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Friday, March 30, 2012

बीजोक्त तन्त्रम् – विरूपाक्ष कल्प तंत्र उद्धृत त्रयी कल्प(आसन सिद्धि,अक्षत तंत्र,मेधा तंत्र)-१ ( BEEJOKT TANTRAM-VIRUPAAKSH KALP TANTRA UDHAT TRAYI KALP(AASAN SIDDHI, AKSHAT TANTRA, MEDHAA TANTRA)-1)


प्रद्युत्मान तन्नोपरि उद्धरित: नूतन सृजः
उत्तपत्ति सहदिष्ठ:ब्रह्मांडो सहपरि सहबीज: अक्षतान् |
मुमुक्षताम स्थिरताम वै: दिव्यः वपुः मेधा: 
पूर्णम पूर्णै सपरिपूर्ण: आसन: दिव्यताम सिद्धि: ||

विरूपाक्ष कल्प तंत्र ५६ सारगर्भित श्लोकों से निर्मित वो तंत्र रचना है जो एक सामान्य साधक को अपूर्णता से पूर्णत्व की और यात्रा करवाती है और उस ग्रन्थ का प्रत्येक श्लोक कूट भाषा में ऐसे ऐसे रहस्यों का समावेश किये हुए है जो सामान्य से सिद्धता और नर से नारायण की और आपकी यात्रा करवाता है |बीज मन्त्रों का जितना सुन्दर रहस्य इस में वर्णित है उतना कही और प्राप्य होना दुष्कर ही है उसी ग्रन्थ का ये श्लोक इंगित करता है चेतना के उन स्तरों का जिनके द्वारा सिद्धि प्राप्ति की क्रिया अत्यधिक सहज हो जाती है वास्तव में ये सम्पूर्ण शब्द एक क्रिया विशेष की और संकेत करते हैं और व्यंजना शैली में लिखित होने के कारण इनका वो अर्थ कदापि नहीं हो सकता है जो की हम सामान्य दृष्टि से देख या सामान्य बुद्धि से समझ रहे होते हैं | 
सिद्ध विरूपाक्ष संकेत करते हुए मात्र यही कहते हैं की यदि मन्त्र(कुछ विशेष बीजाक्षर)या योजना विशेष का क्रमगत रूप से प्रयोग कर तीन पदार्थों या भाव को साध लिया जाए तो ब्रह्मांडीय रहस्यों को भेदकर नूतन सृजन की सिद्धि सहज आपका वरण कर लेती है तब आप मात्र पूर्ण ही नहीं होते हो,अपितु आपके उद्यम से आप व्यक्ति या प्रकृति की विकृति को भी दूर कर उसमे पूर्णत्व का समावेश कर देता है” | एक साधक के साधना कक्ष में उसकी साधनात्मक यात्रा के जो उपकरण होते हैं यदि वही विशेष शक्ति योग से युक्त न हो तो उसकी सफलता संदिग्ध ही होती है हम में से सभी अपने जीवन में एक बार तो उस सफलता को अपनी आँखों से देखना चाहते हैं,अनुभव करना चाहते हैं उसकी प्राप्ति को और उसके बाद उसका प्रयोग कर स्व जीवन और समाज को अपनी सफलता का लाभ देना चाहता है किन्तु ये सब मात्र कल्पना ही रह जाता हैमुझे याद है जब हम सभी जबलपुर सेमीनार के लिए इकठ्ठा हुए थे तो वहाँ मास्टर ने हमें बताया था की सिद्धि की साकारता वास्तव में आपकी कल्पना शक्ति का संलयित रूप होता हैकिन्तु जब ये घटना ब्रह्माण्ड में कही घट रही होती है तो उस समय असीम ऊर्जा का प्रवाह विस्तार पाता है किन्तु कल्पना तब तक कल्पना ही होती है जब तक उसमे शक्ति का योग न हो जाए |याद रखिये प्रत्येक पदार्थ हमें जीवन में दो बार देखने को मिलते हैंपहला हमारी कल्पना में और दूसरा जब उस कल्पना को साकार कर लिया जाये,किन्तु कल्पना को साकार करने के लिए उद्यम शक्ति का अभाव नहीं होना चाहिए |यदि उद्यम शक्ति या परिश्रम का अभाव नहीं है तब आपकी आत्मशक्ति आपकी कल्पना को विघटित नहीं होने देती है बल्कि उसके घनत्व को तीव्र कर आपके वांछित को साकार कर आपकी शक्ति को प्रत्यक्ष कर देती है |
साधक यदि अपनी साधना सामग्री की ऊर्जा तरंगों को जाग्रत कर ले और उस जाग्रत अवस्था को यदि चैतन्य कर दे तब उसके लिए सफलता मात्र कल्पना नहीं रह पाती है अपितु वो सहजता से उस सफलता का वरण कर सकता है किन्तु हम में से कितने हैं जिन्हें इन प्रक्रियाओं का ज्ञान है |
क्या हमारा आसन जाग्रत है ? 
जो हमें वातावरण की नकारात्मकता से ना केवल मुक्त करे अपितु जब हम उस पर बैठ कर साधना करे या मंत्र जाप करे तो ना केवल वो हमारी बाहरी या सूक्ष्म बाधाओं से हमारी सुरक्षा करे और जीवन पर्यंत सभी साधनों में हमारा सहयोग करे अपितु हमारे मन्त्र इष्ट का हमसे योग भी करवा दे,तब ऐसे में साधक और साध्य एक हो जाते हैंउनमे परस्पर कोई भेद ही नहीं रहता तब आप मंत्र हो जाते हो और मंत्र जप की क्रिया से आपके कर्मगत मलों का नाश हो जाता है और आप पूर्णत्व की और ना केवल अग्रसर हो जाते हो अपितु उस आयाम से भी आपका समपर्क होना सहज हो जाता है जो की अगोचर है शायद आपने सुना होगा की सिद्ध योगियों के आसन पर बैठने से सामान्य साधक पागल भी हो सकता है क्यूंकि वो आसन विशेष उर्जा से युक्त होते हैं,इसी कारण सिद्धों के आसन को दूर से ही प्रणाम किया जाता है क्या आपको ज्ञात है की जब हम उच्च शक्तियों,योगियों या सिद्धों का आवाहन करते हैं तो उन्हें निवेदित किये जाने वाले आसन को कैसे चैतन्य किया जाता है ताकि वो आसन ना सिर्फ उन्हें निवेदित करने योग्य हो अपितु जब वे उस आसन को ग्रहण कर अपनी शक्ति से युक्त करे तो कैसे भविष्य में वो आसन एक पीठ के रूप में परिवर्तित होकर अन्य शक्तियों का भी आकर्षण करने में समर्थ हो सके और आपको उस आसन की उपस्थिति सफलता भी प्रदान करे |

क्या हम अक्षत की महत्ता जानते हैं या हमें ज्ञात है की कैसे इस सामान्य से दिखने वाले पदार्थ के द्वारा हमारे मनोरथ को पूर्ण किया जा सकता है? 
कैसे इन्हें सिद्ध कर हमारी साधना का एक महत्वपूर्ण अस्त्र बनाया जा सकता है जिससे वशीकरण,शांति कर्म,उच्चाटन,लक्ष्मी प्राप्ति,इष्ट की कृपा प्राप्ति और अपरा शक्तियों का आकर्षण किया जा सके कैसे इनके अंदर सुप्त चेतना को जाग्रत और चैतन्य कर स्वयं की चेतना से योग कर इन्हें अचूक अस्त्र के रूप में अपनी साधना में प्रयोग कर सके और तब ऐसे में ये एक तरफ तो आपका सर्वविध सुरक्षा करने का दायित्व निभाते हैं और आवशयकता पड़ने पर आपके लक्ष्य का भी भेदन कर सकते हैं | 
क्या आपको ज्ञात है की एक सामान्य से रत्न के द्वारा जो की सहजता से किसी भी पूजा पथ का सामान रखने वाले के यहाँ प्राप्त हो जाता है और कैसे उसकी अन्तःगर्भित शक्तियों को जाग्रत और चैतन्य करने से वो सामान्य रत्न बहुमूल्य गुणों से युक्त हो जाता है और आपकी मेधा शक्ति को बहुगुणित कर स्मरण शक्ति को तीव्र कर देता है ?

तब ऐसे में ना सिर्फ आपकी मानसिक शक्ति और स्मरण क्षमता में वृद्धि हो जाती है,अपितु बीज मंत्र का विशेष क्रम से योग होने पर ये प्रबल आकर्षण क्षमता से युक्त होकर पराशक्तियों का आकर्षण सरलता से कर लेते हैं और इन्हें धारण करने वाला साधक थोडा परिश्रम कर किसी को भी सरलता से अनुकूल कर सकता हैदुर्घटना निवारक और तंत्र प्रहारों से बचाने में इनकी भूमिका सर्वोपरि होती है |इसी कारण प्राचीन काल में मुद्रिका धारण की प्रथा थी क्यूंकि वो अंगूठियां कवच का कार्य करती थी और आपकी सफलता प्राप्ति को सहज भी |
प्रकृति का प्रत्येक तत्व स्पंदन से युक्त है,भले ही हमारी दृष्टि में वो निर्जीव या मृत की श्रेणी में आता होकिन्तु उसमे चेतना शक्ति होती है और भले ही सूक्ष्म होने की वजह से वो स्पंदन हमें दिखाई न देता हो किन्तु उसका यदि किसी उपाय से वेग तीव्र कर दिया जाए तो उस स्पंदन और चेतना का हम सकारात्मक प्रयोग कर सकते हैंऔर आगम शास्त्र ऐसा ही प्राच्य विज्ञान है जिसकी ऊँगली थामे नव्य विज्ञान विकास की और गतिशील है तभी तो कहा जाता है की जहाँ से नव्य विज्ञान की सीमा समाप्त होती है वहाँ से आध्यात्म प्रारंभ होता है विरूपाक्ष कल्प तंत्र ऐसी युक्तियों से भरा हुआ है | 
विरूपाक्ष कल्प तंत्र से उद्धृत उपरोक्त श्लोक में अन्तर्निहित पद्धति से कैसे उपरोक्त तीनों सामग्री और तत्वों को चैतन्य कर सके ये अगले लेख में.........(क्रमशः)
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प्रद्युत्मान तन्नोपरि उद्धरित: नूतन सृजः
उत्तपत्ति सहदिष्ठ:ब्रह्मांडो सहपरि सहबीज: अक्षतान् |
मुमुक्षताम स्थिरताम वै: दिव्यः वपुः मेधा: 
पूर्णम पूर्णै सपरिपूर्ण: आसन: दिव्यताम सिद्धि: ||

Pradyutmaan Tannopri Udhritah Nuutan Srijah
Utatptati Sehdishtah Brahmaando Sehpri Sehbeejah Akshtaan |
Mumukshtaam Sthirtaam vahi divyah vapuh medhaah
Poornam poorne spripoornah aasanh divyataam siddhi ||
 
“Virupaaksh Kalp Tantra” is a tantra scripture of 56 deep hidden shloks(paragraphs) which travels a normal sadhak from uncompletness to completeness(From apoorntaa to poorntaa) and in that scripture each paragraph contains secrets which can take normal to siddhtaa and man to lord naryaan(from nar to naaryan). It is really difficult to find that beautiful  secret explanation of Beej Mantras anywhere which has been given in this scripture. The above paragraph from that scripture tells the levels of chetnaa from which the process of getting siddhi become very easy . In real, these all words points to one special process and due to deeply written, their meaning cannot be that which we are seeing from normal eyes or which we are understanding from normal intelligence.
The great Saint Virupaaksh says that if we use mantra(some special beejaakshar) in a special arrangement ,we will adopt three forms or bhaav and new selfdevlopment chooses you by covering all the secrets of Brahmaand. Then, You are not only complete(poorn) but can insert completeness into any  man or nature by removing its all impurities. If the instruments of one sadhak in his sadhna room during its sadhnaa life do not contain shakti(power) in it, then, his chances of becoming successful becomes less. We all want to see success from our eyes once in our life, experience it and after that, we want to give  its benefit to our life and society by using it. But, it remains a dream only. I remembered during Jabalpur seminar, master has told us that siddhi is only giving a form to our dream shakti(power) but when this incident is taking place anywhere in the universe then, wave of huge energy gets all around. But, the dreams remains dream when it does not combines with shakti  in it.Remember we see each thing  two times, once in our dreams or imagination and when that dream gets fulfilled but to complete that dreams, there should not be the deficency of the high level energy.  If there is not the deficiency of high energy or hard work, then you selfpower does not distribute your imagination  but by increasing its force, it fulfill your imagination and tell you about your shakti(power). If sadhak awakes sadhna material by energy waves and gives chetnaa to those materials, then success do not remain dream for sadhak but the sadhak can easily choose that success. But, how many of us has knowledge of this?
Is you Aasan has awaken?
Which not only Realease us from the negativeness of the environment but when we do sadhna on it or do mantra jap, then, it should save us from Sukshm or outside problems and provide all types of support in our life and also do yog of  us from mantra isht, then, at that time, sadhak and the dev of sadhna become one. There remains do difference between them , you become mantra and through the process of mantra jap, your waste material of Kram get destroyed and not only you go towards completeness and contact with that impossible power becomes easy for you. May be you have listen that normal sadhak get mad by sitting on the aasan of the siddh yogi’s because those aasan contain special energy in it, For this reason only, we  must salute or respect to aasan of siddh from a distance only. Do you know how can we energize the offered aasan of high powers, yogi’s and siddh’s when we do the avaahan of them, so that, it do not only become of that level , so that we can offer them but when they sit on them and make it energize with their energy, so, in the near future , these aasan gets converted into peeth become capable  of  attracting others shakti(powers) and the presence of that aasan provide you success.
Do we know the importance of akshat(rice) or we know the thing which is looking so much simple can serve our all wishes?
 Can we make them a strong sadhna weapon by siddh them, through which vashikaran, Shaanti Karam, Ucchaatan, Laxmi Praapti, Getting Kripa of isht and attraction of shakti’s can be done. How to awake the sleeping chetnaa of them and after awkening , combining our chetnaa with their, we can use them like weapons in our sadhna, then, in this way, they provide you all round security and when required help you towards your goal.
 Do you know how through ordinary ratna which is available easily in the shops of worship material, we can awaken them and by giving chetnaa to them, normal ratna is filled with special benefits and increases your learning power.?
 Then, not only, your mental power and learning power increases but through the yog of beej mantras in special format, through their attraction capacity, easily attracts the powers and by doing little hard work, the sadhak can mould anybody. These play a vital role in saving us from accident and from the tantra  attacks. For this reason only, various mudriks were tied on the fingers in the ancient times because they work like the kavach for us and provide us the success easily.
 Everything of nature contain chetnaa in it whether it is living or non-living, whether it is small, but if we increases the force of chetnaa in it, then, we can use that chetnaa in positive way. And Aagam shaashtra is a type of ancient science, through which the modern science is developing. For this reason only it is said that where the modern science ends, from there spritiuality begins. Virupaaksh Kalp Tantra is filled with this type of things. By how these three things can be energized through the above paragraph of Virupaaksh Kalp Tantra will be discussed in the next article….(continue) …………..
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2 SARAL LAKSHMI PRADAYAK PRAYOG(२ सरल लक्ष्मी प्रदायक प्रयोग)


जीवन की पूर्णता पथ मे भौतिक तथा आध्यात्मिक पक्ष दोनों मे पूर्णता प्राप्त करना आवश्यक है. जब बात भौतिक जीवन मे परिपूर्णता की हो तब जीवन मे अर्थ का क्या महत्व है इसे हर एक व्यक्ति समज ही सकता है. भौतिक जीवन से सबंधित यह एक नितांत सत्य है की अर्थ या धन हर एक कदम पर महत्वपूर्ण अंग है जिससे की एक बहोत ही उच्च कोटि का ऐश्वर्य सम्प्पन जीवन की प्राप्ति हो सके. लेकिन जब जीवन मे जब धन का स्त्रोत नहीं होता और धन सबंधित समस्या रहती है तब जीवन अत्यधिक कष्टमय और बोजिल सा हो जाता है. ऐसे समय पर हमारी संस्कृति मे समस्याओ से मुक्ति के लिए साधनात्मक समाधान दिये गए है उन्हें हमें अपनाना चाहिए. योग्य रूप से देव शक्तियो की उपासना की जाए तो निश्चित ही उनकी कृपा प्राप्त कर समस्याओ के समाधान प्राप्त किये जा सकते है. आज के इस युग मे कई व्यक्तियो के लिए यह संभव नहीं होता की वह बड़े अनुष्ठान को निति नियम पूर्वक साधनात्मक आचरण करते हुए सम्प्पन करे. प्रस्तुत लेख मे धन प्राप्ति से सबंधित कुछ ऐसे प्रयोग दिये जा रहे है जिससे की जो व्यक्तिओ के पास समय का आभाव हो वह भी साधना के माध्यम से लाभ उठा कर अपने मनोभिलाषा को पूर्ण कर सके.
१)  श्री प्रयोग:

अगर नित्य सूर्योदय के बाद तथा सूर्यास्त के बाद दिन मे दो समय इस मंत्र की एक एक माला की जाए तो धन के नए स्त्रोत मिलाने लगते है, किसी न किसी रूप मे धन सबंधित समस्या का समाधान हो ही जाता है. इस प्रयोग मे अपने सामने घी का दीपक लगाना ज़रुरी है. दिशा उत्तर रहे. वस्त्र तथा आसान कोई भी हो. मंत्रजाप कमलगट्टे की माला से होना चाहिए. यह प्रयोग किसी भी दिन से शुरू किया जा सकता है तथा इसे एक महीने तक करना चाहिए. इसके बाद माला को प्रवाहित कर दे.

ॐ श्रीं  श्रीं  श्रीं  नित्यमदद्रव्ये श्रीं  श्रीं  श्रीं  सिद्धिं नमः

२)  पारद लक्ष्मी प्रयोग:

  पारद लक्ष्मी का यह प्रयोग उत्तम है. मंत्रसिद्ध शुद्ध पारद लक्ष्मी विग्रह को अपने सामने स्थापित कर शुक्रवार की रात्री मे यह प्रयोग करना है. साधक का मुख उत्तर की तरफ हो. पहले साधक लक्ष्मी का सामान्य पूजन करे और उसके बाद स्फटिक माला से निम्न मंत्र का एक घंटे तक जाप करे. माला की गिनती ज़रुरी नहीं है. जाप एक घंटे तक चलना चाहिए.
ॐ श्रीं  शीघ्रसिद्धिं विष्णुपत्नी कल्याणमयी नमः
इस प्रयोग को ३ दिन तक करना चाहिए. इस प्रयोग से साधक को धन तथा ऐश्वर्य की शीघ्र प्राप्ति होती है. तथा उत्तरोत्तर वृद्धि होती रहती है. यह एक उत्तम प्रयोग है. साधक माला को संभल के रखे तथा जब भी यह प्रयोग भविष्य मे करने की इच्छा हो तब इस माला का प्रयोग किया जा सकता है.
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In life path one need to achieve materialistic and spiritualistic completeness at both the fronts. When it comes to materialistic happiness then everyone can understand what the significance of money is in living life. This is the profound truth of life that at every step we need money and can’t deny from this fact that it’s an important part of life. By which one can achieve all those luxuries in life. But when there is lack of money or financial crunches then life goes haywire and turns into burden. In those circumstances in culture our many sadhnatmak solutions are given to get rid of it which we should grab instantly. If we worship the gods and goddess in right way surely we can get proper solution.  In today’s hectic life schedule it’s really not feasible that to do big proceedings with all rules and regulations. And that to be with whole sadhnatmak intensions. In impending article such process are given which can be done without disturbing your following routine. And can take desired benefit in less time.
1.   Shri  Prayog.
On daily basis after sunrise if you do one rosary two times in a day then you will find many different sources to earn money. And in any ways you get rid of it. In this process you have to enlighten ghee lamp in front of you facing towards north direction. No restriction on Asan and clothes. Mantra Jap should be done via Kamalgatta rosary. You can start it on any day. Do it for one month. Then afloat it in river.
om shrim shrim shrim nityamaddravye shrim shrim shrim siddhim namah.


2. Parad laxmi Prayog:

This is the best process. Take a mantra siddh parad laxmi idol and establish it on Friday night. Facing towards north direction. First of all do a normal worship ritual of Laxmi. Then by crystal rosary chant the following mantra for one hour. No need to count rosaries. Jap should go on for one hour in continuity.

Om shrim shighrasiddhim vishnupatni kalyaanmayi namah

Do this process for for 3 days. By this process a sadhak can get wealth and luxuries in his life. This will just increase day by day. This is really best process. Sadhak should really keep the rosary with him with safe and care. And if wants to do it again then in that case he can repeat the same rosary.
   

                                                                                               
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Wednesday, March 28, 2012

SARV SIDDHI PRADAY VIDHAAN- 2 PRAKSHEPAN SADHNA (सर्व सिद्धि प्रदायक विधान – २ प्रक्षेपण साधना)



किसी भी साधना  को सिद्ध  करने के  उपरान्त वह कौन कौन  सी आवश्यक क्रियाये है.जिसके माध्यम से  सिद्ध की गयी  साधना  का  सफल प्रयोग  किया  जा सके . यह गोपनीय  विधान   तीन  आवश्यक  क्रियाओं से  युक्त हैं
संधान क्रिया साधना
प्रक्षेपण क्रिया साधना
 लक्ष्य   क्रिया साधना
 और इन सभी के   योग  से बनी ...सिद्धि  क्रिया .
इस  सिद्धि क्रिया   को जो इन तीनो  क्रियाओं  का सम्मलित  स्वरुप  हैं कैसे  उपयोग में  लिया  जाए ?. पर अभी  तो   इन तीनो क्रियाओं को  अलग अलग  समझना    ही होगा .
 “ संधान क्रिया  साधना   के  रहस्य सामने    ही चुके हैं   और  इस क्रिया  को कैसे   पूर्ण करना हैं वह भी   रहस्य   खुल  ही चुका  हैं  अब इसी दिव्यतम   सर्वथा आवश्यक  क्रियाओं की श्रंखला में   द्वितीय   क्रिया  प्रक्षेपण  क्रिया साधना “ के बारे  में ..
 संधान का मतलब  निशाना  साधने   की  क्रिया . पर प्रक्षेपण का   तात्पर्य की  कितने  तीव्रता  से  उसे  लक्ष्य पर...मतलब किस वेग   से लक्ष्य पर   छोड़ा  जाए   .अगर निशाना  सही होने के बाद  भी  तीव्रता  कम  हुयी  तो   फल या कार्य की  पूर्णता कैसे  संभव हैं .
यहाँ तक कि  लक्ष्मी  प्रयोग भी .  अगर  इन तीन गोपनीय  क्रियाओं  से  युक्त हैं  तो  वह कहीं ज्यादा   सफल  होगा .मानलो  हमारे  ऑफिस में  हमारा  जो उच्च अधिकारी  हैं  वह बे  वजह जब तक  हमारे सामने  रहता   हैं  हम पर चिल्लाता हैं  तो    इतनी  सी बात के  लिए  मारण प्रयोग का   उपयोग  तो  उचित नही  हैं  ..तो कोई ऐसा  प्रयोग   तो तत्काल उसे  शांत कर दे कहीं ज्यादा   उपयोगी सिद्ध होगा   तो इस  तरह  के शांति  वाले  प्रयोग  आना चहिये . एक ऐसा  ही  प्रयोग हमने   जो सदगुरुदेव प्रणित   रहा हैं  ब्लॉग  पर  दिया  भी हैं  कि  जिसे  सिद्ध करने कि कोई जरुरत  नही हैं बिना  सिद्ध किये   यह प्रयोग  किये जा सकते हैं .
तंत्र बाधा   निवारण के...... पितृ  वाधा निवारण के...   जितने  भी प्रयोग सदगुरुदेव  जी ने  दिए  हैं सब के  सब उन्होंने  अपने  प्राणों के  घर्षण  से दिये हैं .जिन्हें  सिद्ध करना नही पड़ता  बल्कि  सीधे  ही प्रयोग  में लिए  जा सकता हैं .
हर व्यक्ति जीवन में किसी  न किसी अतृप्ति भाव  को लेकर    ही  जीवन  में चल रहा हैं . आप चाहते हैं कि  रसेस्वरी   मन्त्र आपके लिए  पूर्ण सफलता  दायक हो जाये   तो ..भी इस  प्रक्रिया  का लाभ  आप ले सकते हैं  पारद को अग्नि स्थायी  करना   हैं  तो सबंधित प्रक्रिया  को  तो  सिद्ध कर लिया  पर   उपयोग कैसे  करना  हैं .
सदगुरुदेव   जी ने  एक सिद्धि पुरुष  साधना  भी  इस हेतु मंत्र  तंत्र यन्त्र  विज्ञानं में   दी हुयी   रही हैं .जिसके  यदि  सवा लाख मंत्र जप कर लिए  जाए  तो जो भी  साधना के  इष्ट  हैं  साधक उनके  प्रत्यक्ष   दर्शन कर सकता हैं  .साथ ही साथ आप  और आपके  परिवार  को  पूर्ण  रक्षा भी प्राप्त होती हैं.
मानलो  तंत्र वाधा  का प्रयोग किया जा रहा हैं  तो इसमें  हवन आपको नही करना हैं  बल्कि इस प्रयोग  से राइ को  अभिमत्रित(१०८  बार  इस  मंत्र का  जप  करके अभिमंत्रित  कर )  घर  के बाहर  विखेर  दे  यह क्रिया  तीन  दिन कर ले   फिर  आपके  घर पर   कोई भी प्रयोग नही  हो गा .यह प्रयोग  एक बार  ही किया  जाता हैं . और  यदि  कोई  हर वर्ष  कर ले   तो कई  गुना   और  प्रभाव   देख सकता  हैं
इस  प्रयोग  को सिद्धाश्रम देव  लक्ष्मी  प्रयोग “ या  “गुप्त  षोडशी  प्रयोग “ भी कहते हैं .क्योंकि यह  तीन  बीज  से  संयुक्त मंत्र  आपने आप में  दिव्यता लिए हुए हैं .यही नही इस  प्रयोग  को सफलता  पूर्वक करने  से  यदि  साधक  चाहे कि उसके  द्वारा  किये जा  रहे   अन्य प्रयोग में कोई विघन  वाधा ना करे या साधना काल  में  न आये  तब भी यही प्रयोग  की  शक्ति काम में  आती हैं .
इस प्रयोग  को सम्पन करने  पर  जो लक्ष्मी का   घर  आगमन होगा  वह   स्थिर  होगी... चंचला  नही . क्योंकि यहं मंत्र  श्री  और  गुप्त षोडशी से  संयुक्त हैं .और सिद्धाश्रम   लक्ष्मी युक्त हैं .
मंत्र :  ह्रीं  क्लीं  हसौ:
 Mantra:  hreem   kaleem   hasouh.
    ह्रीं – महा सरस्वती  का  बीज मन्त्र हैं .
   क्लीं -  महाकाली का बीज  मंत्र हैं
  हसो:  -यह राज राजेश्वरी का  बीज मंत्र  हैं. सदगुरुदेव  द्वारा   विस्तृत  व्याख्या  एक शिविर  में  की  गयी थी की   किस  तरह से  ह्रीं  बीज मंत्र  अकेला ही  महाकाली  , महालक्ष्मी और महा सरस्वती  तीनो का बीज  मन्त्र हैं  .        
आवश्यक  विधान:
·         एक बार  में आसनस्थ होने पर   ११ माला  मंत्र   जप करना  हैं
·         इस मन्त्र  की  कुल  ३००  माला  मंत्र जप करना हैं  
         कुल  ९  दिन में पूरा मंत्र  जप  करना हैं 
·         ब्रह्मचर्य   आदि नियमों की  कोई आवश्यकता नही ..(फिर  भी कर  सके  तो  उचित  रहता ही हैं )
·         जितने  दिन  घर से बाहर  रहे हैं(यदि साधना काल  में  और बाहर  खाना  आदि खाना  पड़ा  हो  तो ) उतने   दिन  गुणित  ३ माला  हर दिन के हिसाब से नवार्ण  मन्त्र की  कर ली जाए  तो  त्रि   दोष  नही लगता  हैं .
·         वस्त्र  और आसन  लाल   होना चाहिये .
·         किसी भी  माला से केबल तुलसी की  माला को  छोड़  कर  जप कर सकते हैं.
·         दिशा  पूर्व या  उत्तर  रहे   तो  उत्तम हैं
·         किसी विशेष  समय  की  अनिवार्यता  मन्त्र जप  काल में  नही हैं
·         यदि  इसी समय संधान क्रिया के मंत्र  जप भी किये  जा रहे  हैं  तो  जैसे  ही उस  दिन का  संधान क्रिया का मन्त्र  जप समाप्त  हो तत्काल  इस क्रिया  का  मन्त्र  जप  किया  जा सकता  हैं  .
.  इस तरह से  यह  दूसरी आवश्यक क्रिया  कैसे सम्पन्न करना हैं ,यह रहस्य  आपके सामने  हैं आप  इस  क्रिया   को  सफलता  पूर्वक सम्पन्न   कर सकते  हैं .सरल  हैं ...इस तरह आप  इस सिद्धि  दायक  आवश्यक गोपनीय  विधान  कि  दूसरी  महत्वपूर्ण क्रिया  आपके सामने  हैं .
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After succeeding sadhna(siddh some sadhna), which are the necessary procedures(Kriyaaye)?, through which we can use that succeeded sadhna(siddh sadhna)? This secret Process consist of three procedures:
संधान क्रिया साधना(SANDHAAN KRIYA SADHNA)
प्रक्षेपण क्रिया साधना(PRAKSHEPAN KRIYA SADHNA)
 लक्ष्य   क्रिया साधना(LAKSHYA KRIYA SADHNA)

And the result of all these is…….SIDDHI KRIYA……
The “SIDDHI KRIYA” which is the combined form of the above three Kriyaa’s. How to use this? But, first we have to understand each of these three kriyaa’s separately….
The secrets of संधान क्रिया साधना(SANDHAAN KRIYA SADHNA) had already come in front of you all and how to do that procedure, the secret of that also has opened…….Now, in this divine series of necessary procedures, the second procedure(kriya) is ……. प्रक्षेपण क्रिया साधना (PRAKSHEPAN KRIYA SADHNA)

The sandhaan means the process of firing at the goal…..but prakshepan means how speedily the bullet is moving at the goal…..in other words, with how much force the bullet is fired….If the bullet has fired at the right point but its speed or force is less….then, how it will be fruitful or how we will succeed in our work……
If our Laxmi Paryog consists of these three secret procedures, then, it will succeed with more result….suppose in our office, if some high officer always shout on  us without any reason….then, for this type of small problems, the use of maaran paryog is not right or appropriate…..so, at that time, the paryog which can change his behavior  or remove his angriness to coolness instantly will be more beneficial for us …..so, we should know this type of peaceful paryogs in which we can mould the angriness of others ……This type of paryog which we have received from our sadgurudev has already given in the blog..we can use  these type of paryogs without siddh them…there is no requirement to siddh them…….
The paryogs for removal of tantra baadha, Pitra Baadha…….the paryogs which has been given by the sadgurudev, these all are given by him through the power of his Praans only….we do not have to siddh them. Instead we can use them directly…..
Every person of this world is moving with the feeling of unsatisfaction in his life……if you want that raseshwari mantra should be fully fruitful to you…then, also you can take the benefit of this process…..if we want to do mercury(paarad)Agni  Sthaai ,then, even if we have siddh that process but we don’t know how to use that?
Sadgurudev has also given the  one “SIDDHI PURUSH SADHNA” in the mantra tantra yantra vigyaan, if someone do the 1.25 mantra , then, sadhak can get the darshan of the isht of the sadhna. At the same time, you and your family get the full security……..

Suppose, we are doing the procedure of tantra baddha, then, for this we do not have to do the havan. Instead, we have to mantraized the Raai (do 108 times of mantra jaap and mantraized it) with this paryog and throw it outside our house…..If we do this paryog continuously for three days, then, no paryog can be done in your house. This paryog should be done once and if someone do it every year ,then, one can see its effect with more degree……
This paryog or process is also called “Siddhashram Dev Laxmi Paryog” or “Gupt Shodashi Paryog ” . Because it is a combination of three beej mantra, contain divinity in it…..By doing successfully this paryog, if sadhak want that no obstracle should come in other paryogs or during sadhna time, then, also the shakti(power) of this paryog works for us.
After doing this paryog, the arrival of laxmi in our homes will be stable….not the unstability of laxmi will be there because this mantra is a combination of shree and secret Shodashi and containing siddhashram laxmi….
मंत्र :  ह्रीं  क्लीं  हसौ:
 Mantra:  hreem   kaleem   hasouh.
    ह्रीं – (Beej mantra of mahasaraswati)
   क्लीं -  (Beej mantra of mahakaali)
  हसो:  -(Beej mantra of raaj raajeshwari). Sadgurudev has given the definition in one of the shivir that how alone “HREEM” is the beej mantra of all the three mahakaali, mahalaxmi and mahasaraswati .

Necessary Procedure:
          .In one seating, 11 malas has to be done.
          .Total 300 malas of this mantra has to be done.
          Mantra jaap should be done in total 9 days.
          .The necessary requirement of following of Brahmcharya etc rules is not there(but, it will be good if u follow that).
          . If someone leaves out of house(if outside food has been eaten during sadhna period), then,for that much days *3 maala of Navaarn mantra should be done,so that, we could be saved from tri dosh.
          .Clothes and Aasan should be red.
          .Jaap can be done from any maala except tulsi maala.
          .Direction north or east will be best.
          .The necessary of following some special time during mantra jaap is not there.
          .If the mantra jaap of sandhaan kriya is also being done at the same time, then, after doing mantra jaap of sandhaan kriya of that day, we can continue the mantra jaap of this process also.
          .In this way, how to do the second necessary procedure, this secret is in front of u. You can do this procedure successfully, it is simple…..In this way, the second important procedure of the necessary secret process is in front of all of u.
 
   

                                                                                               
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