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Sunday, December 23, 2012

TIBBATI SAABAR LAKSHMI VASHIKARAN SADHNA VIDHAN



Poorv Janm Krit Dosh Eh Janmani Yad Bhavet |
Daaridray Durbhagya Vimuchayante Aishwarya Prapyte Mahalakshmi Sadhvai ||
   
Tantra is the expansion of feelings, it is the expansion of life and taking the support of this expansion entire bad-luck and poverty can be eliminated. Upon attaining the grace of Sadguru in life, there is definitely arise in good-luck and it completely annihilate bad-luck and inconsistencies of life. And it all depends on his grace that he can tell a simple solution for any cumbersome problem.
Vidhaan presented here may seem very easy but we will not be able to understand the divinity of this amazing Vidhaan which has been obtained so easily until and unless we apply it. Upon doing prayog with dedication, you yourself will experience something special. 
 
Though earlier I was only in favour of putting forward only one Vidhaan. But seeing your affection and enthusiasm towards this Vidhaan I am giving 2 procedures out of total 5 procedures.

All the things remain same in both the procedures but there is difference in number of days. You can do it either in 34 days or in 17 days. You can fix time and day according to your time-schedule and commitments. In addition to normal poojan articles one will need Bundi ka Laddu ( a sweet of the shape of ball) , flock of cotton impregnated with Itr (perfume) , two red rosaries, dhoop , Rakt Chandan (red sandal) , lamp , curd , Panch Meva , Kheer , five betel leaves folded and seasoned and five different/similar fruits for this prayog.

It has to be done in night. One can choose north, east or west direction .Daily in the night take bath before sadhna and wear the dress. Dress and aasan will be red.Before doing basic sadhna, like every sadhna do Sadgurudev poojan, chant at least 4 rounds of Guru Mantra, do lord Ganpati poojan and Lord Bhairav poojan necessarily and this is compulsory in each and every sadhna. After this, set up one small Baajot in front of Sadgurudev’s Baajot and spread red cloth on it and in middle of that cloth make one circular round with red sandal and write HREENG HREENG SAA in middle of it. And establish yantra on it after bathing it with clean water. While doing its bath, recite HREENG HREENG SAA JALSNAANAM SAMARPYAAMI.

After this, chant mantra in sequence given below and offer articles on yantra.
HREENG HREENG SAA SUGANDHIDRAVYAM SAMARPYAAMI (offer flock of cotton impregnated with Itr (incense))
HREENG HREENG SAA PUSHP MAALYAM SAMARPYAAMI (offer garland of flowers)
HREENG HREENG SAA DHOOPAM AAGRAPYAAMI (offer Dhoop)                                         
HREENG HREENG SAA DEEPAM DARSHYAAMI (Offer Til (sesame) oil or ghee lamp)
HREENG HREENG SAA DADHIM SAMARPYAAMI (Offer Curd)
HREENG HREENG SAA PHALAANI SAMARPYAAMI (Offer fruits)
HREENG HREENG SAA NAIVEDYAM SAMARPYAAMI (Offer Panch Meva, Bundi‘s Laddu and Kheer)
HREENG HREENG SAA TAAMBOOLAM SAMARPYAAMI (Offer 5 betel leaves)
HREENG HREENG SAA KARPOOR SAMARPYAAMI (Offer camphor)

After it chant 5 rounds of beej mantra HREENG HREENG SAA with Rakt Chandan rosary, Kamalgatta Rosary, Sarv Shakti Rosary (which you have accomplished before), Moonga Rosary or Shankh (conch shell) Rosary. And if you are doing Vidhaan of 34 days , then while reciting basic mantra 34 times offer oblation of Ghee and Kheer ( Mix Panch Meva , which you have offered on yantra). But if you are doing Vidhaan of 17 days then you have to recite basic mantra 71 times and offer oblation of ghee and Kheer.

BASIC MANTRA

OM SATYA BHAVAANI KAALIKA , BAARAH BARAS KUNWAAR , EK MAAI PARMESHWARI , CHOUDAH BHUVAN HUAAR , DO PAKSH NIRMALEE, TERAH DEVAAR, ASHT BHUJA MAAI KAALIKA, GYARAH RUDRA SEV,SOLAH KALA SAMPOORNI ,TRAN NAIN BHARMAAR, DASO DUAARE NIRMALI, PAANCHO RAKSHA KAR, NAU NAATH SHAT DARSHANI PANDRAH TITHI JAAN , CHARO VED HAATH SUHAAVE KAR MAAI KALYAAN

After offering oblation, again chant 5 rounds of HREENG HREENG SAA. All Vidhaan hardly takes one or one and half hours. After this, do Jap Samarpan, pray, leave the aasan and offer one cooper spoon of water under the aasan and apply that water on your forehead. Consume the offered fruits yourself or give it to any priest daily.

On the next night, before starting the procedure remove the articles offered on yantra before and do the procedure with new articles. You have to do this procedure daily for the number of days fixed by you. You can immerse the offered articles daily or on the day succeeding the day of sadhna completion.

After completion of sadhna, on the next day offer food to any Brahman couple or unmarried small girl for seeking their blessings. Girl should not belong to your family or clan. And thereafter sadhak should establish yantra by his own hands in business place or safe.
 
Some important facts have to be kept in mind that sadhak who will start sadhna, he will do it till last day, sadhna has not be left in between and also no alternative will be used. In addition to accomplishment of yantra, one thing has to be kept in mind that daily dhoop should be offered to yantra but it should not be touched by anybody else and shadow on none should not fall on it.If anyone except sadhak i.e. wife, son, daughter or father-mother shows dhoop then they should pray and show it from far off. In case of absence of sadhak they should take complete bath and they should neither touch that yantra nor their shadow fall on it. Sensitivity of yantra is very high therefore all these facts have to be kept in mind. Those who want to eliminate poverty and want to make life financially sound and take life to higher pedestal, they will do it so.

If we talk about its effect, then if you do this sadhna while following purity, you can see good luck coming into your life and prosperity becoming stable in life, see your business growing like anything. What is needed is to do sadhna while following all rules. Sadhna will not yield results, it is impossible.

“Nikhil Pranaam”


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पूर्व जन्म कृत दोष इह जन्मनि यद् भवेत |
दारिद्रय दुर्भाग्य विमुच्यन्ते ऐश्वर्य प्राप्यते महालक्ष्मी साधवै ||
   
 तंत्र विस्तार है भावों का,विस्तार है जीवन का और इसी विस्तार का सहयोग लेकर समस्त दुर्भाग्य को,दरिद्रता को नष्ट किया जा सकता है. जीवन में सदगुरु कृपा होने पर निश्चय ही जीवन और सौभाग्य का उद्भव होता है और उदित सौभाग्य जीवन की विसंगतियों और दुर्भाग्य का पूर्ण नाश निश्चित ही करता है.और ये उनकी ही कृपा होती है की वे किसी कठिन समस्या का भी सहज और सरल उपाय बता दें.

  प्रस्तुत विधान भी देखने में अत्यंत सहज है,किन्तु मात्र सहजता और सरलता से हुयी इसकी प्राप्ति के कारण आप इस अद्भुत विधान की दिव्यता को तब तक नहीं समझ पायेंगे,जब तक स्वयं ही अपने श्रम से प्रायोगिक रूप ना दे दें. प्रयोग को श्रद्धा और पूर्ण आत्म भाव से संपन्न करने के बाद आप स्वयं ही इसकी विलक्षणता अनुभव कर पायेंगे.

वैसे मैं इसका मात्र एक ही विधान आप सभी के सामने रखना चाहता था.किन्तु आप सभी का स्नेह और इस विधान के प्रति उत्साह देखकर इसकी ५ विधियों में से २ विधियां यहाँ पर आप सभी के समक्ष दे रहा हूँ.

 प्रस्तुत दोनों विधियों में बाकी सब तो एक जैसा ही है किन्तु दिवस की संख्या में अंतर है. आप इसे या तो ३४ दिवस में संपन्न कर सकते हैं या फिर १७ दिन में. आप अपनी व्यस्तता और समय के विभाजन को देखकर समय और दिवस का निर्धारण कर सकते हैं.सामान्य पूजन सामग्री के अतिरिक्त  बूंदी का लड्डू,इत्र का फाहा,दो लाल माला,कपूर,धूप,रक्त चन्दन,दीप,दही, पञ्चमेवा,खीर,पांच बीड़ा पान,पांच अलग प्रकार के या समान फल अनिवार्य है.

    समय रात्रि का ही होगा,उत्तर,पूर्व या पश्चिम दिशा का आप चयन कर सकते हैं.नित्य रात्रि में साधना के पूर्व स्नान करने के पश्चात वस्त्र धारण कर लें.वस्त्र वा आसन लाल होगा.मूल साधना के पहले आप हर साधना की ही तरह सदगुरुदेव पूजन और गुरु मंत्र का कम से कम ४ माला जप,भगवान गणपति पूजन और भगवान भैरव का पूजन अवश्य करें और ये हर साधना में अनिवार्य है.इसके बाद सदगुरुदेव के बाजोट के सामने ही एक छोटा बाजोट स्थापित कर लें और उस पर लाल वस्त्र बिछा दें और उस वस्त्र के मध्य में लाल चन्दन से एक गोल घेरा बनाकर उसके मध्य में ह्रीं ह्रीं सा लिख दें.और उस के ऊपर यन्त्र को शुद्ध जल से स्नान करवाकर स्थापित कर दें. स्नान कराते समय ह्रीं ह्रीं सा जलस्नानं समर्पयामी कहें.

इसके बाद निम्न क्रम से मंत्र उच्चारण करते हुए सामग्रियों को यन्त्र पर अर्पित करते जाएँ.

ह्रीं ह्रीं सा सुगंधिद्रव्यम समर्पयामी कहते हुए इत्र का फाहा समर्पित करें.
ह्रीं ह्रीं सा पुष्प माल्यं समर्पयामी कहते हुए पुष्प माला समर्पित करें.
ह्रीं ह्रीं सा धूपं आघ्रापयामी कहते हुए धूप समर्पित करें.
ह्रीं ह्रीं सा दीपम् दर्शयामी कहते हुए तिल के तेल अथवा घृत का दीप समर्पित करें.
ह्रीं ह्रीं सा  दधिम् समर्पयामी कहते हुए दही समर्पित करें.
ह्रीं ह्रीं सा फलानि समर्पयामी कहते हुए फल समर्पित करें.
ह्रीं ह्रीं सा नैवेद्यम समर्पयामी कहते हुए पञ्चमेवा,बूंदी के लड्डू और खीर समर्पित करें.
ह्रीं ह्रीं सा ताम्बूलं समर्पयामी कहते हुए पाँचों पान समर्पित करें.
ह्रीं ह्रीं सा कर्पूरं समर्पयामी कहते हुए कपूर समर्पित करें.

 इसके बाद रक्त चन्दन माला,कमलगट्टा माला,सर्व शक्ति माला(जो आपने पहले सिद्ध की हुयी है),मूंगा माला या शंख माला से ह्रीं ह्रीं सा (HREENG HREENG SAA) बीज मंत्र की ५ माला जप करें. और यदि आप ३४ दिनों का विधान कर रहे हैं तो मूल मंत्र का ३४ बार उच्चारण करते हुए घी और खीर(पञ्च मेवा जो आपने यन्त्र पर अर्पित किया था,उसमें मिला लें) से हवन करें.किन्तु यदि आप १७ दिन का विधान कर रहे हैं तो ७१ बार आप मूल मंत्र का उच्चारण करते हुए घृत और खीर से हवन करें.

मूल मंत्र -

ॐ सत्य भवानी कालिका,बारह बरस कुंवार,एक माई परमेश्वरी,चौदह भुवन हुआर,दो पक्ष निर्मली,तेरह देवार,अष्ट भुजा माई कालिका,ग्यारह रूद्र सेव,सोलह कला सम्पूर्णी,त्रण नैन भरमार,दसो दुआरे निर्मली,पांचों रक्षा कर,नौ नाथ षट दर्शनी पन्द्रह तिथि जान,चारों वेद हाथ सुहावे कर माई कल्याण ||

हवन के बाद पुनः ह्रीं ह्रीं सा मंत्र की ५ माला करें. इस पूरे विधान में मुश्किल से १ या डेढ़ घंटा लगता है. इस क्रिया के बाद जप समर्पण कर प्रार्थना कर आसन छोड़ दें और आसन के नीचे १ आचमनी जल अर्पित कर उस जल को माथे पर लगा लें.फल का प्रसाद स्वयं ग्रहण कर लें या फिर किसी ब्राह्मण को नित्य दे दें.

 अगले दिन रात्रि में क्रिया प्रारंभ करने के पूर्व यन्त्र पर समर्पित सभी सामग्री को हटा दें और नवीन सामग्री से क्रिया करें.यही क्रिया आप को अपने तय किये हुए दिनों में नित्य करनी है.आप प्रतिदिन के निर्माल्य को या तो नित्य विसर्जित करें या फिर साधना पूरी होने के अगले दिन विसर्जित कर दें.
    
   साधना पूरी होने के बाद अगले दिन किसी ब्राह्मण दम्पति को अथवा किसी कुमारी को पूर्ण भोजन करवाकर दक्षिणा देकर तृप्त करें.कन्या स्वयं के परिवार या वंश की नहीं होना चाहिए. और उसके बाद यन्त्र को स्वयं साधक अपने हाथ से व्यापारिक प्रतिष्ठान अथवा तिजोरी में स्थापित कर दें.
  
  कुछ विशेष तथ्य का अवश्य ध्यान रखे,की जो भी साधक इस साधना को प्रारंभ करेगा अंतिम दिवस तक वो साधना संपन्न करेगा ही,साधना बीच में नहीं छोडना है और ना ही इसका कोई विकल्प ही प्रयोग किया जायेगा.यन्त्र सिद्धिकरण के साथ ही इस बात का विशेष ध्यान रखा जाए की यन्त्र को नित्य धूप दिखाई जाए किन्तु किसी और का स्पर्श नहीं होना चाहिए और ना ही किसी की परछाई पड़े. यदि साधक के अतिरिक्त कोई और जैसे पत्नी,पुत्र अथवा पुत्री या माता-पिता धूप दिखा रहे हो तो वो भी मात्र प्रणम्य भाव से दूर से ही धूप दिखाएँ वो भी साधक की अनुपस्थिति में पूर्ण स्नान किये हुए और उनकी भी परछाई या स्पर्श उस यन्त्र को ना हो.यन्त्र की संवेदनशीलता अत्यधिक तीव्र है इसलिए इन तथ्यों का ध्यान रखना अनिवार्य है.जिन्हें दरिद्रता का नाश करना है और जीवन को अर्थयुक्त कर अपने परिवार तथा जीवन को उच्चता की और बढ़ाना है वे ऐसा करेंगे भी.
    
  रही बात इसके प्रभाव की तो शुद्धता का पालन करते हुए यदि आप इस साधना को संपन्न कर लेते हैं तो स्वयं ही आप सौभाग्य को आपका वरण करते हुए और ऐश्वर्य को आपके घर में स्थायित्व लेते हुए देख सकते हैं,व्यापार को दिन दूनी रात चौगुनी प्रगति की ओर बढ़ता हुआ देख सकते हैं.आवशयकता मात्र नियमों का पालन करते हुए साधना को संपन्न करने की होती है,साधना फल ना दे ये होना असंभव ही है.

“निखिल प्रणाम”
****NPRU****

3 comments:

अभियंता said...

Which Yantra We have to use for above Sadhana?

Jai Gurudev....

अभियंता said...

Which Yantra we have to use for this sadhana?

rahul said...

bhai ji yeh sadana kis din suru karni hai