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Friday, February 11, 2011

Aavahan-8(Astitva And Maya Jagat)

भावना मेरी कल्पना मात्र अगर होती भी, तो में उसे प्रत्यक्ष कर नहीं सकता था या उसे दुसरे शब्दों में स्थूल रूप नहीं दे सकता था, यूँ भी इसके लिए कल्पना करना आवश्यक हे, भावना से मेरी मुलाकात एक संयोग थी, संयोग....जो की प्रकृति ने निर्माण किया था. खेर
सदगुरुदेव ने आगे बताया की जेसे मेने कहा मानव की विचार शक्ति न्यून हे लेकिन ब्रम्हांड नहीं, इसी क्रम में हमने स्थूल और अस्थूल को अस्तित्व का नाम दिया हे. विज्ञानं की भाषा में कहे तो अणु ही अस्तित्व का निर्माण करता हे जिससे घन प्रवाही वायु वगेरा का निर्माण होता हे. पर अस्तित्व हीनता का क्या? अस्तित्व हीनता का भी कोई अस्तित्व होता हे ?
शिव और शक्ति निरंतर गतिशील रहते हुए निर्माण को जन्म देते हे. शिव स्थूल रूप हे तो शक्ति आत्म रूप. शिव के अन्दर शक्ति हे और शक्ति के बाह्य में शिव. अस्तित्व के क्रम में हमे शिव और शक्ति को समजना पड़ेगा . शिव का पूर्ण रूप शक्ति से सायुज्ज हे. मतलब के स्थूल रूप में शिव का अंश ज्यादा होने से वह पुरुष आकृति में दिखाई देते हे पर शक्ति उनके अन्दर स्थापित होती ही हे. शक्ति की बात करे तो शक्ति का जो स्थूल रूप हे या जिसे चरम चक्षु से देखा जाता हे उसका पिंड शरीर शिव से निर्मित मात्र ही हे. यु तो दोनों अपने आप में पूर्ण हे. लेकिन एक दुसरे में समाहित होते हुए भी एक दुसरे से अलग हे.

अस्तित्व हीनता और अस्तित्व एक दुसरे में समाहित ही हे लेकिन जहाँ पर जिस का भार बढ़ जाता हे वही स्थूल रूप में उसका बाह्य आवरण नज़र आता हे. इसका मतलब ये हे की पदार्थ के अन्दर उसका अस्तित्व ठोस रहता हे. पत्थर बिना हिले दुले कुछ नहीं कर सकते लेकिन उसके अन्दर की शक्ति देखनी हे तो उठा के किसीके सर पे फेंके तो सर फोड़ देता हे. तो फिर हम उसके अन्दर निहित शक्ति का अस्तित्व गिने या शक्ति की अस्तित्व हीनता ? इसी लिए मेने कहा की हरेक पदार्थ में अस्तित्व और अस्तित्व हीनता सम्मिलित होती ही हे.

स्थूल जगत से शुक्ष्म जगत के बिच में अंतर कुछ भी नहीं हे. जहाँ आप बेठे हे वही स्थूल जगत हे और वही सूक्ष्म जगत भी लेकिन अगर आप में जल तत्व और भूमि तत्व हे तो आपके लिए सूक्ष्म जगत का अस्तित्व नहीं हे और अगर अगर जल और पृथ्वी तत्व का लोप हो गया तो फिर आपके लिए शुक्ष्म जगत का अस्तित्व हे.

इसी प्रकार से हरेक अस्तित्व में उसकी अस्तित्व हीनता हे और हर एक अस्तित्व हीनता का अस्तित्व स्थूल रूप में भी होता हे वहां पे निर्माण की प्रक्रिया अणु विज्ञानं से नहीं बल्कि ऊष्मा विज्ञानं से होती हे. और जिस प्रकार से स्थूल और सूक्ष्म एक हे फिर भी अलग अलग हे, ये जगत भी यही पे विद्यमान हे जिसे "माया जगत" कहते हे.

मेने प्रार्थना की की माया जगत पर थोडा और प्रकाश डाले, तब उन्होंने कहा की माया जगत में प्रकृति निर्माण का कार्य ऊष्मा से करती हे. ऊष्मा को एक ठोस रूप देने पर वह पदार्थ में परिवर्तित हो जाती हे लेकिन वह पदार्थ सिर्फ और सिर्फ उसी को दिखाई देता हे जिसके लिए वो निर्मित हो. दुसरे शब्दों में वह निर्माण किसी एक उद्देश्य मात्र से होता हे.
माया जगत में जाने पर अगर आपको प्यास लगी हे तो पानी आपके सामने प्रकट हो जाएगा पर आपके मित्र को भूख लगी हे तो उसके सामने खाद्य पदार्थ आजेगा. आपके लिए खाद्य पदार्थ का अस्तित्व नहीं होगा और आपके मित्र के लिए पानी का अस्तित्व नहीं होगा, भ्रम और अस्तित्व के बिच में जो पर्दा हे उसे जिस जगत पर हटा दिया जाता हे उसे ही माया जगत कहा जाता हे.
मुझे श्रीलाहिरी महाशय के साथ हुयी घटना याद आगई जब बाबा महावतार ने उनके लिए जंगले में सोने का महल बना दिया था, जिसका अस्तित्व सिर्फ उन लोगो के लिए ही था.

सदगुरुदेव ने कहा की  और तुम जो प्रश्न का जवाब धुंड रहे हो, उसका जवाब भी माया जगत ही हे.
मतलब की भावना माया जगत से निर्मित थी ?
हाँ, इसी लिए उसका अस्तित्व सिर्फ तुम तक सिमित था.
फिर वो सूक्ष्म जगत में केसे आ सकती हे ?
माया जगत सूक्ष्म जगत से ऊपर स्थित अवस्था हे, उसमे प्रवेश करने के लिए खुद को ऊष्मामय बनाना पड़ता हे, यु पृथ्वी, जल ,वायु तत्वों का लोप करके अग्नि और आकाश तत्व मात्र से उसमे प्रवेश पाया जाता हे,
इसी प्रकार जिस प्रकार शुक्ष्म जगत से स्थूल जगत में प्रवेश किया जाता हे, उसी प्रकार से  माया जगत से शुक्ष्म या स्थूल में भी प्रवेश किया जाता हे, माया जगत में निवास करती हुयी आत्माए अपना अस्तित्व सिर्फ उनके सामने प्रकट करते हे जिनके सामने वो करना चाहे और फिर अपना अस्तित्व समेट लेते हे.

अब में कुछ समाज पाया की भावना माया जगत से थी, जिससे मेरी मुलाकात तब हुयी थी जब उसने शुक्ष्म जगत में प्रवेश किया था और संयोग वश मेने भी प्रवेश किया था, उसने अपना अस्तित्व सिर्फ मेरे सामने प्रकट किया था, इस लिए उसका अस्तित्व सिर्फ मेरे लिए ही था. और किसी के लिए उसका अस्तित्व था ही नहीं.
ख़ुशी तो बहोत हुयी दिल के अन्दर की आखिर रहस्य का अनावरण हो गया. तो भावना का अस्तित्व जरुर माया जगत में अब भी होगा ही...

एक दिन गुरुदेव मूड में बेठे थे तब मेने पूछा की गुरुदेव कितने जगत होते हे तो उन्होंने कहा अनंत....
मेने और कुछ सवाल नहीं किया और मुस्कुराकर योजना के अनुसार पूछा की गुरुदेव एक और सवाल हे, तो उन्होंने मुस्कुराकर कहा की क्या हे पूछो. मेने कहा गुरुदेव माया जगत में केसे प्रवेश किया जाता हे और वहां के निवासियों से केसे मिला जा सकता हे

बस इतना ही कहना था की गुरुदेव के नेत्र जेसे अग्न ज्वाला बन गयी चेहरा लाल सुर्ख हो गया और चिल्लाते हुए बोले " मुर्ख.........., लगता हे तू अभीभी उस मायाविनी के मोह से मुक्त नहीं हुआ हे, तंत्र के रास्ते पर मोह ग्रस्त होना, खुदका पतन करना ही हे. मोह को छोड़ और आगे बढ़ वर्ना...."
सही ही तो था, में मोह से बहार ही नहीं आया था उसके, बस फिर क्या था, जीवन का वो एक नया अध्याय था जहाँ पर भावना का अध्याय ख़तम हो गया. काफी समय बाद मेने गुरुदेव से माफ़ी मांगी तो उन्होंने मुझे आगे बढ़ने का  आशीर्वाद दिया

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If bhavna was just my Imagination, I would have not made it real, in other words I would have been able to give her structure, for this even imagination requires, the meeting with bhavna was just a coincident...which was made by nature. Anyways.
Sadgurudev continued that as I told, the thinking power of human is limited but the universe is not, in that order only we have given the name ‘existence’ to tangible and intangibles. if we speak in the scientific term, Atom is creator of existence by which solid, liquid, gas etc. are created. But what is non existence? Does non existence even exist?

Shiv and Shakti continuously remains in process of creation. if shiva is tangible, shakti is non tangible. Shiva has shakti inside him and outer form of shakti is shiva. To know the order of existence, we require understanding shiva and Shakti first. The complete shiva is accompanied by shakti. This means, in the tangible form the structure, it has shiva’s more volume so he looks in the form of man, but shakti is established inside him. if we speak about shakti, the visible form of shakti or the body of shakti outer is made of Shiva only. These both are complete individually, but with contained of each other too they both are separate.

Non existence and existence are present in each other, but where there is more volume of any of these, it becomes tangible or visible. This means that the existence of anything lay in it. Stone can not do anything without moving but if you want to know its power, and then throw it on head of anyone, it may kill even. So, what should we think on the power of that stone, rather it exist or it does not? That’s why I told that everything on this universe has existence and nonexistence inside it.

There is no measurable distance between sthool jagat and Sukhsm jagat. where you are sitting is Sukshm jagat and Sthool jagat both but if you have jal tatva and Bhoomi tatva in you then your existence is in sthool jagat and is it is not present your existence is in Shukshm Jagat

same way, in every existence there is non existence and in every non existence has its tangible form. There, the process of creation is not done with atom science but with heat science (ushma vignana). And as the both sthool and sukshm jagat is one but then too those are separate, same way this jagat is here only which is termed as maya jagat.

I requested him to throw more light on Maya Jagat, then he spoke that in Maya jagat, the nature does the creation with ‘ushma’. When the energy of the heat is molded in particular way, it turns into substance, but that substance is visible and exists for the one for which it is made. in other words, that creation take place for singular purpose only.
When you go to Maya jagat, if you feel thrust, the water will be emerge to you but at the same time if your friend is hungry, the food item will emerge in front of him. For you the food item would not exist and for your friend the water would not. where the layer between intuition and existence is removed, that place is known as Maya Jagat

I did remembered the incident happened with shri lahiri Mahasaya when baba mahavatar created a palace of gold for him in the jungle, which was having existence for them only.

Sadgurudev told me that the answer which you are searching for your question is Maya jagat only.

Means, Bhavna was formed in Maya Jagat?
Yes, that’s why his existence was limited till you.
Then how did she come to Shukshm Jagat?

Maya jagat is higher then sukshm Jagat, to enter in it, one needs to mold them sef in the form of heat energy. This way, by removing Prithvi, Jal, and Vayu tatv, you can enter in it with Agni and Akash tatva. Like one can enter in Sthool jagat from Shukshm jagat , one can enter into sthool or sukshm jagat from Maya jagat even. The aatma of Maya jagat reveal their existence in front of anyone their wish and then they fold their existence.

Now I was able to understand that Bhavna was from Maya Jagat, and I met her when she entered in sukshm Jagat and co incidentally I even entered, she revealed her existence in front of me only, therefore her existence was only for me and for others she was having no existence. I felt very happy in heart that finelly this secret is no more secret. Then Bhavna must be existing in Maya Jagat.

One day gurudev was in good mood, so I asked that how many jagats are there. he said infinite. I smiled and according to plan I asked for one more question, he allowed and I asked slowly that Gurudev How can I enter in Maya jagat and Meet their people?
 
This was the moment, in a second Gurudev’s eyes became like fire, the face became red like sun and he shouted at me…” Idiot….I think you have not been free from the enchantment of that Mayavini. On the way of tantra to walk with ‘Moh’ is to finish self, leave Moh of her and go ahead otherwise…..”
 
It was complete truth I was not out of her enchantment, then what next? The chapter of the bhavna got its end there and new chapter started, after sometime I apologized for my mistake to gurudev, He blessed with me the words to go ahead
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3 comments:

Dinesh Paliwal said...

जय सदगुरुदेव,

रघुनाथ भाई जी,

इस लेख की पिछली कडियो से लेकर अब तक आपने व्यावहारिक ज्ञान दिया है| इस तरह का ठोस ज्ञान मैंने पहले कही पर कभी नहीं देखा यह मेरे लिए तंत्र का सर्वथा नया ज्ञान है, जिसमे की असीमित सम्भावनाये और स्वतंत्रता उपस्थित है|
और चुकि:यह तांत्रिक रहस्य आप NPRU साधक परिवार की तरफ से मेरे को मिला है इसलिए में इस पर पुरे विश्वास के साथ गतिशील हो सकता हूँ|
इस तंत्र रहस्य से मेरे मन की कई ग्रंथिया सुलझी है|कई कडिया परस्पर मिली है|

और इस बारे में बहुत कुछ जानना था पर एक बात यह की क्या में कल्पना लोक में किसी दिव्य ऋषि स्थान में साधना करता हू तो वह मेरी कल्पना करने तक ही चलेगी या मेरी कल्पना से बाहर होने पर भी मेरा कल्पित रूप वहाँ उपस्थित रह कर साधना को निरंतरता देता रहेगा?
क्योंकि आजकल ही में मैनें कल्पना लोक में इस तरह की साधना एक दिव्य ऋषि स्थान में प्रारंभ की है|

(क्योंकि परिवारजनों के उग्र विरोधात्मक व्यवहार,उनके द्वारा किये गए विघ्नों और जुगुप्सा से भौतिक रूप से मंत्र तंत्र यन्त्र की साधना मेरे लिए असंभव है|हो सकता है यह मेरा ही कोई पाप हो पर जो बात हैं वो हैं|)
बात बहुत लंबी हो गई हैं, मुझे इसका स्वतः जवाब मिल जायेगा, या नहीं भी मिले, पर मैंने यह सब लिख ही दिया| आप मेरे मात्र भाई या बहिन नहीं है, आप मेरे गुरु भाई गुरु बहिन हैं|और हमारा पथ एक ही हैं-तंत्र साधना,शक्ति,ज्ञान और सिद्धि|

धन्यवाद और बहुत बहुत धन्यवाद|

जय सदगुरुदेव

Raghunath Nikhil said...

जय सदगुरुदेव भाईजी
आपकी भावनाओ को जान कर ह्रदय में हर्ष का प्रसार हुआ है. आपके सवाल का उत्तर इस प्रकार से है की जब आप किसी वस्तुस्थिति की कल्पना करते है तो स्थूल रूप से नहीं लेकिन शूक्ष्म रूप में उसका आकार निश्चित रूप से घटित हो गया होता ही है. इस लिए एक निश्चित समय तक इसी कल्पना जगत का अभ्यास करते रहने पर एक स्तर पर वह विचार ठोस आकार ग्रहण करने लगता है. यह सारा घटना कर्म आपके आतंरिक जगत में और अवचेतन मानस में घटित होता है इस लिए आप की उपस्थिति नितांत रूप से होती ही है. और आप इस प्रकार से साधना कर सकते है.

Dinesh Paliwal said...

धन्यवाद,
जय सदगुरुदेव