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Friday, January 2, 2009

शिवाम्बु द्वारा धातु कल्प


सम्पूर्ण सृष्टि पारद और गंधक से ही उद्भव हुयी है. और इस बात का अनुमोदन विदेश के विद्वान् भी करते हैं . पाश्चात्य कीमिया के जान कार जिन्हें वह फ्हिलोस्फोर भी कहते हैं , वे यही कहते हैं की इस प्रकृति के प्रत्येक सजीव या निर्जीव में पारद और गंधक का अंश होता ही है फिर वो चाहे, जानवर हो, मौसम हो या जलचर. क्यूंकि पारद प्रकृति पुरूष सदाशिव का सत्व है और गंधक आदि शक्ति माँ पार्वती का राज है. उच्च कोटि के योगी मानव वीर्य को रस या बिन्दु कहते हैं और बिन्दु साधना के द्वारा वीर को उर्ध्वगामी कर दिव्व्य शक्तिया प्राप्त कर लेते हैं.

जब ऐसा है तो मानव इससे अछोता कैसे रह सकता है . आप ने सुना या पढा होगा की दिव्व्य मानवो या सिद्धो का शिवाम्बु उया मूत्र भी धातुओ को वेध कर गोल्ड में बदल देता है , आख़िर ऐसा कैसे हो सकता है ???

मूत्र तो वेस्ट मटेरिअल है फिर उसमे कैसे इतनी शक्ति हो सकती है ? वास्तव में प्रकृति के अन्य प्राणियों की भाँती मनुष्य में भी पारद का अंश होता है . जिस प्रकार गंधक का तेल बनते समय उसमे अज मूत्र , गौमूत्र, अश्व मूत्र , मानव मूत्र, प्याज रस, लहसुन रस की भावना दी जाती है या , संखिया, हरताल , मनाह्सिल आदि का शोधन गधे के मूत्र द्वारा किया जाता है तो वास्तव में होता क्या है की अपरोक्ष रूप से शुद्ध करने के साथ उस मूत्र में व्याप्त पारद का जो की पूर्ण चैतन्य अवस्था में होता है के साथ उन तत्वों का संयोजन या योग कतराने की प्रक्रिया भी हो जाती है. आप को एक बात बता दूँ की पारद की प्राप्ति सिर्फ़ हिंगुल, अभ्रक या खदानों से ही नही होती बल्कि समुद्रीय जीव यथा शार्क, व्हेल, वनस्पतियों जैसे बथुआ, बेशरम की पत्तियों या अश्व मूत्र से भी होती है. इसका यह मतलब भी नही है की पारद सिर्फ़ इन्ही में होता है बल्कि ऐसा इस लिए है क्यूंकि अन्य प्राणियों के मुकाबले इनके शरीर में पारद के मात्र ज्यादा होती है.

पाश्चात्य विद्वान् वर्षों से उरिनल स्टोन बनाने की क्रिया कर रहे हैं . पर वे सफल नही हो पाए , जबकि उनके यहाँ पर रस तंत्र के ग्रन्थ प्रचुर मात्र में हैं. हाँ वे मूत्र में से पारद जरूर प्राप्त कर पाने में सफल हो गए जो की भस्म के जैसा होता है . और यदि आप भी मूत्र को इकट्ठा करके थोडी देर बाद देखे तो आप उस द्रव्य के ऊपर मोर पंख की अभ वाली परत देख सकते हैं . यह अभा पारद की उपस्तिथि के कारण ही होती है . यदि वे विद्वान् असफल हुए तो इसका कारन था , ज्ञान का पूर्ण अभाव . क्यूंकि जिन भी विद्वानों ने वे ग्रन्थ रचे थे वास्तव में उन्होंने एक बात छुपा राखी थी.
करीब २० साल पहले गुरुधाम में सदगुरुदेव के सन्यासी शिष्य श्री राघव दास बाबा आए थे और उन्होंने कार्यालय में ही सबके सामने अपने मूत्र से कोप्पेर को गोल्ड में बदल दिया था . यदि साधक सिद्ध गंधक, पारद, या अन्य दिव्व्य कल्पों का एक निश्चित समय तक भक्चन करता है तो इन सिद्ध रासो में व्याप्त गंधक का शर्रेस्थ पारद से योग होता है और शरीर के भीतर के तापमान से उस पारद पर गंधक की जारना होती जाती है और एक निश्चित समय के बाद वो पारद पूर्ण वेधन छमता से युक्त हो जाता है और वैसे भी हमारे शरीर के तापमान के कारण शरीस्थ पारद कभी भी तेज या वेध विहीन नही हो पता , जरूरत रहती है सीरक गंधक के योग और जारण की . क्यूंकि गंधक के कारण ही धातुओं में रंग आता है. जैसे ही जारण पूर्ण हो जाता है पारद मूत्र के असिड के साथ वेध करने की शक्ति युक्त होकर धातुओं का वेधन कर देता है. शारीरिक तापमान , गंधक, तथा असिड इनका योग पारद की वेधन छमता को सहस्त्र या कोतिगुना बढ़ा देते हैं. तथा उन दिव्व्य कल्पों के प्रभाव से वीर्य भी अधो गामी न होकर उर्ध्व गामी होकर साधक को असीम शक्तियां दे देता है तथा दीर्घ जीवी कर देता है. असाध्य कुछ भी नही है जरूरत है इस तंत्र के भीतर छुपे हुए सूत्रों को प्राप्त कर समझने और क्रिया करने की , सफलता बस आपके सामने ही है।
****आरिफ****

1 comment:

hirendra said...

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