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Tuesday, February 8, 2011

Aavahan-7 Aavahan and Imagination

जीवन क्या हे, सायद इस का जवाब देना अत्यंत दुस्कर हे. हो सकता हे हर एक के लिए जीवन का मतलब अलग अलग रहता हे. जीवन का मतलब मृत्यु से जीवन की यात्रा मात्र नहीं हे, यह तो एक एसी क्रिया हे जो कभी नहीं ख़तम होती. काल के लिए हमारे जन्म से लेके मृत्यु तक का सफ़र एक क्षण मात्र हे, क्यूँ की काल भी अनंत ही तो हे. और पता नहीं मेरे उन क्षणों को केसे जी रहा था. जहाँ मेरे लिए एक एक पल काटना एक एक सदी सामान था, उसी समय मेरे कई जन्मो की काटे हुवे सेकड़ो वर्ष काल खंड में मात्र एक बिंदु से ज्यादा कुछ भी नहीं थे. पर रुकना मेरा अभिष्ट नहीं था. आगे बढ़ना और बढ़ते रहना ही मेरे जीवन का उद्देश्य था. मेरा रास्ता तंत्र था या बन गया था ये तो में जनता नहीं पर हाँ मेरे साथ हुयी हर घटना ने मुझे तंत्र के क्षेत्र में आगे बढ़ने पर प्रेरणा जरुर दी थी. अब मेरे लिए जीवन का कोई विशेष महत्त्व नहीं था पर विशेष उद्देश्य जरुर था. तंत्र के अनंत महासागर मेसे मेने जो जाना वह बूंद भी नहीं थी, नियति ने मेरे लिए एक रास्ता चुन लिया था. और बीती बातो को कूड़े में फेंक के में आगे बढ़ गया, पहली बार जाना की त्याग की महत्ता क्या होती हे. त्याग सिर्फ भौतिक वस्तुओ को छोड़ना नहीं हे, त्याग तो अपने अन्दर से वह मोह हटाना हे जो आपके रस्ते में बाधक हे .इसी दौरान मे शाबर साधनाओ का अभ्यास करने लगा, एक साल बाद ही वह मेरा परम सौभाग्य था जब कितने अथक प्रयत्नों के बाद परमहंस निखिलेश्वरानंदजी ने मेरे सर पर हाथ रख के मुझे दीक्षा प्रदान की, मुझे मेरे भाग्य पर विश्वास नहीं हो रहा था, शुक्ष्म जगत में जिस दिव्यात्मा ने मुझे सब से ज्यादा साधनाए प्रदान की थी उनका चेहरा में कभी देख नहीं पाया था, वह व्यक्ति जिसने मुझे बचपन से लेके आज मेरे जीवन के हर एक क्षण को मोड़ा था जिससे की में तैयार हो जाऊ तंत्र जगत के लिए. वही व्यक्तित्व  थे परमहंस निखिलेश्वरानंद, दीक्षा के बाद सब कुछ साफ साफ देखा मेने. उनके प्रेम और स्नेह के सामने सब कुछ व्यर्थ सा लगा और न जाने कितने आंसू उनकी अभ्यर्थना में मेरे आँखों से निकलते ही रहे.

जीवन की वह उपलब्धि ने मेरे सारे जख्म भर दिए, और मिला विशुद्ध प्रेम. प्रेम का सबसे सर्वोच्च स्वरुप. फिर क्या था आगे बढ़ाते जाना ही ज़िन्दगी बन गयी थी. सदगुरुदेव का मार्गदर्शन तो था ही. औरउन्ही दिनों एक ग्रन्थ को टटोलते समय आवाहन के बारे में पढ़ लिया, मेरे सामने मेरा सारा भूतकाल एक बार फिर से घूम गया, और मुझे वो शब्द फिर से याद आ गए "में तुम्हारा साथ कभी नहीं छोडूंगी". वह रहस्य जिसने मेरी ज़िन्दगी को न जाने किस तरफ मौड़ दिया था.  खेर जो भी हुआ हो सब तो प्रभु ने कुछ सोच समाज कर ही किया होगा...लेकिन वो राज़ तो मुझे जानना ही था. और सोचने लगा फिरसे की "आखिर हुआ क्या था? " लेकिन कोई समाधान नहीं. सदगुरुदेव ने एक बार पूछा की क्या बात हे? मेने कहा कुछ नहीं बस एसे ही कुछ सवाल हे जिनका जवाब खोज रहा हु. उनको में पूछ सकू उतनी हिम्मत भी नहीं थी. लेकिन उनके पास तो शिष्य के हर एक क्षण का भी हिसाब रहता हे, कुछ व्यंग के साथ उन्होंने कहा " मिला जवाब ?" मेने कहा नहीं. उन्होंने फिरसे कहा " क्या हे पूछो ?" मेने कहा कुछ खास नहीं, मिल जाएगा, और वो मुझे उलजन में देख किंचित मुस्कुरा दिए.

एसे ही एक दिन गुरुदेव ने बताया की हमारे प्राचीन ग्रंथो में जो वर्णन दिया हे वह सही हे. तो ये भी समज लो की हमारा अस्तित्व हे ही नहीं. मेने पूछा एसा केसे...हम हे आप हे सब हे फिर केसे हो सकता हे की हमारा अस्तित्व ही नहीं हो, उन्होंने कहा की तुमने पढ़ा होगा की भगवान विष्णु निद्राधीन हे और वो जो स्वप्न में देखते हे वही सृष्टि की गति होती हे. इस धारणा से तो हम सब उनके स्वप्न का भाग हे और उसी में ही गतिशील हे .जब उनका स्वप्न टूटेगा हमारा अस्तित्व भी समाप्त हो जाएगा. में सोच में पड़ गया की आखिर हम हे या नहीं हे.
उस दिन गुरुदेव ने कहा की ब्रम्हांड अनंत हे, हम नहीं. हमारी विचार शक्ति भी सिमित हे, और इसी लिए हमारी कल्पना भी. हम कोई कल्पना करते हे तो यु तो उसका अस्तित्व नहीं होता मगर अनंत ब्रम्हांड में तो उसका अस्तित्व कहीं न कही तो होता ही हे, अगर हम कोई बच्चे को १० अंक सिखादे, तो वो उसमे से कई अंक की कल्पना करता हे, उसके लिए उन अंको का अस्तित्व नहीं हे, ये मात्र उसकी कल्पना ही हे, लेकिन गणित शास्त्र के ग्रन्थ के लिए वो एक अत्यंत न्यून स्थिति होती हे.

मेने कहा की क्या तब हर एक चीज़ जो की हम सोचते हे वह होती हे ? उन्होंने कहा की "ब्रम्हांड में कोई भी चीज़ कल्पना नहीं होती, योगी अपनी सिद्धियों के माध्यम से अपनी कल्पना को साकार स्वरुप दे सकते हे, चाहे वह कुछ भी हो क्यूँ की अस्तित्व की प्रारंभीक स्थिति ही तो कल्पना होती हे और यही कल्पना योग हे, अगर इसमे तंत्र का समन्वय करवा दे तो वह बन जाता हे कल्पना तंत्र. अगर किसी ऋषि ने किसी को वरदान देने के लिए सोचा हे, कल्पना की हे तब ही वो  उसे सिद्धिबल से वरदान दे देगा, ये सब कल्पना पर ही आधारित हे. भौतिक जगत में कल्पना से अविष्कार का पूर्ण निर्माण होने में सालो का समय लग जाता हे, सिद्ध उसे अपने सिद्धि बल का "आवाहन" करके एक क्षण में साकार रूप दे देते हे"

मन ही मन मेने सोचा तो क्या भावना भी मेरी कल्पना का साकार रूप थी ?
शायद नहीं.... (क्रमशः)

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what is life, probably most difficult question to answer. possibly, for everyone the meaning may change of life. life do not means the journey from birth to death, this is an process which do not end. for ' Kaal', the time period from our life to death is just a moment, because Kaal is infinite. and was not aware how I was living my those moments. where as for me every moment was like century to pass, for Kaal Khand my many lives of hundreds of year was nothing more then a small dot. but to stop, was not my destiny. to go ahead and keep on going was only my purpose. Tantra was my way or it became my way that I was not aware but yes, every incident happened in my life had inspired me to move ahead in tantra field. for me there was no more importance of life but there was a purpose. from the big ocean of tantra, what I received was not a drop even. Destiny had choose a way for me. and I threw my past in dustbin and went on, first time I came to know the importance of Sacrifice. Sacrifice is not just to leave material things, it is to remove that enchantment from inside, which creates boundaries in your way. in that time I started practicing shabar sadhanas and after one year it was my really great fortune that after so many efforts I had been fortunate to be blessed by Paramhansh nikhileshwaranad and receive diksha from his holy hands. in Shukshm Jagat, the divyatma who gave me more sadhanas then anyone, I had not seen face of him, the one who molded my every moment from my childhood to prepare me for tantra field. the one was Paramhansh Nikhileshwaranad. after diksha I seen everything clearly all these. In front of his love and affection , everything else felt to be useless. and with do not know how many tears my eyes were using to Ahhyrthn his holy feet.
That achievement of my live filled up my all wounds, and I received purest love. what used to be next...to go ahead only was the thing, and sadgurudev's guidance was even available.  and those days when I was going through with some scripture, I came to read about aavahan. once again my whole past went through my eyes and I did remembered the words " I will not leave you ever".  the secret which molded my life on unknown turn.  anyways whatever had happen must be with god's wish...but I was willing to know that secret.  and again started to think that " what actually had happened" but no solution. Sadgurudev asked me once that "what's the matter ?" i said "nothing, just wondering for answers of some questions." i was not having courage to ask him, but with him information of every moment stays. he asked me that " have you got the answers ? " I said No. He said again " what is that?" I said nothing important, I'll get it and after watching me confused he smiled lightly.

like wise one day gurudev told that everything mentioned in our scripture is truth and fact. then you do understand this even, that we do not exist. I asked him How? we are here, you are here, everyone everything is here then how it is possible that we do not exsist ? he told that you might have read that Lord Vishnu is sleeping and whatever he watch in his dreams is how the earth is running. this way, we are just a part of his dream and running in it. when the dream will be over, our existence will be over. I wondered that rather we exist or not ? that time gurudev told that " Bramhand is infinite" but we are not. our thinking power is even limited and so as our imagination. when we imagine something, it may not be existing but in infinite universe, it would be having its existence. if we teach some kid 1 to 10 numbers, then he can imagine any no. from it, for him those no. do not exist, he just imagines but for the scriptures of mathematics, it is very lower level of existence.

I asked that is this mean that whatever the things we imagine, it have its existence ? Sadgurudev told that " There is no imagination in universe, it stands for us.with vatious accomplishments yogi creates  existence of imagination, what ever it may be, the first stage of every existence is Imagination only, and this is kalpana yoga. when tantra is being incorporated with this, it becomes Kalpana tantram. if some sage have thought to provide boon to some one, he must have imagined it and using his power, he will bless, these whole thing depends on imagination. in our material life it may take many  years to imagination developing into the complete exist matter, but Sidhha people will take few moments to form reality of his imagination by siddhi AAVAHAN.

I wondered in my mind that was bhavna just my imagination which became true....probably Not. (continue).

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1 comment:

Anu said...

Dear Friends,
now the wait for second issue of Tantra kaumudi is about to end, on the 9 th feb the second issue is about to release. so just wait for remaining hours still left . Thanks a lot for the support.
Smile
Anu