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Monday, February 7, 2011

AAVAHAN-6 SAHYOGI NIRMAAN SADHNA


सहयोगी शब्द मेरे लिए नया नहीं था मगर जो कुछ भी सहयोगी के बारे में पता चला निश्चित रूप से एक नया अध्याय था.
और जाना मेने की सहयोगी की उपयोगिता क्या हे. आवाहन के कई गुप्त सूत्रों मेसे एक हे सहयोगी या आत्म पुरुष. इस साधना के मध्य शुक्ष्म जगत में प्रवेश के बाद ध्यान किया जाता हे एक आकृति का. वह आकृति की कल्पना हम चाहे वेसी कर सकते हे, उदहारण के लिए ताकतवर या फिर चतुर या फिर खोजी. उसके साथ ही साथ उस आकृति को त्रिनेत्र के मध्य स्थापित किया जाता हे. उस आकृति का ध्यान करते वक़्त मंत्र का जाप करते रहना चाहिए "
ॐ आत्म पुरुष सिद्धये नमः". ये सम्पूर्ण क्रिया सूक्ष्म जगत में ही की जाती हे. धीरे धीरे इस प्रक्रिया को करते रहने से एक पुरुषआकृति प्रकट होती हे जोकि तीसरे नेत्र पर ही स्थापित रहती हे. सहयोगी का निर्माण सूक्ष्म जगत  में किये गए आवाहन के द्वारा होता हे इस लिए उसमे न तो जल तत्व होता हे न ही भूमि तत्व. वह आकृति ठीक उसी प्रकार से प्रकट होती हे जिस प्रकार से हम उसकी कल्पना करते हे. वह सहयोगी का बिम्ब अभ्यास से हमेशा उपस्थित रहता हे. अभ्यास के मध्य एसा समय आता हे जब सहयोगी पुर्नाकृति में परावर्तित हो जाता हे. अब आप उस सहयोगी को एक नाम प्रदान करते हे. सहयोगी उस नाम को अपना लेता हे और उसकी सत्ता आपके साथ ही जुडी हुई होती हे. कहने का मतलब ये हे की सहयोगी आपका ही एक भाग होता हे पर निश्चित ही समय आने पर आप उसका खंडन करके अपने से अलग कर देते हे.

सहयोगी के बारे में एक और विशेष तथ्य ये भी पता चला की सहयोगी में किसी भी एक चीज़ की भावना दी जाती हे, दुसरे शब्दों में उसे कोई एक निश्चित वर्ग के काम के लिए ही निर्मित किया जाता हे. जेसे की सन्देशवाहक. संदेशवाहक सहयोगी आपका सन्देश किसी भी रूप में आप जहा चाहे वहां पहोचा सकता हे, त्रिवार्गात्मक होने के कारण, उसे सेकड़ो मिल दूर जाके सन्देश पहोचने के लिए कुछ मिनट मात्र ही लगते हे. इसी तरह अगर सहयोगी का निर्माण किसी को पीड़ा पहोचने के लिए किया जाता हे तो उसे जिस व्यक्ति को पीड़ा पहोचने की लिए कहा जाएगा वह तुरंत ही अलग अलग तरीको से उसे मानसिक यातना देता रहेगा और तब तक देता रहेगा जब तक की आप खुद उसे अटके नहीं. इसी क्रम में रोग दूर करने के लिए, जासूसी करने के लिए, लोगो के मन की बात जानने के लिए, दुसरे लोक की खबर लेन के लिए, किसी के घर पे चोकी पहरा लगाने के लिए, लोगो को स्वप्न में जाके उसे डराने के लिए....विभ्भिन्न काम के लिए नाना प्रकार से सहयोगी अपना पूर्ण सहयोग प्रदान करता हे.

सहयोगी या आत्म पुरुष साधना को कुछ ही दिनों में सिद्ध किया जाता हे और फिर वह एक आज्ञा पालक सेवक की तरह काम करता ही रहता हे, ध्यान में रखने योग्य बात ये हे की सहयोगी का कार्य क्षेत्र अपने आपमें मर्यादित हे और वो उसी काम को कर सकता हे जिसके लिए उसका निर्माण हुआ हे. दूसरी बात की सहयोगी सिर्फ त्रिवर्ग के काम कर सकते हे, मतलब की उनका स्थूल शरीर का निर्माण संभव नहीं हे और न ही वो स्थूल कार्य कर सकते हे.

में चमत्कृत हो चूका था. अपने ही अन्दर कितनी शक्ति निसृत हे वह इससे ही जाना जा सकता हे. खुद ही सर्जन करने की क्षमता प्राप्त करके सिद्धि के प्रतिरूप को बनाना...सही में मनुष्य जब अपने बारे में ज्ञान प्राप्त कर लेता हे तो पता नहीं वो क्या क्या कर सकता हे. उसके भी आगे मेने जो तथ्य जाना वो तो उससे भी चमत्कृत करने वाला था.
" सहयोगी के निर्माण के बाद, आगे अभ्यास से महा सहयोगी का निर्माण किया जाता हे , उसकी शक्तिया अनंत होती हे और वो सर्व शक्तिमान कुछ भी कर सकता हे, वह स्थूल रूप भी ले सकता हे, यु उसमे वैताल या फिर वीर जितनी शक्ति होती हे. धीरे धीरे अभ्यास के बाद उसे भी सिद्ध किया जा सकता हे."

में सोचने पर मजबूर हो गया की तंत्र का क्षेत्र अनंत हे, अगर भावना न होती तो में ये सब कभी नहीं जान पता. अब तो वह रोज़ आने लगी थी अपने शुक्ष्म शरीर में. और हम दोनों एक दुसरे से घंटो बाते करते रहते और यु ही दिन महीनो में बदलने लगे. शुक्ष्म जगत में भी मेने अब जाना बांध कर दिया था, पर एक सिद्धात्मा श्री चण्डेश्वर से काफी आत्मीयता थी, उनके लिए कभी कभी जा के आ जाता था.

आज भी भलीभांति याद हे वो रात, भावना को याद कर ही रहा था, देखा रात के १ बज रहे हे, अचानक कमरे में जो बल्ब जल रहा था, टुकड़े टुकड़े हो कर टूट गया, खिड़की जोर से एक बार खडकी और एक तेज़ हवा का जोंका कमरे में प्रवेश कर गया और आते आते आवाहन के लिए जो मोमबत्ती जलाई थी वो भी भुजा गया.  देखना तो कुछ संभव ही नहीं था. पूरा कमरा अन्धकार से घिर गया था. उसी घोर अन्धकार में  अपने पास किसीको महसूस किया मेने, भावना ही थी वह.धीरे से वो मेरे पास, एक दम पास, आगई. मेरा हाथ पकड़ा उसने और कहा "में तुम्हारा साथ कभी नहीं छोडूंगी". और में अपने आपमें जेसे सब कुछ पा गया, दुनिया तो मेरी मेरे पास ही थी. सुबह जब नींद खुली तो कोई नहीं था. बल्ब के टुकड़ो को उठाया और बहार फेंका. शाम तक इधर उधर घूमता रहा. यु भी में भावना के आने के बाद अपने कमरे से कभी कभी तो ३ ,३ दिन तक बहार ही नहीं आता था. शाम होने लगी तो उसका इंतज़ार करने लगा. पर जब ३ बज गए कोई खबर नहीं. मेने तुरंत ही बेठा और सूक्ष्म जगत में प्रवेश किया, मुझे वो नहीं दिखी. और स्थूल जगत में आ गया. मुझे लगा की में बहोत व्याकुल हो रहा हु, मुझे इतनी चिंता भी नहीं करनी चाहिए. और एसे ही मन को समजाके शांत भाव से बेठा रहा. फिर भी मन तो व्याकुल था ही था. धीरे धीरे रात हुई. आज भी कोई खबर नहीं. फिर भी में अपने आपको शांत करने की कोशिश करता रहा. फिर सुबह सर शाम फिर रात और आज फिर सुबह हो गयी. कोई आता पता नहीं. रात को में आवाहन के लिए बेठा, और भावना का ही आवाहन करने लगा...लेकिन कुछ नहीं हुआ. एसा तो आज तक कभी नहीं हुआ था. बस और फिर चला गया सूक्ष्म जगत में एक बार और...श्री चण्डेश्वर से पूछने की क्या उनके पास कोई माहिती हे ? श्री चण्डेश्वर को पूछा की में भावना को खोज रहा हु. उन्होंने शांत भाव से पूछा की कौन भावना? मेने कहा वह यहाँ की ही एक सिद्ध आत्मा हे. उन्होंने कहा की यहाँ पे कोई भावना नहीं हे. मेने कहा तो वो कहा गयी हे क्या आप मुझे बता देंगे ? उन्होंने कहा सायद तुम समजे नहीं " यहाँ पे कोई भावना थी भी नहीं और हे भी नहीं " मेने कहा शायद आपको पता नहीं हे में उससे यही मिला हु. उन्होंने कहा की बंधू तुम्हे मालूम हे की यहाँ की हरेक आत्मा व् सिद्धात्मा एक दुसरे से परिचित होती ही हे, अगर तुम्हे मेरी बात का विश्वास न हो तो किसी से भी पूछलो "

मेने कहा ठीक हे, मगर यह क्या मेने न जाने कितने आत्मा सिद्धात्मा से उसके बारे में पूछा, सब ने यही कहा की इसी कोई सिद्धात्मा यहाँ पे हे भी नहीं और न ही थी. वहां के सिद्धात्मा मानसिक पृष्ठ भूमि को सहज ही जान लेते थे, इस लिए मेरे मानस में भावना का चेहरा लाते ही वो भी उसे देख लेते थे और तुरंत ही कहते की यहाँ पे इसी कोई सिद्धात्मा हे ही नहीं.
ये मेरे साथ जूठ नहीं बोल सकते लेकिन तो फिर क्या हे...मेने एक महीने तक उसका इंतज़ार किया पर वो कभी नहीं दिखी, इस दरम्या मेने सूक्ष्म जगत से भी संपर्क बनाये रखा जो की व्यर्थ ही था.
मेरी दशा दयनीय हो गयी थी, और मेरा सब कुछ छीन गया था. महीनो भर तक उसका इंतज़ार, और फिर वह हतासा. उसके बिना ज़िन्दगी व्यर्थ ही हे लेकिन एसा केसे हो सकता हे की उसका अस्तित्व हो ही नहीं. पर शुक्ष्म जगत की सिद्धात्मा किसी भी हालत में जूठ नहीं बोल सकती. फिर आखिर कौन सा सत्य हे..उसे पाने के लिए में कुछ भी कर सकता हु लेकिन करू भी तो क्या...में पागल की सी हालत में इधर उधर फिरता रहता, और फिर एक दिन मेने हर स्वीकार कर ही ली की में उसे नहीं पा सकता. लेकिन मुझे ये राज़ तो जानना ही हे की आखीर हुआ क्या था.

एक साल तक उसी सदमे में जीता रहा में और बस पिछले एक डेढ़ महीने से यही भूतनाथ की सीढियों पर बेठ के यही सोचता रहता हु की वो थी की नहीं, थी तो वो कहाँ हे, क्यों छोड़ा आखिर उसने मुझे. क्यों वो चुप चाप चली गयी लेकिन उसका तो अस्तित्व था ही नहीं !!!और फिर से हताश और खिन्न सा कोशिश करता की कोई कड़िया जुड़ जाये. पर ये तो शून्य में  ईमारत थी जो घर हे ही नहीं, उसमे रहा केसे जाए, कहते हे कोई कहानी की शुरुआत और अंत होता ही नहीं, मेरी ये कहानी कभी पूरी होगी ? शाम घिर आई थी और में शून्य में ताकता हुआ चल दिया. मेरे पास कोई जवाब नहीं था, जो मेरे सवालो का समाधान कर सके. (क्रमशः)
The word “Sahyogi” was not new for me, but whatever I came to know about it was complete new chapter undoubtedly.
And I came to know importance of Saygoi. it was one of the secret in aavahan, Sahyogi or Aatm Purush. In this sadhana, after entering to the Shukshm Jagat, the meditation of an aspect is done. That aspect or figure could be imagined as we wish. For example Stronger or Smarter or researcher, with this process, that figure is established on third eye. When meditating on that image one should keep on chanting mantra “Aum aatm purush siddhaye namah”. This whole process is done in Sukshm Jagat only. Keep on repeating this process, these forms an image of men, which would be at third eye only. The formation of the Sahyogi is done in Shukshm Jagat so through Aavahan so it would not be having any gravity creating element with it. It wills immerse in the way we imagined only. With daily practice, the form of Sahyogi will always be available. While in practice, there will be a time when Sahyogi will be in his complete form. Now you will give him a name. sahyogi will accept the name and his power will be connected with you. Means, sahyogi will remain part of you only but at specific time you can separate it from you. 

I even came to know a fact in regards o sahyogi that, sahyogi will be given inspiration for only single thing, in other word; it is designed for a particular set of tasks only. For example messenger. Messenger sahyogi would let reach your message to any place in any form, he do not have gravity effect so he takes few minutes to make your message reach miles far. Like wise, if sahyogi is formed to give enemy a pain, he will then does various painful stuff which let him suffer mentally and physically, and it will continue till you would not stop him. Same way, sahyogi will help in various things like to remove diseases, to spy, to do mind readings, to get information about other worlds, to establish watch at some house, to scare people in their dreams etc.

The sahyogi or aatm purush is accomplished in very few days and after that he will keep on working like a trusted servant, the thing to be kept in mind is he can work into limited zone and he can work only on the things, for which he is designed. Second thing is, sahyogi can do the tasks of trivarg means the work in which gravity force is not required. He can not form his gravity in body.

I was surprised. How much power we lay in our self, that can be understood by this. To have a power to form and create and make it a power of us. Really, when human get knowledge of them self completely, then can’t be imagined what he can do. But the thing which I came to know after this was more surprising.
“ After forming Sahyogi, the continue practice can form Maha sahyogi. They have infinite powers and that can do anything. he can form body even, he may be as accomplished as Veitaal or Veer. slowly with practice, he could even be accomplished.

I was forced to say that the area of tantra field is infinite. If Bhavna would not have been with me, I would be never eligible to know all these. Now she used to come daily in her Shukshm body. and we used to keep on talking with each other for hours. and likewise, the days went to Months. I did stopped visiting Sukshm Jagat, but there was a quite intimacy with one Siddhatma Shri Chandeshwar, for him I used to visit some times.

Today even i have remembred that night, I was just remembering her, and it was 1 Am in night. Suddenly, the lamp of the room broke into many pieces, the window made sound for once and a air quickly entered in my room, while entering it had off candle which was burning for aavahan. It was not possible to see anything. The whole room filled with darkness. In that darkness i felt someone, she was Bhavna only. Slowly slowly she came closer to me, very closer. She holds my hand and spoke “I will not leave you ever”. And it was like gaining everything; the world of mine was with me only. When my eyes opened in morning, no one was there. The pieces of glass bulbs were thrown out by men then. Till evening I kept on roaming nearby. After bhavna used to visit, sometimes i used not to come out of the room for 3, 3 days. When it became evening, i started waiting for her. But when it was 3AM and till no information of her. I set down and entered in Shukshm Jagat quickly, but I didn't see her and I returned with heavy heart. I thought that I am being very confused; I should not bother too much. And like wise, I made my mind understand to be in peace. But it was morning, evening, night and a morning again. No news from 2 days. I set for aavahan in night, and started aavahan for Bhavana, but nothing happened. It had not happened till the date. It was enough to search for her; I went to sukshm jagat and met shri chandeshwar. I asked him that I am searching Bhavna? He asked that who the bhavna was? I said that she is siddhatma of this place only. He said that bhavna is not here. I asked that can he tell me where she is. And He replied “you did not understand I think, anyone named bhavna is not here and was not in past even. I said that you might not be aware; I have met her here only. he said that brother, you know that here every aatma and siddhatma are in touch with each other. if you do not believe on my words, you may ask anyone.

I said ok, but what was these, Who so ever I asked about her, everyone told me that there is no such siddhatma in this place and there was not in past even. The Siddhatmas there were able to read minds and check it. So when I thought about bhavna's face, they were able to scan it directly to their mind and they used to say that there is no one like this in this shukshm Jagat.

These Siddhatma can not lie, but what is then...I waited 1 month for her but she did not came, meanwhile I kept on my touch with sukshm jagat which was useless. I was in pathetic condition, and I lost my everything. Months long wait for her and then sadness. Without her, the life is useless but how it is possible that she was not exist. But siddhatma of sukshm jagat can not lie at any cost. so, what the truth was ? to get her back I can do anything, but what to do..I became like a madmen roaming here there and one day I accepted my failure that I can not get her. but the secret behind this, was my dream to know that what actually happened.

Kept on living with that shock was now from 1 year and from last one and half month I used to sit here and wonder at this staircase of bhootnath that was she having an existence if yes where is she, why she left me, why she went silently but she was having no existence!! And again with frustration I used to try to join that chain. But it was a building in air, he thing which do not exist how can some one live in it?it is said that there is neither beginning nor end of any story. Will my story end? It was getting dark, looking at sky, I stood up and went. I was having no answers which can act as Solutions. (Continue)
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****RAGHUNATH NIKHIL****

4 comments:

Vinod S Sharma said...

Please send me a copy of Tantra Kaumudi on nikvin81@gmail.com. I a registered member of this group.

Thank you

Love to all

gurubhai said...

JAY GURUDEV

PLZ HELP MEE.

SAHYOGI NIRMAAN KE BARE ME PLZ HELP KARE KI AE SADHNA KITAANE DIN KARNI HE OR KYA ME MERE HOME ME AE SADHNA KAR SAKTAHU OR KITANE DINME A SADHNA SAMPURNA HOGI OR PLZ KAHE I MUZE KESE MALUM HOGAKI ME SAHI DISH ME JA RAHA HU PLZ MERI HELP KARE


MENE KAI SAVALO AAP KO BEJE HE AABHI TAK AEK BHI JAVAB MUZE NAHI MILA PLZ HELP MI MERI HELP KARE

TNANK

YOGESH THAKAR said...

JAY GURUDEV

PLZ HELP MEE.

SAHYOGI NIRMAAN KE BARE ME PLZ HELP KARE KI AE SADHNA KITAANE DIN KARNI HE OR KYA ME MERE HOME ME AE SADHNA KAR SAKTAHU OR KITANE DINME A SADHNA SAMPURNA HOGI OR PLZ KAHE I MUZE KESE MALUM HOGAKI ME SAHI DISH ME JA RAHA HU PLZ MERI HELP KARE


MENE KAI SAVALO AAP KO BEJE HE AABHI TAK AEK BHI JAVAB MUZE NAHI MILA PLZ HELP MI MERI HELP KARE

TNANK

Raghunath Nikhil said...

jai sadgurudev bhai

bhai is sadhana ka aadhar aapki manah sthiti he yu to aap ise 30 din tak abhyas kar skte he. aap is sadhana ko ghar me ya kahi par bhi kar skte he aapko jab sahyogi purn roop se dikhane lage tab unko jis nirmaan hetu banaya gaya he us ke samany kary ko samppan karne ka aadesh de aur is prakaar aap ko malul kar skte he. aapka koi bhai e-mail prapt nahi hua bhai in sawalo ke le kar is lie reply nahi kar paya :)

apki safalta ki kaamna sah

jai sadgurudev