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Tuesday, March 20, 2012

अद्भुत चमत्कारी सर्व साधना सिद्धि प्रदायक गोपनीय विधान




तन्त्र   साधना  के  महासागर   में  एक से  एक अद्भुत  क्रियाए  और साधनाए  के  विवरण  आते  हैं साधक   पढते हैं  ..उनमे से कुछ  इस  ओर  अग्रसर होते हैं कि निश्चत रूप में  सफलता  प्राप्त  कर  अपने  जीवन  को  अपने व्यतित्व को  एक  निश्चित दिशा ....एक निश्चित सफलता   दे सके . पर  यह इतना  आसान नही हैं .  अनेको क्रियाए  जो कि   न केबल  अपरिचित  रही साधको  के  मध्य   .और साथ  ही साथ   केबल  गुरु परंपरा   से  ही प्राप्त  हुयी   वे कभी सार्वजानिक रूप  से प्रकाश में  ही नही आई . .हेतु या मंतव्य   कुछ भी रहा हो .पर   इस काल  क्रम में   जब  सफलता  के लिए  वही अत्यावश्यक क्रियाओं  का ज्ञान नही  मिला  तो बार बार असफलता   ही साधको  के  हाथ में  आई  और   अनेको प्रयास करने के बाद  कभी  अपने  दुर्भाग्य   को  तो  कभी  ज्ञान की  कमी   को दृष्टिगत  करते   हुए .साधक  निराशा में   तंत्र क्षेत्र   से विमुख  होने लगे .केबल किताबे  पढकर   ही सफलता  अगर पाई जा सकती   तो यह अवस्था  न होती . क्योंकि   उन  गुप्त सूत्रों को   तो  अधिकारियो  के  मध्य    ही   रखा गया .पर एक अवस्था  यह भी  रही   कि योग्य साधको  ने  बार बार  कोशिश  कि  पर   ऐसे  व्यतित्व  जो कि  उदार ह्रदय  से बताते  या   कि जिन्हें  सच में  इन प्रक्रियाओ का ज्ञान  भी  होता  अति  दुर्लभ हो गए .परिणामतः   नुक्सान  तंत्र जगत का ही  हुआ .

किसी भी मन्त्र  को  सिद्ध करने  के लिए  मुद्राओ के ज्ञान कि  इतनी  आवश्यकता नही  होती  जितनी कि  उस क्रियाओं  को सिद्ध  करने के  उपरात प्रयोग करते समय उनका उपयोग कैसे किया   जाए .मैंने   बगलामुखी प्रयोग  सिद्ध कर लिया   पर प्रयोग कैसे किया जाये??    अगर इसका  ज्ञान  नही   हैं मुझे   तब क्या  अर्थ   रहा सारी प्रक्रिया  का .?.साधक  लक्ष्मी या  वशीकरण मंत्र  सिद्ध  तो कर लेते हैं पर   प्रयोग कैसे किया जाए इस  ज्ञानके अभाव में  सारी की   गयी मेहनत   भी  उपयोगी  सिद्ध नही  होती.आप किसी  भी महाविद्या का प्रयोग कर  ही नही सकते  अगर आपको   सही अर्थो  में  एक विशिट क्रिया  का  क्रमशः अनिवार्यतः एक भाग   नही जानते  हैं  ..जिसे  अभीतक  अति गोपनीय  रखा गया  वह  गोपनीय  क्रिया  का  पहला भाग   हैं  “संधान क्रिया “...यदि  साधना मंत्र  को सिद्ध करने के  उपरान्त  इच्छित दिशा  में  सटीक   निशाना  नही लगाया जाये  तो सारी  क्रिया  अर्थहीन  ही हैं.क्योंकि  दिशा  ही  सही नही  तो सबंधित   क्रिया   इच्छित कार्य परिणाम  कैसे  प्रदान कर सकती  हैं .भले  ही तंत्र वाधा निवारण का  प्रयोग  हो  उसमे  भी हवन जैसी क्रियाए    ततकाल परिणाम दृष्टी गोचर करा देती हैं .यदि इन आवश्यक क्रियाओं का  सटीकता  के  साथ उस किये  गए  प्रयोग में  संयुग्मन   किया जाये .

यह " संधान क्रिया" ..किसी  भी  मंत्र  के   सबंध में इच्छित परिणाम प्राप्ति में  सहायक  ही   नही वरन  अत्यंत  आवश्यक  हैं  पूज्यपाद  सदगुरुदेव के  अत्यंत कृपा  वश समस्त  आवश्यक  मुद्राओ को  केबल  पांच मुद्राओं  में  ही सीमित  कर दिया  हैं.पर इससे  अन्य मुद्रा जैसे   शक्तिचालिनी   आदि की  उपयोगिता समाप्त या कम नही हो जाती  हैं .सदगुरुदेव  जी द्वरा  जोभी  महाविद्या से संबंधित  शिविर  लगाये गए .सामान्य  साधक  केबल यही समझ  या  विचार कर पाता कि उसमे क्या होगा ..अधिक से अधिक उस महाविद्या सिद्धि .मैंने अपना   उदाहरण  दिया  ब्लॉग ..मैने कितनी क्रियाए   की  तब जा कर  धूमावती  महाविद्या  सिद्ध हुयी .सदगुरुदेव द्वारा सम्पन्न कराये गए प्रक्रिया  में पहले  आत्म्स्थापन  प्रयोग ,फिर बीज प्रयोग ,शरीरस्थ धारण  प्रयोग,निश्चित इच्छा  सिद्धि प्रयोग यह क्रम होता . और इस  अंत के प्रयोग मे   तीनो आवश्यक क्रियाए ..संधान ,लक्ष्य प्रक्षेपण . का समावेश  कर देते .अगर प्रयोग की क्षमता 400km  दूर तक की  हो तो ठीक वही  पर इतनी दुरी  स्थित  शत्रु   पर ही उसे क्रियाशील   होने  पर  ही  तो परिणाम मिल सकता हैं .क्योंकि इसमें  दिशा का निर्धारण ,तत्पश्चात दुरी का  निर्धारण ,फिर  लक्ष्य का निर्धारण यह तीन  आवश्यक  क्रम हैं . जो कि करना ही होंगे अन्यथा अपेक्षित सफलता कहाँ ??

तारा  महाविद्या  साधना शिविर में  उन्होंने अंत मे  उग्र  तारा  विधान कराया तो निश्चित स्वर्ण प्रदायक  तारा साधना विधान भी  भी  सम्पन्न कराया  .कोई   भी मंत्र अकेला नही  बल्कि उसके  साथ साथ में  चलने  वाली  आवश्यक  क्रियाओं का ज्ञान भी आवश्यक हैं ,तब  ही वह सम्पूर्ण क्रिया  इच्छित परिणाम  दे सकने  में  समर्थ  होगी . साधक  मन्त्र  तो सिद्ध कर लेगा पर  इच्छित आवश्यक क्रिया के अभाव में  उसे परिणाम कि प्राप्ति  भी नही  हो सकेगी .किसीके  पास पारस मणि भी हो  तो उसका क्या प्रयोजन?? .उचित ज्ञान  के अभाव  में  वह उसके  लिए  एक भार  ही हैं.यह   तीन अतिआवश्यक प्रक्रिया  संधान क्रिया लक्ष्य क्रिया  और प्रक्षेपण क्रिया  में  से यहाँ पर  संधान क्रिया को कैसे  सम्पूर्णता से  सिद्ध  करने हेतु 

इस  क्रिया में प्रयुक्त मंत्र भगवती राजराजेश्वरी  षोडशी  त्रिपुर सुंदरी  का बीज मंत्र  “त्री” (treem)  और भगवती  छिन्न मस्ता के महाकाली  कुल से   युक्त  होने के कारणक्रीं “(kreem) बीज से संयुक्त इस प्रकार  हैं .
मंत्र : क्रीं  त्रीं क्रीं
Mantra :  kreem  treem kreem
आवश्यक  नियम इस  प्रकार  हैं .
·  तीन दिवसीय  यह क्रिया हैं .
·  इसमें कुल  150 माला  मंत्र जप अनिवार्य हैं  और  इसे  तीन  दिनों में ही  पूरा किया जाना  हैं कम या अधिक दिन   में  नही .
·  एक  बार आसनस्थ होने  पर  केबल एक बार  २४ माला मंत्र  जप  ही किया जा सकता हैं  ,अर्थात  दिन में  दो या  तीन बार  मंत्र जप  हेतु बैठा जा सकता हैं .
·  वस्त्र  और आसान लाल  ही होने चाहिए .
·  दिशा उत्तर  या पूर्व होना चाहिये
·  मंत्र  जप  हेतु  कोई  समय बिशेष निर्धारित  नही हैं .
·  मूंगा माला /रुद्राक्ष माला / हकीक माला  का प्रयोग किया जा सकता  हैं .
इस क्रिया के सफलता पूर्वक कर  लेने उपरान्त अगली क्रिया प्रक्षेपण क्रिया  का  ज्ञान होना आवश्यक हैं ..जैसे  ही साधक इन क्रियाओं   को  समझ कर  अपनी साधना में  उपयोग करते  हैं सफलता  मानो   विजय माल्य  लिए  उनके पथ पर पहले  से ही  खड़ी  होकर इंतज़ार करती हैं .आगे आप अपनी साधना  को किस  दिशा में  ले  जाना चाहते हैं ..निर्णय आपका हैं ...
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Sadhak often reads very surprising procedures and sadhnaas in the deep ocean of tantra sadhna……by doing some of those sadhnas successfully, we can provide a proper direction to our personality……they provide you a sure success, but they are not so simple. There are many procedures which remain unware in between the sadhaks but they are given only through the guru prampra. They did not came into the light openly, the reason or the thought behind it can be any, but, due to the lack of these necessary procedures,  everytime the failures come into the hands of sadhaks. After trying  many a times, some sadhak  thought it may be because of theirbad luck while other thought it may be lack of knowledge, then, sadhak started moving away from tantra field due to the depression of failures. If anyone  get  success only by reading books, then, this situation had not been arised because those secrets were only in between the sadhaks which were eligible to that knowledge. But, there was also a situation at the same time, when the capable sadhaks many a times were trying but every time either the senior person was not having knowledge of those secrets or they were not  ready to told to them or those masters were not easily available, ultimately, the loss was of tantra world only.

The knowledge of mudra science is not so much necessary for succeeding some mantra (to siddh some mantra)as compared to the procedures which are necessary to be known to use those mantras after succeeding them (the mantras which are siddh to us). I have completely succeeded Baglaamukhi paryog but how to use that paryog? If I do not have knowledge about this thing, then, what is the meaning of this whole procedure? Sadhak sometimes succeded the laxmi oe vaashikaran mantras but due the lack of knowledge of using it, the whole hard work of sadhak to succeed that mantra become meaningless. You can’t do the prayog of any mahavidhya,if you do no know all the steps of serially ordered necessary procedures which are kept secret. The first step of that secret procedure is संधान क्रिया “(SANDHAAN KRIYA). If sadhak after succeeding sadhna mantra do not point the gun in the right direction, then the whole procedure is meaningless because if the direction is not right, then, how the related procedures provide you the result which you want. If we follow the all steps of the necessary procedures, then, the simplehavan can also give you results to the difficult problems of Tantra Baadha.

This “sandhaan Kriya ” do not onlu provide  results which we want but it is necessary also. Due to the Kripa of sadgurudev, necessary mudraas are limited to only five mudraas but from this, the use of other mudraas like शक्तिचालिनी (Shaktichaalini) can’t be ended or less. Sadgurudev has organized several shivirs relating to mahavidhya, a normal sadhak only understanded or thought what will happen by these……more to more mahaviddhya siddhi…I have given my example in the blog…After doing many procedure ,then ,only dhumaavati siddh to me. From the procedures learnt from Sadgurudev, first Aatmsthapan prayog, then, Beej prayog,  Sharirasht Dhaaran prayog,Nischit iccha siddhi prayog, and at the last, three more procedures Sandhaan, Lakshya and Prshepan were done by me. If the power of our prayog is of only 400 kms, then, it can work for the enemy and give result within that boundary only because in this, the decision of direction, afterwards, decision of distance and finally, decision of lakshya, these are necessary three steps. These are to be done otherwise, where will be the expected results?

In the end of the Taara Mahaviddhya Shivir , with Ugra Taara Procedure, Swarn giving Taara sadhna vidhaan was also taught by him. No mantra is alone. With it, the knowledge of necessary procedures which move with it is also necessary. Then, only the whole procedure will give result which we want. Sadhak can siddh mantra but due to the lack of necessary procedures, the prayog will not give any result. If someone is having MANI, then what is the use of that? With the unavailability of right knowledge, it is only a extra weight to him.  Out of these three very necessary procedures, Sandhaan kriya,,lakshya kriya and Prashepan Kriya, I am giving you the procedure how to siddh the Sandhaan Kriya.

In this Kriya(Procedure), the beej mantra of Bhagwati Raajraajeshwari Shodashi Tripur Sundri  त्री” (treem) is combined with “क्रीं “(kreem) beej due to Bhagwati Chinn Mstaa from the kul (department)of Mahakaali.
मंत्र : क्रीं  त्रीं क्रीं
Mantra :  kreem  treem kreem

Necessary rules are for it are given below:
.This procedure is for 3 days.
.In this , we have to do total 150 maalas in three days only,  not more or less than3 days.
.In one seating and in one time, maximum 24 maalas can be done. Means, we can seat for two or three times a day.
. Clothes and Aasan should be Red only.
.Direction should be north or east.
.Any special time is not  for mantra jaap.
.Moonga Maala/Rudraaksh Maala/Hakik Maala can be used.

After completing this procedure successfully, the knowledge of next procedure Parshepan kriya is necessary. If sadhak understand these procedures and uses them in the sadhna, success  comes to him very easily. In which you want to take sadhna, decision is yours only…………


                                                                                               
 ****NPRU****   
                                                           
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2 comments:

Neeraj Kumar said...

Dear Bhai kripa karke bayein koi bhi mantra siddh karne ke bad uska proyog is sandhan mantra se dwara kis prakar karna hai....... aur baki ke dono vidhan bhi dene ki kripa karein aapka chota bhai...

Neeraj

Hirendra Pratap Singh said...

thanks bhiya ji es ke bare main to pata hi nahi hota hia thanks bhiya ji marg dharsak bane rahe jay guru dev ........guru dev aap ko aur shakti de