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Friday, August 26, 2011

Shtru nashak sadhana prayog


सदगुरुदेव अनेको बार कहते  एक राजस्थानी कहावत हैं की   "ऐ माई एसा पुत जन दुश्मन होय हज़ार " मतलब  हे माँ तुम एक ऐसे  पुत्र  को जन्म  दो किसके  कम से कम हज़ार शत्रु  तो हो ही” . क्यों तुम्हारा तो कोइ शत्रु हैं नहीं ,क्योंकि शत्रु  तो उसी का  न होगा  जो कुछ लीक से हट कर कर रहा   होगा , अब केंचुए जैसे  जीवन का कोई क्या शत्रु होगा ,

सच बात  भी हैं आलोचना     तो उसी  की होगी  न  जो कुछ कर रहा   होगा, जो मात्र आखें बंद कर बैठा  हो  कुछ कर  ही न  रहा हो वह  तो सीधे  ही परम हंस  हो गया , जीवन में  गति शीलता और  कार्यशीलता   की आवश्यकता हैं ,
 आजके  युग में सतोगुणी  नहीं बल्कि   रजो गुणी  व्यक्तियों की आवश्यक ता हैं तभी तो इस साधना विधिया और  इससे सम्बंधित कार्य  को गति शीलता मिल सकेगी . 
 ठीक इसी  तरह  जीवन में हमारे कुछ उजाला आये , कुछ सदगुरुदेव  के  ज्ञान  रूपी सूर्य का उदय हमारे मन  में हो  तब न जीवन की सार्थकता  हैं, न की हम अपने जीवन में मात्र ही आलोचक न  बने,कि  अर्थ  हो इस जीवन का , कि  हर किसी पर चीखने  चिल्लाने पहुँच गए ,  यह तो इस जीवन का अपमान हुआ  न. यह कार्य  तो दूसरों पर  छोड़ दे

कम से कम हमारे सदगुरुदेव का  यह सपना   तो न  था, वह चाहते हैं की हम सभी दीपक से बढ़कर छोटे छोटे  ज्ञान के सूर्य बने , न की जय कारा  लगाने वाले  एक भक्त .

परन्तु सच्चाई  थोड़ी कडवी हैं  पर एक बार  निरपेक्ष  दृष्टी से सोचे   तो  हम सभी  को   साधक बनने  कि कोशिश करना  चाहिए  हैं / था पर  हम हो गए एक भक्त .. 
हमें सदगुरुदेव भगवान् ,आकाश कि  अपरिमित विस्तार नापने के  योग्य बनाना  चाहते  थे, पर हमने  एक भक्त बनना   ज्यादा   पसंद किया 


 जीवन हैं तो  शत्रुता  होगी  भी  पर शत्रु का मतलब क्या हैं वह हो हमारे   विरुद्ध खड़ा हैं  ,केबल वह शत्रु हैं .... .न ...न .....बल्कि ऐसी सारी परिस्थतिया   जो हमारे  विपरीत  हो  , जो मार्ग में वाधा  बन रही  हो , भौतिक  ही नहीं शारीरिक भी और  साधनात्मक भी उन सभी का निराकरण हो सके ,

अंतर और बाह्य्गत  दोनों  कि विपरीत परिस्थतियाँ  ही हमारी वास्तविक  शत्रु हैं 


फिर वह हमारी अत्यधिक बढ़ ती  हुए काम वासना  हो या फिर आसन पर स्थिर न बैठ  पाना  हो या  फिर कोई शारीरिक रोग  ही हो  या फिर हमारे जीवन  में आने वाला  कोई दुर्घटना या फिर किसी  अचानक  धन हानि  ये सभी  भी तो शत्रु हैं ही.घर में सुख शांति न हो . ये भी  तो उतनी  ही  घातक  हमारी शत्रु हैं .


 तो इन सबका निराकरण कैसे हो 

क्या  कोई उपाय हैं, अब सदगुरुदेव ने  तो कोई  क्षेत्र  छोड़ा नहीं ,वे  ही साधना   जगत  की सर्वोच्चता हैं अनंतता हैं , वही  सब कुछ हैं, उन्ही की कृपा ही तो हैं यह प्रयोग  जो आपके सामने प्रस्तुत हैं  यह अत्यंत सरल प्रयोग  को आप कभी  भी जब आपको लगे  की शत्रु तत्व के कारण आपकी प्रगति में वाधा आ रही हैं तो इस प्रयोग  को कर ले .
शत्रु होना जरुरी हैं , पर उनसे हार मान जाना   तो  जरुरी  नही हैं  तभी तो जीवन कि पौरष ता  हैं  मैंने इतनी विधियाँ क्यों लिखाये 

शत्रु दमन के लिए इस मंत्र को रोज २१ माला १ हफ्ते तक करे, सोम वार से शुरू करे माला रुद्राक्ष ,समय रात्रि काल मे १० बजे के बाद दिशा उत्तर / पूर्व वस्त्र स्वेत रहे.
रुं रुं रुं रुं रुं रुं रुं रुद्राय शत्रुदमनाय नमः

आज के लिए बस इतना 
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Sadgurudev Bhagvaan many times used to say this rajsthani proverb that “ye meri mai aisa put  jan  ,dushman  hoy hazaar “ means  o mother become a mother of such a son that  have at least  thousand enemies” but our life  is like earth worm  so where is the enemy ?, since enemy  will  be to those one , who are  doing something different.
Its  true , that  one ,the person will be a centre of criticisms , who is  doing something special, not to that  fellow who is sitting  with closed eyes  ,  he is already a paramhans.
Like that . our life will have rays of Sadgurudev bhagvaaan’s divine knowledge ,  than only our  life has a purpose , its  not good that we become only a criticizer, this is a accuse to  life. leave this criticism  too others.
At least that was not the dream of our Sadgurudev bhagvaan , he wants  that all of us turn  to  small  sun  from a small  Deepak., we should not be just a shishy who can  say only “ jai Sadgurudev”
When  there is life , then surely , some type of enemy will also,  we have,. but whom we call a shatru ???    to that who stand against us , or  our physical or  financial  or  mental  problem.  Theses all  above mentioned situation are our enemy.
 intrernal and external both are the problem.
 Like that we cannot  sit longer in our aasan , or worried about ever increasing our sexual desire in sadhana kaal  or  physical illness or our near and dear one.  Or any other type of accident.  All theses are known as shtru./enemies.
 Than  how we can solve that is there any  way to achieve that  ,
 Sadgurudev Bhagvaan did not leave any field on sadhana  on that he  not taught  to all of us,  since he is the param purush , ultimate  in sadhana  jagat.,  this is his blessing that are coming as  this prayog. Do this prayog any time when you think   shatru are creating problem.
 Do jap this mantra  for one week  with a jap of  21 round of rosary  for each 7 days. Start this prayog with Monday,   facing   uttar /purv direction  and  jap  time will be  after 10pm  night. And not only aasan but the  clothes of you should wear be  white.
 Mantra :
Rum rum rum rum rum rum rum rudraay shtrudamnaay namah ||
  
 This  is enough for today 
****NPRU****

2 comments:

varun said...

which mala to use

Rahul Agarwal said...

arif bbhaiya , ek gurubhai ji rahul sharma from pune ne apko video mail ki hai mudra ke baare mein.. pls unko reply to karein wo blog ke member bhi hain...unki email id hai...

rsrahul1978@gmail.com