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Thursday, March 5, 2015

होली का यक्षिणी प्रयोग

         {तंत्रस्य जीवनं धर्म, तन्त्रं ही परिपूर्णता}




स्नेही स्वजन !

           होली की शुभकामनाओं के साथ********

तंत्र, तो जीवन का आधार है, हम तंत्र में ही जीते हैं, ये अलग बात है कि मन्त्र बद्ध न होकर क्रिया बद्ध होकर जीते हैं, किन्तु यही क्रिया शीलता मान्त्रिक होजये तो तंत्र का मूल स्वरुप सामने आ जाता है, भाइयो बहनों ! मेरे विचार में आज के समय में तंत्र की व्याख्या समझाने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि आप सभी बहुत कुछ पढ़ चुके हैं और समझ चुके हैं किन्तु तंत्र तो महा विज्ञान है जिसमें हजारों सिद्धांत है . अब ये तो जीवन की व्यवस्था है जिसमें अभ्यास और व्यवहारिक ज्ञान का समावेश है |

          बस इतना समझना ही काफी है कि तंत्र के माध्यम से सम्पूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त ईश्वरीय शक्ति को आकर्षित कर अपने अनुकूल कर सिद्धि प्राप्त की जा सकती है |

   तंत्र साधक अपने अन्दर उस सिद्ध शक्ति को चुम्बकीय प्रभावशाली और तीव्र उर्जायुक्त बनाता है | ये विज्ञान मानव शरीर के सूक्ष्म शरीर में स्तिथ चक्र और यौगिक ग्रंथियों को जागृत कर शक्तिशाली बनाता है, तंत्र के माध्यम से आम्नव अपने अन्दर की बंधन से मुक्त होकर अपनी शक्तियों का विस्तार कर सकता है , शरीर में रहते हुए भी शरीर से मुक्त होकर अपने आपको विस्तार दे सकता है, इसी क्रम में ब्रम्हांड में स्तिथ अनेक शक्तियां यक्ष, किन्नर, गन्धर्व, एवं अन्य भूत प्रेत प्रकार की योनी को भी अपने अनुकूल बनाकर अपने जीवन को सहजता प्रदान कर सकता है....

 चूँकि होली महानिषा के श्रेणी में आती है अतः तंत्र का विशिष्ट दिवस कहलाता है सभी तंत्र साधक इस दिन का बड़ी बेसब्री से इंतज़ार करते हैं , तो इस बार हम पूर्णिमा से पूरे पांच दिन अलग-अलग साधनाएं सम्पन्न कर अपनी पूर्णता की ओर अग्रसर होंगे |

      मै जानती हूँ कि आप सब अपनी पसंद की साधना करना चाहते हैं और हमारे ब्लॉग सभी तरह का मैटर उपलब्ध है भी किन्तु जो सबसे आवश्यक और और महती आवश्यकता हो आप उसे पहले करिए, और जीवन में सभी मूल भूत आवश्यकताओं की पूर्ती हेतु धन यानि लक्ष्मी की आवश्यकता होती ही है अतः पहले इसी ओर प्रयास करना चाहिए | हैं ना J

भाईयों बहनों ! सद्गुरुदेवजी ने बताया है कि तंत्र और लक्ष्मी आपस में पूर्ण रूप से जुड़े हैं लक्ष्मी प्राप्ति हेतु जिस प्रकार क्रिया शील रहना आवश्यक है उसी अनुरूप तंत्र भी क्रियारूप है हि तंत्र में वह शक्ति है कि वह लक्ष्मी को अपने वष में कर ले | और जहाँ बात आती हो यक्षिणी कि तो लक्ष्मी का सर्वश्रेष्ठ स्वरुप है धनदा रतिप्रिया यक्षिणी | और इस स्वरुप को तंत्र साधना द्वारा जागृत किया जा सकता है |

भाइयो बहनों ! अब प्रश्न आता है कि साधना सामग्री, यानी यंत्र माला वगैरह , तो आप में से अधिकांशतः लोगों के पास तंत्र कौमुदी का अप्सरा यक्षिणी रहस्य खंड और तंत्र मण्डल यंत्र  तो है ही बाकी विधि ये है ही अब आपके ऊपर निर्भर है कि प्रत्यक्षीकरण करना है या आवश्यकतानुसार लाभ प्राप्त करना है |

दारिद्रय सन्हत्री यक्षिणी पाप खंडिनी विद्या के अंतर्गत धनदा रतिप्रिया यक्षिणी साधना साधक को संपन्न करनी चाहिए, यह देवि लक्ष्मी का सर्वोत्तम व एकमात्र स्वरुप है जिसमे तांत्रिक विधान द्वारा सिद्धि प्राप्त कि जा सकती है |

   इस साधना कि सबसे बड़ी विशेषता यह है कि लक्ष्मी के जितने भी स्वरुप होते है, उन सभी स्वरूपों का आवाहन व विशेष पूजा की जाती है, प्राण प्रतिष्ठा प्रक्रिया संपन्न की जाती है, दशों दिशाओं का कीलन किया जाता है जिससे किसी भी बाहरी बाधा से साधना में विघ्न ना पड़े और जो भी संकल्प साधक करें, उसका फल साधक को तत्काल अवश्य ही प्राप्त हो |

 प्राण प्रतिष्ठा से हि शक्तियां चैतन्य होती है | प्राण प्रतिष्ठा का विधान अत्यंत गुह्तम रहा है व इस महान तांत्रोक्त साधना में प्राण प्रतिष्ठा आवश्यक है |

 रुद्रयामल तंत्र  में स्पष्ट वर्णित है कि यदि यह तंत्र साधना पूर्ण विधि विधान से संपन्न कि जाय, तो ऐसा हो हि नहीं सकता कि देवि तत्काल आकर साधक का मनोरथों को पूर्ण ना करे |

 इस तांत्रोक्त साधना का मूल विधान तो एक ही है, परंतु आगे प्रत्येक आर्थिक समस्या के सम्बन्ध में अलग अलग मन्त्र जप है | 


सदगुरुदेव द्वारा प्रदत्त--

        तांत्रोक्त धनदा रतिप्रिया यक्षिणी साधना

     अब साधक सबसे पहले कुबेर पूजन सम्पन्न करें, अपने सामने कुबेर यंत्र स्थापित कर उसका चन्दन से पूजन कर एक माला निम्न कुबेर मन्त्र का जप करें

कुबेर मन्त्र 
                                                    
|| ॐ यक्षाय कुबेराय धनधान्याधिपतये धनधान्यसमृद्धि मे देहि दापय स्वाहा ||
तत्पश्चात् सर्वप्रथम एक थाली में “ॐ ह्रीं सर्वशक्ति कमलासनाय नमः” लिखें और उस पर पुष्प की पंखुड़ियां रखें, तत्पश्चात् इस पर धनदा रतिप्रिया यक्षिणी यंत्र,    या  अप्सरा यक्षिणी मण्डल यंत्र स्थापित कर चन्दन लेपन करें और सुगंधित पुष्प अर्पित कर संकल्प विनियोग संपन्न करें |


   विनियोग में अपने हाँथ में जल लेकर निम्न विनियोग मन्त्र पढ़ कर जल भूमी पर छोड़ दें –

 ॐ अस्य श्रीधन्देश्वरीमंत्रस्य कुबेर ऋषिः पंक्तिश्छंदः श्रीधन्देश्वरी देवता धं बीजं स्वाहा शक्तिः श्रीं कीलकं श्रीधन्देश्वरीप्रसादसिद्धये समस्तदारिद्रयनाशाय श्रीधन्देश्वरीमन्त्रजपे विनियोगः ||


प्राण प्रतिष्ठा प्रयोग –

प्राण प्रतिष्ठा के द्वारा जीव स्थापना की जाती है व साक्षात यक्षिणी का आवाहन किया जाता है, इसमें अपने चारो ओर जल छिड़के तथा निम्न मन्त्रों द्वारा आवाहन करें-

  ॐ आं ह्रीं क्रौं यं रं लं वं शं षं सं हं सः सोऽहं श्रीधन्देश्वरीयंत्रस्य प्राणा इह प्राणाः |     
  ॐ आं ह्रीं क्रौं यं रं लं वं शं षं सं हं सः सोऽहं श्रीधन्देश्वरीयंत्रस्य जीव इह स्थितः |

  ॐ आं ह्रीं क्रौं यं रं लं वं शं षं सं हं सः सोऽहं श्रीधन्देश्वरीयंत्रस्य सर्वेंद्रीयाणि इह स्थितानि |

  ॐ आं ह्रीं क्रौं यं रं लं वं शं षं सं हं सः सोऽहं श्रीधन्देश्वरीयंत्रस्य वाङमनस्त्वक्चक्षु श्रोत्रजिव्हाघ्रापाणिपादपायूप्स्थानी इहैवागत्य सुखं चिरं तिष्ठन्तु स्वाहा ||

                श्रीधान्देश्वरी इहागच्छेहतिष्ठ||

    यह प्राण प्रतिष्ठा प्रयोग साधना का सबसे महत्वपूर्ण कार्य है, यह अपनी साधना में प्राण प्रतिष्ठा में प्राण तत्व भरने कि प्रक्रिया है |

    अब धनदा यक्षिणी लक्ष्मी के ३६ स्वरूपों की पूजा कर उनका आवाहन किया जाता है, प्रत्येक स्वरुप का आवाहान कर ‘ एक तांत्रोक्त लक्ष्मी फल ‘ (लघु नारियल) “जो कि किसी भी पूजा सामग्री की दूकान में प्राप्त हो जाता है”  स्थापित करें, धनदा यक्षिणी के ३६ स्वरूपों पर चन्दन चढ़ाएं,(यंत्र पर हि चन्दन का तिलक करें), प्रत्येक तांत्रोक्त लक्ष्मी फल के आगे एक-एक दीपक जलाएं तथा पुष्प कि एक-एक पंखुड़ी रखें, आवाहन क्रम निम्न प्रकार से है-

ॐ धनदायै नम :
ॐ दुर्गायै नम :
ॐ चंचलायै नम :
ॐ मंजुघोषायै नम :
ॐ पद्मायै नम :
ॐ महामायै नम :
ॐ सुन्दर्यै नम  :
ॐ रुद्राण्यै नम :
ॐ वज्रायै नम :
ॐ कमलायै नम :
ॐ अभयदायै नम :
ॐ उमायै नम :
ॐ कामदायै नम :
ॐ महाबलायै नम :
ॐ कामप्रियायै नम :
ॐ चपलायै नम :
ॐ सर्वशक्तयै नम :
ॐ सर्वेश्वर्यै नम :
ॐ मंगलायै नम :
ॐ त्रिनेत्रायै नम :
ॐ त्वरितायै नम :
ॐ सुगन्धायै नम :
ॐ वाराह्यै नम :
ॐ ॐ कराल भैरव्यै नम :
ॐ सरस्वत्यै नम :
ॐ चामर्यै नम :
ॐ हरिप्रियायै नम :
ॐ वरदायै नम :
ॐ सुपट्टिकायै नम :
ॐ महालक्ष्म्यै नम :
ॐ क्षुधायै नम :
ॐ धनुर्धरायै नम :
ॐ गुह्याश्वर्ये नम :
ॐ लीलायै नम :
ॐ भ्रामर्यै नम :
ॐ माहेश्वर्यै नम :

  इस प्रकार पूजन कर साधक यक्षिणी का ध्यान करे, तथा यक्षिणी यन्त्र व चित्र के सामने खीर का भोग लगाये, इसके अतिरिक्त घी, मधु तथा शक्कर का भोग लगायें |
 कुछ ग्रंथों में यह भी वर्णित है कि साधक धनदा रतिप्रिया यंत्र के नीचे अपना फोटो अथवा अपना नाम अष्टगंध से कागज़ पर लिख कर रख दे |

  अब साधक धनदा रतिप्रिया यंत्र का वीर मुद्रा में बैठ कर मन्त्र जप तांत्रोक्त यक्षिणी माला से प्रारम्भ करे व मंत्रजाप सम्पूर्ण होने के पश्चात हि आसन से उठे |

मन्त्र-
|| ॐ रं श्रीं ह्रीं धं धनदे रतिप्रिये स्वाहा ||

  यह धनदा साधना का मूल मन्त्र है, १०० माला मन्त्र जप करना है, यदि आसन सिद्धा नहीं है अर्थात एक ही दिन में साधना यदि संपन्न न कर सकें तो ,
इस साधना का ११ दिन का संकल्प लें और इसे प्रतिदिन १००८ मन्त्रों का जप यानी ११ माला जप करते हुए ११ दिन में साधना संपन्न करें, इस तरह सम्पूर्ण प्रयोग कुल ११ दिन का हो जायेगा |  तो साधना करने का दृण संकल्प लें और----J


निखिल प्रणाम


***रजनी निखिल***

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