति के सभी सिद्धांतों को समझलेने पर जान लेने पर हमारी मूल प्रकृति की हमें प्राप्ति हो जाती है. फिर तन्त्र की अनिवार्यता क्यों है? विज्ञान और तन्त्र का लक्ष्य क्या एक ही है ?
विज्ञान हमें प्रकृति के मूल सिद्धांतों को समझा  सकता है उसका ज्ञान करा सकता है (understanding) लेकिन समझने से आगे भी एक स्थिति होती है जिसे आत्मसात  करना कहा है (realization). हमारे सदगुरुदेव ने हमें कहा की साधना पथ पर निरंतर गतिशील रहना और अपने लक्ष्य की और अग्रशील रहना. हमने ये समझलिया की इससे अर्थ ये है की वो हमें साधना करने को कह रहे है और अपने लक्ष्य की और हमेशा बढते रहे ऐसा कह रहे है, उनकी प्रकृति के निहित मूल सिद्धांत जो की हमारे लिए बने हुए थे उसे हमने समझलिया जो की परिवर्तन के नियम से बहोत दूर है. यह विज्ञान का कार्य है. यही विज्ञान है. लेकिन क्या हमने उसे आत्मसार किया ? उसे आत्मसार कर लिया होता तो फिर सभी चीजे गौण हो जाती है. यह तन्त्र है. मूल सिद्धांत को समझने के बाद उसे आत्मसार कर लेना, बाह्य प्रकृति के उस भाग का ज्ञान प्राप्त कर उसे अपने अंदर आतंरिक प्रकृति मे सदैव के लिए स्थापित कर लेना. ये दोनों प्रक्रियाए एक दिखने पर  भी अलग अलग है की किसी भी सिद्धांत को समझना जो की प्रारंभिक स्थिति है वो विज्ञान है उसी सिद्धांत को आत्मसार करना यह तन्त्र है.
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In the first part of the series we understood that what the base of science is. Science is completely based on concepts of nature. Here, a question arise that what was the importance to understand these sciences?

The base of the universe is prakruti and purusha. What significance does the nature carries for sadhaka, that sadhak could understand very well. The main objective of the sadhaka is to merge him in main base-nature. Basically there are two main type of nature, inner and outer. There are sub types of these two main types in which outer nature is base and inner nature is Reflectional.The basic characteristic of outer nature is to remain still and for inner, it is inconstant. As the journey of sadhak is to dissolve the self in bramha, in other word this journey is to achieve our origin. To dissolve our self of which we are made of and further on merge it in our self. If one stone is still on the mountain, it is mountain itself. Or we can say that the base power of that stone is complete mountain. But when it separate itself from that mountain,  the entity of the same gets change and it could be used in several ways because it is not still or base, the basic nature of that stone has changed, it has no more characteristic of the base which was still. Till the time we stay merged with bramh we hold bramhas basic nature but after Fragmentation our nature even gets change. The meaning of the science is to know and understand that basic concepts. With which we can understand about hugeness of power in our base nature. When we came to know about basic concepts of nature then the knowledge nature of the one gets change and a step forward is taken to have that base nature.

So it does mean that after understanding all the concepts of base nature we will have our base nature. Why does tantra require then? Does the target of science and tantra is one?

Science can make us understand about the basic concepts of the nature, it can let us KNEW about it. But there is a stage ahead then ‘understanding’ which is called ‘realizing’.  Our sadgurudev told us that always stay activate on the path of sadhana and keep on moving toward your goal. We understood that by this he mean that we should keep on doing our sadhana and we should always keep on moving to our sadhana goals. We understood the base concept which was meant for us in his still nature state which can never going to change. This understanding is work of science. And this is science only. But did we realize it? If we had realized it, then all other thing would have been Accessory for us. This is tantra. To realize main concept after understanding it, to know about that part of base nature and to establish it in inner self.  This both processes are separate though it seems one. That to know about any concept is primary stage which is science and further to realize it and establishment of it is tantra.
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Monday, September 19, 2011

VIGYAAN EVAM TANTRA BHED-1

विज्ञान का आज जो भी रूप है वो हम सब के सामने ही है, उस पर विशेष चर्चा करना यहाँ मेरा उद्देश्य नहीं है. इतना ज़रूर कहूँगा की चाहे विज्ञानं का क्षेत्र हो या आध्यात्म हमरे ऋषि मुनियो ने अपने जीवन काल मे इसका बृहद अभ्यास किया था और विविध विज्ञानं मे वो निपूर्ण थे. इसी क्रम मे कई विज्ञानों का आदि काल मे प्रचलन रहा था जिसमे विविधगणितविज्ञान, ज्योतिषविज्ञान, खगोलविज्ञान, चिकित्साविज्ञान, काल व् क्षणविज्ञान, अणुविज्ञान, वैमानाकी और दूसरे यांत्रिक विज्ञान, ध्वनिविज्ञान, सूर्य / चन्द्र / ग्रह व् नक्षत्र विज्ञान, रसायन विज्ञान, ब्रम्हांडीय विज्ञान, प्राद्योग विज्ञान, पंचतत्व विज्ञान, धूम्र विज्ञान, कला विज्ञान जैसे १०८ मूल विज्ञान का समावेश होता है. आज का विज्ञान इस बात को स्वीकारे या नकारे लेकिन ये सत्य है की उस समय भी हमारे ऋषि मुनि विज्ञान के क्षेत्र मे अत्यधिक आगे थे आधुनिक विज्ञान जिसका एक प्रतिशक भी नहीं है. लेकिन आज इस युग मे हमारा प्राचीन विज्ञान व् धरोहर लुप्त हो गई है.

यहाँ, इस विषय पर चर्चा करने के लिए एक विशेष कारण है. जो तथ्य सिर्फ कुछ लोगो के सामने ही आ पाया है. जिस प्रकार सदगुरुदेव ६४ तन्त्रो मे सिद्ध थे, उसी प्रकार वे इन सभी १०८ विज्ञान मे भी सिद्धहस्त रहे है. समय समय पर कुछ शिष्यों को उन्होंने कई विज्ञानो का ज्ञान कराया है, सूर्य विज्ञान, काल विज्ञान, रसायन विज्ञान जेसे कई विषयो पर तो वे शिविरों मे भी अपने शिष्यों को समजाते थे, लेकिन मूलतः उनका ये पक्ष भी उनके कई पक्षों की तरह सामान्य शिष्यों से गोपनीय ही रह गया लेकिन कुछ विशेष गिने चुने शिष्यों ने ही सही लेकिन विज्ञान मे भी बराबर पूर्णता प्राप्त की है.

विज्ञान क्या है तो इस सन्दर्भ मे समजने के लिए ये कहा जा सकता है की ज्ञान के क्षेत्र का विशेष ज्ञान को जो की पूर्णतः सैधांतिक है. प्रकृति के मूल सिद्धांत है की कोई भी क्रिया करने पर एक विशेष शक्ति उत्प्पन होती है जिसके फलस्वरुप उस क्रिया का कुछ न कुछ परिणाम आता है.(cause and effect relationship) यही मूल सिद्धांत के कई उप सिद्धांत है की कोन सी प्रक्रिया करने पर प्रकृति मे विशेष मनोकुलित परिणाम को प्राप्त किया जा सकता है (reflection cause of power) या कोई परिणाम को प्राप्त करने के लिए प्रकृति के किस मूल सिद्धांत या उप सिद्धांत को किस प्रकार गतिशील किया जाए (power generation and modulation). ये कोई चमत्कार नहीं है, यह पूर्णतः सिद्धांत के ऊपर आधारित है. जैसे की कोई चीज़ को उठाओ और उसे दूसरी जगह पे रखो, ये परिवर्तन एक सामान्य सिद्धांत पर आधारित है. जिसमे सिद्धांत ये था की उठाने की शक्ति का उपयोग कर किसी भी पदार्थ का स्थानातरण किया जा सकता है.


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Sunday, September 18, 2011

For Gaining happiness and Success


जीवन में  अनेको ऐसी कठिन  स्थितियां   हैं और  अगर  दूसरी  दृष्टी से देखें  तो क्या सभी  स्थिति के लिए  एक  ही बात  एक   ही  उपाय  ही   करेंगे , मैं  उदाहरण  से  कहूँ  की  कुछ लोगों को   बुखार  हैं  तो क्या  चिकित्सक सभी को एक  ही दवाई  और एक ही  dose  ,हर परिस्थिति में  देता हैं ?? नहीं  न ,ठीक इसी तरह  से भले  ही  एक ही  समस्या  हो  पर सभी के लिए  एक  ही  साधना   ही उपयोगी   होगी , नहीं..... न .....इस लिए  अनेको बार  किसी एक   ही समस्या   के  लिए  अनेको साधना  दी जाती हैं ,क्योंकि   कुछ  के मन में  आ सकता  हैं    की  लीजिये  फिर  उसी समस्या के लिए  एक  और  नयी साधना .
 एक  और बात आप सभी  के सामने   हम रखना   चाहेंगे ,   जो हमारे कई गुरु भाई   बहिनों ने  पूछी   हैं  इनमे हमारे   प्रिय गुरु भाई अमित खन्ना  जी ने  कुछ  प्रश्न  हमसे पूंछे हैं
कि क्या एक साधना  का प्रभाव सारा  जीवन भर  नहीं होता  ?
 क्या  एक बार साधना  सफलता  पूर्वक  कर ली   तो क्या दूसरी बार क्यों  करना  चाहिए क्या  तात्पर्य  हैं ?
क्या एक  ही समस्या  के लिए  बार बार अन्य  साधना   क्यों  की जाये ??
 तो इन सभी बात का  उत्तर  यही हैं   कि   क्या   एक बार खाना  कहने  के बाद क्या  दूसरी बार  पूरे जीवन में  खाना खाने   की जरुरत  नहीं होगी , अगर इस प्रश्न  का   जबाब  यह हैं की  नहीं , जरुरत   तो पड़ेगी ही तो  यदि बात साधना  जगत के लिए भाई....   तो लागु होनी  न , साथ ही साथ  साधना  का  क्या मतलब   हैं???,,साधना में साधना से  आपके  जीवन में एक विशिष्ट  उर्जा का संचार  कर देती हैं अब उसे  आप  जो चाहे   सो नाम  दे , पर  उर्जा  को हम कैसे स्थिर  रख सकते हैं ??, दिन भर के हमारे असत्य . दोष पूर्ण काम , विभिन्न   विचारो के  कारण  यह  पल प्रतिपल  खर्च   होती जाती   ही  हैं तो साधना उर्जा  का  भी    असर भी कम  हो जाता हैं , इस कारण एक बार के  बाद  दूसरी  या  कोई अन्य साधना   फिर भले  ही वह्बार बार  लक्ष्मी  साधना   ही  क्यों न  हो   करना चाहिए  .
 यह एक  दिन का  सौदा   तो नहीं हैं बल्कि साधना   तो एक नया  जीवन  जीने की शेली हैं ही ..
अब जितने भी प्रयोग  दिए जाते हैं  वहां यह मतलब नहीं हैं की सभी  को  आप करें ही बल्कि   जिसे  ,जो भी अच्छा   लगे   ,अपनी परिस्तिथियों  के अनुसार , वह  जिस  भी प्रयोग को अपने लिए  सही  समझता हैं उसे करे .
 तो जीवन में  सभी प्रकार  का आपको  लाभ मिले , सभी   प्रकार की अनुकूलता मिले , अनेको  प्रकार की शुभता   दे सकने में  समर्थ यह प्रयोग  हैं तो छोटा सा हैं पर  यदि इसे कोई अपनी  दैनिक पूजा में शामिल  भीकर लेता हैं तो  उत्तम हैं
मंत्र :
ॐ क्षीं    क्षीं  क्षीं   क्षीं  क्षौं  फट ||
अब  इसके लिए   कोइ विशेष नियम  नहीं हैं  जितना अधिक से अधिक   इसका  जप कर लिया जाये  उतना    ही अच्छा  हैं , फिर भी  किसी भी विशेष  महूर्त  में  5/10 माला  जप और भी लाभ दायक  होगा , यह मंत्र अनेको  ग्रंथो में  आया  हैं , और बहुत  ही प्रशंशा प्राप्त हैं
आज के लिए  इतना ही 
******************************************************************************                       There many difficult situation comes  in our way of  life and if we see them through very different view/angel   than can  we apply same solution in  each and every problem?
Here  for example ,  if  many people  are suffering from fever than a doctor will prescribe same  medicine and same  dose  to all  the person in all situation ?? like the same way  even though the problem is same  but considering  different  different  person   ,the sadhana useful  for them  are also different. Since many of  us  may think , here is again a new sadhana  for same old  problems.
 we would like to place  in front   of you some  views..    about  the  doubts , which has been asked  by many  our  guru brother and sister  .specially our dear  guru brother  Amit khanna ji , asked us  some    question..
Is effect of any sadhana , will  not be  effective for  the rest of life / whole  life??
When we have already successfully  completed any one  sadhana, than  what is  the logic  behind  again doing the same  sadhana again ??
Why  to  go for  diffenrt  different sadhana for   the same problem??.
 Here the answer of  all that  question  is , if  once ,you have  taken/eaten   food than   rest  of the life  you  do not need to take that  again ?? if   answer  is no , we  have   to eat many times,  than  the same  is applicable  to sadhana  field.  what is the sadhana  means/does ,   this  means  through sadhana  a specific energy enter  in  your body, now  you can free  to name   that  ,anything you like , but how   can we  make that  urja stationery…? Due   to various  false activity/wrong action,    and  our thoughts this  energy  get decreasing  in each  and every moments. That means   our sadhana urja  is also  decreasing. That’s why even one sadhana  you have   successful completed  but still you have  to go for  other, so  this  fact is also applicable  for any lakshmi sadhana.
 This  is not a  one day  business  but  sadhana is  a way of life that you have  to live
  Here  so many prayog are given  but that does not means that you have to do all, no… no… but whatever  prayog or sadhana,  you think  suitable  for  you after considering your  circumstances  do that..
 Here   this is very small  prayog that  can  give  or induce many happiness and all round  success  if   you  do  this  with faith and devotion .
Mantra :
 Om ksheem ksheem ksheem ksheem  kshoum  phat .
 And  there is  no  rules and  regulation that  you need to follow. But as much as   jap of this  mantra is helpful  for you ,but on any auspicious  mahurat   do jap of this mantra 5 or 10  mala , and that  will give  you more success., this is  mantra comes/mentioned  in various granth and  found very effective.  
This is enough for today.
****NPRU****

Friday, September 16, 2011

Mekhala prayog for tantra siddhi


 तंत्र  में एक से एक विधान कहे जाते  हैं या दिए जाते हैं साधारण  साधक  को  यह बहुत अचरज लगता हैं की  की यह भी  प्रयोग करना चाहिए   फिर जाता हैं की यह भी करना चाहिए , फिर  यह भी जरुरी  भी हैं इसके  बिना    सफलता नहीं  मिल सकती हैं , या फिर  इसके लिए  यह भी विधान  भी जरुरी हैं , अब क्या क्या  हम और क्या नहीं  या तो यह विधान यह साधना  को ही करते रह जाये , मूल साधना  को कब करे ??   तो पहले  यह हम समझ ले , की यह क्षेत्र   ऐसा नहीं हैं  की बस यन्त्र माला  ले ली और कल एक  अनुष्ठान कर लिया और हम और  आप  विश्व प्रसिद्द  हो गए  , थोडा सा  देखें  की जिन्होंने  सफलता  पाई हैं कितनी कठिनाई  सहन की  हैं
 पर आप   कहेंगे  की वह एक ,आपके पहचान का  हैं उसे तो एक  ही बार में .. उसने  तो यह नहीं और यह  भी  नहीं किया था  .....तब भी ..
मित्रों , तंत्र जगत में  कुछ भी  एक दम  से नहीं होता हैं  अगर  किसी ने  विगत  जन्मो में साधना  की हैं या वह साधना की  हैं और  उसका  थोडा सा  ही रास्ता  बाकि था   तो उसे इस जीवन में  जल्दी ही सफलता  मिल  ही जाएगी/जाना  ही चाहिए     पर  इसका मतलब  हम हाथ पर हाथ  धरे बैठे रहे की कोई कर पहले हमें हमारे विगत  जीवन के बारे हमें बताये  की यह साधना  करो ..  
नहीं नहीं
 यह तो भाग्य वादी दृष्टी  कोण हो गयी हैं .  तो हमें  जब तक  सफलता  नहीं मिल  जाये  तब तक अपनी साधना के लिए  विशेष  विशेष विधान  समय समय  पर अपनाना  ही  चाहिए , यह बिलकुल हैं की  कोई  मात्र एक किताब पढ़ कर टॉप कर लेता हैं  तो किसी  किसी को  tution  भी लेनी पड जाती हैं पर सफल  तो सभी कहलाते हैं .

  ठीक इसी  पूज्य  सदगुरुदेव   जी ने अनेको विधान  दिए हैं आप से जिसको  लगे  यह विधान उनके  लिए  उपयोगी  हो सकता  हैं वह आगे आये  और इस विधान  को करे 
Imp:
 पर ध्यान  रखे  यह विधान  या  बहुत  ही उग्र  हैं  इसलिए कमजोर ह्रदय  वाले  को इस के बारे में सोचना  भी नहीं चाहिए 
मंत्र :
ॐ मेखले सर्व सिद्धिं तन्त्र सिद्धिं कुरु कुरु नमः
साधारण नियम :
·        दिशा दक्षिण. 
·        इस मंत्र को  रुद्राक्ष या काली हकीक माला से जपना  हैं 
·        काले वस्त्र पहन कर और काले आसन  ही उपयोग करना हैं 
·        निखिलेश्वरानंद  कवच  का  उपयोग करे  और आवश्यक  रक्षा विधान करके  ही इस प्रयोग में जाये 
·        क्योंकि स्मशान कोइ मजाक  या  प्रयोग करने की जगह नहीं हैं  इसका   विशेष ध्यान  रखे ,  
·        स्मशान मे रात्रि काल मे ( after 10 pm )२१ माला २१ दिन तक जपने से आगे की जाने वाली साधनाओं में तन्त्र सिद्धि होती है
 और साधक को आगे की साधनाओ के लिए देवी बिम्बात्मक रूप मे दर्शन देकर आशीर्वाद देती है
आज के लिए बस इतना  ही 


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 There are  various sadhana  and prayog  are in tantra sadhana jagat ,  and its   very natural that a common sadhak often get confused  on reading that this  sadhana /prayog is  must , and  this  too , and without this  prayog  one cannot get success , and  this is an essential sadhana , than what to do or not to do is a  big question ?, if we go  this way  so it seems  when  we have time  for  our   main sadhana ,???
 Than  at first we  understand  that , this is not  such a  field that  you  have  taken one yantra  and mala  and  just do  a single anusthan and  get  world  fame. Just  see  those who have  got success how much  hard work they  took.
 But on  replying this  simply you  would say that , he is  one whom you know , did not do any of  such thing and  got success in one attempt. why  Is it so …
 Friend  there  is no sanyog/coincidence   in  tantra sadhana , if  he  undertook that sadhana in his  previous life and  just little more was needed to have the success,  s o its  quite  natural  that   in this  life  he will get success  in very little minimum efforts. And   it should be , but that  does not means  that we just sitting  effortlessly , waiting for  some one  to come and  tell that  this sadhana  you have to  do  ,since in past life..
 No no
 Than is  just not  a good approach ,we should  apply each and  every sadhana that will give  us success  in  our aimed sadhana,  which is  in someone  views  helpful  for   success in  sadhana  . this is  just like that someone  get top in exam  by just reading a  book  and other one has to  take  tuition ,  but on the  success  both are considered  successful and equal  .
So considering these facts  poojya Sadgurudev  ji has  given  so many prayog , which ever you think good  for  you  , go ahead .
Imp:  keep it in mind this  prayog  is  tough ,  so  do not undertake  it in any cost  if  you are having weak in heart.
 Mantra :
  Om mekhle sarv siddhim  tantra siddhim  kuru kuru namah
General  rules :
  • Direction would be south
  • Do jap  with using  either  rudraksha  or  black hkik mala .
  • Use black color  aasan and  clothes.
  • Chant nikhileshwaranand kavach and  do necessary  rakshatmak vidhan .
  • Always  remember  shamshan is  not a place  for  joke  or  for experimenting .keep  this  always in mind.
  • In shamshan , night time(after 10pm)   do jap  21 round of rosary  for  21  days , than you  got  tantra siddhi .
And   devi   will bless  you   for  getting success in  coming  sadhana  .
This is enough for today
****NPRU****