There was an error in this gadget

Thursday, March 16, 2017

हंसा उड़हूँ गगन की ओर -2----(गुरु कृपा से सिद्धि)

हंसा उड़हूँ गगन की ओर -2----(गुरु कृपा)

स्नेही स्वजन !   

मेरी साधना यात्रा के कुछ अनछुए पहलु--- जिसे कभी भी किसी से भी शेअर नहीं किया किन्तु शायद आज इसकी आवश्यकता है क्योंकि सभी ओर मार्गदर्शन की कमी कि वजह से बहुत भटकाव और मनगनन्त चीजें एक दुसरे की नक़ल और अपने आप को दूसरों से श्रेष्ठ साबित करने की होड़ में सामान्य साधक का समय और पैसा ही बर्बाद नहीं हो रहा है अपितु वे अब साधना से ही अपने आप को दूर करने लगें हैं ..... जो कि ठीक नहीं है |

ऐसे समय में हम जैसे साधक भाई या बहनों का कर्त्तव्य है कि वे गुरु के गौरान्वित पंथ और श्रेष्ठता एवं साधना के उचित मार्ग को प्रत्यक्ष करें यही शिष्यता है---

1994 की एक घटना --- मै सदगुरुदेव की सेवा में थी, एक साधक जो शायद नेपाल से थे वे निरंतर 15 दिनों से गुरुदेव के पास आ रहे थे और एक ही बात कहते थे कि गुरुदेव मुझे आप जैसा साधक बनना है गुरुदेव मुस्कुराते रहते कुछ कहते नहीं थे एक डी उसे एक साधना व मन्त्र दिया और कहा इस मन्त्र 51,000 जाप करके आजा – उसने मन्त्र देखा और बोला ये तो बहुत बड़ा है, गुरूजी ने कुछ कहा नहीं और बहार का रास्ता दिखाया |

उसी शाम हम सब साधकों कि छत पर क्लास हुई जिसमे गुरुदेव ने हम से पूछा कि किस किस को मेरे जैसा बनना है हम सारे लोगों के चेहरे झुके हुए और आँखें जमीं पे थी मुझे नहीं मालुम कि आज शिष्य गुरु के बीच क्या व्यवहार होता है किन्तु हमने अपने गुरु के चरणों के अलावा न कुछ देखा न कुछ समझा क्योंकि हमारी शिष्य परम्परा यही थी ---

अचानक मेरी ओर देखा और कहा, कृति ! आज रात चौदस  तिथि है तुझे इसी मंत्र की एक माला अर्थात १०८ पाठ करने है, पुत्री इस व्यक्ति से तेरी उम्र आधी से भी कम है किन्तु क्षमता उससे दुगनी और मै यही बताना चाहता हूँ—“कि भूल कर भी मेरी तरह बनने की कोशिश मत करना मेरी तरह ऊंचाई प्राप्त करने का प्रयत्न भी मत करना, क्योंकि तुम स्वयं अपने आप में एक विशेष रचना हो, और  जो, बहुत तेजी से दौड़ता है, वह गिरता भी बहुत तेजी से है इसलिए मेरा उद्देश्य तुम्हे अपने सामान या अपनी जैसी उचाई पर पहुचाना नहीं है, अपितु तुम्हारा व्यक्तित्व का विकास कर देना, तुम्हारे अन्दर जो कुछ है उसे समाज के सामने स्पष्ट कर देना है और यही वो जीवित जाग्रत ग्रन्थ की रचना होगी”  |  
और वो मन्त्र एक हजार अक्षर का था जिसे करने में कम से कम 6 घंटे लगने थे, रात ११ बजे से सुबह 5 बजे तक का क्रम निर्धारित था |

यहाँ प्रश्न ये नहीं है कि मुझे करवाया गया, यहाँ समस्या मेरी थी क्योंकि गुरु कि पारखी नजरें ने परख लिया था अब बारी मेरी थी कि उनकी कसौटी पर खरा उतरना था, घबराहट और बैचैनी थी क्योंकि प्रत्यक्षीकरण साधना थी पहली साधना और वो भी भगवती का अत्यंत तीक्ष्ण स्वरुप सामने आना था हालाँकि गुरुदेव ने अस्वासन दिया था कि मै साथ रहूँगा किन्तु मै मंद बुद्धि उनके स्नेह और क्रिया को समझ नहीं पा रही थी मेरी वकील, माताजी ने भी पैरवी कि, अभी बच्ची है इतनी तीक्ष्ण मत करवाओ किन्तु किसी की भी सुनाई काम नहीं आई, आखिर मुझे तो गुरु आज्ञा थी सो करना ही था | बस मैंने अपने आप को गुरुदेव के हवाले किया और जुट गयी साधना में ...
क्योंकि गुरुवर ने कहा था---- “तुम्हें करना कुछ नहीं है, तुम्हें केवल जुड़ना है तुम्हे केवल अपने आपको मिटा देना है और मझसे एकाकार हो जाना है, जब तुम अपने आपको विस्मृत कर लोगे, तो मेरी दिव्य आभा से अपने आप चमत्कृत हो उठोगे, और उतनी रौशनी भी पूरी पृथ्वी का अन्धकार दूर करने के लिए पर्याप्त होगी” |

मुझ पर गुरुकृपा की ऐंसी बारिस हुई कि उसके बाद के तीनों क्रम को करवाने के लिए गुरुदेव ने मुझे अपने हि एक शिष्य के हवाले किया, जिससे वो उस साधना के प्रत्येक क्रम को पूर्ण करवा सकें,  भाई हरिराम चौधरी जिन्होंने मेरे समस्त क्रम को पूर्ण करवाया | मै सदैव उनकी आभारी हूँ हृदय से ऋणी हूँ जिन्होंने  निरंतर अपने मार्ग दर्शन से वो क्रम पूरे करवाया और मुझे सह्स्त्राक्षरी चंडी जैसी विद्या से विभूषित किया, J /\ भाई ह्रदय से आभारी हूँ ---

हुम हुम् कालिके क्रीं कालेश्वरी दः दः दहन्शीले ॐ कार नाद बिंदु रूपिणी ---- माँ रक्ष-रक्ष

***निखिल प्रणाम***
***रजनी निखिल***

No comments: