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Sunday, January 2, 2011

SWARN RAHASYAM-1 PAARAD AND PRAKRITI RAHASYA



सृष्टि में पाए जाने वाले सभी तत्त्वो का निर्माण पारद और गंधक के योग से हुआ है. अर्थात यौगिकों की प्रधानता है मूल पदार्थ कोई नहीं...... अजीब लगता है न ऐसा सुन या पढ़ कर?????
  पर ये सत्य है और आध्यात्म ने इस बात को साबित भी किया है, दृष्टि व्यापक हो , कुतर्क न हो तो इस सिद्धांत को समझा जा सकता है. देखिये इस ब्रह्माण्ड में पाए जाने वाले मूल और सृजन कारी तत्व सिर्फ पारद और गंधक हैं. जिनके योग के कारण ही धातुएँ बनी है, जहा पारद प्रकृति पुरुष सत्व है वही गंधक प्रकृति सत्व. और हम सभी जानते हैं की कोई भी सृजन तभी हो सकता है जब पुरुष और स्त्री तत्व का आपस में योग हो. और विज्ञानं भी ये बात मानता है की गुणसूत्र के आधार पर ही ये भी निर्धारण होता है की उत्पन्न जीव पुरुष होगा या स्त्री, कोई भी जीव पूर्ण पुरुष या पूर्ण स्त्री नहीं होता है अपितु उसमे ये दोनों ही गुण कम या ज्यादा मात्रा में होते हैं, हाँ जो गुण अधिक होते हैं वो जीव वैसा ही व्यव्हार करता है, पर कभी कभी योग के दौरान इन गुणसूत्रों में विक्रत्ता आ जाने के कारण जो जीव बनता है वो लैंगिक गुणों में सामान्य नहीं रहता. ये अवस्था धातुओं के साथ भी है और प्राणियों के साथ भी.ऐसा सिर्फ मैं नहीं कह रहा हूँ. बल्कि बड़े बड़े रस सिद्धों का वक्तव्य भी यही है, चाहे फिर वो भारतीय हो या पाश्चात्य. किसी भी पदार्थ का विघटन करने पर उसमे स्त्री और पुरुष तत्व की प्राप्ति होगी ही , और एस इसलिए कहा जा सकता है की क्यूंकि यदि अपने समकक्ष जाती या पदार्थ को उत्पन्न कर सकता है तो फिर उसमे ये दोनों लैंगिक गुण होने चाहिए. हाँ ऐसा जरुर हो सकता है की उसके ये दोनों या फिर कोई एक गुण सुषुप्त अवस्था में हो. कीमिया का सिद्धांत ही इस बात पर अवस्थित है की चाहे पदार्थ कोई प्राणी हो या फिर कोई वस्तु या धातु, उसमे परिवर्तन संभव है. निर्माण की बात नहीं बात है रूपांतरण या परिवर्तन की. जहा विज्ञानं जब भी किसी औषधी का निर्माण करता है तो उसकी क्षमता को , प्रभाव को परखने के लिए किसी पशु, पक्षी या जीव का सहारा लेता है उस औषधि को उस प्राणी के शरीर में पहुचाकर उस सकारात्मक या नकारात्मक प्रभाव को देखा जाता है.
   परन्तु रस शास्त्र ऐसा नहीं करता, वो जब भी किसी वेधकारी या क्रमक औषधि का निर्माण करता है तो उसे सबसे पहले विज्ञानं की भाषा में निष्प्राण या निर्जीव धातुओं पर प्रयोग कर उन परिवर्तनों को देखता है जिसके निमित्त वो द्रव्य(भस्म आदि) निर्मित किया गया है. क्यूंकि रस तंत्र विशुद्धता को महत्त्व देता है, अर्थात यदि पारद या गंधक में दिव्यता है तो उन पर संस्कृत गुणों के कारण जब वो किसी भी धातु या शरीर में प्रविष्ट हो तो अपने विलक्षण प्रभाव के कारण माध्यम धातु या शरीर की सभी अशुद्धता को नष्ट कर विशुद्धता का विकास करेंगे. यहाँ पर तत्व के अनुसार विशुद्धता की परिभाषा भिन्न भिन्न है, जैसे किसी धातु के लिए उसकी विशुद्धता का अर्थ होता है उस जगह तक पहुचना जो उसे प्रकृति बनाना चाहती थी पर अनुकूल वातावरण न मिलने के कारण वो वैसे बनने से वंचित रह गया अर्थात किसी भी धातु की विशुद्धता का अर्थ ये है की उसका अग्नि में क्षय न हो, वो अक्षय हो जाये और ये तभी संभव हो सकता है जब वो विशुद्ध रूप में हो क्यूंकि अग्नि सर्वश्रेष्ट परीक्षक है हमारी विशुद्धता को परखने के लिए, वो तपाती है जलती है , परन्तु आप को नहीं अपितु आपकी अशुद्धता, न्यूनता और कमियों को, और ये क्रम तब तक चलता है जब तक की आप विशुद्ध अवस्था में न आ जाये. आप को ये सिद्धांत दर्शन से जुड़े हुए लग रहे होंगे न , पर ऐसा है ही नहीं, इस सिद्धांत को न समझ पाने के कारण ही तो आज तक रस सिद्धों की संख्या न्यून है. मनुष्य के लिए प्रकृति, परिस्थिति और काल वही काम करते हैं जो की धातुओं के लिए अग्नि. प्रकृति की सबसे मूल्यवान धातु स्वर्ण है, ऐसा स्वर्ण जिसे रस शास्त्र कुंदन की संज्ञा देता है.कुंदन का अर्थ होता है ऐसा स्वर्ण जिसे चाहे कितने बार गला लो, कितनी ही देर अग्नि पर तपाओ पर वो अपने भर में घटेगा नहीं बल्कि उसकी आभा बढती चली जायेगी. और प्रकृति धातुओं को उसी रूप में तो बनाना चाहती थी. पर परिस्थिति अनुकूल न होने के कारण उन धातुओं में मूल तत्व पारद और गंधक का सही योग न होने के कारण विकार उत्पन्न हो गया और वो उस विशुद्ध तत्व में निर्मित होने से वंचित हो गए. जैसे स्वर्ण अपने आप में विश्द्ध है क्यूंकि उसमे योगनुपट सही है.पर बाकि...
विशुद्ध स्वर्ण= विशुद्ध पारद+विशुद्ध गंधक
चांदी= विशुद्ध पारद + अल्प गंधक
ताम्बा= विशुद्ध गंधक+ अल्प पारद
सीसा=अल्प पारद + अशुद्ध गंधक
जस्ता= अशुद्ध पारद + अल्प गंधक
लोहा= अल्प पारद + विकृत गंधक
  
  इसी प्रकार से धातुओं का निर्माण होता है. यहाँ ध्यान दीजियेगा की चाहे शुद्ध या अशुद्ध अवस्था में हों पर पारद और गंधक इन सभी धातुओं में हैं. यदि किसी भी प्रकार से योग को संतुलित कर दिया जाये तो विशुद्ध तत्व की प्राप्ति संभव है क्युकी जब विशुद्ध परिवर्तन होगा तो विशुद्ध तत्व का ही होगा. यहाँ मैंने निर्माण नहीं बल्कि रूपांतरण किया है , क्यूंकि हमने संतुलन किया है. निर्माण कार्य प्रकृति ही कर सकती है. और रस तंत्र की सभी वेधक  क्रियाएँ , क्रामण संस्कार आदि बस इसी सिद्धांत का अनुसरण करने पर सम्पादित होते हैं. ये रहस्य ही धातु परिवर्तन का रहस्य है. और शायद आप इस का महत्व न समझो लेकिन, इसी सूत्र के आधार पर हमारे सिद्धों ने हजारों लाखो बार ये धातु परिवर्तन की क्रिया की है, और याद रखिये जो क्रमक या वेधक तत्व धातुओं में विशुद्धता प्रदान कर सकता है तो चैतन्य मानव शरीर में क्यूँ नहीं, क्यूंकि फिर वो मानव शरीर को सभी जरा, पीड़ा और अभावों से परे कर विशुद्ध आत्मा और शरीर दे देता है, और याद रखिये चाहे वो विश्द्ध स्वर्ण हो या फिर विशुद्ध देह या आत्मा , हमेशा विशुद्धता का आभा मंडल या चमक सुनहरी ही होगी. आप जानते ही हैं की जैसे जैसे साधना का स्टार व सफलता बढते जाती है वैसे वैसे उच्चावस्था में साधक का आभा मंडल सुनहरा होने लगता है. आशा है आप मेरा इशारा ससमझ गए होंगे.
                                               क्रमशः........
   
     ये लेख अप्रकाशित स्वर्ण रहस्यम पुस्क का ही भाग है, जो की तंत्र कौमुदी में प्रति अंक लेखमाला के रूप में दिए जायेंगे. हाँ एक बात मैं और बता दूँ की सदगुरुदेव की चर्चित कृति अल्केमी तंत्र में एक क्रिया दी हुयी है की जब अघोरी ने मेरे द्वारा स्वर्ण का निर्माण करवाया. उस प्रक्रिया को साधकों ने लाखो बार किया है पर सफलता हाथ नहीं आई, पर सब एक बात भूल जाते हैं की ग्रन्थ सिद्धांत बताते हैं उसकी गोपनीयता का खुलासा तो सदगुरुदेव  ही करेंगे न. पर कोई बात नहीं मैं सिर्फ इतना ही इशारा कर सकता हूँ की यदि किसी भी प्रकार से मतलब वनस्पतियों, पदार्थो या साधना के योग से उन पांचो पदार्थ को अग्नि स्थायी कर लिया जाये और पारद स्वर्ण जारित हो वे सभी पदार्थ अग्नि में टिके रहेंगे और  भस्म हो जायेंगे और आपको सिद्ध सूत की प्राप्ति हो जायेगी तथा निश्चय ही वो क्रिया सिद्ध होकर आपको आपका मनोरथ पूरा करवा देगी. इस बार के लिए इतना ही.............. 

As yogis think there is no basic element in nature and everything is made by the mixture of PAARAD (MERCURY) and SULPHUR (GANDHAK).
It is strange but true and ADHYAATM (SPIRITUALITY) has proved it. This SIDHAANT (PRINCIPLE) can understand with open mind which means vyaapk drishti. Remember all the basic and constructive (srijan) elements are only PAARAD and SULPHUR and with their mixture metals took birth. So PAARAD is as PRAKRITI PURUSH SATV and GANDHAK is PRAKRITI SATV. We all know new thing can born with the combination of man and woman. Science also believes that by GUNSUTRA (CROMOSOMES) it is decided that who will born- a boy or a girl. Everyone has the qualities of both male and female and these qualities decided person’s behavior. But sometimes if a problem happens during yog then new baby get sexual differences. Same thing is with metals. This is proved by INDIANS and WESTERN RAS SIDHS. When we dissolve anything we get male and female features because it can make a new thing like it. ALCHEMY is based on the principle that it is possible to change every person, thing and metal. Here change means TO GIVE NEW FORM (ROOPANTRAN) not construction (NIRMAAN). To see results we can use birds and animals by transform medicine in their body and watch its positive and negative effects.
But in RAS SHASTRA when a new medicine is made it checks its effect on NON LIVING THINGS (NIRJEEV VASTU). Because MERCURY and SULPHUR had divine qualities and when they enter in some metal or living body they end every type of impurity and make them pure. Here according to TATV meaning of purity is different as by the purity of metal means to reach at that place where nature wants to take it in proper environment. And when in fire it does not melt it means now the metal is completely pure because fire only burns its impurities. You must think this principle is from DARSHAN (PHILOSOPHY) and this is the reason of less number of RAS SIDHS. For man nature, situation and time do the same thing which fire does for metals. Gold is most precious metal of nature and RAS SHAASTRA named it KUNDAN which means after placing it on fire for many times it does not lose its weight and shines more brightly. Nature also wants to make other metals like this but in different environment PAARAD( MERCURY) and SULPHUR(GANDHK) fails to make good mixture and metals become impure then Pure Gold. For example-
PURE GOLD= PURE MERCURY+PURE SULPHUR
SILVER= PURE MERCURY+ LESS SULPHUR
COPER= PURE SULPHUR+LESS MERCURY
LEAD= LESS MERCURY+IMPURE SULPHUR
JASTAA=IMPURE MERCURY+LESS SULPHUR
IRON=LESS MERCURY+IMPURE SULPHUR
By this system metals are made and remember in pure and impure metals MERCURY and SULPHUR is always present. And if yog can be making under control then surely perfect body take birth. Here I am doing ROOPAANTRAN by making balance. Only nature can give birth to new bodies. All the VEDHAK KIRYA and KRAAMAN SANSKAR in RAS TANTRA are based on this principle. This is also the secret of metal transformation. You don’t believe that our SIDHS do this metal change thousands times and remember if this VEDHAK KIRYAEN and KRAAMAN SANSKAR can change metal then they can give new life to human also. And this life will free from pain and problems. Always keep in mind that every pure metal, soul,Aura Of body, and gold will have golden shine. You know as saadhak do more sadhnaa he becomes more pure from inside same in the case of metals. I hope you understand what I mean.
This Article is a part of un-published SWARN RAHASYAM book which will explain in every article of TANTRA KOUMUDI. And in a book ALCHEMY TANTRA by SADGURUDEV this process is also explain under the title “JAB AGHORI NE MERE DWARA SWARN KA NIRMAAN KARVAYA”. Many people try it but fail because in books only principle are written but the vidhi will tell by SADGURUDEV. But I can only give idea that if by vegetation (vanaspati), things or Tantra sadhnaa you get that  using Swarn Jarit Parad and  basic five things Fire stable (Agni Sthayi) on fire then that things will change in BHASM and you will get SIDDH SOOT and you will get what you want. This is all for now… 

****ARIF****

3 comments:

BABIT NAIK NIKHIL said...

dear anu ji ,
abhi tak mujhe tantra kaomudi ki ek bhi ank prapt nahi hui hai. please send this e-mail ndbabit@gmail.com

BABIT NAIK NIKHIL said...

dear anu ji,
mujhe tantra kaumudi ka ek bhi ank prapt nahi hua hai , kripya ndbabit@gmail.com pat mail karne ka kasht karen

vsngh said...

dear anu ji ,
abhi tak mujhe tantra kaomudi ki ek bhi ank prapt nahi hui hai. please send this e-mail vishalsngh803@gmail.com