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Tuesday, February 16, 2010

श्वेत बिंदु ,रक्त बिंदु रहस्य-४ (व्योम क्रिया)




उच्चकोटि के साधक इसी पारद शिवलिंग के प्रयोग से भूमि तत्व पर नियन्त्रण कर लेते हैं ,और की जब चाहे अपने शरीर मे भूमि तत्व का लोप कर शरीर को शून्य मे स्थित कर लेते हैं या वायुगमन कर लेते हैं .
पर एक सामान्य साधक अपने जीवन मे शुन्यस्थ होने से कही ज्यादा महत्त्व भौतिक सम्पन्नता को देता है , और देना भी चाहिए आखिरकार जीवन के विविध सुखों की प्राप्ति धन से ही तो हो पाती है ना........
ये सम्पन्नता भी ऐसे ही रसेश्वर की साधना से प्राप्त होती है , नित्य विल्वपत्र या कुमकुम से रंजित अक्षतों को भी १०८ मन्त्रों के द्वारा इन्हें अर्पित करने पर भौतिक पूर्णता साधक के जीवन मे आती ही है.
क्या ये इतना सहज है ??? मैंने पूछा.....
क्या भौतिक सम्पन्नता !!!!!!!
नहीं नहीं .... ये तो मैं भी भली भांति जानता हूँ की रसेश्वर की साधना करने वाले साधक की अभ्यर्थना तो स्वयं शक्ति स्वरूप लक्ष्मी भी करती हैं और ये प्रभाव मैं खुद भी अपने जीवन मे अनुभव कर सका था ... इसीलिए मैं भौतिकता की नहीं दिव्यता की बात कर रहा हूँ . क्या मात्र त्राटक के साथ कोई अन्य रहस्य नहीं जुदा हुआ है शरीर को शुन्य भार करने मे ?????????
है बिलकुल है .... और क्यूँ नहीं होगी , क्या आपको लगता है की ये सब इतना सरल है ..... नहीं बिलकुल नहीं ..... जब शरीरस्थ तत्वों को आप अपने नियन्त्रण मे ला लेते हैं तो भला क्या है इस ब्रह्माण्ड मे जो साधक प्राप्त नहीं कर पाता वो भी मात्र संकल्प बल से...
अणिमा, महिमा ,लघिमा, वशित्व,प्राकाम्य, आदि परा और अपरा जगत की विविध शक्तियों का साधक भली भांति प्रयोग कर सकता है क्योंकि साधक सामान्य साधक न होकर सिद्ध की अवस्था को प्राप्त कर लेता है . और ऐसा तभी हो पाता है जब साधक उस रहस्य से परिचित हो जो न सिर्फ गुप्त रखा गया है सिद्ध समाज मे, बल्कि जिसकी भनक भी नहीं पड़ने दी जाती है सामान्य मनुष्यों को ....................

सबसे पहले तो ये समझो की शरीर मे स्थित दो लक्ष्य –बाह्य और आभ्यांतरिक हैं . जो साधक अपने शरीर को ही नहीं जानता वो कैसे सफलता पा सकता है ..
शरीर सिद्धि के लिए छह चक्रों,षोडश आधारों, त्रिलक्ष्य ,व्योम पंचक ,नव द्वार, पंचाधिदैवत का ज्ञान पाना अनिवार्य है .
जब साधक पारदेश्वर को सामने रख कर उस पर त्राटक करता हुआ त्रिनेत्र मंत्र का जप करता है . तो शनै शनै साधक को काल ज्ञान की क्षमता प्राप्त होने लगती है . अब साधक के ऊपर है की ये क्रिया वो बाह्य रूप से संपन्न कर वो मात्र काल ज्ञाता बनता है या इस दुर्लभ विश्व विजयी रसेश्वर का सम्बन्ध आत्मस्थ महालिंग से कर महासिद्ध और परम सिद्ध अवस्था को प्राप्त कर लेता है . जिसके बाद कुछ भी अप्राप्य नहीं रहता .
भला ये कैसे होता है ???? मैंने पूछा ...
थोडा सब्र करो बताता हूँ........ मूलाधार और स्वाधिष्ठान के मध्य मे त्रिकोणाकार स्थान है जिसे योनि कहा जाता है इस योनि को कामरूप कहा जाता है ...
यही तंत्र व योग सिद्धों के द्वारा वंदित कामाख्या शक्तिपीठ है और इसी पीठ के मध्य मे पश्चिम मुख महा लिंग स्थित है ,जिनके शीर्ष पर मणि अवस्थित है.जो स्वर्ण वर्णीय अग्निमयी ज्योति से आलोकित है . अनंत विश्वतोमुख इस महाज्योति से जब बाह्य स्थित रसेश्वर का पूर्ण मानसिक एकाकार होता है तो वो परम ज्योति साधक के सातों शरीर को ही न सिर्फ जाग्रत कर देती है बल्कि उनकी शक्तियों के स्त्रोत भी खोल देती है .इसके लिए बहुत धैर्य की आवशयकता होती है . त्राटक के मध्य जब पारदेश्वर का बिम्ब त्रिकुट या भ्रूमध्य मे बनता है तो अंदर जाती श्वास के साथ ही उस बिम्ब को अपने मूलाधार तक लाया जाता है . देखने मे ये क्रिया कठिन है पर ऐसा है नहीं . अभ्यास से ये क्रिया सहज सिद्ध हो ही जाती है . और एक बार जब वो रसेश्वर पूर्ण रूपेण आंतरिक महालिंग मे स्थित हो जाता है और वो परम ज्योति बहुगुणित हो जाती है . तब साधक को बाह्य आलंबन की कभी भी आवश्यकता नही रहती बल्कि वो जब चाहे एकाग्र मन से उस आंतरिक रक्त बिंदु, स्थित महालिंग मे बाह्य श्वेत बिंदु द्वारा निर्मित रसेश्वर का पूर्ण दर्शन कर जो भी चाहे पा लेता है . और ऐसा होने के बाद वो उस परम ज्योति को अलग अलग चक्रों पर पर भी स्थापित कर सकता है जिससे उन चक्रों और उनके स्वामित्व वाले शरीर व लोकों मे उसका गमन भी सहज हो जाता है और उसे बाह्य ब्रह्मांडीय यात्रा की आवश्यकता ही नहीं रहती , वो शरीर मे स्थित ब्रह्माण्ड की यात्रा जब चाहे कर लेता है .
क्योंकि कहा गया है की “ यत पिंडे तत् ब्रह्मांडे” .... और ये उक्ति तभी तो चरितार्थ होगी. जब हम उपरोक्त प्रक्रिया संपन्न कर लेते हैं.
और आप सभी जानते ही हैं की हमारे आंतरिक चक्रों की शक्तियां अनंत है ... इस लिए भला क्या अप्राप्य रह जायेगा साधक के लिए.
ये क्रिया श्रेष्ठ साधकों के मध्य व्योम क्रिया के नाम से जानी जाती है. इसीलिए तो कहा जाता है की यदि पूर्ण संस्कृत , मन्त्रों से अभिसिंचित पारदेश्वर साधक के पास हो तो ऐसा साधक कुछ भी कर सकता है , शर्त यही है की उसकी जिज्ञासा का अंत न हो , जिज्ञासा होगी तभी तो नवीन रहस्यों का अनावरण होगा.....है ना...........
रक्त बिंदु और श्वेत बिंदु के द्वारा अध्यात्मिक उपलब्धि के साथ वाम-तंत्र जगत के अनसुलझे रहस्यों के भेदन की गोपनीय क्रिया का विवरण अगले लेख मे .....


****ARIF****

1 comment:

MUKESH SAXENA said...

aaj humne aapke 2008 ke kafi lekh parad vigyaan par padhe.hum parad aur surya vigyaan poorn roop se seekhna chahte hain,hum ye to nahin jaante ke hum iss layak hain ya nahin.arif bhaiyya.lekin hamaari aarthik sthiti itni achchhi nahin hai ke iski workshop ki fees vahan kar sakein.kyonke ismein kharch to bahut aata hoga ek ek workshop mein.mehnat karne mein hamein koi taklif nahin hoti,waise bhi bina mehnat ke kabhi koi divya gyaan prapt nahin hota.kya aap hamein iska systematic gyaan denge?
mukesh saxena
e-mail:msaxena.saxena@gmail.com