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Saturday, November 26, 2011

AAVAHAN-17


एक लंबी सी सुरंग; जिसमे चारो तरफ घोर काला रंग लेकिन फिर भी उसमे से प्रकाश झर रहा था. यूँ लग रहा था जैसे वायु से बनी हुई हे वो. अजीब सा ही नज़ारा था अपने आप मे. उस ३०-४० फीट व्यास वाली सुरंग मे पता नहीं कैसे पहुँच गया था. जिसमे अपने आप मे आश्चर्य चकित करने वाली गति से जैसे हवा मे तैरते हुए आगे बढ़ता ही जा रहा था. ज्यु ज्यु आगे बढ़ता जा रहा था, प्रकाश भी उतना ही बढ़ता जा रहा था. लौकिक भाषा मे कहे तो करीब १५-२० मिनट की स्थिति रही होगी उसी सुरंग के अंदर मे सफर की. बहोत ही अद्भुत नज़ारा था चारो तरफ वायु से निर्मित वह सुरंग अपने आप ही जैसे घूम रही थि. मेरी गति की तीव्रता और प्रकाश दोनों बढते ही चले गए. लेकिन जैसे ही प्रकाश बढ़ता गया वैसे अपने आप ही सुरंग दिखना बंद हो गयी और फिर एक भयंकर तेज प्रकाश मेरे सामने था. उस तीव्र प्रकाश को देखने की पूरी कोशिश की लेकिन प्रकाश बढ़ता ही गया अपने आप मे. और एक चरम सीमा के बाद उस प्रकाश को देखना संभव नहीं हुआ मेरे लिए और मेरी आँखे अपने आप ही बंद हो गयी. जब आँखे खोली तो अपने आपको किसी पहाड़ पर पाया. शाम घिर आई थि और देखना थोडा मुश्किल हो गया था. आस पास कुछ मिटटी के मकान और झोपडियां पहाडो पर एक दूसरे से दूर दूर दिख रहे थे. उसी झोपडियो मे से कुछ एक ने दिये जलाये हुए थे. आगे बढ़ा तो थोड़े पत्थरो के बीच से एक रास्ता मिला. ध्यान से देखने पर मुझे वो क्षेत्र कुछ परिचित सा लगा. फिर से रहस्यों मे घिर ने लगा मन की... लेकिन आगे बढ़ने पर काफी लोग और सन्याशी को बैठे पाया. यहाँ पर बिजली की कोई व्यवस्था नहीं थि. बड़े बड़े पत्थरो के किनारे बैठे लोगो मे से कुछ लोग मुझे देख सकते थे और कुछ नहीं. मुझे कुछ समज नहीं आया, ये सूक्ष्म शरीर का अभ्यास था लेकिन फिर ये कैसे देख सकते है. आगे जाने के लिए रास्ता ज़रूर था उसी कच्चे रास्ते पर कुछ कच्ची सीढियाँ सी दिख रही थि. चारो तरफ जंगल से घिरी वह जगह अत्यंत ही मनोहर दिख रही थि. फिर भी ऐसा लग रहा था की यह जगह कुछ परिचित सी है. बस कुछ सीढियाँ ही आगे बढ़ा की अपने सामने जो द्रश्य देखा वह देख कर मुझे विश्वाश नहीं हुआ. माँ कामाख्या का मंदिर. लेकिन ना ही कोई गलियारा. न ही कोई बिजली. न ही वह फर्श और कोई दिवार. धूमिल सा प्रांगण जिसके आस पास कुछ सन्यासी और सन्यासिनी तथा कुछ स्थानिक या फिर पथिक थे. ऐसा कैसे हो सकता है? यह मंदिर तो मेने देखा है, ये संभव ही नहीं है. यहाँ पे बिजली है, दुकाने है, पक्के रास्ते है, मकान भी है, मदिर का प्रांगण, सीढियाँ वगेरा सब पक्का है फिर ये मे क्या देख रहा हू. पहचानने मे गलती नहीं हुई थि, १० फीट दुरी पर खड़ा था मे. ऐसा कैसे हो सकता है की कुछ समय मे ही यह मंदिर और ये जगह ऐसे बन गई जैसे की कभी.... और उसी समय एक विद्युत झटका अपने आप मे मुझे खिंच गया उसी सुरंग मे वही १५-२० मिनट और जब आँख खुली तो मन विस्मय से भर गया था. कुछ सोचने समजने की शक्ति ही जैसे नहीं रही थि. सूक्ष्म शरीर के अभ्यास मे एसी सुरंगों को देखना तथा उसमे प्रवेश कर के यात्रा करना ऐसा कभी मेने सुना भी नहीं था. रहस्य अकबंध रहा. फिर एक दिन सदगुरुदेव से ही पूछा की क्या जो मेने देखा था और जिस जगह मे गया था...उन्होंने बीच मे ही रोक के कहा की वो माँ कामाख्या का मंदिर ही था. मेने कहा की कामाख्या का मंदिर और उसकी स्थिति तो अपने आप मे अलग है और मेने वहा जा कर देखा और अनुभव किया वो भी अपने आप मे अलग है. ऐसा कैसे हो सकता है? उनके चेहरे पर एक रहस्यमय मुस्कान फ़ैल गई. हो सकता है. क्यों की तुम समय मे ६० साल पीछे चले गए थे... मेरी आँखे फटी की फटी रह गई. स्वाभाविक सी बात हे मुझे विश्वास नहीं आया, इच्छा हुई की एक बार अपने आप को आईने मे देख लू तुरंत के कही शरीर मे कोई तफावत तो नहीं आया कहीं मेरा शरीर ६० साल... मेरे मन मे उठ रहे विचारों को देख कर स्वामीजी कुछ व्यंग और मधुर स्नेह से मेरी तरफ देख के हसने लगे...उन्होंने कहा की काल ज्ञान के सबंध मे कई प्रकार की साधनाए निहित है जिसके माध्यम से व्यक्ति काल को देख सकता है चाहे वह भुत हो या भविष्य. ये बिलकुल उस तरह है जिस तरह आप किसी जगह की तस्वीर देख रहे हो. लेकिन इससे भी आगे भी साधनाए है जिसके माध्यम से व्यक्ति न सिर्फ काल को देख सकता है बल्कि अपने सूक्ष्म शरीर से उस काल खंड मे उपस्थित भी हो सकता है. ये कोई चित्र नहीं है, ये अपने आप मे वास्तविक काल खंड है जो की बराबर अपनी मूल जगह पर गतिशील है. तुम्हारे योग तंत्र के अभ्यास के अंतर्गत तुमने जाने अनजाने मे ही उसी काल खंड मे प्रवेश कर लिया था और इसी वजह से तुम उस काल खंड को ना सिर्फ तुमने देखा बल्कि उस काल खंड मे प्रत्यक्ष रूप से गतिशील हो कर भाग भी लिया. मेने कहा की फिर तो इसका ये अर्थ है की किसी भी काल मे जा कर हम वो हर घटना को प्रत्यक्ष अनुभव कर सकते है जिसे हम करना चाहे. लेकिन इसके सबंध मे तंत्र क्या है. उन्होंने कहा की महाकाली अपने आप मे काल की देवी है. तथा देवी धूमावती विपरीत क्रम की देवी है. अगर इन दोनों के बीज को सिद्ध कर सम्मिलित मंत्र के रूप मे जाप कर लिया जाए तो साधक के लिए ये स्थिति सहज ही संभव होने लगती है...मेने पूछा की इसकी पूर्ण प्रक्रिया क्या है?... (क्रमशः) 
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A long tunnel; which was occupied by black in colors all over but then too, the light was coming from it.  It was looking like, it is made from gas. It was all very strange scenes. I was unaware that how did I reached there in that tunnel which was 30-40 feet diameter. In which I was moving ahead with strange speed like flying in air. The way I was moving ahead, with the same speed light was also started shining more. In the unit of our time it was about 15-20 minutes travel in that tunnel. It was mysterious all way tunnel made of gas all over of it and rolling on its own. My speed and speed of light too increased. But when the light increased more, the tunnel was not getting visible and now it was very bright light in front of my eyes.  I tried to look at that bright light but at certain limit it became not possible for me to look at that light and my eyes went off automatically.  When my eyes opened, I found myself on a pick of mountain. It was sun set and it was a bit difficult to look around. Few mud houses were suited in mountain far from each other.  From those same houses in few, lamps were burning. When I move ahead, I found a way in between stones. While looking with concentration I found that it was looking like my known place. Again mind was getting confused with mysteries that…but while moving ahead I found many ascetics and people sitting there.  Here, electricity was absence. Sitting by side of huge stones, few people were able to see me and others weren’t. I didn’t understood anything, this was study of Shukshm sharer, and how could they see me.  There was a way to go ahead on the same raw street there I see few raw staircases. All side occupied by the forest, that place was really mind blowing. But again it was feeling to be familiar place. Just few steps more and the scene which my eyes looked was not to be believed. Temple of mother Kamakhya. But there was no boundary.  No electricity. Not that floor, neither those wall I seen. Floor was raw nearby and few ascetics with local people or may be travelers were there. How come it is possible? I have seen this temple before. Here is electricity, shops, roads, houses, courtyard of the temple, hard staircase then what am I looking at now? There was no chance in wrong identification; I was just 10 feet far.  How come this is possible, in a matter of just a little time this place has become like this that….and at the same time I felt electricity current which driven me to the same tunnel and again 15-20 minutes and when my eyes opened mind filled with so much of confusion. I was feeling no energy to try to think and understand anything. In the study of shukshm sharir, I had never heard about such tunnels and to travel in it. Secret remained packed. But one day I asked sadgurudev that whatever I seen and the place I went….. He stopped me in-between my question and said, yes it was kamakhya temple only. I asked that the kamakhya temple and its situation is completely different and the thing which I went there and seen, felt was completely different. How come this is possible? The mysterious smile came over his face. ‘it is possible’. Because you went 60 years back in time. My eyes remained opened. It was natural that I didn’t come to believe. Wish roll covered mind that I should get up and quickly look in mirror that my body have not got any change. If my body was 60 years…By looking at the thoughts coming in my mind with bit of kidding and love looking at me he smiled back…he said that there are several sadhanas in regards of kaal gyan with help of which a person can look into past or future. It is same like watching some picture. But there are sadhana beyond this stage by which sadhak not only can see the time he wish but with the help of Sukshm Sharir he can have his presence in that particular time period. It’s not like watching a picture; that is particular time section which is continued at its main place. In your study time of yog-tantra you have entered in that section unknowingly and with which you just not seen that time period but you remained present in that time and took part in it. I said that it all mean that we can go to any time period and experience it by our self which we wanted to do. But what is the tantra in this regards. He said that mahakaali is goddess of kaal. And dhoomavati is goddess of reverse order. If we accomplish both of their beej mantra and chant it in compile for this this stage for sadhak becomes simple….I asked that what the complete process is for this... (Continued)  
****NPRU****

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