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Friday, March 31, 2017

माँ चंडी रहस्य और साधना विधान





सप्तशती महत्व और चंडी रहस्य साधना 

माँ दुर्गा के महात्म्य का ग्रन्थ सप्तशती शाक्त संप्रदाय का सवार्धिक प्रचलित ग्रन्थ है और यह भी निर्विवाद सत्य है कि जितना शाक्त सम्पद्रय में है उतना ही शैव-वैष्णव और अन्य संप्रदाय में भी है सभी संप्रदाय में समान रूप से प्रचलित होने वाला एक मात्र ग्रन्थ सप्तशती है

पाश्चात्य के प्रसिद्द विद्वान और विचारक मि. रोला ने अपने विचारों में सहर्ष स्वीकार किया है कि “सप्तशती के नर्वाण मन्त्र को (ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै) संसार की सर्वश्रेष्ठतम प्रार्थनाओं में परिगणित करता हूँ” |

सौम्या सौम्य तरा शेष सौमेभ्यस्वती सुंदरी ----- “देवि तुम सौम्य और सौम्यतर तो हो ही, परन्तु इतना ही, जितने भी सौम्य पदार्थ है, तुम उन सब में सब की अपेक्षा अधिक सुंदरी हो” |
ऋषि गौतम मार्कण्डेय आठवे मनु की पूर्व कथा के माध्यम से नृपश्रेष्ठ सुरथ एवं वणिक श्रेष्ठ समाधी को पात्र बनाकर मेधा ऋषि के मुख से माँ जगदम्बा के जिन स्वरूपों का वर्णन किया गया है .. वह सप्तसती का मूल आख्यान है |

शक्ति-शक्तिमान दोनों दो नहीं है अपितु एक ही हैं शक्ति सहित पुरुष शक्तिमान कहलाता है जैसे ‘शिव’ में इ शक्ति है---यदि (शिव) में से ‘इ’ हटा दें तो ‘शिव’ शव बन जायेंगे | प्रलय काल में  शिव सृष्टि उदरस्थ कर लेते हैं  व पुनः कालान्तर में सृष्टि निर्माण होता है तब संकल्प शक्ति द्वारा भगवान शिव और शक्ति एक होकर भी अनेक हो जातें .

एकोऽहंबहु श्याम्-----
प्रभु प्रकृति योगमाया का आश्रय लेकर पुनः जगत प्रपंच को चलाते हैं, एस प्रकार प्रवाह से संसार नित्य है सृष्टी प्रलयकाल अनुसार होते हैं अतः काल भी नित्य है | जिस प्रकृति के स्वाभाव के कारण यह संसार चक्र गतिमान है, प्रकृति महामाया ही नित्य है सब कुछ नित्य हि है अनित्य कुछ भी नहीं सम्पूर्ण ब्रहांड में कोई देवी मानते हैं तो कोई देव को | ब्रम्हवेवर्त पुराण के गणेश्खंड में बताया कि सृष्टि के समय एक बड़ी शक्ति पांच नामों से प्रकट हुई – राधा, पद्मा, सावित्री, दुर्गा और सरस्वती |

   जो परब्रह्म श्रीकृष्ण कि प्राणाधिष्ठात्री हैं और उन्हें प्राणों से अधिक प्रिय हैं  वे ही राधा कहलाएगी, जो देवि ऐश्वर्य की आधिष्ठात्री और समस्त मंगलों को करने वाली हैं वे हि परमानन्द स्वरूपिणी हैं देवि लक्ष्मी (पद्मा) नाम से विख्यात है जो विद्या की अधिष्ठात्री और परमेश्वर की दुर्लभ शक्ति हैं और वेदों शास्त्रों पुराणों तथा समस्त योगों की जननी हैं वे सावित्री नाम से प्रसिद्द हैं जो बुद्धि की अधिष्ठात्री देवि हैं सर्वग्यानात्मिका और सर्वशक्ति स्वरूपिणी हैं हैं वे हि माँ दुर्गा हैं जो वाणी की अधिष्ठात्री हैं शास्त्रीय ज्ञान को प्रदान करने वाली और श्री कृष्ण के कंठ से उत्पन्न हुई वे सरस्वती के नाम विख्यात हुई .....

इस प्रकार एक ही देवि या देव अनेकानेक नाम से प्रसिद्द होए हैं यह सृष्टी त्रिगुणात्मिका है | इसमें सत्व, रज-तमो गुण सदा से रहें हैं और रहेंगे सप्तसती में तीन चरित्र के मध्यम से ही तीनों गुणों को दर्शाया गया है मुख्य बात ये है कि कभी सत्व गुण की प्रधानता होती है तो कभी रजोगुण बढ़ जाता है और कभी तमों गुण की वृद्धि होती है इसी प्रकार मनुष्य भी सतोगुणी, रजोगुणी, और तमोगुणी रहें हैं और रहेंगे | जो गुणवान होते हैं उसकी उपास्य देवि भी वैसी ही होती है, भगवान् श्री कृष्ण ने गीता में कहा है कि जो सत्वगुणी प्रकृति के होते हैं वे परमात्मा के साक्षात् स्वरुप देवों की आराधना करतें हैं जो राजसी की प्रकृति के होते हैं यक्षों, राक्षसों की पूजा करते हैं और जो तमोंगुणी पुरुष हैं, वे भूत प्रेत पिशाचादी की पूजा करते हैं |

जिसका जैसा स्वाभाव है जिसकी जैसी प्रकृति है श्रद्धा उसी के अनुसार वह बर्ताव करेगा और वैसी फलश्रुति होगी, जिसके पूर्वजन्म कृत संस्कारानुसार प्रकृति और स्वाभाव होता है और कार्य करता है |
कुछ लोगों का मत है कि, शास्त्रों में मायारूपी भगवती की ही उपासना कही गयी है | यह माया वेदांत सिधान्तानुसार है अतः मुक्ति में उसकी अनुगति नहीं हो सकती अतः भगवती की उपासना अश्रद्धेय है नृसिंहतापिनी में स्पष्ट उल्लेख है नारसिंही माया ही सारे प्रपंच की सृष्टी करने वाली है वही सबकी रक्षा करने वाली और सबका संहार करने वाली है उसी माया शक्ति को जानना चाहिए | जो उसे जानता है  वह मृत्यु को भी जीत लेता है वही अमरत्व को महतीश्री को प्राप्त करता है |
इन सबसे एक ही बात स्पष्ट होती है कि भगवती मायारूपा ही हैं देवि भाग्वातादी के अनुरूप माया स्वयम जड़ा (जड़)है | इसी माया की उपासना का यत्र-तत्र सर्वत्र स्थानों में विधान है | कंतु ऐसा कहना ठीक नहीं है क्योंकि इसका भाव दूसरा है जो निम्न लिखित प्रमाण से सिद्ध है कि देवि साक्षात् ब्रहमस्वरूपिणी  है

सर्वे     वै   देवा   देविमुपस्थु:   कासि  त्वम् महादेविती |
साब्रवीत्-अहं ब्रह्मस्वरूपिणी | मत्त: प्रकृति पुरुषात्मकं जगत् |

अर्थात देवों ने ने देवि  के निकट पहुँच कर उनसे प्रश्न किया—कि आप कौन हैं, देवि ने कहा मै ब्रहम हूँ, मुझसे ही प्रकृति पुरुषात्मक जगत उत्पन्न होता है |

इसी प्रकार ‘अथ द्रयेषां ब्रह्मरन्ध्रे ब्रह्मरूपिणी भुवानाधीश्वरी तुर्यतीता है’ (भुवनेश्वरी उपनिषद) ‘स्वात्मैव ललित’ (भावानैक उपनिषद)  आदि वैदिक ग्रन्थों में भी तुर्यातीत ब्र्हम्स्वरूपा भगवती ही है, यह स्पष्ट है | त्रिपुरातापनी और सुन्दरितापनी आदि उपनिषद में परोरजसे आदि गायत्री के चतुर्थ चरण में प्रतिपाद ब्रहम के वाचक रूप में ह्रीं बीज को बताया गया है कलि तारा आदि उपनिषदों में भी ब्रह्मरूपिणी भगवती की ही उपासना प्रतिपादित है सूत संहिता में कहा गया है---

  अतः संसार नाशायै साक्षिणीमाल्य रूपिणीम् |
 आराध्येत् परां शक्तिं प्रपन्चोल्लासवर्जितम् |

अर्थात् संसार निवृत्त के लिए प्रपंच-स्फुरण शून्य सर्वसाक्षिणी आत्मारूपिणी परा शक्ति कि ही आराधना चाहिए |
सर्व व्याख्यान एवं प्रमाणों से निर्विकार निरंजन अनंत अच्युत निर्गुण ब्रह्म को ही भगवती का वास्तविक स्वरुप बतलाया गया है देवि भागवत में भी कहा में भी कहा गया है कि निर्गुण-सगुण भगवती के दो रूप है | सगुणों के लिए देवि सगुणा और निर्गुणों के लिए देवि निर्गुणा | यथा--- 

स्नेही स्वजन !

अब आपके लिए माँ आदि शक्ति की वो साधना जो त्रिशक्ति के जाज्वल्य मान स्वरुप की साधना है, उसका व्याखान है इन नव दिवस में पूर्व में दी चंडी साधना के साथ इस साधना को भी कर लिया जाये तो माँ की कृपा प्राप्त होती ही है

यूं तो हमारे ब्लॉग पर कुंजिका स्त्रोत आदि के प्रयोग दिए गए है किन्तु अब इसे संपन्न करें |
सिर्फ तीन दिवसीय साधना है

चूँकि नवरात्री में सभी ज्योत जलाते ही हैं और जो नहीं जलाते वो कम से कम तीन दिवस तक अखंड दीपक प्रज्वलित करे लाल आसन, लाल वस्त्र यदि वाम पंथी है तो दक्षिण मुख और दक्षिण पंथी है तो पश्चिम दिशा का उपयोग करे माँ दुर्गा का चित्र लाल आसन पर स्थापित कर सामने दीपक जलाएं और मन्त्र सिद्धि का संकल्प करें ...

गुरु गणेश और भैरव पूजन सम्पन्न कर कुंजिका स्त्रोत का एक बार पाठ करें एवं पूर्ण नवार्ण मन्त्र की ११ माला संपन्न करें --- माला लाल हकिक या मूंगा या रुद्राक्ष का प्रयोग करें ....

मंत्र---

“ॐ एंग ह्रींग क्लीं चामुंडायै   ॐ ग्लों हुम् क्लीं  जूं  सः  ज्वालय-ज्वालय,
ज्वल-ज्वल प्रज्वल-प्रज्वल एंग ह्रींग क्लीं चामुंडायै विच्चे,
ज्वल हं शं लं क्षं फट् स्वाहा”

“Om eng  hreeng  kleeng  chamndaayai  vichchai  om glom hum  kleen  jum  sah
Jwalay-jwala y  prajwal-prajwal  eng  hreeng  kleeng  chamundayai  vichche
Jwal  ham sam  lam  ksham  fatta  swaha” |

साधना आप संपन्न करें और स्वयम अनुभूत भी आप करें क्योंकि मेरा  तो 20 वर्षों अनुभव है आज मै जो कुछ भी हूँ इसी साधना की वजह से हूँ इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं ---

***निखिल प्रणाम***

***रजनी निखिल***


Tuesday, March 28, 2017

ब्रह्माण्ड की अति तीव्र शक्ति साधना (चंडी साधना )





जय सदगुरुदेव !

आप सभी को नवरात्री की हार्दिक शुभ कामनाएं /\

यदि हम साधक हैं तो ये पर्व हमारे लिए क्या हो सकता है ये बताने की आवश्यकता नहीं है वर्ना पूजा पाठ और भक्ति तो हमारी संस्कृति के अंग हैं ही ....
ये दिवस आदि शक्ति के सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में विस्तार हेतु निर्धारित है इस वक्त उनकी उर्जा अति घनी भूत होती है और समय कोई भी साधक पूर्ण संकल्प और एकाग्रता के साथ माँ का आवाहन करता है तो वो भी मजबूर हो जाती है आने हेतु अपने स्नेह और आशीर्वाद से अभिसिक्त करने हेतु क्या आप जानते हैं कि जितना साधक अपने ईष्ट के लिए पागल होगा, आतुर होगा ईष्ट भी उतने ही आकर्षित होंगे |
क्योंकि परा शक्तियां ज्यादा लालायित होती हैं इस पंचभूत शरीर से जुड़ने हेतु--- अब परा शक्ति में फिर आदि शक्ति ही क्यों न हों--- और जब बात आदि शक्ति की है तो क्यों न हम इस बार त्रिशक्ति का ही आवाहन करें ---
विकल्प मिलेंगे बहुत मार्ग भटकाने के लिए

संकल्प एक ही काफी है मंजिल तक जाने के लिए
तो न हमें मार्ग भटकना है और न ही किसी अन्य विकल्प पर जाना है बस साधकत्व की ओर अग्रसर होना है ----- और शुरुआत यहीं से ---
माँ का सबसे तीव्रतम और तेजस्वी प्रयोग --
 विधि:
उपरोक्त मंत्र के प्रतिदिन ५१ पाठ करने हैं, लाल आसन और सह्स्त्राक्षरी सिद्ध चंडी प्रयोग

विनियोगः
ॐ अस्य श्री परदेवी सूक्त माला मंत्रस्य मार्कंडेय मेधसौ ऋषिः गायत्रीयादि  नाना विधि छंदासि, त्रिशक्ति रूपिणी चण्डिका देवता, ऐं बीजम्, हृीं शक्ति: क्लीं कीलकं, मम चिंतित-सकल-मनोरथ-सिद्धयर्थे जपे (पाठे) विनियोगः

ऋष्यादिन्यास:
     ॐ श्रीमार्कंडेयमेधसऋषिभ्यां नम:            - शिरसि
ॐ गायत्रीयादि नाना विधछन्दोभ्यो नम: - मुखे
ॐ त्रिशक्तिरूपिणी चण्डिकादेवतायै नम:       - हृदये
ऐं बीजाय नम:                       - गुहेय    
हृीं शक्तये नम:                       - पादयो
ॐ क्लीं कीलकाय नम:                   - नाभौ
ॐ मम चिंतितसकलमनोरथ सिद्धयर्थे जपे विनियोगाय नम: सर्वाङगे

करन्यास:
ऐं अंगु"ठाभ्यां नम: A
हृीं तर्जनीभ्यां नम: A
क्लीं मध्यमाभ्यां नम: A
ऐं अनामिकाभ्यां नम:  A
हृीं कनिष्ठीकाभ्यां नम: A
क्लीं करतलकरपृष्ठाभ्यां नम:
हृदयादिन्यास:
ऐं हृदयाय नम: A
हृीं शिरसे स्वाहाA
क्लीं शिखायै वषट् A
ऐं कवचाय हुम् A
हृीं नेत्रत्रयाय वौषट् A
क्लीं अस्त्राय फट्


दिङ्न्यास:
ऐं प्राच्यै नम: A
हृीं आग्नेय्यै नम: A
क्लीं दक्षिणायै नम: A
ऐं नैॠत्यै नम: A
हृीं प्रतिच्यै नम: A
क्लीं उधार्वयै नम: A
हृीं क्लीं भूम्यै नम: (आसन पर बैठे-बैठे सभी दिशाओ में हाथ घूमकर, उठकर नहीं)

ध्यान:
ॐ योगढ़यामरकार्यनिर्गतमहातेज: समुत्पत्तनी
भास्वत्पूर्णशशांक-चारुधवला लीलोल्लसत्भ्रूलता
गौरी तुंगकुचद्या तदुपरी स्फूर्जत्प्रभामंडला
बंधुकारूणकाय कांतिविलसच्छ्रीचण्डिका सर्वत:
एवं ध्यात्वा मानसोपचारैश्च संपूज्य सूक्तं पठेत्



ऐं ह्रीं क्लीं हुं सैं हुं ह सौं स्त्रौं जय जय महालक्ष्मी जगदाघ बीजे सूरासुरत्रिभुवननिदाने, दयाकारे सर्व-सर्वतेजो रूपिणी, महा महामहिमे-महा-महारूपिणी, महा महामाये महामयास्वरूपिणी विरच्चिसंस्तेतु, विधिवरदे-चिदानन्दे, विष्णुदेहावृते, महामोहिनी
मधुकैटभजिघांसिनी, नित्यवरदानतत्परे, महासुधाब्धीवासिनी महामहातेजोधारिणी सर्वाधारे सर्वकारण कारणे, अचिन्तयरूपे, इन्द्रादी निखिलनिर्जरसेविते, सामगान गायिनी पूर्णेद्रिंय कारिणी, विजये जयंति, अपराजिते, सर्वसुंदरी, रक्तांशुके सूर्यकोटि संकाशे, चन्द्र कोटिसुशीतले, अग्निकोटी दहनशोले, यमकोटिक्रूरे, वायुकोटीवहनशोले, ओंकारनादरुपिणी, निगमागम मार्गदायिनी, महिषासुर निर्दलिनी, धुम्रलोचन क्षयपरायणे, चंडमुण्डादि शिरश्च्छेदिनी, रक्तबीजादी, रुधिरशोषिनी; रक्तपानप्रिय महायोगिनी, भूत वैताल भैरवादि तुष्टि विधायिनी, शुम्भनिशुम्भ शिरच्छेदिनी, निखिलासुर खलखादिनी, त्रिदशराज्यदायिनी, सर्वस्त्रीरत्नरुपिणी, दिव्यदेहे, निर्गुणे, सगुणे, सदसद्रूपधारिणी, स्कन्दवरदे, भक्तत्राणतत्परे, वरे, वरदे, सहस्त्राक्षरे अयुताक्षरे, सप्तकोटि चामुण्डारूपिणी, नवकोटि कात्यायनिस्वरुपे, अनेकशक्तयालक्ष्यालक्ष्य स्वरूपे, इन्द्राणी, ब्रम्हाणी, रुद्राणी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, शिवदूती, इशानि, भीमे, भ्रामरी, नारसिंहि, त्रयस्त्रिंशतंकोटि देवसेविते, अनंतकोटी, ब्रहमांडनायिके, चतुरशीति, लक्षमुनिजन संस्तेतु,  सप्तकोटि मन्त्रस्वरूपे, महाकालरात्रि प्रकाशे, कलाकाष्ठदिरूपिणी, चतुर्दशभवन विभवकारिणी, गरुणगामिनी’ क्रोंकार होंकर ह्रौंकार श्रींकार क्लौंकार जूंकार सौंकार ऐं क्लींकार कांकार ह्सौंकार नानाबीजकूट निर्मितशरीरे, नानाबीज मंत्रराज विराजते, सकलसुन्दरिगण सेविते, चरणाविन्दे, श्रीमहात्रिपुरसुंदरी, कामेशदयिते, करणैक रस कल्लोलिनी, कल्पवृक्षाध: स्थिते, चिंतामणी द्विपावस्थिते, मणिमंदिरनिवासे, चापनी, खड्गिनी चक्रिणी, दण्डनी, शंखिनी, पद्मिनी, निखिल भैरवाराधिनी, समस्तयोगिनी, परिवृते, कालिके, काली तारे, तरले, सुतारे, ज्वालामुखी, छिन्नमस्तिके, भुवनेश्वरी, त्रिपुरे, लोकजननी, विष्णुवक्ष: स्थलालंकारिणी, अजिते, अमिते, अमराधिपे, अनूपचरिते गर्भवासुद: खापहारिणी, मुक्तिक्षेत्राधिष्ठायिनी, शिवे, शांतिकुमारिरूपे, देविसुक्त दशशताक्षरे, चैन्द्री, चामुण्डे, महाकाली-महालक्ष्मी-महासरस्वती त्रयीविग्रहे! प्रसीद- प्रसीद, सर्वमनोरथान्, पूरय-पूरय, सर्वारिष्ट-विध्नांश्छेदय छेदय,  सर्वग्रहपीड़ा ज्वरग्रहभयं विध्वंसय-विध्वंसय, सर्वत्र त्रिभुवन जीव जांत वशय-वशय, मोक्ष मार्गान् दर्शय-दर्शय, ज्ञानमार्ग प्रकाशय-प्रकाशय, अज्ञानतमो नाशय-नाशय, धनधन्यादी वृद्धिं कुरु-कुरु, सर्वकल्याणीनि! कल्पय-कल्पय, मां रक्ष रक्ष, सर्वपद्भ्यो निस्तारय- निस्तारय, मम वज्रशरीरं साधाय- साधाय, ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे स्वाहा.
 दक्षिण दिशा और सरसों के तेल का दीपक, संकल्प के साथ जप करे 

***निखिल प्रणाम***
***रजनी निखिल***



Sunday, March 26, 2017

हंसा उड़ऊ गगन की ओर -----

स्नेही स्वजन !
 जय सदगुरुदेव /\
जीवन में और साधनाओं में मुद्राओं का बड़ा महत्व है..... मेरी अगली पोस्ट इसी सब्जेक्ट पर

निखिल प्रणाम






 निखिल प्रणाम 
एन पी आर यु 

Thursday, March 16, 2017

हंसा उड़हूँ गगन की ओर -2----(गुरु कृपा से सिद्धि)

हंसा उड़हूँ गगन की ओर -2----(गुरु कृपा)

स्नेही स्वजन !   

मेरी साधना यात्रा के कुछ अनछुए पहलु--- जिसे कभी भी किसी से भी शेअर नहीं किया किन्तु शायद आज इसकी आवश्यकता है क्योंकि सभी ओर मार्गदर्शन की कमी कि वजह से बहुत भटकाव और मनगनन्त चीजें एक दुसरे की नक़ल और अपने आप को दूसरों से श्रेष्ठ साबित करने की होड़ में सामान्य साधक का समय और पैसा ही बर्बाद नहीं हो रहा है अपितु वे अब साधना से ही अपने आप को दूर करने लगें हैं ..... जो कि ठीक नहीं है |

ऐसे समय में हम जैसे साधक भाई या बहनों का कर्त्तव्य है कि वे गुरु के गौरान्वित पंथ और श्रेष्ठता एवं साधना के उचित मार्ग को प्रत्यक्ष करें यही शिष्यता है---

1994 की एक घटना --- मै सदगुरुदेव की सेवा में थी, एक साधक जो शायद नेपाल से थे वे निरंतर 15 दिनों से गुरुदेव के पास आ रहे थे और एक ही बात कहते थे कि गुरुदेव मुझे आप जैसा साधक बनना है गुरुदेव मुस्कुराते रहते कुछ कहते नहीं थे एक डी उसे एक साधना व मन्त्र दिया और कहा इस मन्त्र 51,000 जाप करके आजा – उसने मन्त्र देखा और बोला ये तो बहुत बड़ा है, गुरूजी ने कुछ कहा नहीं और बहार का रास्ता दिखाया |

उसी शाम हम सब साधकों कि छत पर क्लास हुई जिसमे गुरुदेव ने हम से पूछा कि किस किस को मेरे जैसा बनना है हम सारे लोगों के चेहरे झुके हुए और आँखें जमीं पे थी मुझे नहीं मालुम कि आज शिष्य गुरु के बीच क्या व्यवहार होता है किन्तु हमने अपने गुरु के चरणों के अलावा न कुछ देखा न कुछ समझा क्योंकि हमारी शिष्य परम्परा यही थी ---

अचानक मेरी ओर देखा और कहा, कृति ! आज रात चौदस  तिथि है तुझे इसी मंत्र की एक माला अर्थात १०८ पाठ करने है, पुत्री इस व्यक्ति से तेरी उम्र आधी से भी कम है किन्तु क्षमता उससे दुगनी और मै यही बताना चाहता हूँ—“कि भूल कर भी मेरी तरह बनने की कोशिश मत करना मेरी तरह ऊंचाई प्राप्त करने का प्रयत्न भी मत करना, क्योंकि तुम स्वयं अपने आप में एक विशेष रचना हो, और  जो, बहुत तेजी से दौड़ता है, वह गिरता भी बहुत तेजी से है इसलिए मेरा उद्देश्य तुम्हे अपने सामान या अपनी जैसी उचाई पर पहुचाना नहीं है, अपितु तुम्हारा व्यक्तित्व का विकास कर देना, तुम्हारे अन्दर जो कुछ है उसे समाज के सामने स्पष्ट कर देना है और यही वो जीवित जाग्रत ग्रन्थ की रचना होगी”  |  
और वो मन्त्र एक हजार अक्षर का था जिसे करने में कम से कम 6 घंटे लगने थे, रात ११ बजे से सुबह 5 बजे तक का क्रम निर्धारित था |

यहाँ प्रश्न ये नहीं है कि मुझे करवाया गया, यहाँ समस्या मेरी थी क्योंकि गुरु कि पारखी नजरें ने परख लिया था अब बारी मेरी थी कि उनकी कसौटी पर खरा उतरना था, घबराहट और बैचैनी थी क्योंकि प्रत्यक्षीकरण साधना थी पहली साधना और वो भी भगवती का अत्यंत तीक्ष्ण स्वरुप सामने आना था हालाँकि गुरुदेव ने अस्वासन दिया था कि मै साथ रहूँगा किन्तु मै मंद बुद्धि उनके स्नेह और क्रिया को समझ नहीं पा रही थी मेरी वकील, माताजी ने भी पैरवी कि, अभी बच्ची है इतनी तीक्ष्ण मत करवाओ किन्तु किसी की भी सुनाई काम नहीं आई, आखिर मुझे तो गुरु आज्ञा थी सो करना ही था | बस मैंने अपने आप को गुरुदेव के हवाले किया और जुट गयी साधना में ...
क्योंकि गुरुवर ने कहा था---- “तुम्हें करना कुछ नहीं है, तुम्हें केवल जुड़ना है तुम्हे केवल अपने आपको मिटा देना है और मझसे एकाकार हो जाना है, जब तुम अपने आपको विस्मृत कर लोगे, तो मेरी दिव्य आभा से अपने आप चमत्कृत हो उठोगे, और उतनी रौशनी भी पूरी पृथ्वी का अन्धकार दूर करने के लिए पर्याप्त होगी” |

मुझ पर गुरुकृपा की ऐंसी बारिस हुई कि उसके बाद के तीनों क्रम को करवाने के लिए गुरुदेव ने मुझे अपने हि एक शिष्य के हवाले किया, जिससे वो उस साधना के प्रत्येक क्रम को पूर्ण करवा सकें,  भाई हरिराम चौधरी जिन्होंने मेरे समस्त क्रम को पूर्ण करवाया | मै सदैव उनकी आभारी हूँ हृदय से ऋणी हूँ जिन्होंने  निरंतर अपने मार्ग दर्शन से वो क्रम पूरे करवाया और मुझे सह्स्त्राक्षरी चंडी जैसी विद्या से विभूषित किया, J /\ भाई ह्रदय से आभारी हूँ ---

हुम हुम् कालिके क्रीं कालेश्वरी दः दः दहन्शीले ॐ कार नाद बिंदु रूपिणी ---- माँ रक्ष-रक्ष

***निखिल प्रणाम***
***रजनी निखिल***

Sunday, March 12, 2017

हंसा उड़हूं गगन की ओर -------








जय सदगुरुदेव, /\

स्नेही स्वजन !

बहुत दिनों से इस कार्य को गति देने कि प्रयास था किन्तु कुछ कामों में उलझे रहने के कारण कर ही नहीं पा रही थी किन्तु ऐंसा धर्म शास्त्रों का कथन है कि हजार कार्य छोड़कर भी गुरु कार्य को प्राथमिकता देनी चाहिए किन्तु मेरी मजबूरियां थी अतः हे गुरुवर मुझे क्षमा करें इस देरी हेतु /\
इस अकिंचन पर कृपा करें और सामर्थ्य प्रदान करें कि आपके द्वारा मुझे प्रदत्त कार्य को गति दे सकूँ |

भाइयो , वर्तमान में सदगुरुदेव से सम्बंधित चीजें अधिकांशतः नेट पर है , उन दिव्य विभूति के बारे में मै भी बयां कर सकूँ इतना सामर्थ्य मेरा नहीं है लेकिन गुरु आदेश है, तो कार्य आगे बढ़ाना हि है अतः शुरुआत तो करना ही है तो ---जय सदगुरुदेव /\

परम हंस स्वामी निख्लेश्वरानंदजी महाराज
(डा. नारायण दत्त श्रीमाली जी)

एक अकेला व्यक्तित्व, जो समस्त साधना शक्तियों को समेटे हुए हैं

लाखों करोड़ों के मार्गदर्शक, हिमालायवतविराट व्यक्तित्व, साधनाओं के मसीहा, सागर जैसी गहराई, मन्त्र सृष्टा योगी, सिद्धाश्रम के आधारभूत आयुर्वेद, रसायन विज्ञान और सूर्य विज्ञान जैसी गुप्त विधाओं को पूर्ण प्रमाणिकता के साथ जीवन्त करने वाले अनन्यतम योगी, तंत्र, मन्त्र और यंत्र के साथ साबर साधनाओं का मसीहा |

वो साधनाए जो कभी भारत में विलुप्त हो गयीं थी उनको न केवल प्रकाश में लाये अपितु उनके अनेक आचार्य बना डाले –

परकाया प्रवेश ,हादी विद्या, कादी विद्या, मदालसा सिद्धि वायुगमन सिद्धि, कनक धारा सिद्धि, सूर्य विज्ञान मृत संजीवनी विद्या आदि .... इसके अलावा अनेक सन्यासी और तंत्र के आचार्यों को प्रकाशित करने वाले भी आप ही थे |

“मुझे अत्यधिक ख़ुशी है और  गौरान्वित हूँ कि मै आपकी शिष्य हूँ और आपके स्नेह की पात्र बनी...”

मुझे पता है अनेकों के मन में सवाल उठ रहे होंगे कि अचानक सदगुरुदेव का परिचय क्यों ?  तो उत्तर ये कि अभी वर्तमान में कुछ नए लोग हमारे ब्लॉग और ग्रुप से जुड़े हैं जिन्हें नहीं पता उनके लिए है इसलिए समय समय पर ये अपडेट भी जरुरी है J

आज होली के इस शुभ अवसर पर कुछ श्रंखला प्रारम्भ कर रही हूँ जैसे ब्लॉग पे आवाहन चालू किया गया था.. इसमें मेरी साधना यात्रा और अनुभव के कुछ सुनहरे पल के साथ आपके लिए कुछ नयी साधना प्रयोग भी होंगे  |


क्रमशः ----- 
***रजनी निखिल***
 *** NPRU***