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Saturday, February 25, 2012

बीजोक्त तन्त्रम् – शक्ति समन्वित गुरु पादवंदन अनाहत कल्प(Beejokt Tantram- Shakti Smanivat Guru Paddvandan Anahat Kalp )COMPLETE


“भुक्तिमुक्ति प्रसीद्धयर्थ मीयते सद्गुरुं प्रति”
मालिनिविजय तन्त्रं”का ये श्लोक उन रहस्यों को विवेचित करता है जो गूढ़ है,सामान्य अर्थों से इस श्लोक का गूढार्थ समझा ही नहीं जा सकता है | अभिन्न भाव से भोग और मोक्ष की प्राप्ति’  सद्गुरु का आश्रय लिए बिना कदापि संभव नहीं है |
स्मरण रखने योग्य तथ्य ये है की अवसाद युक्त मष्तिष्क,कपट से भरे विचार और अस्थिर चित्त के होते हुए यदि हम सद्गुरु का आश्रय मात्र जिव्हा के द्वारा या अपनी तथाकथित छवि को बचाने के लिए स्वप्रशंसा हेतु प्रयोग करते हैं तो समर्पण हुआ कहाँ,और जब समर्पण ही नहीं हुआ तो पूर्णत्व के पथ पर भला वो परम तत्व जो की कालातीत गुरु तत्व है हमें कैसे अग्रसर कर सकता है | हमें समर्पण का मूल नियम ही नहीं पता है |वो नियम जिसे समझे बिना हम सद्गुरु की कृपा प्राप्त कर ही नहीं सकते और जब कृपा प्राप्ति’  ही नहीं हुयी तो आगम-निगम,वेद-वेदान्त, साधना और सिद्धियों की प्राप्ति’  तो बहुत दूर की बात है अनुभूति का धुआँ भी आपको सूंघने को नहीं मिलेगा | और वो नियम है सब कुछ छोड़कर मात्र उनके समक्ष चले जाना |शायद पढ़ने में ये बहुत आसान लग रहा हो पर है ये अत्यधिक कठिन, क्यूंकि हम धन छोड़ सकते हैं,परिवार से भाग सकते हैं,भय से मुक्त हो सकते हैं,त्याग कर सकते हैं,किन्तु क्या आपको पता है की स्वयं से स्वयं को मुक्त करवा लेना इतना सहज नहीं है |इसका सीधा सा अर्थ है की हमारा समर्पण बहुत ही नापा तुला होता है और हमने स्वयं के समर्पण के लिए एक सीमा रेखा अर्थात dead line भी तय कर ली होती है,की हम मात्र इतना दे सकते हैं.इससे ज्यादा यदि हमारा गुरु मांगेगा तो वो हमारे वश का नहीं है |याद रखिये गुरु को आपका धन नहीं चाहिए होता है,आपका ऐश्वर्य उनके लिए अर्थहीन होता है,उन्हें मात्र आपका पूर्ण समर्पण चाहिए होता है,और जब ऐसा होता है तो वो आपको तराश कर अनमोल रत्न बना देते हैं की जिसके पाने के लिए ये दुनिया ही पागल हो जाती है |
मात्र डेढ़ वर्ष पहले जब मैं मेरे मास्टर से मिली तो मैंने बहुत से तर्क वितर्क तंत्र और गुरु को लेकर किये, किन्तु उन्होंने मुझे अत्यंत धैर्य से समझाया और जिन तथ्यों को उन्होंने मुझे समझाया था उसके अंत में उन्होंने यही कहा की मैंने जिन तथ्यों को समझाया है वो मुझे मेरे प्राणाधार सदगुरुदेव से प्राप्त हुए हैं और मैंने इन तथ्यों के बल पर ही आज तक सब कुछ पाया है और भविष्य में भी प्राप्त करता रहूँगा,और उसी विश्वास से यह कह रहा हूँ की यदि तुम भी इन नियमों को अपने जीवन में अपनाओगे तो तुम्हारे जीवन में रिक्तता नहीं रह सकती | समर्पण से ही प्राप्ति’ हो सकती है |प्राप्ति’ जो अष्टादश सिद्धियों में से एक है और इस प्राप्ति’ सिद्धि की प्राप्ति’ का मार्ग समर्पण से ही संभव है | तब ना तो जीवन में कोई अवसाद होता है,ना कोई ईर्ष्या और ना ही पतन का डर |तब मात्र अवसर की प्रचुर उपलब्धता ही हमारे चहुँ और रहती है |सदगुरुदेव कहते थे की पराजय के डर से भरा हुआ मनुष्य वस्तुतः ये भूल जाता है की उसने अपने जीवन का प्रारंभ ही विजय से किया होता है अर्थात उसका जन्म प्रकृति के व्याघातों से लड़कर और जन्म के प्रतिकूल वातावरण से लड़कर ही होती है और जीवन एक विजय से दुसरे लक्ष्य के मध्य की मात्र यात्रा ही तो है,और वो लक्ष्य होता है मृत्यु पर जीत का,जीतने का अर्थ ना मरने से नहीं है अपितु अपनी इच्छा से अपनी देह,आत्मा और कीर्ति को विस्तारित करने से है, और इस यात्रा के मध्य प्रचुर अवसर आते ही हैं किन्तु तब जब मार्गदर्शक हो आपको जीवनमार्ग की कठिनाइयों को पार करने का कौशल सीखने वाला |और ये मार्गदर्शक मात्र सद्गुरु ही तो होता है जिसने स्वयं उस परम तत्व को अपने अंदर आत्मसात कर लिया हो और स्वयं ही निखिल तत्व में परिवर्तित हो गया हो| मात्र वही बता सकते है की जीवन में प्राप्त अवसरों का कैसे सदुपयोग किया जाए,अवसर के अनुकूल हम अपने मनोभावों को कैसे परिवर्तित करे जिससे प्रगति और आनंद की प्राप्ति’  हमारे लिए सहज हो जाये ये मात्र वही बता सकते हैं,तब हम किसी भी क्षेत्र में क्यों न हो,कैसे भी कार्यों को हाथ में ना लें,विजय हमारा ही वरण करेगी | याद रखो कार्य का संभव होना या न होना मनोभावों पर निर्भर करता है और इसे स्थिति को प्रारब्ध या ‘प्राप्ति’ ’ के नाम से जाना जाता है | 
और मैं आज पूर्ण गर्व से कह सकती हूँ की मैंने मास्टर की बात और आत्मविश्वास को हृदयंगम किया  अपने आपको सदगुरुदेव के श्री चरणों में पूरी तरह उड़ेल देने से नहीं रोका,मेरा ध्येय मेरा लक्ष्य मात्र मेरे सदगुरुदेव ही बन गए और तब इन्ही सूत्रों के क्रमशः पालन ने मुझे अवसाद और हीन भावों से मुक्ति दिलाई,अवसरों का सदुपयोग करने की कला सिखाई जिससे आज आत्मविश्वास और सफलता की प्राप्ति मेरे लिए कही सहज है,कैसे विपरीत स्थितियों से निकल कर आज तक की यात्रा मैंने की है ये बताना कही ज्यादा कठिन है,आज मुझे स्वयं को विश्वास नहीं होता है की ये मैं हूँ | और इन क्रियाओं के बाद ज्ञान और अनुभूतियों का जो मार्ग सदगुरुदेव की कृपा से मेरे लिए खुला उसकी तुलना विश्व के किसी खजाने से नहीं की जा सकती है |    
 मास्टर ने बताया था की सदगुरुदेव हमेशा कहते रहे हैं की गुरु ध्यान के लिए अक्सर हम एक वाक्य सुनते हैं की जब भी गुरु का ध्यान करना हो अपने त्रिकूट में अर्थात भ्रूमध्य में करना चाहिए | किन्तु क्या वास्तव में नासिकाग्र अर्थात जहाँ से नाक का प्रारंभ होता है या ललाट पर जहाँ बिंदी लगायी जाती है वहाँ गुरु का ध्यान किया जा सकना सहज और पूर्ण ध्यान है ??  नहीं क्यूंकि गुरु का ध्यान क्रमिक रूप से श्री गुरु,श्रीमत गुरु और तदुपरांत सद्गुरु के रूप में किया जा सकता है | क्यूंकि सामान्य रूप से गुरु का बिना शक्ति युक्त ध्यान करना अपूर्ण ध्यान ही होता है और तब मात्र उनकी देह का चिंतन ही हम करते हैं किन्तु पूर्ण शक्ति युक्त ध्यान गुरु का ब्रह्मांडीय ध्यान होता है | और उस ध्यान तक या गुरु की उस विराटता तक हम तभी पहुच पाते हैं जब पहले हमने उनका दर्शन अपने ह्रदय में किया हो अर्थात अनाहत चक्र में उनकी स्थापना की हो,तदुपरांत विशुद्ध और फिर आज्ञा चक्र में | इसी क्रमिक ध्यान द्वारा हम सद्गुरु के दिव्य चरणों का बोध कर पते हैं और उनके वास्तविक स्वरुप और उनसे अपने संबंधों की सत्यता और पुरातनता भी | इसके बाद कोई अवसाद,कोई ईर्ष्या,कोई असफलता या मलिनता हमारी साधनात्मक,मानसिक,शारीरिक या आर्थिक उन्नति को नहीं नहीं रोक पाती है | अनाहत चक्र पर गुरु का ध्यान उनकी परांगत मूल शक्ति का उनसे योग कराती है अर्थात यहाँ पर हम ध्यान कर हमारे गुरु के मूल शक्ति स्त्रोत के उनकी करुणामयी ममता का,उनके स्नेह का और उनके तेज का दर्शन करते हैं जिससे हमारे मॉल शिथिल होकर भस्मीभूत हो जाते हैं |
अनाहत पर किया गया ध्यान गुरु के प्रति हमारे मलिन भाव का और संबंधों के संशय का नाश करता है जिससे भावनागत शुद्धि आती है,चित्त की निर्मलता की प्राप्ति होती है |यहाँ वे श्री गुरु के रूप में विराजमान होकर अपने दर्शनों के द्वार खोलते हैं |   
इसके बाद विशुद्ध पर किया गया ध्यान निर्मल भावनाओं को वाणी की सत्यता और शब्द शक्ति का बल देता है ,जिससे मंत्र जप में अतिशीघ्र सफलता और पूर्ण तेज की प्राप्ति होती है | यहाँ वे श्री मत गुरु के रूप में शिष्य को अपने प्राणांश से जोड़कर सफलता का योग करा देते हैं |
तदुपरांत आज्ञा चक्र पर किया गया ध्यान जिव्हा और मन द्वारा किये गए जप को सिद्धि प्रदान करते हैं जिससे सभी क्षेत्रों में सफलता प्राप्त होती ही है , मंत्र पुरुष के दर्शन यही होते हैं,यही सदगुरुदेव की विराटता से शिष्य का परिचय होता है और उनका अनुग्रह भी |
    इन्ही क्रमों का मैंने खुद प्रयोग किया और सफलता भी पायी है,मुझे मास्टर ने इन क्रमिक ध्यान प्रयोग में से प्रथम प्रयोग को लिखने की अनुमति दी जिससे मेरे सभी भाई-बहनों को सफलता प्राप्त हो और उनका चित्त पूर्ण निर्मल भाव की प्राप्ति कर समर्पण का अर्थ न सिर्फ समझ सके अपितु उसे साकार भी कर सके | आप स्वयं अनुभव करेंगे की आपके भीतर छुप कर बैठे विभिन्न मलिन पक्ष कैसे उभर उभर कर सामने आते हैं और तभी आपको ज्ञात भी होगा की जीवन यात्रा पर अभी तक आपकी किये गए प्रयास क्यूँ नकारात्मक परिणाम देते रहे हैं,और आप को क्यूँ बार बार असफलता मिलती रही,मात्र इतना ही नहीं इस प्रयोग के बाद आप स्वयं ही इन नकारात्मक भावों का सकारात्मक परिवर्तन होते हुए देखंगे और देखंगे परिस्थितियों को अपने अनुकूल होते हुए भी.
किसी भी गुरूवार या रविवार की सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण कर उत्तर दिशा की और मुख कर सफ़ेद आसन पर बैठ जाएँ,सामने गुरु चरणों का और सदगुरुदेव तथा माता जी का संयुक्त चित्र हो,यदि गुरु यन्त्र और गुरु पादुका हो तो और अच्छा और यदि ना हो तब भी चित्र तो अनिवार्य ही है.
फिर निम्न गुरु ध्यान का उच्चारण ५ बार करें-
“अखंड मंडलाकारं व्याप्तं येन चराचरम् |
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरुवे नमः ||”
ये ध्यान मंत्र कई कारणों से विशिष्ट है,इसके इसके द्वारा श्री गुरु के चरण कमल के दिव्या दर्शनों का सौभाग्य प्राप्त होता है,उनके मूल स्वरुप से परिचय की और पहला तथा अनिवार्य क्रम जहाँ हम जिज्ञासु से शिष्यता की और मुड़ते हैं |
इसके बाद उन दिव्य चित्रों और यंत्रादि का पूर्ण पूजन करे और सफलता की प्रार्थना करे और गुरु मंत्र के द्वारा ११ बार प्राणयाम करे और बाद में गुरु मंत्र की १६ माला जप करे और
“ओम गुं गुरूवै नमः” 
का उच्चारण कर हल्दी मिश्रित पीले अक्षतों को १० मिनट तक उन दिव्य चरणों पर १-१ करके अर्पित करते रहे और तब स्थिर देह के साथ किसी भी सुखासन में बैठकर अनाहत चक्र पर ध्यान केंद्रित कर
“ह्रीं ग्रीं ह्रीं” (HREEM GREEM HREEM) मंत्र का जप ४५ मिनट तक करे,धीरे धीरे आपको पूर्ण निस्तब्धता और शांति की प्राप्ति होने लगेगी आगे के दिनों में अनाहत चक्र में गुरुचरणों का पूर्ण बिम्ब दिखाई देने लगेगा, किन्तु साथ ही साथ मलिन भावों का उद्वेग भी अनुभव होगा जिससे सामान्य दैनिक जीवन और संबंधों में साधना के प्रति अरुचि और संशय भाव की जागृति होगी,लेकिन आप अपनी क्रिया संपन्न करते रहे,अंतिम दिन तक आपको पूर्ण प्रकाश और अनाहत कमाल पर सदगुरुदेव का विराजमान स्वरुप दिखाई देने लगेगा और ये कोई अहसास न होकर वास्तविकता ही होगी और इसके साथ साथ आपके चित्तगत सभी मलिन भावों की निवृत्ति भी प्रारंभ हो जायेगी |तब न तो भावों में नकारात्मकता होगी और ना ही आत्मबल का आभाव ही दृष्टि गोचर होगा |तब रह जायेगा तो मात्र पूर्ण आत्मविश्वास और सदगुरुदेव की करुण कृपा से युक्त आपके निर्मल भाव,आपका समर्पण और जीवन में सफल होने के दिव्य सूत्रों का जीवन में साकार उदय | ये साधना १४ दिनों की है और माला के रूप में आप गुरुमाला का प्रयोग कर सकते हैं,रही बात प्रभाव की तो यही कहूँगी की प्रयोग करके स्वयं ही देख लीजिए | यदि भविष्य में अनुमति मिली तो अन्य दोनों क्रम भी अवश्य आप सभी के समक्ष रखूंगी |
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 भुक्तिमुक्ति प्रसीद्धयर्थ मीयते सद्गुरुं प्रति
This shlok from “Malinivijay Tantra” depicts that mysteries which always remain behind the veil and it is impossible to understand this shlok in vernacular meaning. To get Bhog and Moksha that too in varied forms without Guru is impossible.
Point which should keep in mind is that while having unstable thoughts, selfish soul, depressed mind……and moreover just to make our social image healthy among others we keep on saying lie that I am a true disciple of my Guru…..i have given my life to Him is nothing but an empty and false show off…..Guru only needs our factual devotion because without it He can’t let us walk on the way of Salvation. But the fact is that we don’t know basic rule of this devotion which is refered as Samarpan….as without this we can’t get the blessings of our Guru and without Guru’s blessing it is next to impossible even to think about Aagam-Nigam, Ved-Vedants, Sadhna and Sidhi….to get them is another worlds talk….and that rule is leave everything behind and give yourself to your Guru without any demand or expectation. May it seems easy at first stance but it is the toughest job that a person can perform because we can leave our money, comforts, family and sometime make ourselves free from our inner fear but to liberate yourself from you seems herculean task. It means we have mark a line between our Guru and us as we have our personal measurements that if Guru asks than we will give this and that but not beyond our deadline. But it’s our misfortune that we forget our Guru didn’t ask for our money or luxuries of life as all these are nothing to Him, He only needs our true affection and when we give it to Him…..than like a potter He carves His best creations on us and make us priceless diamond which can be dream of anyone’s eye.
 Just one and half year back when first time I met with my Master I discussed each and every point as per my knowledge about Guru and Tantra and without any second thought and hesitation he explained everything to me and let me know that “ Whatever I am conveying to you is all that I got from divine Master i.e. our Sadgurudev and it is because of His knowledge that I am getting and will get everything my life”, he further explained that if you too follow these rules than your life will become fruitful as well. 
“Prapti” which is one out of Ashttdshh Sidhis can be attained only through Samarpan because when we attain this feeling then all strains, jealous and fear of annihilation remains no more…..which remain behind is “success and only success”. Our Sadgurudev always told that it is nothing but the feeling of failure which frighten us but we forget that our first outcry in this world was the symbol of our success as out of millions one sperm had to fight hard to get life…..and life is nothing but a journey between one goal to another and this second goal is Victory over Death…..this victory doesn’t mean that we become immortal but its meaning is to get enlarge one’s body and soul according to one’s will. But this can happen only when you have a true guide in the form of your Guru…..Guru who knows this way very well…..who is nothing but kind of NIKHIL in himself…….as it is only NIKHIL who can tell us how we can make situations favorable to us, how we can change our feelings to achieve lifelong happiness and success…..and when this all done hardly matters which type of work we are doing and what type of situations are…success is bound to meet us. One thing which we should always keep in mind is that it is our mind which makes situations favorable and against to us…and this state of mind is called Prarabdh or Prapti.
And now today I can proudly say that whatever I learnt from my Master I truly obeyed all that and give my life to my Sadgurudev. He become my soul and breath…..and the result this that now there is no depression, inferiority and failure exists in my life….now I get what I want….it is hard to explain my whole hardship but now whenever I look at myself I always thrills with joy that “this is me” and after all these procedures with the blessings of Sadgurudev an ocean of knowledge   opens its way for me which is priceless and matchless.
Master told me that about the meditation of Guru one thing which we always learnt that HIS meditation should be done at Trikut means at Bhrumadhya. But is it really true that meditation which is done at Nasikaagrh or centre of eyes is easy and beneficial in itself?? And the answer is “NO “because meditation on the name of Guru can be done in form of SHRI GURU, SHRIMATT GURU and then SADGURU respectably. And we get the glimpse of Guru’s universal form only when we get Him establish and have His divine look firstly in our heart i.e. our Anahatt Chakra and then in our Vishudh and Aagya Chakra. By this systematic procedure we can realize Sadgurudev’s presence as well as His love behind His relations to us.  When all this done then neither depression nor jealous, failure can hinder our spiritual, mental, physical and financial development. By meditating on Anahatt Chakra we can feel the basic divine power which helps us to be one with our Guru and can have His love, feel His divine aura which has the power to get destroyed our all spiritual and mental illness.
  By meditating on this chakra we get rid of every doubt which remains as a obstacle between us and our Sadguru….our emotional thoughts become completely pure and at this point He seated as SHRI GURU and open the door from where we can see Him.
 After that when we meditate at Vishudh Chakra it strengthen truthfulness ( Vaani ki satyata) and gives power to Shabad Shakti….and with the help of this power one gets easily success in Mantra Jap. At this point Sadgurudev gets established in the form SHRIMATT GURU and be one with HIS disciple and gives success to him.
 After that meditation on Aagya Chakra opens the door of success in every field as by concentrating on it one gets Sidhi for the vocal mantra jap( jihwa dwara kiya gya jap ) and soul mantra jap ( mann mein kiya gya jap) and this is the same point where a shishya can have the golden opportunity to see his Sadgurudev.
 I followed these procedures and got success as well…..but here out of these three procedures my Master allowed me just to write the first one so that my guru bhai bahen can come to know the true meaning of Samarpan ….and give their best to be one with our honored Sadgurudev. By doing this proyog you will face to face countless negative aspect that are hidden in your inner personality…..not only this you also come to know the reason behind your every failure till the date……but! but! but!  Once as you start the proyog you’ll see how internal and external negativities and situations will convert into positive one. 
 On any Thursday or Sunday after getting bath wear neat and clean clothes and seated on white altar (aasan) by facing south direction, in front of you there should be photo of Guru Chran and Sadgurudev with Mata ji. If you have Guru Yantra and Guru Paduka then its fine but if you don’t then too will be ok.
After that keep on concentrating on the following Mantra for 5 times
 अखंड मंडलाकारं व्याप्तं येन चराचरम् |
 तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरुवे नमः ||”
This Mantra is very much important for multiple reasons as by this we not only see the divine feet of our Sadgurudev but also it changes our inner soul from a curious one to shishya.
After doing the pooja of that divine photos and yantra make prayer for success and do the Pranayaam for 11 times with Guru Mantra and then do 16 rosaries of Guru Mantra and then by chanting given mantra offer turmeric mixed yellow akshatt for next 10 minutes.
ओम गुं गुरूवै नमः
When all this done you can sit in any posture comfortable to you and try to concentrate on your Anahatt Chakra by chanting-
ह्रीं ग्रीं ह्रीं” (HREEM GREEM HREEM)
Mantra for next 45 minutes. Slowly-slowly you will realize complete peace and satisfaction and Holy Feet of our Pranadhaar Sadgurudev’s on your Anahatt Chakra but one thing which I need to clear is that as you will carry on this proyog it is quite possible that your routine life and relations your mind will divert against the sadhna and mantra jap but you have to get out of this feeling and continue your sadhna till the last day….on the final day you will see Sadgurudev is sitting on your Anahatt chakra and that will not a sort of feeling or mere illusion but a fact and by doing so you will also feel yourself liberating from negativity. Then there will be no failure, the thing which remain behind will be success, self confidence and pure devotion. This sadhna is of 14 days and use guru mala for this…..effects can be seen by you. In future if my Master will allow I’ll give next two procedures as well….
 
   

                                                                                               
 ****NPRU****   
                                                           
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1 comment:

varun said...

should hreem greem hreem mantra be chanted using guru mala and concentrating on anaahat chakra