Friday, November 30, 2012


Our ancient sages and saints have touched those dimensions of life which are beyond imagination of humans. Through their sadhna power, they have reached that stage in life which can be only a dream for any person. It may be related to attainment of complete prosperity and pleasure in materialistic life or it may be attaining completeness in spiritual life. Through there sadhna power they beautified their life by continuously improving it and they also kept their knowledge safe for future generations and propagated it too. But due to our shortcomings, we could not attain that knowledge. Our negligence made this knowledge obsolete and then we did not had any other option then to live life in shadow of doubts. Something happened in the case of Kundalini subject. The numbers of misconceptions which are spread regarding subjects like Kundalini and Yog-Tantra probably are more than any other subject. Prime reason behind it is our negligence in not understanding the subject or considering description of any person to be true. In reality what should happen is that we should experience it ourselves and become witness ourselves. Well, today nothing is considered beyond activation of Kundalini chakras and through Yoga or Tantra, they are activated. Besides it, there is no special procedure relating to Kundalini which we are aware of.
Sadgurudev have so many times disclosed so many unknown secrets relating to Kundalini in various shivirs, in his articles and recorded discourses which had earlier become obsolete with time. In the same context, he told about Kundalini Yog through which person can enter deep inside and sees his inner self-evolved Ling and chakras situated inside and can attain many accomplishments. It is Yogic procedure about which he has told. But there is one Mantric Yog procedure of Kundalini Yog too about which may be he has not told to everyone but he has told the procedure relating to it to some disciples. Under this procedure, sadhak can combine power of Mantra with Kundalini Yog and move at faster pace. Whereas on one hand Kundalini Yog takes time and is completely dependent upon physical activity , on the other hand Kundalini Mantra Yog besides relying on physical activity also relies on voice of Mantra by which activation of power can happen at much faster pace. Prayog presented here is very rare. Those who have done Kundalini Yog practice, they can certainly feel the necessity of fruitfulness of this prayog. To add to that, it is easy too and can be done by any sadhak or sadhika.
This prayog can be started on any day. Appropriate time for this sadhna is sunrise. If sadhak cannot do it at the time of sunrise or Brahma Muhurat then sadhak should select such time when there is no noise or at least it is very less. Surroundings should be calm and there should not be any disturbance in the middle of sadhna.
Sadhak can wear dress of any colour for this prayog and can chose direction of his own choice.
First of all sadhak should do Guru Poojan. Then sadhak should chant Guru Mantra.
After chanting Guru Mantra, sadhak should do the Anulom and Vilom Pranayama procedure.
After Anulom and Vilom sadhak should fill air in his stomach through two nostrils and stop it inside using Jalandhar Bandh i.e. touch jaw of face under the throat.
After this, sadhak should mentally chant beej mantra “Eem”.
After chanting for some time, sadhak starts felling clearly the vibration in his navel. If air is filled inside lungs instead of stomach then this vibration is not felt in this procedure. And if sadhak does not chant Beej Mantra then his concentration will not go to chakras lower than Aagya Chakra. But after chanting for some time, concentration gradually gets stabilized from Anahat to middle of Muladhaar.
This procedure should not be done for more than 5 minutes. After this, sadhak should do Bhasrika. At least 100 Bhasrika needs to be done and they should be done in not more than 3 minutes.
After doing Bhasrika, sadhak should close his eyes and mentally chant below mantra.
om hoom hreem shreem
Certainly, after some time sadhak starts feeling his inner depth and as sadhak goes on practicing he keeps on diving deep into infinite depth of his body.

हमारे प्राचीन ऋषि तथा योगियों ने अपने जीवन के उन आयामों को स्पर्श किया था जिसके बारे में मनुष्य की कल्पनाशक्ति सोच भी नहीं सकती. उन्होंने अपने साधना बल से जीवन की जिस स्थिति को स्पर्श किया था वह किसी भी मनुष्य का स्वप्न मात्र हो सकता है, चाहे वह भौतिक जीवन में पूर्ण वैभव और सुख भोग को प्राप्त करना हो या फिर वह आध्यात्मिक जीवन की परिपूर्णता को प्राप्त करना हो. साधनाओ के बल पर उन्होंने अपने जीवन को हमेशा उर्ध्वगति को प्रदान करते हुवे निखारा तथा अपनी आगे की पीढ़ियों के लिए उन्होंने अपने ज्ञान को सुरक्षित किया तथा उसका प्रसार भी किया. लेकिन हमारी न्यूनताओ के कारण हम उस ज्ञान की प्राप्ति नहीं कर सके, हमारी उपेक्षाओ में यह ज्ञान लुप्त होने लगा और फिर हमारे पास भ्रम और भ्रांतियों में जीवन काटने के अलावा और कोई विकल्प रहा ही नहीं. कुछ ऐसा ही हुआ कुण्डलिनी के विषय में भी. आज कुण्डलिनी और योग तंत्र जेसे विषय पर जितनी भ्रांतियां फैली हुई ही उतनी सायद ही किसी विषय को ले कर हो. इसका मुख्य कारण हमारी इस विषय को न समजने की उपेक्षा तथा कोई भी व्यक्ति की व्याख्या को सत्य मान लेने की भूल है. वस्तुतः होना यह चाहिए की हम खुद अनुभव करे तथा फिर स्वयं ही स्वयं के पास प्रमाण बने. खैर, आज कुण्डलिनी को चक्रों के जागरण से अधिक कुछ समजा ही नहीं जाता तथा योग या तंत्र के माध्यम से इसका जागरण किया जाता है, इसके अलावा कोई भी विशेष प्रक्रिया या कुण्डलिनी सबंध में हमें कुछ ज्ञात नहीं है.
सदगुरुदेव ने कुण्डलिनी के सबंध में कई बार शिविरों, अपने लेख तथा रिकॉर्ड प्रवचन में कई कई ऐसे अज्ञात रहस्यों को खोला है जो ज्ञान काल क्रम में लुप्त ही हो गया था. इसी क्रम में उन्होंने कुण्डलिनी योग के बारे में बताया था, जिसके माध्यम से व्यक्ति अपने अंदर की गहराई में उतर कर अपने आतंरिक स्वयम्भू लिंग तथा शरीर के अंदर स्थित चक्रों का दर्शन कर सकता है तथा कई सिद्धियों को प्राप्त कर सकता है. यह योगिक प्रक्रिया है जिसके बारे में उन्होंने बताया है. लेकिन साथ ही साथ इस कुण्डलिनी योग की एक मांत्रिक योग प्रक्रिया भी है, जिसके बारे में उन्होंने भले ही सभी के मध्य बोला नहीं हो, लेकिन अपने कई शिष्यों को उन्होंने इसके सबंध में प्रक्रिया को बताया है. इस प्रक्रिया के अंतर्गत साधक कुण्डलिनी योग में मन्त्रबल का संयोग कर तीव्रता से गतिको प्राप्त कर सकता है. जहां एक और कुण्डलिनी योग समय लेता है तथा पूर्ण रूप से शारीरिक प्रक्रिया पर आधारित है, वहीँ कुण्डलिनी मन्त्र योग, शारीरिक प्रक्रिया के साथ साथ मांत्रिक ध्वनि की प्रक्रिया पर भी आधारित है, जिसके माध्यम से शक्तियों का जागरण कई गुना तीव्रता के साथ हो सकता है. प्रस्तुत प्रयोग दुर्लभ है, जिन्होंने कुण्डलिनी योग का अभ्यास किया है वे व्यक्ति निश्चय ही इस प्रयोग की सार्थकता की अनिवार्यता का अनुभव कर सकते है. साथ ही साथ यह सहज भी है, जिससे यह कोई भी साधक या साधिका को करने के लिए उपयुक्त है.
यह प्रयोग किसी भी दिन शुरु किया जा सकता है. इस साधना के लिए उपयुक्त समय सूर्योदय है अगर साधक यह सूर्योदय या ब्रह्म मुहूर्त  के समय नहीं कर सके तो साधक को ऐसे समय का चुनाव करना चाहिए जब शोरगुल कम हो या बिलकुल न हो. वातावरण शांत हो तथा साधक को साधना के मध्य कोई व्यव्घान उत्पन्न न हो.
इस साधना में साधक कोई भी रंग के वस्त्र धारण कर सकता है तथा दिशा भी कोई भी हो सकती है.
साधक को सर्व प्रथम गुरु पूजन गुरु मन्त्र आदि करना चाहिए. इसके बाद साधक गुरु मंत्र का जाप करे.
गुरु मन्त्र के जाप के बाद साधक को पहले अनुलोम विलोम प्राणायाम की प्रक्रिया करनी चाहिए.
अनुलोम विलोम के बाद साधक अपने दोनों नथुनों से साधक हवा अपने पेट में भरे तथा उसे जालंधर बंद लगा कर रोक रखे. अर्थात मुख का जबड़ा गले के निचे स्पर्श करा दे.
इसके बाद साधक मन ही मन में बीज मन्त्र ‘ ईं का जाप करे.
यह जाप थोड़ी देर करते ही साधक को अपनी नाभि में स्पष्ट रूप से स्पंदन अनुभव होने लगता है. अगर हवा पेट की जगह फेफडो में भरी जाए और फिर यह क्रिया की जाए तो स्पंदन का अनुभव नहीं होता है. और अगर साधक बीज मन्त्र का जाप नहीं करता है तो उसका ध्यान आज्ञा चक्र से निचे की तरफ नहीं जाएगा लेकिन थोड़ी देर बीज मन्त्र का जाप करते ही वह धीरे धीरे अनाहत से मूलाधार के बिच में स्थिर होने लगता है.
इस प्रक्रिया को ५ मिनिट से ज्यादा नहीं करना चाहिए. इसके बाद साधक भस्त्रिका करे. भस्त्रिका कम से कम १०० करनी है. जिसमे ३ मिनिट से ज्यादा समय नहीं लगना चाहिए.
इस प्रकार भस्त्रिका कर लेने के बाद तुरंत आँखे बंद कर निम्न मन्त्र का मानसिक जाप करते रहना चाहिए.
ॐ हूं ह्रीं श्रीं
(om hoom hreem shreem)
निश्चय ही थोड़े ही समय में साधक को अपनी आतंरिक गहराई का अनुभव होने लगता है तथा साधक जैसे जैसे अभ्यास करता रहता है वह अपने शरीर की अनंत गहराई में उतरने लगता है. 


Thursday, November 29, 2012


Naasti Tantra Sam Shastram , Na Bhakt KeshwaatParah |
Na Yogi ShankaaradGyaani, Na Devi Nilya Para ||
There is no shastra better than Tantra, no devotee is better than Keshav, there is no better yogi and learned person than Shankar and there is no better goddess then Neel Saraswati.
There are many forms of Bhagwati Tara. Somewhere, she is known by the name of Ugra Tara, she is also known by Ekjata and at various instances she is also referred to as Neel Saraswati. Each name in her Sahastranaam (1000 names of particular god/goddess) carries a hidden meaning from the very beginning. Sadhak Fraternity mostly do the sadhna of Tara goddess for attainment of wealth that too in abundance and this is only one ordinary quality of her. But the one form which is considered as very ordinary, that is form of Neel Saraswati. This is because of more inclination towards wealth rather than knowledge in today’s era.
Tantra sadhaks will be amazed to know that whereas on one hand, this form is capable of providing Vidya that too completely and on the other hand with this ‘Neel Saraswati Form’, extremely dreadful and difficult tantric sadhnas are also possible. Even shamshaan sadhna and shav sadhna (sadhna done on corpse) is possible .This is because knowledge should not be seen only in one dimension. Today knowledge has become a symbol of mugged up education whereas it has been clearly mentioned in shastras that knowledge is the thing which is self-experienced , which can introduce person to real meaning of life , enables him to experience soul and introduce him to his real form
And there are many categories of knowledge. Even those personal and intimate subjects about whom it is not considered appropriate to say, knowledge about that aspect is also knowledge. And great person knows that knowledge is infinite. Difference lies in the fact that how he uses this knowledge for his benefit, for welfare of nation, for welfare of society and even beyond it for the welfare of entire world.
Tatvgyaanaat Param NaastiNaastiDevahSadshivaat |
NaastiBhaavastuMadhyaasthaannstiNeela Sam Padam ||
There is no element superior to knowledge, no god superior to SadaShiv, no bhaav superior to Sushamana and no authority superior to Neel Saraswati.
So this form and this idol full of knowledge have got special importance. And this form is present in this Parad Sahatraanivata Tara idol in totality.
In absence of knowledge
How one sadhak will understand his life?
What is aim of his life?
How he has to make his life meaningful?
How he has to fulfill completely his role of disciple?
How he will understand what is meaning of bliss in life?
How he will understand what motherly love is?
How will he understand Bhoga?
How will he remain aloof from sub-conscious mind while indulging in Bhoga?
Because all procedures and sadhnas are for purpose of knowledge only which Yogi, Mahayogi, Devta etc. aspire to attain. No desire is left after attaining that supreme knowledge, no resolutions, and no alternatives where soul becomes aware of its real form and experience it continuously. And all this knowledge is in darkness from so many births and this knowledge is in dormant state due to negative influence of evils, ignorance and past life karmas. And it is only possible through grace of Bhagwati Tara that person gets introduced to his real form.Without Shakti sadhna how can this high state i.e. high state of knowledge be attained and manifested.
ShrunuDevi !Rahasyam me Param Tatv VadaamiTe |
Yasyah Maatren BhuktiMuktiVinditi ||
AnenDhyan Maatren BhuktiMuktiVinditi |
AnenDhyan Maatren SadhakasyMatirbhavet ||
Bhairav says that …..” He Devi, just be remembering which sadhak attains bhoga and moksha (salvation), I am saying that hidden supreme element to you, listen to it.Just by its dhayan, sadhak attains Bhoga and Moksha and besides it sadhak become knowledgeable”
Sadhak should think once that after all which sadhna and which god has so much power which is capable of making even impossible possible.  
VisheshtahkaliyugeNaranaamBhuktiMuktidm |
Neel Tantra Mahatantra Sarv Tantotmootam Tantra ||
TasyaUpasakschaivBramhaVishnuShivaadyah |
ChandrsuyaschVarunahKuberomagnistthaParah ||
DurvashaschVasisthaschDatatreyoBraspatih |
BahnaKimiHotemSarve Deva Upasakaa ||
There is only Neel Roopa Tara Mahavidya especially in Kalyuga which is capable of providing salvation to humans. Her tantra is Mahatantra and is best of best tantra. Bramha , Vishnu , Shiva , Chandra , Surya , Varun, Kuber , Agni , Prabhrati ,god and Durvasa , Vasisht, Datatrey , Brahaspati and entire saints fraternity  worship Tara. In other words, Entire Dev Shakti worships her.
Attaining Tara Mahavidya and such idol can be called fortunate. Though there are many present in streets providing knowledge of this Vidya but do you see any achievement of them in their own lives? Just see their power of words and speaking ability who call themselves as worshipper of her. Sadgurudev has clearly said that the one who gives knowledge after reading from books is also a Guru and he must also be respected. But supreme Guru is the one who does not need any books, who has experienced it himself, who can say and give example from any scripture anytime anywhere. This Supreme Guru is called Sadgurudev otherwise people have starting making jokes of this name but truth does not remain hidden for so much long.
Just think for one moment that how it possible is that person who has accomplished Hanuman completely, imbibed him completely is devoid of strength and is weak.
One most important fact to be kept in mind regarding Bhagwati Tara sadhna is that up till the time sadhna and poojan of her Bhairav is done, her sadhna is not completed and her Bhairav is Aksaubhya who reside in her hairs. This fact should be known by all those sadhaks who are doing Mahavidya sadhna. However, there is one exception to the above fact and that is when Sadgurudev himself has directed person for Mahavidya Mantra. Otherwise there is no relaxation to this rule.
And how is it possible today to do procedures of those tantras?
For which no societal, no health, no moral and no legal rules will give permission ?
So have these procedures become a joke or in its name, crowd of those doing disgusting conduct have come forward. It seems that people have started making mockery of Tantra Procedures. Keeping all these facts in mind Sadgurudev many times made novel creations by taking assistance of Parad. He pretty well understood that sadhaks of today neither have that distinction nor the level of dedication. There is no limit to moral degradation in today’s generation. They do not have physical strength and intensity. So should they be left behind?But how could have Sadgurudev done it….” He said repeatedly that this time, it is not you but me who has hold your hand and I will take you towards completeness”

So with the help of Parad, such idol by the name of Parad Sahatraanivata has come in front of us. It makes all these procedure possible in peaceful way and there are no arbitrary procedures in name of Tantra, no violation of moral and societal rules and no disturbance in materialistic and personal life of sadhak. This is affection of our Praanadhar Sadgurudev that if he has made up his mind, then it is final. Universe does not have enough capability to stop that activity.
Today is the time to get this amazing idol and give meaning to life and not to lose this invaluable opportunity. And such idols are not available in market, though it is being done. In its name, some lead idol is given and sadhak unknowingly considers it as authentic one. Here sadhak has to use his brains because one right decision taken at right time has ability to transform your whole life provided person stays firm on his decision.
Otherwise we are all aware of our current state that sadhaks fluctuate between resolution, alternatives, this procedure and that procedure. In such troublesome and doubtful times if such idol is available, then it is more than enough. The one who has to give one speed and direction to his sadhna, he will continuously do sadhna. He will never be lazy and will not leave everything on Sadgurudev. Definitely one state comes when he devotes everything to Sadgurudev but for attaining that particular stage some activity needs to be done and this Parad Sahatraanivata idol will make that activity easy and simple.
Shiv Shakti BinaDevi !YoDhaaryetMoodadhi |
Na Yogi Syann Bhogi Syaat kalp KotiShatairapi ||
The fool who involves himself in other dharnaas without Shiva and Shakti, he neither becomes Yogi nor Bhogi even in hundred kalpas (a day of brahma consisting of 4320,000,000 year of mortals).
Such idol is capable of providing you abundant wealth, taking sadhak to higher level of knowledge, providing you those hidden secrets of Tantra and taking sadhak forward on this path. Then what is left to think…
Many sadhaks wants to do shamshaan sadhna and achieve competence in it.It is very fortunate that one of the forms of Bhagwati Tara is Shamshaan Tara. If sadhak desires then she also brings sadhak to necessary emotional platform otherwise entering into these sadhna will be like playing with your life and making mockery of supreme Tantra procedures. First emotional platform needs to be created then at appropriate time Sadgurudev automatically, if he feels sadhak is capable, will move sadhak forward on the path. Otherwise if sadhak has in its mind to do something wrong in the name of those procedures then sadhak can try its level best, it is not possible to imbibe those highest level secrets.
And if such type of Parad Idol of Bhagwati Tara is attained then automatically this emotional platform starts getting created and Bhagwati herself moves sadhak on path which is beneficial for him, which is in accordance with his sanskars, by which he can amplify his own purpose of life and pride of Sadgurudev.
Now only your decision is left…………..

नास्ति तंत्र सम शास्त्रं,न  भक्त  केश्वात परः |
न योगी शंकारद ज्ञानी, न देवी  निलया  परा ||
 तंत्र के समान  श्रेष्ठ कोई भी शास्त्र नही  हैं ,केशव की तुलना मे  कोई भी भक्त श्रेष्ठ नही हैं . शंकर की अपेक्षा कोई भी श्रेष्ठ योगी ज्ञानी नही हैं  और नील सरस्वती की अपेक्षा कोई भी श्रेष्ठ देवता नही  हैं .
भगवती तारा के अनेको स्वरुप हैं , वे कहीं पर उग्रतारा के नाम से  तो, कहीं  एकजटा  के नाम से, तो कहीं नील सरस्वती के नाम  से जानी जाती  हैं,और उनके सहस्त्रनाम  मे उनके  सभी नाम का  अपना अपना  एक गुह्य अर्थ  तो सदैव से  ही हैं.साधक गण मुख्यता तारा देवी की साधना या तो धन लाभ  और वह भी प्रचुरता से  पाने के लिए  करते हैं और यह भी तो संभव करने उन्ही का  एक सामान्य  सा  गुण हैं .पर एक रूप जिस को बहुत सामान्य सा  समझ लिया जाता  हैं  वह  हैं  उनका  नीलसरस्स्वती  स्वरुप हैं.क्योंकि आज  धन की कहीं ज्यादा आवश्यकता  हैं और  ज्ञान की किसे???
तंत्र साधक यह जानकर आश्चर्य चकित  हो जायेंगे की  एक ओर यह स्वरुप जहाँ  विद्या  और वह भी सम्पूर्णता के साथ, को देने मे सक्षम  हैं, वही  इस “नील सरस्वती  स्वरुप” से अनेको तांत्रिक साधनाए,घोर से घोरतम और  विकटतम  भी संभव हैं ,यहाँ  तक ही शमशान साधना से  लेकर   शव साधना  तक क्योंकि ज्ञान को हमेशा   एक रूप मे  या एकांगी ही नही  देखा जाना  चाहिए  आज जो ज्ञान शब्द का जो अर्थ या प्रतीक हैं वह तो वास्तव मे पढ़ी पढाई यारटी  रटाई विद्या हैं  जबकि शास्त्रों मे  स्पस्ट  हैं की जो स्व  अनुभव युक्त  हो, जो जीवन का सही अर्थ और आत्मानुभव  और अपने वास्तविक स्वरुप से व्यक्ति का स्व परिचय करा दे,उसे आत्मालीन करा दें , वही ज्ञान हैं .
और ज्ञान  की अनेको श्रेणियाँ हैं और कोई भी ज्ञान,  यहाँ  तक की जिन व्यक्तिगत गोपनीय विषय पर बात करना उचित  नही कहा जा सकता हैं. उन पक्ष भी ज्ञान आखिर ज्ञान ही तो हैं, और एक श्रेष्ठ पुरुष यह जानता है की ज्ञान मे कोई कमी नही बल्कि उस ज्ञान को किस तरह  वह व्यक्ति अपने  हित मे,  देश हित मे,  समाज  हित  मे  और इससे भी आगे  की सम्पूर्ण चराचर के हित मे  कैसे  प्रयोगित करता हैं ..अंतर इस बात  का हैं .
तत्वज्ञानात परं नास्ति नास्ति देव : सदशिवात |
नास्ति भावस्तु मध्यास्थान्न्स्ती  नीला सम् पदम ||
ज्ञान से श्रेष्ठ कोई तत्व नही हैं,सदाशिव से श्रेष्ठ कोई देवता नही हैं.मध्यस्थ (सुषुम्ना )से  श्रेष्ठ कोई भाव नही हैं, और नील सरस्स्वती से श्रेष्ठ कोई पद नही हैं.
तो इस स्वरुप की,इस ज्ञानमय विग्रह की कोई न कोई विशेषता  तो हैं ही  और यह स्वरूप  पूरे  पूर्णता  के  साथ इस   पारद  सह्त्रान्विता देह तारा   विग्रह मे हैं.
जब ज्ञान ही नही होगा तो
कैसे एक साधक अपने जीवन को समझेगा ?
उसके जीवन का लक्ष्य  क्या हैं ?
उसे कैसे अपने जीवन को एक अर्थ देना हैं ?
कैसे अपनी शिष्यता को सही अर्थो मे साकार करना हैं?  
जीवन मे  क्या आनंदमयता  हैं ?
क्या वात्सल्यमयता हैं ?
और कैसे वह भोग को समझेगा ? 
और भोग मे प्रवृत  होकर भी अंतर मन से  अछूता  कैसे रह पायेगा ?.
क्योंकि सारी  क्रियाए  सारी साधनाए उस  ज्ञान के लिए   ही तो हैं जिसे  योगी,  महायोगी,  देवता   और सभी पाना  चाहते हैं.जिस सर्वोच्च ज्ञान के बाद कोई भी और इच्छा  शेष नही रहती, न  ही कोई संकल्प, न  ही कोई विकल्प जहाँ आत्मा  अपने  आप  को अपने सत्य स्वरुप  को जान लेती हैं  और लगातार अनुभव करती रहती हैं, और यह सारा  ज्ञान  जो अंधकार  मे जन्मो से  पड़ा हैं,जिस पर जन्मो जन्मो के पाप, अज्ञानता,विगत कर्मो की कालिख  के कारण यह  ज्ञान सुशुप्त  अवस्था मे  पड़ा  हुआ था,और यह तो भगवती की दया दृष्टी से  ही संभव हैं की व्यक्ति अपने आप को जान पाए , अपने सत्य स्वरुप से परिचित हो सके . यह तो भगवती तारा  की कृपा से  ही तो संभव हैं .
बिना  शक्ति साधना के  कैसे  उस उच्च अवस्था को या इस उच्च ज्ञान अवस्था को पाया जा  सकता हैं,साक्षात् किया जा सकता हैं  .
श्रुणु देवि ! रहस्यं  मे परं  तत्व  वदामि  ते |
यस्या:मात्रेण भुक्तिं मुक्तिं  विन्दति ||
अनेन  ध्यान मात्रेण  भुक्ति मुक्तिंच विन्दति |
अनेन  ध्यान मात्रेण  साधकस्य मतिर्भवेत ||
 भैरव  कहते हैं की ...  “हे देवी  जिनके स्मरण मात्र से  साधक भोग और मोक्ष  पाता  हैं, मैं उस गोपनीय परम तत्व को  तुमसे कहता हूँ ,श्रवण करो. इसके ध्यान मात्र से  साधक को भोग और मोक्ष की  प्राप्ति होती हैं  और साथ मे साधक  इसके ध्यान मात्र से  ज्ञानवान, मतिवान  हो जाता  हैं |”
साधक स्वयम यहाँ  एक पल रुक कर सोचे  भाल और किस  साधना मे ,  और किस देव मे  इतनी शक्ति हैं जो यह असंभव को भी संभव बना  सकने मे समर्थ हैं .
विशेषतः कलियुगे नराणां भुक्ति मुक्तिद्म |
नील तंत्र महातंत्र  सर्व तन्त्रोत्तमोतम्  तंत्र||
तस्य उपासकस्चैव  ब्रम्हाविष्णुशिवादय: |
चंद्रसुर्याश्च  वरुण : कुबेरोंग्निस्तथा परः ||
दुर्वाशाश्च  वाशिस्ठाश्च दत्तात्रेयो  बृहस्पति :|
बहना किमि होत्तें  सर्वे  देवा उपासका ||
कलियुग मे विशेषतः  नील रूपा  तारा महाविद्या  ही एक मात्र  हैं, जो  मानव समूह को भुक्ति मुक्ति प्रदान करने  वाली हैं. यह तंत्र ही एक महातंत्र  हैं. और सर्वोत्तम तन्त्रो से  भी श्रेष्ठतम तंत्र हैं .ब्रम्हा, विष्णु,शिव, चंद्र, सूर्य, वरुण, कुबेर, अग्नि, प्रभृति,  देवगण और दुर्वासा,वशिष्ठ,दत्तात्रेय, बृहस्पतिऔर समस्त ऋषि गण इसके अर्थात भगवती तारा उपासक हैं और अधिक क्या कहा जाए,एक प्रकार से समस्त देव शक्ति ही इसके  उपासक हैं .
यह तारा महाविद्या और ऐसे विग्रह को प्राप्त करना  बहुत  ही भाग्य  या सौभाग्य या परम भाग्य  ही कहा जा सकता हैं,  यूँ तो आज  गली गली मे  इस  विद्या का  ज्ञान कराने  वाले  बैठे हैं पर  उनके  स्व जीवन मे क्या  इसकी कोई उपलब्धि दिखती हैं. जो इसके उपासक बने  बैठे हैं, उनके  शब्द  शक्ति और वाक् चातुर्य को ही देख ले . सदगुरुदेव  स्पस्ट कहते रहे की पोथिन पढ के  ज्ञान देने  वाला  भी गुरू ही हैं और वह भी प्रणम्य  हैं  पर श्रेष्ठ गुरू  तो वह होता हैं,  जिसे   कोई पोथी की आवश्यकता ही न हो,जिसने आखिन देखी की स्थिति स्व अनुभव  की हो, वह जहाँ चाहे,  जैसा  चाहे,  जिस ग्रन्थ को चाहे, वैसा कह सके, उद्धरण दे सके, वह होता हैं  एक “सदगुरुदेव” अन्यथा  अब तो इस नाम का भी  मानो मखौल सा बनने लगा हैं पर सत्य  बहुत देर छुपता  ही नही हैं .
एक क्षण को रुक  कर सोचे,  जिसे पूर्णता के साथ भगवान आंजनेय या हनुमान  सिद्ध हैं,  जिसने  उन्हें पूर्णता के साथ आत्मसात किया हैं  और वह स्वयम ही बल हीन हो तो कैसे  संभव हैं यह ...??
भगवती तारा के साधना मे   एक बहुत  ही ध्यान रखें  वाली तथ्य है उन की, जब तक उनके भैरव की साधना या पूजन न किया जाए  उनकी साधना पूर्ण नही होती हैं और उनके भैरव हैं अक्षौभ्य , जो उनकी जटाओ   मे  ही निवासित रहते  हैं, और यह तथ्य  तो हर उस साधक को जानना ही चाहिए  जो किसी भी महाविद्या की साधना मे लगा  हुआ हैं,हाँ इस तथ्य को सिर्फ एक जगह  छोड़ा जा सकता हैं  वह उसे, जिसे  सीधे सदगुरुदेव ने ही सिर्फ महाविद्या मंत्र के लिए  स्वत निर्देशित किया हो अन्यथा इस नियम से किसी  को छूट नही .
और आज कैसे  संभव  हैं उन तन्त्रो की क्रियाओं  को करना ?  
 जिसके लिए  न तो समाज,  न ही स्वास्थ्य, न ही नैतिक नियम और  न  ही कानूनी नियम अनुमति देंगे ?.
तब क्या  वह सारी  क्रियाए   मजाक बन्  गयी हैं या  उनके नाम  पर कुत्सिक आचरण करने  वालों की भीड़   सामने  आ गयी हैं. तंत्र  क्रियाओं का मानो माखौल सा उडाया जाने लगा हैं तो इन्ही बातों को ध्यान मे रखते  हुये  सदगुरुदेव  जी ने  अनेको बार  पारद  का सहयोग ले कर नवीनतम रचना की  वे अच्छी तरह से समझते रहे  हैं की आज  के  साधको मे न तो उतनी उच्चता हैं,  न  ही उतना समपर्पण  संभव  हैं,और आज की पीढ़ी मे चारित्रिक हास  और पतन की तो कोई सीमा ही नही ,न ही वह शारीरिक बल  और तेज उनमे हैं . तो क्या इन्हें  पीछे छोड़ दिया जाए .??.पर सदगुरुदेव ऐसा कब कर सकते रहे ..”उन्होंने  तो बारम्बार  बोला की  इस बार  तुमने नही, मैंने  तुम्हारा  हाथ थमा  हैं और तुम्हे उस पूर्णता  तक ले कर जाऊँगा ही यही उनका वचन रहा “.
तो पारद के संयोग से  ऐसा विग्रह   जो आज पारद सह्त्रन्विता  देह तारा  के नाम से  हमारे सामने  आया हैं   वह इन्ही  क्रियाओं  को सौम्यता के  साथ  संपन्न करा देता हैं, जहाँ  तंत्र के नाम पर ,न कोई मनमानी क्रिया,  न नैतिक, सामाजिक  नियमों का  उल्लघन , न  ही साधक के भौतिक और व्यक्तिगत जीवन मे किसी भी प्रकार का विक्षेप. यही  तो हमारे प्राणाधार सदगुरुदेव  की  करुणा हैं की जब उन्होने अपना मानस बना लिया तो बना लिया  फिर ब्रम्हांड मे   सामर्थ्य नही की उनकी क्रिया  को रोक सकें .
आज यह अद्भुत विग्रह को प्राप्त कर अपने  जीबन को एक अर्थ देने का और इस देव  दुर्लभ अवसर को न चुकने का समय हैं .और ऐसे विग्रह कोई बाज़ार मे थोक के भाव  मे  तो  मिलते नही हैं  हलाकि आज यही हो रहा हैं इनके नाम   पर कोई भी शीशा या  लेड का  कोई भी विग्रह थमा  दिया जाए  और साधक अपने  मे ही डूबा रहे .यहाँ  पर साधक को अपने  विवेक से  निर्णय लेना होता है, क्योंकि   एक सही और समय पर लिया गए  निर्णय  पूरे जीवन को बदल सकने की सामर्थ्य रखता हैं अगर व्यक्ति  अपने  निर्णय पर से  डिगे न .
अन्यथा  आज हमारी स्थिति जो हैं वह सभी कोई ज्ञात हैं की साधक वर्ग संकल्प, विकल्प  और इस प्रक्रिया और उस प्रक्रिया के मध्य झूलता  ही रहता हैं .और ऐसे   कष्टकारी  विभ्रम् कारी  समय मे  अगर ऐसा  विग्रह प्राप्त हो तो,  यही ही काफी हैं ,और  जिसे   अपनी साधना को एक गति, एक दिशा  तीर्वता  से देना  हैं वह तो सदैव  साधनामय होगा ही वह कदापि आलसी या सदगुरुदेव पर सब कुछ छोड़ कर नही चलेगा ,हाँ एक अवस्था आती हैं   ऐसी,जहाँ सब कुछ  सदगुरुदेव मय हो जाता  हैं पर उस अवस्था  लाने के लिए भी तो  कुछ करना  शेष होगा  और यह पारद विग्रह  जो सह्स्त्रान्विता  तारा के नाम से  हैं  इसी क्रिया को तो सरल और सहज बना देता हैं .
शिव शक्ति  बिना देवी ! यो धार्येत  मूढ़धि |
न योगी स्यान्न  भोगी स्यात  कल्प कोटि शतैरपि ||
शिव और शक्ति के बिना   जो मूढ़, अन्य धारणाओं मे प्रवृत होता हैं वह सैकड़ों कल्पों मे न तो योगी  होता हैं, न ही भोगी .
जहाँ एक ओर ऐसा विग्रह  जो धन धन्य को पूर्णता  से  उपलब्ध कराने मे ,ज्ञान  की उच्च सीमा  तक साधक को पंहुचा सकने मे,जीवन  और तंत्र की उन गोपनीय रहस्यों  को प्राप्त कराने मे समर्थ हैं या साधक  को अग्रसर करा सकने  मे समर्थ हैं  तब क्या और क्या सोचना शेष हैं.
अनेको साधक शमशान साधना  मे जाने  की  या उसमे  दक्षता  हासिल करने  की सोचते हैं और  यह भी कितने  सौभाग्य की बात हैं की भगवती तारा   एक रूप श्मशान तारा  हैं जी साधक की यदि इच्छा हैं तो उसके  लिए  आवश्यक वह भाव भूमि भी स्वत तैयार कर ही देती हैं अन्यथा   इन साधनाओ मे प्रवेश करना  सिर्फ  अपने  जीवन से  खिलवाड  या  उन उद्दात तंत्र क्रियाओं का मजाक उड़ाना ही कहा  जायेगा ,पहले भाव भूमि तो बने  फिर  उपयुक्त समय पर सदगुरुदेव  स्वत  ही, यदि उन्हें लगता हैं की वह साधक योग्य हैं तो आगे इस मार्ग पर बढ़ा देंगे  .अन्यथा साधक के मन मे उन क्रियाओं के नाम पर यदि  कुछ ओर अनुचित करने का हैं तो  साधक कितना  भी कोशिश करले  संभव ही नही हैं ऐसे  उच्चतम रहस्यों को हस्तगत करना .
और यदि इस  प्रकार के भगवती तारा  का  पारदीय विग्रह प्राप्त हो जाए ,तो स्वत ही वह भावभूमि बनने  लगती  हैं और साधक  को उस मार्ग पर भगवती स्वयं ही बढ़ा देती हैं जो  उसके लिए  हितकर  हो , जो उसके संस्कार मे हो, जिसके माध्यम से   अपने  जीवन के हेतु  को  और अपने  सदगुरुदेव के  गौरव को प्रवर्धित कर  सकें ..
अब  आपको निर्णय लेना ही शेष हैं..