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Sunday, April 22, 2012

पारद स्वर्ण अणु सिद्धि गोलक-A Very Rare and Miraculous Parad swarn anu siddhi Golak


धर्मार्थ मुप्भोगानाम  नष्ट राज्य विवार्धाये |
                            आयुर्योवंलाभार्थे  मुक्तयेर्थ    मुमुक्षुणाम ||

यह विद्या (.******”पारद तंत्र विज्ञानं “*** ) जनता  को    धर्म ,  अर्थ, काम  की  प्राप्ति कराती ,  राजाओं को नष्ट   राज्य  की प्राप्ती  और राज्य वृद्धि  में  सहायक  और  गृहस्थो   को  दीर्घायु , यौवन  प्रदान करने  वाली   और   मुमुक्षुओं   को मुक्ति  प्रदान करती हैं  
पारद  तंत्र  के  जानकार  आज बहुत  ही कम हैं  और  जो हैं  भी   तो  उन  दूर  दराज पहाडो  पर  हैं जहाँ  की  जन सामान्य  पहुँच पाना  बिलकुल असंभव हैं . और जो   हमारे  बीच   हैं उनके बारे में तो समझ पाना शायद  और भी  कठिन हैं .पर   जो आज  हमारे   मध्य  हैं वे  यह तथ्य  उद्घाटित करते  हैं की ....
रस  ग्रन्थ  लगभग 60 ,000 गुटिका  या गोलक के बारे  में  बताते हैं और इन सभी के निर्माण की  प्रक्रिया और लाभ पर सभी मौन ही हैं . एक से एक अद्भुत   रहस्य  से भरा यह क्षेत्र  हैं .
                                    रोगपंकाब्धिमग्नाना..पारदानाच्च  पारदः ||
रोग रूपी सागर  में डूबे  हुए  मानव  को   पार या  मुक्त कर दे .यह  पारद  तंत्र  विज्ञानं  से ही संभव  हैं  किस  रोग की बात   यहाँ  की  गयी हैं??? वस्तुतः यहाँ पर  आध्यात्मिक ,  देहिक ,मानसिक , भौतिक  सभी रोग  को शामिल किया गया.                                          
                     “सकल पदारथ  हैं जग माही ,भाग्यहीन   नर कछु  पावत नाही “
आखिर  कब तक  टूटे हुए .भाग्य  या अजगर के  सामान   सोये  भाग्य  का  रोना  रोते   रहा जाए ..आखिर कहीं तो ...अंत हो ..........कम से कम तंत्र   क्षेत्र  के  साधको  और  सदगुरुदेव  के  शिष्य   होने के बाद   तो यह  हाथ पर हाथ   धरे   ...... शोभा   ही नही देता  हैं ...
तो कैसे  सभव   हो .जीवन  की  हर प्रतिकूलता  में  विजय  श्री  का वरण  करना ...क्या  यह संभव हैं .??
 क्यों नही ...और यही  बात   आती हैं   रस  शास्त्र  की ...उसकी उपयोगिता   की ...
रस शास्त्र  अपने आप मे अत्यंत    ही उच्च कोटि  के  ज्ञान और विज्ञानं से आपूरित  हैं .पर विगत  कुछ  कालों में  इसको मानो भुला  ही  दिया गया .पर अब  एक  नयी प्रकाश  किरणे   पुनः   अपनी    उज्ज्वलता  और  अपने  तेज से इस  अत्यंत   उच्च कोटि स्थ     तंत्र   विज्ञानं  से हमारा  परिचय  करा रही हैं .
कोई भी विज्ञानं कितना  उच्च कोटि का  क्यों न हो  अगर  वह  हमारे  दिन प्रति दिन  के जीवन में  उपयोगी  अगर ना हो सके  तो  उसका क्या  अर्थ  हैं .
पारद तंत्र   विज्ञानं  के  साथ  ऐसा नही हैं .
  यह तो ....“भोगस्थ  मोक्षस्थ  करस्थ  एव च “.
की धारणा  को   सामने प्रत्यक्ष  रूप से  रखता  हैं .
इसी श्रंखला  में ..
·        जब  जीवन पर संकट आन  पड़ा   हो तब  किस  गुटिका   का सहारा  ले .??
·        जब   अत्यधिक  श्रमसाध्य और क्लिष्ट  साधनाओ को कर पाने का मन  नही  हो पा   रहा हो   तब ...??
·        जब परिवार  में  दिन रात  कलह  और दरिद्रता  का  साम्राज्य  छाता ही   जा रहा   हो  तब ..??
·        क्या हर छोटी छोटी सी  समस्या के लिए  सदगुरुदेव का आवाहन किया  जाए या  उनके  ऊपर सब छोड़ कर ......क्या यह मर्यादा की दृष्टी से उचित  होगा ...??
·        क्या  हर समस्या के लिए  परम महामंत्र   गुरु मंत्र  का  ही  सीधे  उपयोग किया जाए ..क्या  यह   उचित होगा .??
·        षट्कर्म की   क्रियाये   जैसे वशीकरण ,उच्चाटन,..जैसे का  उपयोग न  करके  सिर्फ भय से  इस  ओर ....क्या यह   उचित हैं..??
क्यों न सदगुरुदेव  द्वारा  हमारे सामने  लाए  गए   ज्ञान को आधार   बना कर .स्व निर्भर  बने ...श्रेष्ठ  साधक  बने ..और शिष्यता  के राजमार्ग पर  कुछ ओर कदम बढ़ाये ..
·        वैताल  साधना ,  भगवान दत्तात्रेय  प्रत्यक्ष   साधना , धन  आगमन  साधना ..जैसी  लगभग  १००८  साधनाए   जिस पर संभव  की जा सकती हो ......उस  गुटिका  के बारे में  जानकारी ..
·        सूर्य विज्ञानं ...., पारद विज्ञानं.... ,काल  विज्ञानं.... , और स्थान  विज्ञानं.... ,वायु  विज्ञानं.... , और अन्य विज्ञानं सीखने में  एक अत्यंत  आवश्यक   गुटिका ...जिसकी महत्वता   गिनाई ही नही जा सकती  हैं ..
·        शमशान साधना  में     केबल  स्व रक्षा  हेतु वरन  हर  शमशान स्थ साधना  पूर्ण सफलता   हेतु भी ....... .
·        जीवन  को  पूर्ण निरोगी बनाये  रखने  हेतु ..
·        जो हर साधनाओ  में  सफलता   दे सकने में  समर्थ हैं .
·        जो  जीवन की  असफलता   को सफलता  में   बदल   देने  में समर्थ  हैं ...
·        जो जीवन  को उच्चता  ,श्रेष्ठता , लक्ष्य   तक तीव्रता  से  आपको अग्रसर  कर  सकती हैं ....

जैसा की  नाम ही बता रहा हैं कि “पारद  स्वर्ण   अणु सिद्धि  गोलक”   तो यह नाम   ही क्यों  दिया  गया ..????
तंत्र  विज्ञानं में  हर नाम  या शब्द  का एक विशिष्ट अर्थ  हैं ही ..... आखिर  अणु  से क्या  तात्पर्य  हैं.? पदार्थ  की  सबसे छोटी   इकाई जिसके माध्यम  से पदार्थ परिवर्तन  किया जा सकता हैं पर यह पदार्थ  परिवर्तन  कैसे  संभव हो ?  तो इसके लिए महर्षि  कणाद  ने एक पूरा  विशिष्ट ग्रन्थ   ही रच दिया  हैं .जो “ कणादोपनिषद “ के नाम  से  विख्यात रहा  हैं ... इस अणु विज्ञानं के  लिए एक ही नाम सबसे पहले  सामने  आता हैं   वह  हैं  **सूर्य विज्ञानं ** और इस  विज्ञानं में  ” सिद्धाश्रम सूर्य लेंस “ .......इसकी प्राप्ति   तो  सभी का स्वप्न  रहा हैं ..इसका  सूर्य विज्ञानं में  एक महत्वपूर्ण  स्थान  हैं आखिर यह हैं क्या ..?? एक अति  विशिष्टतम   लेंस जिसमे .विभिन्न   कोणों  से माध्यम से   अणुओ का  संलयन या विखंडन  करके  पदार्थो का रूपांतरण  किया जाता हैं  .क्या सिर्फ इतना ही ..बल्कि  बल्कि नव जीवन और   पुनर्जीवन  तक  देने में समर्थ  हैं यह सूर्य  विज्ञानं ..पर यह सिद्धाश्रम सूर्य लेंस  प्राप्त करना  तो बहुत ही  दुष्कर हैं  .
पारद  में एक  विशुद्ध  धातु “ स्वर्ण” का  संयोग ..!!!!  वहभी शास्त्रीय  मर्यादानुसार ....यह तो सोने में   सुहागा  भी नही कहा  जा सकता क्योंकि वहां   तो   सिर्फ धातु हैं ..और यहाँ पर ..समस्त  संसार  को    पुनर  जीवन  देने  में समर्थ  तत्व  की बात ...यह संयोग कर पाना   तो इस मार्ग  के सिद्धहस्त  लोगों के लिए भी  सपना  सा  हैं ..
और  फिर “अणु  सिद्धि “..यह तो स्वपन  रहा हैं  महा योगियों का भी..क्योंकि सारा  विश्व  हैं क्या ???..सिर्फ  अणुओ  का विभिन्न  संयोजन .. और जब इसकी  सिद्धिता  प्राप्त   हो जाए   तो .. क्या अब  शेष  रहा .......!!!
  इस गोलक  के सामने   एक विशिष्ट मंत्र  का जप करने पर यह   पारदर्शी  हो जाता  हैं ..पारद  और पारदर्शी ..!!!!!  यह  तो संभव  ही नही हैं ??.पर यह सच  हैं . सदगुरुदेव  ने  यह बहुत पहले  स्पस्ट  किया था .और अनेको बार   यह  कहा  की  पारद  के  गुणों  की  तो कोई सीमा  ही नही हैं .और   जो इसका  सहारा  नही लेता   वह व्यर्थ ही अपना  समय  और शक्ति नष्ट  करता  हैं   हम इस को   स्वयं करके देख सकते हैं .अगर  हम में  शिष्यता  का  गुण हो तो .सदगुरुदेव के शब्दों पर अगर विश्वास   हो तो ......

शमशान  साधना ::::  तो व्यक्ति के  जीवन का सौभाग्य हैं,पर यह  क्या  इतनी  सरल हैं ??. यहाँ पर प्रक्रिया..सरल   से  दुष्कर   दोनों हैं  ,पर एक भी मामूली  सी गलती   क्षम्य  नही हैं .  थोड़ी  सी   गलती ..काफी  महगी हो  सकती हैं . पर   एक विशिष्ट  मंत्र का जप  इस  गुटिका  पर किये जाने से न केबल .यह  समस्त  शमशानिक  कार्यों में न केबल पूर्ण   सुरक्षा   देती हैं बल्कि ..इन क्रियायो में और उच्चतर  साधनाओ  में सफलता   भी प्रदान कराती हैं .

बिंदु शोधन प्रक्रिया ::
पारद तो शिव बिंदु हैं ओर हमारा वीर्य  हमारा  बिंदु हैं , अब हमने  शिव वीर्य तो शुद्ध कर लिया  पर जब हमारा स्वयं का ही बिंदु अशुद्ध हैंतब क्या कहेउच्चतर साधनाओ  के अमृत को कैसे??? , कैसे   कोई अशुद्ध पात्र में शुद्ध वस्तु डालने तैयार होगा , कैसे मानेगा कोई ..... की उसके बिंदु का अभी तक शोधन नहीं हुआ,पर जब तक आपका बिंदु  शुद्ध  न हो जाये उच्चतर क्रियाओ  के लिए कैसे व्यक्ति को योग्य माना  जाय .पर बिंदु शोधन की अद्भुत विधि तो  शास्त्रों  में  भी  वर्णित  नहीं  हैं  .......पर यह भी संभव  हो जाता हैं इस पारद गुटिका /गोलक के माध्यम से एक विशेष  प्रयोग  के द्वारा. यह प्रक्रिया  इतनी सरल  हैं की साधक  विश्वास ही नही कर सकता .....पर  जब बिंदु शोधित होता हैं  तो व्यक्ति के चेहरे  पर एक आभा ... एक प्रकाश ...एक ओज .....दिखाई  देता हैं.  

और  जब बिंदु  शुद्ध   होने लगा ..तो शिवतत्व  की ओर ...जो की वास्तव में सदगुरुदेव तत्व  हैं .....एक कदम और बढ़ गया ...और जो भी  कदम  ..जो भी  साधना ..सदगुरुदेव  के श्री चरण कमलों में ले जाए ..क्या वह एक उच्च कोटि स्थ गुरु साधना  न होगी ..???

षट्कर्म साधना  में :: आज  हर  छोटी  छोटी सी बात के लिए  सदगुरुदेव  पर आश्रित   होना .उनपर सारा  भार  डाल देना ..यह एक शिष्य  को शोभा नही देता  हैं यह मर्यादानुकूल भी नही हैं ..अगर यही सब होना  था .या  सदगुरुदेव ऐसा चाहते  तो  एक लाख  से  ज्यदा   साधनाए .मंत्र   उन्होंने क्यों  दी .धूमावती साधना  में  तो सदगुरुदेव ने  स्पस्ट कह  ही दिया  की आखिर   गुरु के पास  भी क्यों  जाना ..जब की स्वयम  गुरु  ने   तुम्हे   विधि  दी  हैं  गुरु भी आखिर  उसी  देव शक्ति के पास  जाकर   वह  कार्य करेगा ..तो तुम सीधे   क्यों नही   उसी देव शक्ति के पास   जाते हो ...अब  और क्या  शेष  रह गया ..

पति /पत्नी   बात  नही मानते ...समाज /ऑफिस में सम्मान   नही ..बच्चो  को  सस्कार  बिहीन   होते  बेबसी में  देखना .........योग्य  हो सकने वाले  जीवन साथी  को देख कर  भी ..अपने भाग्य को कोसना ..यहाँ  वहां के  तान्त्रिको  के पीछे भागते रहे की वह कर  दे ......विभिन्न  में रोग को लिए   रहना ..हर पल  जीवन से ..शत्रुओं  से समझौता ...हर जगह  जीवन में हारना ...योग्य  होकर  भी तिल तिल करके  हाथ  मलते रहना ...

क्यों नही  इन षट्कर्म  के माध्यम से ..इन इतनी सरल प्रक्रिया   जो इस  गोलक  के माध्यम से  संभव  हैं हम अपने जीवन की दिशा   जो अधोमुखी हैं .उसे  उर्ध्वमुखी  बना  दे  हम स्वयं ..

सदगुरुदेव  ने  व्यर्थ के  अहंकार   को गलत माना  हैं पर   स्वाभिमान  की  वे सदैव प्रशंशा  करते रहे .

हम डरते हैं ..अपने  ही पिता के  द्वारा दिए गए ज्ञान को  उपयोग करने में ...

तो  भिखारी वत ..निरीह ..असहाय .. उन्होंने नही बनाया ..बल्कि हमने  चुना  हैं .

उन्होंने  ऐश्वर्य  का रास्ता  दिखाया .हमने  समझौता   चुना ..

उन्होंने कहाँ  की परिस्थितयों  से समझौता   नही  बल्कि  तुममे  मेरा लहू वह रहा हैंउसे  तो ध्यानमे  रखो  ..आगे बढ़ो ...विजय  श्री मिलेगी ही तुमको ..

पर हम  यह सोच कर  अपने  साधना  रूपी अश्त्रो  को एक तरफ रख कर..अब सौप दिया  इस जीवन का भार ..गाने लगे ...

 कैसे  यह दुर्लभ गुटिका  का निर्माण   होता हैं ??
आप सभी कुछ  प्रयोग इस  गुटिका  या गोलक    से भली भांती   परिचित हैं .  और  यह गुटिका /गोलक  भी अष्ट  संस्कार  से   आगे  के अनेक संस्कार  से युक्त   रहती  हैं .पर हर  बार  संस्कार  ही  क्यों ??..
क्योंकि रस  तंत्र  शास्त्र  कहते हैं  
“संस्कारो  ही गुणान्तराधानाम”
 संस्कारो के   माध्यम से  ही पारद में  अनंत   गुणों  का प्रवर्धन किया जा ता हैं .
पर  क्या शास्त्रीय  नियम  का पालन  इतना  आवश्यक  हैं .??
.इस हेतु ..गोरक्ष संहिता  स्पस्ट  करती    हैं और  निर्देशित  भी करती हैं  
“ न शास्त्र  रहितं  किंचित  कर्म  चास्तिति  कुत्र  चित ||
 शास्त्रीय मार्ग के पालन   के बिना कैसे   सफलता मिलेगी  .
फिर भी यह गोलक पारद के दिव्य संस्कारो से युक्त ही अपने आप में ही दिव्यतम  हैं  फिर यदि इसे  इसे स्वर्ण  ग्रास रजत ग्रास  के साथ कितनी ही दिव्य जड़ी बूटियों से सहयोग से इसका निर्माण किया गया अब क्या शेष रह जाता हैं

लगभग १६ दिन  इस कार्य में प्रति दिन के ६ घंटे के हिसाब से  लगते हैं ही .   घंटे दिन में तो दो घंटे रात में शास्त्रीय इस गोलक के निर्माण में ऐसा ही शास्त्रीय   नियम हैं .  फिर  जिसके लिए भी इस देव  दुर्लभ गोलक  का निर्माण   किया जाए ..उस साधक  के नाम से  व्यक्तिगत  रूप से इस की चैतन्य करण   , अभिसिंचितिकरण , ओर विशिष्ट  क्रियाओं को कर के इसका प्राथमिक  चरण पूरा  किया जाता  हैं   ,   पर अब आगे साधक  को स्वयं इसमें सदगुरुदेव के पूर्ण पूजन  , स्वर्णाकर्षण भैरव स्थापन जो की पारद  साधना के पूर्ण आधार  हैं , नाथ  ही नहीं नव नाथ और भगवान् दत्तात्रेय  का स्थापन प्रयोग इस गुटिका पर करना   होगा ..क्योंकि  नाथ संप्रदाय के आदि गुरु ने ही  ही तो इस पारद  संस्कार  को प्रसारित किया  फिर नव नाथ तो शिव पुत्र हैं  पारद  जो शिव वीर्य हैं  तो शिव तत्व को कैसे भुला सकते हैं . जीवन में नव ग्रहों स्थापन के महत्त्व को कैसे टाल सकते हैं पर  इनके साथ नवग्रहों की माता मुन्था का स्थापन को कैसे भूल सकते हैं इन नव ग्रहों की  की कृपा साधक को  मिले ही पारद  के माध्यम से.यह भी  एक अनिवार्य अंग  हैं .

   केबल अष्ट लक्ष्मी बल्कि इनमें से प्रत्येक लक्ष्मी  के १०८ स्वरूपों का भी स्थापन  इस गोलक में किया जाना चाहिये  जिस से  यह पारद गोलक वास्तव में ही साधक के लिए  सौभाग्य के रास्ते खोल दे. वाराही देवी स्थापन का  तो यह गोलक  स्तम्भन  के लिए भी साधक के लिय उपयोगित  हो सके  पर स्तम्भन का क्यों की साधक किसी भी प्रकार  के तंत्र वाधा से मुक्त रह सके तब इसी महा शक्ति  कीस्थापन  अनिवार्य हैं ही .जब पारद व्यक्ति को कालातीत कर सकने की क्षमता  देता हैं तब  भगवान् महाकाल का स्थापन  तो इस गोलक मैं ही होना ही हैं अन्यथा  कैसे कुछ भी उपलब्धिया स्थायी  रह पायेगी.   महाकाल का स्थापन  तो  कर लिया पर  काल की अधिस्ठार्थी माँ महाकालीके दिव्यतम स्वरुप  माँ दक्षिण काली , माँ काम कलाकाली , गुह्य काली , सिद्धिप्रदा काली के स्वरुप को तो भूला कैसे जा सकता हैं  इन सभी माँ जगदम्बा के स्वरुप की स्थापन अगर ऐसे महा शक्ति पीठ जो साक्षात्   माँ पराम्बा का स्थान हैं ,

पर यह सारी क्रियाए   तो  महा शक्ति पीठ  कामाख्या पीठ   पर  ही  हो सकती हैं .  अब  यह सारी क्रियाए  साधक को *****स्वयं ****** ही करनी पड़ेगी .पर  यह कैसे संभव  हैं .?? क्योंकि इस  का ज्ञान तो साधक  को होगा  कैसे ..??? फिर वहां स्थित  हर पीठ पर जाकर  स्वयं ***एक दस तत्व  युक्त  दशमहाविद्या  मंत्र  का जप .****अब यह   तो लगभग  असम्भाव्य सी   स्थिती   बन गयी हैं .

सदगुरुदेव   जी के आत्म स्वरुप   सन्याशी  शिष्य  और शिष्याओ  ने  हमारी इस  दुविधा  को दूर  कर  अब स्वयं यह  प्रक्रिया  हमारे लिए करके  यह दिव्य गुटिका  हमें  उपलब्ध कराने तैयार   हो गए हैं ....की कोई भी जिनके मन में  था  पर  वह उस विशिष्ट पारद कामाख्या कार्यशाला  में भाग नही  ले पाए .पर  अब जिसके भी मन में  हो यह प्राप्त  कर सकता  हैं ...अब इससे बड़ा  सौभाग्य  और क्या ....  और  वह भी घर  बैठे ...

जब  बिंदु उद्भव रेतस गुटिका  हैं तो अब हमें इस  पारद अणु  सिद्धि गोलक  की आवश्यकता  ही क्यों ??

हर   गुटिका का  अपना  एक अर्थ हैं . बिंदु रेतस   गुटिका  ........एक सम्पूर्ण  जीवन  परिवर्तन  के लिए हैं  ....सम्पूर्ण चक्र जागरण के लिए हैं ........अन्तः  स्थित .ब्रम्हांड  तंत्र  से सीधे  साधक के  बाह्य  ब्रम्हांड  तंत्र  से संपर्क  के लिए हैं ...........अपने  स्व तत्व   को  जानने के लिए .......आत्मसात  करने के लिए  हैं  ..हर साधना  में  पूर्ण सफलता  और   ठोस   सफलता  प्राप्त  हो  उसके  लिए  एक  ठोस  आधार  बनाने के लिए   हैं ...और यह  कोई चमत्कार  वाली गुटिका  नही हैं , यह   पूरे  जीवन भर चलने वाली.... बिंदु साधना  के लिए हैं ..क्योंकि  जो समग्र परिवर्तन कर दे  ......वह  एक दिन की प्रक्रिया   तो होगी  ही नही .

.बिंदु गुटिका से  साधक  षट्कर्म  प्रयोग नही कर सकता  हैं .बिंदु गुटिका  शमशान  साधना में काम नही आ सकती हैं . वैताल  साधना ,भगवान दत्तात्रे य प्रत्यक्षीकरण  साधना,   लक्ष्मी  के  अनेको  रूपों को अपने यहाँ स्थापन  करने  में  काम नही आ सकती हैं . सूर्य विज्ञानं .क्षण  विज्ञानं ..काल  विज्ञानं ..और .अन्य विज्ञानों  में   इसका  सीधा  कोई  हस्तक्षेप नही हैं ..
पर फिर अर्थ क्या हुआ ...??

कितनी  भी बड़ी उपलब्धि  प्राप्त हो .पर उसके लिए  एक पात्रता .....एक योग्यता ..एक ठोस  आधार .. समस्त  अन्तः शरीर  का  शुद्धिकरण ..शरीरस्थ समस्त  चक्रों का जागरण ... समस्त  मानसिक..आध्यात्मिक  शक्तियों का   हममे  उदय   होना  जरुरी हैं ..अन्यथा .इन उपलब्धियों को पाना  ना केबल कठिन  बल्कि बहुत ही श्रम साध्य   हैं ..

पर जिन्हें जीवन  हर पल अपनी  ही शर्तों  पर जीना  हो ....उच्चता  की ओर  अग्रसर  करना हो ..    प्रतिकूल परिस्थतियों  को भी अपने अनुकूल बना  देना   हो ...समाज  और  और राज्य में  सम्मान  पाना   हो ..

और  सबसे महत्वपूर्ण   तथ्य ..अगर हम  तंत्र  साधक हैं   तो     केबल हम  गिडगिडाये .. बल्कि जहाँ भी   कोई भी असहाय   हो .. निर्बल  हो ..असमर्थ हो .  दुखी  हो ....भग्न  ह्रदय  हो ..उसे  अपने साधना बल से   पुनः .जीवन  युक्तकर दे ..

यही तो सदगुरुदेव का  सपना  रहा  हैं . जो वैदिक ऋषियों का  उद्घोष रहा  हैं की “वसुधैव  कुटुम्बकम “ के  आधार  पर हम  ठोस आधार   बने अपने समाज का ..देश  का  और   पुनः संस्कृति   को ऊपर  ले जाए ....

और  अब अंत  में  इस  पारद   गुटिका   के बारे  में  ..

की ..”  हरि  अनंत ..और हरि  कथा  अनंता ..”

  और   जिसके भाग्य   हो जो यह  गुटिका  प्राप्त करे ..

उसके लिए ..

“साधो  यही घडी यही बेला .......”

******NPRU*******


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                                   A Very Rare and Miraculous Parad Golak
                              धर्मार्थ मुप्भोगानाम  नष्ट राज्य विवार्धाये |
                            आयुर्योवंलाभार्थे  मुक्तयेर्थ    मुमुक्षुणाम ||
            Dharmarth Mupbhoganam Nasht Rajya Vivadharye |
             Aayuyaryovamlabharthe Muktyerth Ch Mumukshunaam ||
This Vidya ( *****Parad Tantra Vigyanam****) helps public to attain Dharma, Arth and Kaam , kings to attain lost states and helps state to prosper, provides long life and youngness to householders  and provides salvation to saints.
Those who know Parad Tantra are very few in number and if there are, they are in far off mountains where it is really impossible for common public to approach them and those who are among us, it is even more cumbersome to understand them .However, those who are among us , they always reveal the facts that……
Ras Scriptures mentions about nearly 60000 gutikas and golaks but they are silent on the process of making them and the benefits of them. This field is full of amazing secrets….
                                  रोगपंकाब्धिमग्नाना..पारदानाच्च  पारदः ||
                    RogPankabdhimgraana….paaradanaachh paradah ||
What can free human beings from sea of diseases; this is only possible by Parad Tantra Science. Which disease we are talking about? Actually, here all the diseases whether spiritual, physical, mental or materialistic are included.
                       सकल पदारथ  हैं जग माही भाग्यहीन   नर कछु  पावत नाही 
           Sakal Padarthhain Jag Maahi ,Bhagyaheen Nar Kuchu Paavat Naahi
Up till what time, we can afford crying over our misfortune or the fate which has slept like python( a type of snake) . It has to end somewhere. Atleast after being Tantra sadhaks and disciples of Sadgurudev; it does not suit us sitting idle.
So how is it possible, to win over all the unfavourable circumstances in life………..is it possible?
Why not? And this is precisely where Ras Shastra comes into picture and also it’s utility.
Ras Shastra is very higher order knowledge and science in itself .However, it was forgotten for quite some time in the past. But new rays  of light and hope have emerged with full intensity and brightness and is introducing us to this high level Tantra Science.
Any science ,how higher-order it may be of , if it does not have any utility in our daily life then what is the meaning of it?
It does not apply to Parad Tantra Science.
Instead, it puts the idea conveyed by following sloka in front of us ….
                           भोगस्थ  मोक्षस्थ  करस्थ  एव च .
                        “BhogasthMokshasthKarasthevch “
In this series:
·         When problems are troubling us in our life, which gutika we should take help of?
·         When we are unable to make up mind to start highly effort-consuming and difficult sadhnas then?
·         When our family is facing the problem of poverty and conflicts each and every day?
·         Should we do Aavahan of Sadgurudev for every minute problem and leave everything on him? ...Is it fair on our part to do so?
·         Should we use directly the highly Divine Mahamantra GuruMantra for each and every problem? Will it be right?
·         Rather than using Shatkarmas(6 procedures of tantra) like Vashikaran, Ucchatan, we develop a feeling of apprehension towards them…..is it correct?

Why should not we make knowledge of Sadgurudev as our base and become self-dependent and great sadhaks and put some strides forward on Rajmarg of Shishyta.

·         Vaital Sadhna, Bhagwan Daitetrya Pratyaksh Sadhna,Dhan Aagman Sadhna …..and similar 1008 sadhnas can be done on it……….information about that gutika
·         The Gutika which is highly essential for learning Surya Vigyanam….,Parad Vigyanam….,Kaal Vigyanam …….., Sthan Vigyanam………,Vayu Vigyanam……….,and other science. It is virtually impossible to highlight the Importance of such divine gutika.
·         Not only for self-defence in Shamshaan sadhnas, but also for complete success in every shamshaan sadhna.
·         To make our whole life disease-free
·         Which is capable of providing success in every sadhna.
·         Which is capable of transforming our failure into success
·         This takes our life to higher pedestal, towards perfection and guides us to our aim very quickly.

As the name says “Parad Swarn Anu Siddh Golak”, why only this name was given……

Every name or word carries a special meaning in Tantra Science…………. What does word Anu (Atom) signifies? The smallest unit of the material by which material transformation can be done but how material transformation is possible? For this, MaharishiKanaad has created a special scripture which is famous by the name “Kanadopnashid”……………..For this atomic science, one name that comes into our mind,that is **Surya Vigyanam**and in this science “Siddhashram Surya Lens”…………and getting this lens has been the dream of everyone……it has got an important place in Surya Vigyan. What is this lens all about? It is a very special lens whereby using  various angles, atoms can be combined or splited and as a result, material transformation takes place. Only this……………..this Surya Vigyan is capable of giving a new life………However, it is very cumbersome to get this Siddhashram Surya Lens.

Adding pure metal Gold in Parad….!!!  That too using Shastra principles……. This is not a big task because there , we are talking about only metal  but here we are talking about element which is capable of giving rebirth to the whole world…….It is dream even for siddhs of this path to make this possible.

And then “Anu Siddhi”……..this has remained a dream even for Mahayogis because what is this entire world?.....Only the different combination of atoms….if one gets accomplishment in it……..then what is left…..!!!

Chanting special mantras in front of this Golak makes it transparent….Parad and transparent…!!!! This is not possible at all??..but this is true. Sadgurudev has explained this fact much earlier and has said multiple times that quality of Parad have no limits and the one who does not takes it’s assistance, he /she is wasting both his/her time and power. We can see the results by doing it ourselves if we have the qualities of shishya and if we have trust in the words of Sadgurudev…………

Shamshaan Sadhna:::: is the the boon for a person’s life, but is it that much easy???. Here the procedures are both easy and difficult but even any slightest of mistake is not forgiven. Even a minute mistake can prove to be disastrous. However Chanting one special mantra on this gutika  not only provides complete security in shamshaan procedures but also provides success in these procedures and higher-order sadhnas.

Bindu Sodhan Procedure::
Parad is Shiva’s bindu and our sperm is our bindu. Now we have purified the sperm of lord Shiva but when our sperm is impurethenhow can we do higher order sadhnas??It will be like pouring pure things in an impure container. Who will accept this fact that his bindu has not been purified yet. However, as long as one’s bindu is not pure then how can he/she be considered competent enough for higher level procedures? But the amazing procedure for Bindu Sodhan (purifying the sperm) is not even mentioned in shastras……..But this is possible with the help of special process done on Parad Gutika/Golak. This process is so simple that Sadhak will find it hard to believe it……However when bindu is purified then face of that person glows, he develops an aura.

And when Bindu starts purifying…..then we move towards Shiva Element…….which is in reality Sadgurudev element …………….we are one more step closer….. And any step…any sadhna which takes us towards lotus feet of Sadgurudev……..will it not be higher order Guru Sadhna…???

In Shatkarma Sadhna::depending on Sadgurudev even for minute things…putting full burden on him……………this is not fair for any Shishya  , nor it is in accordance with the moral principles. If Sadgurudev had wished like this, then why would he have givenmore than 1 lakh sadhnas and mantras? Sadgurudev has clearly said in Dhoomavati sadhna that Why to go to Guru…when Guru has given you the procedure. Guru will accomplish the workonly by going to particular deva then why don’t you go to that deva directly……………..then what is left for us to say….

Husband/Wife does not listen to each other…….no respect in society/office………seeing with helplessness getting child deprived of moral values……..cursing your fate even after seeing a capable life partner………..running after the tantriks for your tasks…………living with diseases……compromising with enemies and lifeat every moment… losing in life at every place……suffering despite of being capable….

Why not by help of shatkarmas…….a simple procedure which is possible through this golak can transform the direction of our life in higher direction.

Sadgurudev has always considered the unnecessary ego to be wrong but he has always praised the self-pride.

Why are we scared to utilize knowledge given by our father …

So beggar-like……powerless….helpless…..he has not made us like it ….we have chosen this path.

He has shown the path of prosperity .But we chose compromise…

He said that do not make compromise with circumstance. My blood is running in your veins, you should keep this thing in mind …….Move forward……You will be successful…

But we kept aside the weapon of sadhna and started singing ab soup diya is jeevan ka Bhaar…..

How this Rare Gutika is Created??

You all are aware of some process which can be done on this gutika or Golak and this Gutika/Golak is made from Parad of more than 8 sanskars.But why this sanskarsevery time??

Because Ras Tantra Shastra says
                                  संस्कारो  ही गुणान्तराधानाम
                        “Sanskaroo hi Gunantaradhanam”
       Only with the help of sanskars, infinite qualities of Parad can be amplified.
But is it necessary to follow the rules of Shastras?
For this “GorakshSanhita” clarifies and directs also
“ न शास्त्र  रहितं  किंचित  कर्म  चास्तिति  कुत्र  चित ||
“Na Shastra Rahitam Kinchit Karm Chastiti Kutra Chit ||
How can we get success without following the rules given in Shastras
This Golak, combined with divine sanskars of Parad is divine in itself. If it is prepared after giving swarna graas and rajat graas and combining it with divine herbs then what really is left?
It takes 6 hours per day for 16 days for this process…..4 hours in the day and 2 hours in night for preparing this Golak, these are the rules of shastras. Then the person by whose name this rare golak is made ……energising it personally by name of that sadhak, it’s abhisinchitikaran and doing special procedures on it finally completes the preliminary step. But after this, sadhak has to do Sadgurudev’s complete poojan, Swarnakarshan Bhairav Sthapan (which is base for parad sadhna), not only the nath butNav Nath and lord Daitetrya sthapan process on its own on this gutika……Because Adi Guru of Nath School only popularised the parad sanskars. Then Nav nath are sons of lord Shiva and parad is the sperm of Lord Shiva so how we can forget Shivaelement. How can we ignore the importance of Nav Grah Sthapan? To add to that how we can forget the sthapan of mother of nine planets Muntha.Getting the blessing of these nine planets with the help of parad, is also an essential element.
Not only Ashta Lakshmi ( 8 forms of Lakshmi) but sthapan of 1o8 forms of each Lakshmi should be done on this golak whereby this parad golak can open the doors of bright fortune for the sadhak.Vaarahi Devi Sthapan in golak is necessary so that sadhak can utilize it for stambhan purpose. But why stambhan only? Because to get rid of tantra badha,sthapan of this Maha Shakti is necessary. When parad can give person the ability to trespass time then sthapan of Lord Mahakaal is bound to happen in this golak otherwise how our achievements will remain stable. So we have done the sthapan of Lord Mahakaal, but how we can forget the divine form of supreme deity of time Maa Mahakaali, Maa Kaamkala Kali, Guhakali, and Siddhipradakali. Sthapan of all these forms of Maa Jagdamba should be done on Maha Shakti Peeth which is the place of Maa Paramba.
But all these procedures can be done only on Mahashakti peeth Kamakhya Peeth. Now all these procedures have to be done by sadhak himself. How is it possible.?? How sadhak will have knowledge about this…??? Then chanting *****ten elements combined Ten Mahvidya mantra**** on every peeth established there, now it has virtually become impossible.
Sanyasi disciples of Sadgurudevji have agreed to make us available this divine gutika by doing these processes for us and have put an end to our doubts. Those who were not able to participate in special parad Kamakhya workshop, but those who are willing to get it , they can get it………….what good fortune it can be……….that too while sitting at home.
When there is Bindu UddhavRetas Gutika, then why do we need Parad Anu siddhi Golak at all?
Every gutika has its own meaning. Bindu Retas Gutika…………….it is for complete life transformation………for complete chakra jagran………………for connecting inner universe of sadhak with the outer one……………for knowing self-element………..completely imbibing it…………for making the concrete base for getting success in each sadhna……and this is not a miracle-providing gutika…Rather it is gutika for life-long Bindu Sadhna….. Because the process which transforms as a whole…………….will not be a one day process.
By this Bindu Gutika, Sadhak can’t do Shatkarma process. It can’t be used in Shamshaan sadhna. Vaital Sadhna, Lord Daitetrya Pratyakshikaran sadhna, Sthapan of various forms of Lakshmi can’t be done by it.It does not have any direct intervention in Surya Vigyanam, Kaal Vigyanam, Kshan Vigyanam and other sciences ……….Then what does it mean?
How much higher might be the accomplishment, but for it suitability…..ability ….strong base…..purifying of entire inner body…….Jagran of entire chakras in body……awakening of entire mental and spiritual power is essential. Otherwise getting these accomplishments is not only difficult but also very effort-consuming…..
But those we want to live life on their own terms and conditions….. Who want to move towards higher plane……who want to make unfavourable situations favourable……..who wants to earn respect in society and state.
And the most important fact is that If we are tantra sadhak, then why should we bow down? Infact we should impart new life to those who are helpless…..powerless….incapable by our sadhna power.
This has only been the dream of Sadgurudev, which has been the voice of our Vedic saints that based on the feeling of “Vasudev Katumbakam” we become concrete base for our society, our country and bring our culture up again.
And in the last about this Parad Gutika
Ki “Hari  anant    aur   Hari Katha Ananta
And who are lucky, get this gutika…
For them…
This is the time…………              

                                                                                               
 ****NPRU****   
                                                           
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1 comment:

Dinesh Paliwal said...

Jai Sadgurudev,
arifji bhaisaheb,
paarad aur vah bhi, pardrashi jeevan me pahli bar gyat hua hai,
sadgurudev aur sadgurudev ke shishyon ka gyan, bahut vishal hai,
pata nahi kon se mantra tantra yantra se kab kiska jiveen parivartit ho jay.
swarn bubhukshit gutika jo swarn grass ko grahan kar le uski nirman vidhi ki jankari ho jati to bahut accha hota.
Jai Sadgurudev, aur jai Sadgurudev ke Sadshishyon ki.