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Sunday, December 26, 2010

Sadgurudev Prasang -Vaitaal sadhana and I (a small experience attending the sadhana shivir )



 मैं हमेशा से ही  सदगुरु देव जी  के  जितने भी पास होने का मौका मिले  उसे प्राप्त  करना ही चाहता था|मेरा उद्देश्य था ही की   जैसे भी  मुझे  उनकी कृपा प्राप्त हो चाहे वह  पत्र के रूप में हो या  या दीक्षा  के रूप में या दिल्ली गुरु धाम में उनके सानिध्य में की जाने वाली साधना में भाग लेने के रूप में हो| ऐसे  ही  एक अपने अनुभव को आपके साथ  बाटने जा रहा हूँ |
जिसमे  आप ये जानेगे कि सदगुरुदेव ने  मुझ जैसे एक सामान्य शिष्य  की प्रार्थना  पर ....
               मैं  हमेशा से  कोशिश करता था  था कि जब भी कोई उच्च या महान साधना  जो कि मंत्र तंत्र यन्त्र विज्ञानं पत्रिका में प्रकाशित  होती थी, और यदि वह सदगुरुदेव जी के सानिध्य में हो रही हो तो मुझे उसमें उपस्थित  होना ही हैं जैसे ही  थोड़े से ही पैसे  मेरे पास  हुए में  दिल्ली  जा कर उनसे मिल कर ही आता था | उन दिनों में वह  केबल दीक्षा  देने के लिए ही बाहर आते थे या फिर किसी विशेष साधना को संपन्न करवाने के लिए. |
एक बार पत्रिका में वैताल साधना इस  माह कि इस तारीख को होगीविवरण आया |मैंने निश्चय किया कि भले ही मुझ में इस महान साधना  करने कि योग्यता नहीं हो पर सद गुरुदेव जी द्वारा  यदि वैताल स्थापन क्रिया का स्थापन यदि इस शरीर में ही जाये तो  उससे बड़ा सौभाग्य क्या हो सकता हैं ,भले ही में भविष्य मैं  ये साधना  संपन्न  करूँ  पर आज इस साधना  और उनका आशीर्वाद प्राप्त हो जाये  इससे बड़ा सौभाग्य क्या हो सकता हैं|
                    मैं  दिल्ली   पहुँच कर सुबह के समय गुरुदेव त्रिमूर्ति जी  से मिला | और दोपहर के समय दिल्ली यात्री निवास में बापिस आया जहाँ पर  मैं रुका था | क्योंकि साधना  हमेशा ही  संध्या काल में  ही  होती थी उसके लिए संध्या काल से बजे  समय पहले से ही निर्धारित था.| मैं संध्या के बजे  गुरुधाम के लिए  बस से चल पड़ा |रास्ते के मध्य में ही मुझे अत्याधिक तीव्र  पेट दर्द शुरू हो गया साथ ही साथ उल्टिया भी चालू हो गयीं ,| दर्द इंतना  ज्यादा था कि मेरे पास कोई रास्ता नहीं बचा  मैं  बापिस लौट पड़ा |
                                       थोडा सा आराम  करने के बाद मैं पुनः  एक बार फिर गुरुधाम के लिए निकल पड़ा  उस समय .३० शाम के हो रहे थे और मुझे घंटे वहां   तक  पहुँचने  में लगना ही थेतब तक तो निश्चित ही साधना  समाप्त हो चुकी  होगी |पूरे  रास्ते भर  मैं यही प्रार्थना  करता रहा  कि मेरे  प्रिय  सदगुरुदेव जी , में इसी साधना के लिए ही यहाँ पर आया  था कुछ मेरे लिए  करिए| मेरी प्रार्थना के मध्य में ये बिचार भी बार बार उठ रहे थे कि  इस प्रार्थना  का  अब क्या मतलबनिश्चय ही साधना  अब तक तो समाप्त   हो गए होगीमेरे पास कोई ओर रास्ता भी नहीं था  बस प्रार्थना ओर प्रार्थना ,समय भी समाप्त होता जा रहा  था मेरी बस ट्राफिक  जाम में फसीं हुए थी |जैसे ही समय होता जा रहा  था मेरी ह्रदय कि धड़कने भी बढती जा रही थी | जैसे ही मैं  कोहाट एन्क्लेव  के पास पहुंचा  मैंने बस से उतर कर भागा| उस समय .१५  रात्रि के हो रहा थे | जब मैं गुरुधाम पहुंचा  तो पाया ना केबल हॉल पूरा भर चुका था  बल्कि लोग तो उसके बाहर  भी खड़े  और बैठे थे | 
                मैंने एक गुरु भाई से पूछा की क्या साधना  हो चुकी हैंउन्होंने कहा की नहीं |किसी तरह मैं जगह बना  कर काउंटर पर पहुच कर  साधना पैकेट  ले लिया | तभी मैंने देखा की सदगुरुदेव जी कुर्सी पर बैठे हुए शांति से लगातार मुझे देख रहे हैं | हॉल मैं  पूर्णतः   ख़ामोशी  व्यापत थी |, मैं रोमांचित सा हो गया |
       कहीं भी कोई भी स्थान शेष था मैं कहा पर बैठूं ,अब क्या करूँ |
               सदगुरुदेव जी ने  बिना कोई शब्द बोले उँगलियों का इशारे  से मुझे अपने पास बुलाया ,और अपनी कुर्सी के ठीक पीछे  बैठने को कहा | जैसे ही मैं पीछे बैठ गया , तो उन्होंने मुड के मेरी  तरफ देखा, मैं साधना  पैकेट  खोल रहा रहा था|वे मुस्कुराये और उन्होंने अपना साधना सम्बंधित प्रवचन प्रारंभ कर दिया |  

               वैताल साधना  के बारे मैं समझाया |(यह मेरा प्रथम बार का अनुभव था जब मैं उनके ठीक पीछे  जमीं पर  बैठ कर उनके अमृत बचन सुन रहा था|)
हर कोई उन अमृत बचनो को सुन रहा था, मानो  समय भी रुक गया था |

          उन्होंने बताया ना केबल वैताल  दीक्षा के बल्कि वैताल साधना के भी चरण होते हैं |व्यक्ति एक एक करके साधना करके अगले चरण की साधना  को संपन्न कर सकता हैं |
यद्दपि  प्रथम चरण की साधना भी पूर्ण हैं पर समस्त चरणों की साधना  को पूर्ण करना , को समझाने के लिए शब्द ही नहीं हैं |
प्रवचन के अंत मैं उन्होंने कहा की मुझे बचन दो की  बिना कारण के कभी भी किसी को भी नुकसान नहीं पहुंचोगे  ही इस साधना के माध्यम से कोई असामाजिक कार्य करोगे , हमने प्रसन्नता  पूर्वक  आज्ञा स्वीकार की |
               इसके बाद मुझे पता चला की साधना का टाइम तो .३० रात्रि  था , परन्तु उस दिन क्यों वे इतनी देर से साधना प्रारम्भ करवाई  थे, कारण मुझे तो पता ही था  की मैं जो लगातार प्रार्थना कर रहा था इस कारण वे मेरे लिए रुके थे, (यद्दपि समय बजे को पार कर गया था , हमारे  गुरु भाई धैर्य  पूर्वक प्रतीक्षा  कर रहे थेउनमे से ये कौन जानता था कि मेरी प्रार्थना  के कारण ये सब हो  रहा था |)
                 ये घटना क्रम  अपने आप मैं कोई विशेष ज्ञान नहीं लिए हुए हैं , परन्तु एक सन्देश आप तक बता रहा हैं कि  उनके लिए हर शिष्य महत्पूर्ण हैं ,चाहे आप ऑफिस में या बस में प्रार्थना कर रहे  हो, हर प्रार्थना उन के ह्रदय  तक तक पहुँचती हैं ही,और वे उत्तर भी देते हैं ही बस उसे समझने कि जरुरत हैं | आगे से जब भी मैंने गुरुधाम में होने वाले शिविर में भाग लिया और जब सदगुरुदेव जी के आने में देरी होती तो में ये समझ जाता कि मालूम मेरे जैसा कौन ,कहाँ पर प्रार्थना कर रहा  हो |
उनका ह्रदय कोई अंतर /विभेद  नहीं समझता |

                          मुझे याद आता हैं की एक बार उन्होंने कहा था की  वे हमारी(शिष्यों) की समस्याए समझते हैं , ओर हमारे जीवन मैं केबल और केबल  समस्याएँ ही हैं ओर यही हमारी जीवन भर की पूँजी हैं,चाहे हमारी समस्यांए  हजारों हो ,पर याद रखना  की तुम्हारा गुरु  इन सब के ऊपर लाख गुना  समर्थ हैं |पर बे केबल हमारा स्वार्थ रहित प्रेम ओर  श्रद्धा ,साधना और गुरु के प्रति चाहते हैं |
                        इसलिए प्रिय  भाइयों ,सदगुरुदेव जी के लिए चाहे आप हो या मैं कोई अंतर  नहीं हैं, हम सभी उनके ही बच्चे हैं |उनका स्नेह हम सभी के लिए हैं ओर एक समान  भी हैं |ये उनकी स्नेह और दयालुता थी की वे   आज भी हमारे मध्य गुरुदेव त्रिमूर्ति के रूप में सामने हैं |ओर लगातार नए शिष्यों को भी   स्वीकार करते जा रहे हैं |
एक पल के लिए सोचिये उन्होंने ये   किया  होता तो आज हम कहाँ जाते |
आज ही नहीं हम सभी हमेशा उनके स्नेह छाया के तले  हैं ओर रहेंगे भी |

                               मैं प्रार्थना  कर रहा हूँ की हम सभी जिज्ञासु के स्तर से ऊपर उठ कर शिष्य  के स्तर  को प्राप्त करें और सच्चे अर्थों  में  सदगुरुदेव जी के आत्मांश  बने , अपना जीवन  के कुछ समय  को ,साधना  के क्षेत्र में समर्पित  करें ,और सदगुरुदेव जी का सपना कि इस धरती पर ही सिद्धाश्रम  बने को साकार करें|

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                              I always tried to  get  Sadgurudev ji closeness,  and always mine main motto was to take anyhow his blessing either in form of letter or  diksha or  taking part in sadhana directed by him in Delhi  Gurudham. Once such an exp I will be sharing  with you all.
 shows you that  how ,Sadgurudev ji  respond a younger, small shishya like me and ….  
 I always try  that any higher  or great sadhana, if published in mantra tantra vigyan and that if done under the direction by Sadgurudev ji, I would like to  be present. as I was able to collect  little money I simply went to Delhi to meet him, in that time he was mainly coming out to give diksha. and in some occasion on specific sadhana too.
Once appeared in mantra tantra vigyan marg that Vaitaal sadhana would be on such and such date, I I  made my mind that, even I did not have such quality to have this great sadhana ,,but Sadgurudev blessing as Vaitaal sthapan  in my body, should  be like a great boon. may be in future I would do the sadhana, but now his blessing and understanding the sadhana from him is  also a boon.
I reached Delhi, and in morning meeting time I meet Guru Trimurti ji, and in mid day I returned to mine stay place Delhi yatri nivas. Since sadhana had to be   in evening time, usually 6 to 8 Pm was fixed for that, I started about 5 pm and in between the way , I have a very high stomach pain and I start vomiting continuously. Pain was so high I had no choice I immediately returned in the middle of  my way.
      After resting a little bit I again started my journey, since it was 6.30 pm and at least 2 hours I need to reach their, till then sadhana definitely be completed,  throughout the way I deeply prayed that, Sadgurudev ji I came for this sadhana plz  do something for me, in between my prayer .this thought also rise from time to time, what was the use of this  prayer, sadhana definitely be completed till that time.
         I had no option but only this to pray and pray, but also that I was losing time continuously ,my bus  was in between traffic jam . as the time passes by so my heart beats starts running fast  .as I reached near to kohat enclave, I run  as I came out of bus, it was 9.15 pm. As I  reached Delhi Gurudham, found that not only  in the hall but people  also sitting /standing outside of that.
i asked one guru brother about the status of     whether the  sadhana completed,  he replied no. anyhow I made a way to reach  to counter and got the sadhana packet, when I saw Sadgurudev ji (he was sitting in the chair), was continuously watching me ( total pin drop silence in whole   hall and surrounding).i thrilled .
 find no place to sit/stand . now what should  I do.
Sadgurudev ji pointed his figure  toward me without saying any word ,indicate to come nearer him, and point  me to sit down just behind his chair on the floor .  He just turned  to me, saw that  I was opening the sadhana packet. Smiled, and his  pravachan started on Vaitaal sadhana. (Its mine first turn to listen him from his back side,)
Every one listening him ,suppose time stand still.(complete pravachan still available in audio cd format.)
He mentioned that not only 6 step of Vaitaal diksha but sadhana also has 6  steps, one by one  person  complete a sadhana of it and can move for advanced stage. though first level sadhana it self a complete one. but completing all the six steps , word not able to describe it..
Lastly he asked us, give him promise never ever use this sadhana for, without any case hurting to any one, should not do any anti social activity. we happily did that.
Later I came to knew that though sadhana time was started 6 pm to 8 .30 pm. but as I continuing praying . he waited for me.(even the time crosses 9 pm and all the our guru brother patiently waited there, who knows that mine continues prayer was  responsible for that delay ).
 This  incident not carrying any special spiritual  gyan , but carry a message that, for him every  shishya is important. what you pray either sitting in office /or in bus. Every prayer reaches his heart and he answers that too. But need to understand that. Onwards when I got chance to  take part in Delhi Gurudham’s  sadhana, if Sadgurudev  did not come out on time, I understand who knows someone like me, praying some where else.
 His heart  knows no difference.
I remember once he said that he understand  our (shishy’s )problem and . all our life earning is only problem and problem and nothing else, but even our problem is thousand type, he is million times greater on such problems(infront of him hat stands nowhere), what he need only our selfless love and devotion towards him and sadhana)
So dear one, for Sadgurudev ji , every one like you or me,  have no difference, we all are his children, he loves us all and equal too. Its his great mercy/blessing  that still  he is in the form of guru Trimurti in front of us, and still accepting new shishya continuously .
Think about that , If  not happened that , where we would go.
Still we are in his blessing  and always be.
I pray that we all are  rises from jigyasu (just curiosity seeker) stage to true shishya  and  became aatamansh  of Sadgurudev ji and devote some part of our life in sadhana field  to fulfill his dream to have siddhashram on this earth .
Smile 



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1 comment:

gurpreet hoshiarpur said...

anu bhaiya aap k dwara likhe gaye sadguru prasang sadhna k liye bahut energy dete hain.aur shrdha ko bahut hi mazboot karte hain.