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Tuesday, May 21, 2013

SAHASTRAANVITA DEH PAARAD TARA - DO ADVIYTIYA SADHNA



तारां संसारसारां त्रिभुवनजननीं सर्वसिद्धिप्रदात्रीं |
भगवती श्री महाविद्या तारा देवी के संदर्भ में कुछ भी लिखना या कहेना सूर्य को दीप दिखाने के सामान ही है. आदि काल से ही अपने साधको के मध्य देवी के हर एक स्वरुप का प्रचनल उनके स्नेह एवं प्रेम के कारण तंत्र क्षेत्र में वृहद रूप से विद्यमान है. देवी की साधना आदि ऋषि वसिष्ठ विश्वामित्र गोरक्षनाथ तथा भगवान श्री तथागत ने भी की थी. क्यों की भगवती तारा ही तारण करने वाली अर्थात भोग से मोक्ष की तरफ ले जानी वाली है. उन्ही को ही तंत्र ग्रंथो में शक्ति के मूल रूप में मानकर अभ्यर्थना की है की हे भगवती तारा आप ब्रह्मांडीय संसार अर्थात सभी भोग एवं मोक्ष कारक तत्त्व का सार है, आप ही त्रिभुवन की स्वामिनी जन्मदात्री है तथा आपके माध्यम से ही सर्व सिद्धि की प्राप्ति होती है. और इसी लिए देवी की साधना सभी तंत्र मत्तो में सामान रूप से होती रही है. देवी से सबंधित कई प्रकार के प्रयोग एवं अनुष्ठान आदि प्रसिद्द है लेकिन गुप्त रूप से भी कई ऐसे विधान है जो की सिर्फ सिद्धो के मध्य प्रचलित रहते है. ऐसे ही कई विधान देवी के पारद विग्रह के माध्यम से संपन्न किये जाते है. आज हमारे कई भाई बहेनो के पास यह अति दुर्लभ ‘पारद तारा’ विग्रह विद्यमान है जो की आप सब ने जिस तीव्रता एवं उत्साह के साथ स्वीकार किया था. इसी विग्रह के सबंध में कई दिव्य प्रयोग आप सब के मध्य रखने के लिए बराबर प्रयास किया लेकिन कई प्रकार की योजना में व्यस्तता की वजह से यह प्रयोग आप से के मध्य प्रस्तुत करने में विलम्ब होता रहा है, कुछ दिन पूर्व ही इस विग्रह के माध्यम से संपन्न होने वाला एक अद्भुत तारा विधान प्रस्तुत किया गया था, अब इसी कड़ी में और दो विशेष प्रयोगों को आप सब के मध्य रखा जा रहा है जिनमे आकस्मिक धनप्राप्ति से सबंधित भगवती तारा प्रयोग एवं नीलतारा मेधा सरस्वती प्रयोग शामिल है. यह दोनों अद्भुत एवं तीव्र विधान है जो की साधक को शिघ्रातीशीघ्र फल प्रदान करने में समर्थ है. विधान सहज होने के कारण कोई भी साधक इसे संपन्न कर सकता है. आशा है की निश्चय ही साधकगण इन देव दुर्लभ प्रयोगों से लाभ की प्राप्ति करेंगे.
आकस्मिक धन प्राप्ति भगवती तारा प्रयोग –
प्रस्तूत प्रयोग आकस्मिक धन प्राप्ति से सबंधित भगवती तारा का विशेष प्रयोग है. इस प्रयोग को सम्प्पन करने पर साधक को विशेष धनलाभ की प्राप्ति होती है, वस्तुतः हमारे जीवन में हम कई प्रकार के दोषों के कारण एवं प्रारब्ध जन्य कारणों के कारण कई बार भोग लाभ की प्राप्ति से वंचित रहते है. एसी स्थिति में दीनता युक्त स्थिति से बाहर निकलने के लिए आदि काल से हमारे सिद्धो एवं ऋषियों ने भगवती तारा की साधना उपासना के सन्दर्भ में एक मत्त में स्वीकृति दी है. यूँ भगवती तारा को धनवर्षिणी, स्वर्णवर्षिणी आदि नामो से संबोधित किया गया है तो उसके पीछे यह तथ्य है की निश्चय ही देवी साधक की धन सबंधित सर्व अभिलाषा को पूर्ण करने में समर्थ है अगर प्राण प्रतिष्ठित पारद तारा विग्रह के सामने देवी के मूल मन्त्र को ही साधक पूर्ण समर्पण से युक्त हो कर जाप कर ले तो सभी समस्याओ से उसे मुक्ति मिलती है यह सिद्धो का कथन है. फिर भी कई बार विशेष प्रयोग आदि से भी लाभ प्राप्ति के लिए साधक प्रयत्न कर सकता है. देवी के पारद विग्रह से सबंध में सिद्धो के मध्य गुप्त रूप से प्रचलित जो प्रयोग है उनमे धन प्राप्ति के विशेष एवं उच्चकोटि के प्रयोग शामिल है. लेकिन इनमे से तीव्र एवं गृहस्थ साधको के लिए उपयुक्त विधान निम्न रूप से है. यह विधान सहज है एवं साधक अपने घर में यह विधान कर सकता है. साथ ही साथ यह प्रयोग अल्प मन्त्र जाप एवं साधना काल की अवधि में भी राहत है क्यों की आज के युग में सभी साधको के लिए मंत्रो के पूर्ण अनुष्ठान करना संभव नहीं है अतः इस प्रकार के दुर्लभ प्रयोग को प्रथम बार यहाँ पर प्रस्तुत किया जा रहा है. इस प्रयोग को पूर्ण करने पर साधक को अपनी समस्या में राहत मिलती है, साधक अपने जीवन में उन्नति को प्राप्त करता है, धन प्राप्ति के नूत नविन स्त्रोत उसके सामने आते रहते है या फिर देवी नाना प्रकार से उसकी सहायता करती रहती है.
यह प्रयोग साधक किसी भी शुभ दिन शुरू कर सकता है. साधक को यह प्रयोग रात्री काल में ही संपन्न करना चाहिए.
साधक को स्नान कर साधना को शुरू करना चाहिए. साधक लाल रंग के वस्त्र को धारण करे तथा लाल रंग के आसन पर बैठे. साधक का मुख उत्तर दिशा की तरफ होना चाहिए.
साधक प्रथम सदगुरुपूजन करे तथा गुरु मन्त्र का जाप करे. इसके बाद साधक गणपति एवं भैरव देव का पंचोपचार पूजन करे. अगर साधक पंचोपचार पूजन न कर पाए तो साधक को मानसिक पूजन करना चाहिए.
साधक अपने सामने ‘पारद तारा’ विग्रह को स्थापित करे तथा निम्न रूप से उसका पूजन करे.
ॐ श्रीं स्त्रीं गन्धं समर्पयामि |
ॐ श्रीं स्त्रीं पुष्पं समर्पयामि |
ॐ श्रीं स्त्रीं धूपं आध्रापयामि |
ॐ श्रीं स्त्रीं दीपं दर्शयामि |
ॐ श्रीं स्त्रीं नैवेद्यं निवेदयामि |
साधक को पूजन में तेल का दीपक लगाना चाहिए तथा भोग के रूपमें कोई भी फल या स्वयं के हाथ से बनी हुई मिठाई अर्पित करे. इसके बाद साधक निम्न रूप से न्यास करे. इसके अलावा इस प्रयोग के लिए साधक देवी विग्रह का अभिषेक शहद से करे.
करन्यास
श्रीं स्त्रीं अङ्गुष्ठाभ्यां नमः
महापद्मे तर्जनीभ्यां नमः
पद्मवासिनी मध्यमाभ्यां नमः
द्रव्यसिद्धिं अनामिकाभ्यां नमः
स्त्रीं श्रीं कनिष्टकाभ्यां नमः
हूं फट करतल करपृष्ठाभ्यां नमः

हृदयादिन्यास
श्रीं स्त्रीं हृदयाय नमः
महापद्मे शिरसे स्वाहा
पद्मवासिनी शिखायै वषट्
द्रव्यसिद्धिं कवचाय हूं
स्त्रीं श्रीं नेत्रत्रयाय वौषट्
हूं फट अस्त्राय फट्
न्यास के बाद साधक को देवी तारा का ध्यान करना है.
ध्यायेत कोटि दिवाकरद्युति निभां बालेन्दु युक् शेखरां
रक्ताङ्गी रसनां सुरक्त वसनांपूर्णेन्दु बिम्बाननाम्
पाशं कर्त्रि महाकुशादि दधतीं दोर्भिश्चतुर्भिर्युतां
नाना भूषण भूषितां भगवतीं तारां जगत तारिणीं      
इस प्रकार ध्यान के बाद साधक देवी के निम्न मन्त्र की २१ माला मन्त्र जाप करे. साधक यह जाप शक्ति माला, मूंगामाला से या तारा माल्य से करे तो उत्तम है. अगर यह कोई भी माला उपलब्ध न हो तो साधक को स्फटिक माला या रुद्राक्ष माला से जाप करना चाहिए.

श्रीं स्त्रीं महापद्मे पद्मवासिनी द्रव्यसिद्धिं स्त्रीं श्रीं हूं फट

(OM SHREENG STREEM MAHAAPADME PADMAVAASINI DRAVYASIDDHIM STREEM SHREENG HOOM PHAT)
जाप पूर्ण होने पर साधक मन्त्र जाप को देवी के चरणों में योनीमुद्रा के साथ प्रणाम कर समर्पित कर दे.
ॐ गुह्याति गुह्यगोप्ता त्वं गृहाणाऽस्मत कृतं जपं सिद्धिर्भवतु मे देवि! तत् प्रसादाना महेश्वरी||
साधक यह क्रम तिन दिन तक करे. तीसरे दिन जाप पूर्ण होने पर साधक शहद से इसी मन्त्र की १०८ आहुति अग्नि में समर्पित करे. इस प्रकार यह प्रयोग ३ दिन में पूर्ण होता है. साधक की धनअभिलाषा की पूर्ति होती है.

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नील सरस्वती तारा मेधा सिद्धि प्रयोग –
हमारे जीवन में स्मरणशक्ति का कितना और क्या महत्त्व है यह हम स्वयं ही समज सकते है क्यों की शायद एक तरह से यह पूरा जीवन स्मरण शक्ति के ऊपर ही टिका हुआ है. हमारा जब जन्म होता है तो जन्म के साथ ही हामरे मस्तिष्क का जिस प्रकार विकास हुआ होता है तथा आगे जिस प्रकार होता है उसके ऊपर हमारे स्मरण की शक्ति का आधार रखता है, यही आधार कुछ सालो में स्थायी हो जाता है. और यही हमारी याद शक्ति बन जाती है जो की एक निश्चित सीमा में बंद जाती है. यह कुदरत की देन है की किसी को कम तो किसी को ज्यादा मात्र में स्मरण शक्ति की प्राप्ति होती है. लेकिन अगर हम इसी शक्ति का पूर्ण विकास कर ले तो? निश्चय ही सिद्धो के मध्य देवी का नीलसरस्वती स्वरुप कई विशेषताओ के कारण प्रचलित है जिसमे से एक है स्मरण शक्ति. देवी तारा तथा उनके विशेष रूप आदि की साधना करने पर साधक की स्मरण शक्ति तीव्र होने लगती है तथा जैसे जैसे साधना तीव्र होती जाती है वैसे वैसे साधक की स्मरणशक्ति का विकास होता जाता है. वस्तुतः हमारी स्पर्शेन्द्रिय एवं ज्ञानेन्द्रियो के कारण ही हम देखा, सुना, या स्पर्श याद रखते है. इन इन्द्रियों की एक निश्चित क्षमता होती है जिसका अगर विकास कर लिया जाए तो साधक को कई प्रकार से जीवन में सुभीता की प्राप्ति होती है. और निश्चय ही एक अच्छी स्मरण शक्ति साधक को भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों ही पक्षों में पूर्ण सफलता प्रदान करने में बहुत ही बड़ा योगदान दे सकती है. फिर देवी से सबंधित यह प्रयोग तो अति गुप्त है. पारद की चैतन्यता एवं देवी के एक विशेष एवं गुप्त तीव्र मन्त्र के सहयोग से साधक की दसो इन्द्रियों की चैतन्यता का पूर्ण विकास होने लगता है तथा साधक को मेधा शक्ति की प्राप्ति होती है.
यह प्रयोग साधक किसी भी शुभ दिन शुरू कर सकता है. समय रात्रीकालीन रहे.
साधक स्नानशुद्धि कर पीले वस्त्र धारण कर पीले रंग के आसन पर उत्तर की तरफ मुख कर बैठ जाए.
सर्व प्रथम गुरुपूजन गुरु मन्त्र का जाप कर साधक गणेश एवं भैरव पूजन करे.
अपने सामने साधक ‘पारद तारा विग्रह’ अथवा “नील मेधा यन्त्र”(जिसे उपहार मे भेजा गया है और इस पर अन्य प्रयोग भी शीघ्र ही आयेंगे)  स्थापित करे तथा देवी का पूजन करे. पूजन के बाद साधक न्यास करे.
करन्यास
ऐं अङ्गुष्ठाभ्यां नमः
कूं तर्जनीभ्यां नमः
कैं मध्यमाभ्यां नमः
चां अनामिकाभ्यां नमः
चूं कनिष्टकाभ्यां नमः
ह्रीं स्त्रीं हूं करतल करपृष्ठाभ्यां नमः
हृदयादिन्यास
ऐं हृदयाय नमः
कूं शिरसे स्वाहा
कैं शिखायै वषट्
चां कवचाय हूं
चूं नेत्रत्रयाय वौषट्
ह्रीं स्त्रीं हूं अस्त्राय फट्
न्यास करने के बाद साधक देवी का ध्यान करे.
अटटाटटहास्निर्तामतिघोररूपाम् |
व्याघ्राम्बराम शशिधरां घननीलवर्नाम
कर्त्रीकपालकमलासिकराम त्रिनेत्रां
मालीढपादशवगां प्रणमामि ताराम
इसके बाद साधक भगवती तारा के विग्रह पर त्राटक करते हुए निम्न मन्त्र की ११ माला करे. इस प्रयोग के लिए साधक शक्ति माला, पीले हकीक माला या फिर स्फटिक माला का प्रयोग करे.

ॐ ऐं कूं कैं चां चूं ह्रीं स्त्रीं हूं  

(OM AING KOOM KAIM CHAAM CHOOM HREENG STREEM HOOM)

जिन साधको को मन्त्र विज्ञान का अभ्यास है वह इस मन्त्र की तीव्रता एवं दिव्यता का आकलन कर सकते है, वैसे यह अति गुढ़ विषय है फिर भी साधकगण इतना समझ सकते है की मन्त्र के हर एक बीज की अपनी एक अलग ही विशेषता है. इस प्रयोग में साधना मन्त्र का निरूपण एवं विमर्श कुछ इस प्रकार है की ऐं बीज पञ्च ज्ञानेन्द्रियो के नियंत्रण का सूचक है वहीँ कूं कैं एवं चूं ये  बीज एक एक तथा चां बीज दो कर्मेन्द्रि का प्रतिक है, ह्रीं स्त्रीं हूं देवी नील सरस्वती का मूल अभ्यर्थना क्रम मन्त्र है.
 इस प्रकार साधक यह दिव्य मन्त्र की ११ माला पूर्ण कर लेने पर देवी को वंदन करे.
साधक को यह क्रम ३ दिन तक करना है. ३ दिन इस प्रकार करने पर यह प्रयोग पूर्ण होता है.  

यह दोनों प्रयोग अभी तक गुप्त रहे है तथा सिर्फ सिद्धो के मध्य इनका प्रचलन रहा है. अतः इन विधानों को अपना कर आप सब को पूर्ण लाभ की प्राप्ति करे यही आशा सह एक बार फिर से आप सब की सफलता के लिए सदगुरु चरणों में प्रार्थना है.

****NPRU****

1 comment:

samir said...

Bhai mere paas sadhna ke liye TARA VIGRAH nahi hai to main kaha se praprt kar sakta hu krupaya margdarshan kare