Thursday, March 7, 2013


In field of Tantra, place of Lord Bhairav is amazing in itself. He has always been revered and worshipped among sadhaks from centuries because of providing quick accomplishments and doing welfare of sadhaks. All his diverse form, are same as Shiva form and are amazing and exceptional in themselves. Though there are 52 forms of Bhairav are in vogue in Tantra field, but eight forms are known primarily. These are in combination known by the name of Asht Bhairav. In fact various types of sadhnas related to Lord Bhairav have been carried out through various Tantric sects. In Kapaalik, Nath, aghor sect etc. place of Lord Bhairav has been considered to be supreme. In Tantra, on one hand, it is necessary to do poojan of Lord Ganpati so as to get rid of obstacles. Along with it, siddhs are also of view that Bhairav poojan is also a necessary procedure for any sadhna because he is the god who provides security to sadhak and sadhna procedure followed by sadhak. In fact, Bhairav has been presented as destructive god as a result of which he is seen among common public with fear. But his destructive nature is not for sadhak rather for enemies and troubles of sadhak. This fact has been experienced by many Maha Siddhs in their lives.  From Aadi Shankracharya, Gorakhnath to all the contemporary and ancient Siddhs, all have unanimously accepted Bhairav sadhna as essential and very important procedure of life. Though various types of procedures related to Lord Bhairav are known among sadhaks and within it too Batuk Bhairav and Kaal Bhairav form are forms most popular among Tantra sadhaks. But along with it other forms of Bhairav are also special in their own way. Same thing applies to Lord Krodh Bhairav too. This form is the embodiment of anger i.e. form full of Tamas character. Due to predominance of Tamas character, sadhak gets very fast and instantaneous results. His upasana has been done for very intense procedures like Maaran, Ucchatan, for destroying army etc. In fact, this sadhna is not so much popular. There are many reasons behind it, especially his destructive nature. Therefore sadhak do not attempt his sadhna out of fear. Due to extreme Tamas character, these procedures are uneasy as well as little bit cumbersome. Sadhna presented here is related to this form of Lord which when completed by sadhak, he can destroy the entire family of enemies. This procedure has only been known among accomplished sadhaks because though it is very intense prayog but it does not too much of time. Just by doing sadhna once, sadhak can take benefit out of it throughout his life. In today’s era when sadhak is always surrounded by insecurity and there is crowd of known and unknown enemies at each and every step then in such circumstances, this type of procedure is necessary. Therefore in spite of being an intense procedure, this procedure has been presented here so that at the time of need, sadhak can maintain the dignity of his life and family and attain complete security.
This procedure is highly intense procedure. Therefore sadhak should do this procedure after carefully considering his own courage levels. Sadhak may have intense experiences during sadhna.
If any person is troubling sadhak very much and is causing harm without any reason then it is right to do this procedure. But this procedure should not be done to trouble anyone without any reason otherwise sadhak may have to face consequences. Sadhak should take this procedure as defensive procedure and he can do it for securing his family.
Sadhak can do this procedure on any Amavasya or eighth day of Krishn Paksha of any month in cremation ground or any uninhabited place. It should be done after 10:00 P.M in night.
Sadhak should wear black dress and sit on black aasan. Sadhak should face south direction.
Sadhak should establish any Bhairav idol or picture in front of him and offer vermillion on it. Sadhak should perform poojan of picture/idol after doing Guru Poojan. Sadhak should offer red colour flowers. Sadhak should offer wine in any container also.
After it, sadhak should chant Guru Mantra. Thereafter, sadhak should do Nyas procedure.


After Nyas, sadhak should chant 51 rosaries of below mantra using Rudraksh rosary.
After completion of chanting, sadhak should ignite the fire in any vessel there and offer oblation of meat mixed with wine. Leave the wine offered as Bhog there. On next day, offer curd or any food article to any dog.
After it, if sadhak want to apply this procedure, sadhak should do above procedures after 10:00 P.M in the night like poojan etc. and chant 1 round of this mantra. Then sadhak should offer 101 oblations of meat mixed with wine. Use name of person or enemy (on which procedure needs to be done) in place of Amukam in Mantra. In this manner, ucchatan of that person is done and he never troubles sadhak. If sadhak after offering oblation throws the leftovers or ash in the house of enemy, then whole family of enemy gets into trouble. All member of family have to face troubles and enemy is destroyed along with his family.

तंत्र के क्षेत्र में भगवान भैरव का स्थान तो अपने आप में निराला है, यह देव अपने साधकोको शीघ्र सिद्धि एवं कल्याण प्रदान करने के कारण सदियों से महत्वपूर्ण उपास्य देव रहे है. भगवान शिव के स्वरुपसमही उनके ये विविध रूप, सभी स्वरुप अपने आप में निराले तथा विलक्षण, तंत्र के क्षेत्र में भैरव के यूँ तो ५२ रूप प्रचलित है लेकिन ८ रूप मुख्यरूप से ज्ञात है. इनको संयुक्त रूप से अष्ट भैरव के नाम से जाना जाता है. वस्तुतः भगवान भैरव से सबंधित कई कई प्रकार की तांत्रिक साधना विविध मत के अंतर्गत होती आई है. कापालिक, नाथ, अघोर इत्यादि साधना मत में तो भगवान भैरव का स्थान बहोत ही उच्चतम माना गया है. तंत्र में जहां एक और गणपति को विघ्न निवारक के रूप में पूजन करना अनिवार्य क्रम है तो साथ ही साथ सिद्धो के मत से किसी भी साधना के लिए भैरव पूजन भी एक अनिवार्य क्रम है क्यों की यह रक्षात्मक देव है जो की साधक तथा साधक के साधना क्रम की सभी रूप में रक्षा करते है. वस्तुतः भैरव को संहारात्मक देवता के रूप में प्रस्तुत कर दिया गया है जिसके कारण सामान्य जनमानस के मध्य इनको भय की द्रष्टि से देखा जाता है लेकिन इनकी संहारात्मक प्रकृति साधक के लिए नहीं वरन साधक के शत्रु तथा कष्टों के लिए होती है तथा इसी तथ्य का अनुभव तो कई महासिद्धो ने अपने जीवन में किया है, आदि शंकराचार्य गोरखनाथ से ले कर सभी अर्वाचीन प्राचीन सिद्धोने एक मत में भगवान भैरव की साधना को अनिवार्य तथा जीवन का एक अति आवश्यक क्रम माना है. यूँ तो भगवान भैरव से सबंधित कई कई प्रकार के प्रयोग साधको के मध्य है ही तथा इसमें भी बटुकभैरव एवं कालभैरव स्वरुप तो तंत्र साधको के प्रिय रहे है लेकिन साथ ही साथ भैरव के अन्य स्वरुप भी अपनी एक अलग ही विलक्षणता को लिए हुवे है. भगवान क्रोध भैरव के सबंध में भी ऐसा ही है. यह स्वरुप क्रोध का ही साक्षात स्वरुप है अर्थात पूर्ण तमस भाव से युक्त स्वरुप. यह स्वरुप पूर्ण तमस को धारण करने के कारण साधक को अत्यधिक तीव्र रूप से तथा तत्काल परिणाम की प्राप्ति होती है. इनकी उपासना शत्रुओ के मारण, उच्चाटन, सेना मारण आदि अति तीक्ष्ण क्रियाओं के लिए होती आई है. वस्तुतः इनकी साधना इतनी प्रचलित नहीं है इसके पीछे भी कई कारण है, खास कर इनकी संहारात्मक प्रकृति. इसी लिए भयवश भी इनकी साधना साधक नहीं करते है, साक्षात् तमस का रूप होने के कारण इनके प्रयोग असहज भी है तथा थोड़े कठिन भी. प्रस्तुत साधना भगवान के इसी स्वरुप की साधना है जिसको पूर्ण कर लेने पर साधक इसका प्रयोग अपने किसी भी शत्रु पर कर उसको जमींन चटा सकता है, शत्रु के पुरे घर परिवार को भी तहस महस कर सकता है, यह प्रयोग भी सिर्फ सिद्धो के मध्य ही प्रचलित रहा है क्यों की भले ही यह प्रयोग उग्र है लेकिन इसमें ज्यादा समय नहीं लगता है तथा एक बार साधना सम्प्पन कर लेने पर साधक उससे जीवन भर लाभ उठा सकता है. आज के युग में जहां एक तरफ असुरक्षा सदैव ही साधक पर हावी रहती है तथा पग पग पर ज्ञात अज्ञात शत्रुओ का जमावडा लगा हुआ है तब एसी स्थिति में इस प्रकार के प्रयोग अनिवार्य ही है, इस लिए उग्र प्रयोग होने के कारण भी इस प्रयोग को यहाँ पर प्रस्तुत किया जा रहा है जिससे की आवश्यकता पड़ने पर साधक अपने जीवन की तथा अपने परिवार की गरिमा को रख सके तथा पूर्ण सुरक्षा को प्राप्त कर सके.     
यह प्रयोग अत्यधिक तीव्र प्रयोग है अतः साधक अपनी विवेक बुद्धि के अनुसार स्वयं की हिम्मत आदि के बारे में सोच कर ही प्रयोग करे, प्रयोग के मध्य साधक को तीव्र अनुभव हो सकते है.
साधक को अगर कोई व्यक्ति अत्यधिक परेशान कर रहा हो तथा बिना कारण अहित किये जा रहा हो तब यह प्रयोग करना उचित है लेकिन सिर्फ किसी को बेवजह परेशान करने के उद्देश्यआदि को मन में रख कर यह प्रयोग नहीं करना चाहिए वरना साधक को इसका परिणाम भुगतना पड़ सकता है. साधक को इस प्रयोग को रक्षात्मक रूप से लेना चाहिए तथा अपनी तथा घर परिवार की सुरक्षा के लिए साधक यह प्रयोग कर सकता है.
यह प्रयोग साधक किसी भी अमावस्या या कृष्ण पक्ष अष्टमी को स्मशान में या निर्जन स्थान में करे. समय रात्रि में १० बजे के बाद का रहे
साधक काले रंग के वस्त्र को धारण करे तथा काले रंग के आसन पर बैठे. साधक का मुख दक्षिण दिशा की तरफ होना चाहिए.
साधक अपने सामने भैरव का कोई विग्रह या चित्र स्थापित करे, उस पर सिन्दूर अर्पित करे. साधक गुरु पूजन कर चित्र या विग्रह का पूजन करे. साधक लाल रंग के पुष्प का प्रयोग करे. साधक को किसी पात्र में मदिरा भी अर्पित करनी चाहिए.
इसके बाद साधक को गुरु मंत्र का जाप करना चाहिए. जाप के बाद साधक न्यास करे.
भ्रां अङ्गुष्ठाभ्यां नमः
भ्रीं तर्जनीभ्यां नमः
भ्रूं मध्यमाभ्यां नमः
भ्रैं अनामिकाभ्यां नमः
भ्रौं कनिष्टकाभ्यां नमः
भ्रः करतल करपृष्ठाभ्यां नमः

भ्रां हृदयाय नमः
भ्रीं शिरसे स्वाहा
भ्रूं शिखायै वषट्
 भ्रैं कवचाय हूं
भ्रौं नेत्रत्रयाय वौषट्
भ्रः अस्त्राय फट्
न्यास के बाद साधक रुद्राक्ष माला से निम्न मन्त्र की ५१ माला मन्त्र जाप करे.
 भ्रं भ्रं भ्रं क्रोधभैरवाय अमुकं उच्चाटय भ्रं भ्रं भ्रं फट्  
मन्त्र जाप पूर्ण होने पर साधक वहीँ पर किसी पात्र में आग प्रज्वलित कर के १०८ आहुति बकरे के मांस में शराब को मिला कर अर्पित करे. भोग के लिए अर्पित की गई मदिरा वहीँ छोड़ दे. दूसरे दिन किसी श्वान को दहीं या कुछ भी अन्य खाध्य प्रदार्थ खिलाएं.
इसके बाद साधक को जब भी प्रयोग करना हो तो साधक को रात्री काल में १० बजे के बाद उपरोक्त क्रियाओं अनुसार ही पूजन आदि क्रिया कर इसी मन्त्र की १ माला मन्त्र का जाप कर १०१ आहुति शराब तथा बकरे के मांस को मिला कर देनी चाहिए. मन्त्र में अमुकं की जगह सबंधित व्यक्ति या शत्रुका नाम लेना चाहिए जिसके ऊपर प्रयोग किया जा रहा हो, इस प्रकार करने से उस व्यक्ति का उच्चाटन हो जाता है तथा वह साधक के जीवन में कभी परेशानी नहीं डालता. अगर साधक प्रयोग की आहुति देने के बाद निर्माल्य या भष्म को उठा कर शत्रु के घर के अंदर दाल देता है तो शत्रु का पूरा घर परेशान हो जाता है, घर के सभी सदस्यों को दुःख एवं  कष्ट का सामना करना पड़ता है तथा शत्रु पूर्ण घर परिवार सहित बरबाद हो जाता है.



Anonymous said...

निखिल जी प्रणाम !!!

इस तरह के वाम मार्गी प्रयोगों की आशा नहीं थी. इस तरह के वाममार्गी प्रयोग तो सर्वत्र बिखरे हुए हैं. लेकिन गुरुदेव ने सात्विक तंत्र का जो ज्ञान दिया वो अन्यत्र दुर्लभ है. यहाँ इस तरह के प्रयोग देखकर कुछ अजीब लगा सो कह दिया.

Anonymous said...

प्रिय भाईजी
आपके विचारों का हमेशा स्वागत है| आपका कथन सही है की कई वाममार्गी प्रयोग बिखरे हुवे है. लेकिन साथ ही साथ एक तथ्य यह भी है की इसी प्रकार कई कई दक्षिणमार्गी प्रयोग भी इसी प्रकार प्रचलन में हे ही| यहाँ पर हम उन प्रयोगों की चर्चा कर रहे है जिसके बारे में सदगुरुदेव ने समय समय पर ज्ञान दिया है| सदगुरुदेव ने सात्विक मार्ग सबंधित प्रयोग के साथ साथ तीव्र, वाम मार्गी, अघोर एवं सभी प्रकार की दुर्लभ प्रयोगों को समजाया है उसके विषय में ज्ञान प्रदान किया है. यह व्यक्तिगत रूचि की बात है की व्यक्ति किस मार्ग से सबंधित प्रयोग करना पसंद करता है. इन प्रयोगों की क्षमता तथा उपयोगिता तथा गुढ़ साधना पद्धतियों से सबंधित भी कई भाई बहेनो की सदैव जिज्ञासा रही है. अतः हमारा प्रयास यह है की धीरे धीरे वह सभी प्रयोग सामने आये जो की दुर्लभ है तथा जिनके विषय में सदगुरुदेव ने या उनके सन्यासी शिष्योंने बताया है.

Anonymous said...

निखिल जी प्रणाम !!!

बिलकुल उचित कहा आपने. गुरुदेव सर्व मार्ग निष्णात थे. उन्हने समय समय पर जो समझाया उसे आप पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं तो ये तो बहुत ही अच्छी बात है. ये सही है कि जिसकी जैसी रूचि होगी वो उसी प्रकार के प्रयोग आत्मसात करेगा.

स्पष्ट करने के लिए पुनः धन्यवाद !!

Alakh v.karma said...

bhaiya g.. ye pryog hamaare liye bilkul navin he... aasha karta hu esi tarah ke aur prayog aap anya kaaryo jese manokamna purti, aarthik unnati, aadi ke liye bhi postkarenge... jay gurudev