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Tuesday, May 31, 2011

is there any truth between sankalp or manauti


साधना में सिद्धि  लुभावना  मन भावन शब्द हैं, किसे सफलता  अच्छी नहीं लगती पर हर सफलता  के पिछ्छे  जहाँ एक दृढ  विस्वास होना हैं वही संकल्प शक्ति की अनिवार्यता को भी नकारा नहीं जा सकता ,आखिर इस संकल्प शक्ति की इतनी प्रधान ता  क्यों हैं .सूर्य की किरणों में  ताप हैं पर जब उसे एक बिंदु पर केन्द्रीभूत करदिया जाये तो अग्नि प्रज्व्ज्वालित  होने  में कितनी देर लगती हैं . ठीक इसी तरहशब्द  शक्ति  का हैं शब्द ही ब्रम्ह हैं ,हमारे  द्वारा  अछ्छा  या बुरा , मीठा आया कडवा जोभी शब्द बोला जायेगा वह भी उसी ब्रह्म का एक रूप हैं , तो कह सकते हैं संकल्प भी ब्रह्म का एक रूप ही हैं,यह संकल्प से  ही हमारे  द्वारा  किये जा रहे मन्त्र जप की दिशा  को  निर्धारित करता हैं ,

संकल्प भी कई प्रकार का होता हैं, साधारणतः इसे संस्कृत भाषा में ही कहा जाना चाहिये , पर सदगुरुदेव जी  की असीम क्रिया से इसे हम हिंदी में भी करके  यथोचित लाभ प्राप्त कर सकते हैं. एक तो सामान्य सी प्रक्रिया  हैं कीअपने सीधे हाँथ में जल ले कर
 मेरा नाम (अपना नाम ले)... मेरे पिता का नाम(अपना पिता का नाम ले) में .निखिल गोत्रीय ,(अपने शहर का नाम  ले)  शहर का निवासी  हु , ओर में इस साधना  को  आज से सदगुरुदेव भगवान परमहंस स्वामी  निखिलेश्वरानंद  जी की उपस्थिति में प्रारंभ कररह हूँ , प्रिय गुरुदेव आप मुझे इस साधना  में पूर्ण मनो वांछित  सफलता प्राप्त  हो ही ऐसा आशीर्वाद  प्रदान करे , कह कर जल जमीं पर छोड़ दे.

दूसरा तरीका हैं तांत्रिक पंचांग द्वारा इसमें यह दतिया (मध्य प्रदेशा ) से  बल्गामुखी पीठाधीश्वर पुज्य स्वामी जी महाराज द्वारा  प्रकाशित हैं , इसमें संस्कृत  में कैसे  संकल्प किया जाना चाहिए भिन्न तथ्य को एक साथ ले कर साथ ही साथ उन काल खंड के देवी देवताओ  के नाम का किस क्रम से उच्चारित  किया जाना जाना  चाहिए. थोडा सा कठिन पद्धति हैं . पर आप सदगुरुदेव जी द्वारा  दी गयी पद्धति ही  प्रयोग  करे. 

 फिर भी मूल भूत प्रश्न  अभी भी हैं की...

 साधक जब मन्त्र जप करता हैं तब  उसके द्वारा किये गए मन्त्र को उचित दिशा  होने से यह उसकी समस्त पूर्व जन्म संचित कर्म राशी को ही नष्ट करने में लग जाता हैं फल स्वरुप पहल प्राप्ति में बिलम्ब  होना स्वाभाविक हैं पर संकल्प के माध्यम से  आप इसे एक दिशा प्रदान करते हैं जिस से आपका  काम जल्दी ओर उचित तरीके से होता हैं.

  अनेक लोग अपने काम  की पूर्ति  के लिए किसी भी  भी लोक प्रिय देवी या देवता  के नाम की शपथ  लेकर ये कहते हैं की इतने दिन मैं यह काम यदि हो जायेगा तो  मैं आपके निमित्त यह  या यह  करवाऊंगा. इस  में भी कोई सच्चाई हैं क्या , सबसे पहले समझ लेना होगा की मंत्र योग क्या हैं वस्तुतः  मन्त्र योग कल्पना योग का साकार रूप हैं ,और यह तब ही साकार होता हैं  हैं जब साधक /व्यक्ति मान  ता हैं की वह किसी जीवित  तत्व से बातकर रहा हैं, उसकी  यह मानसिक भावना  ही उसके  कार्य को संभव  बनती  हैं तात्पर्य यह  हैं ," जाकी रही जैसी भावना " की  
पर एक विशेष  तथ्य  भी हैं की , इसे अपनी आदत नहीं बन लेना चाहिए , विशेष तः  यह महिला वर्ग में यह आदात  अधिकतर पाई जाती ,जब जब आपका कार्य इतने मात्र से हो रह हो तो किसे  फिक्र हैं साधना  या  श्रम , प्रथम तः तो  यह मानले की हर बार आपका कार्य हो ही जाये यह निश्चय नहीं हैं द्य्सरी  आपने  यदि कोई इस तरह की मानौती     मान  रखी हैं तो उसे कार्य पूरी होने पर करे ही, प्रशिद्ध संत उड़िया  बाबा  जीके जीवन में एक उनका शिष्य  अत्यधिक  परेशानी से ग्रसित था.
 एक बार वह अपनी समस्याए लेकर अपने गुरुदेव से मिला, उड़िया  बाबा   ने उसकी  बात सुन कर  कहा  की  कभी  कोई मनौती  तो नहीं मानी  थी , उसने कहा नहीं  गुरुदेव ..
 तब फिर बाबजी ने कहा की याद करो भले ही मुखसे न बोला हो पर कभी मन में मांगी हो,
 उसने कहा गुरुदेव हाँ ऐसा  तो हैं, तो उसे पूरी करो.
 पर गुरुदेव  मैंने तो बोला नहीं,
 पर बेटे .. ऐसा होता हैंशब्द तो उच्चारित हुआ ही फिर चाहे वह मुख से या मन में तो प्रभाव पड़ना ही हैं .
( कठिन तथ्य हैं एक दम से बुद्धि इसे  नहीं स्वीकार कर पाती  की ये क्या  बात हुयी   इस तरह  से तो (हमारे सोचने पर भी ...)हर बार हम में से कोई भी.... मित्रो मानना ही पड़ेगा ही की यह सारा  विश्व  वास्तव में एक  प्रभु की  मानसिक रचना  हैं . तो  दो मानसिक बाते में भेद कहाँ  हाँ शक्ति या मत्रगत भेद हो सकता हैं पर  प्रभाव तो होगा ही........ जो बात आपके मन में आ गयी उससे सम्बंधित उत्तर  या कार्य ब्रम्हांड में कहीं न कहीं  जन्म ले ने की प्रक्रिया भी  प्रारंभ  हो जाती हैं , क्योंकि हर सिक्के के दोपह्लू तो होंगे ही )
रहा  सवाल  की एक साधरण ओर एक सिद्ध /महायोगी  में दोनों के पास इच्छा तो हैं पर महायोगी  के पास शक्ति  हैं तो उसके साधरण संकल्प में कोई विकल्प नहीं होता हैं , इसलिए उसके इच्छा मात्र से  सारी प्रकृति वह कार्य  को करनेमें उनकी सहयोगी हो जाती  , साधरण व्यक्ति साधक  केबल  इच्छा   ही लिए होता हैं,
परजब बात हो सदगुरुदेव  या गुरुतत्व  की तो कहाँ भी गया  हैं
"मन्त्र मूलम गुरो वाक्य "
फिर सदगुरुदेव जी जो भी कहे मंत्र  ही हुआ,उसका शिष्य के लिए उतना ही महत्त्व हैं जितना किसी बीज मंत्रो से युक्त वाक्य का.
 पर कैसे , उनके श्री मुख से उच्चारित वाक्य में कोई बीजमंत्र  तो नहीं था वह कैसे हुआ मंत्र  हमारे लिए ,
 में  उदहारण  से अपनी  बात आपके सामने रख रहा हूँ जिस से  इस तथ्य को समझने में आसानी होगी.
भगवान आदि शंकराचार्य  कहते हैं की सदगुरुदेव का अनुग्रह पूर्ण  वाक्य की तू मुक्त हैं तो शिष्य मुक्त हैं . एक तरफ  तो आचार्य   किसी शिष्य  को मन्त्र दे  रहे हैं दूसरी ओर किसी शिष्य  को यह कह रहे हैंवास्तविकता यह हैं की हम चाहे गुरु तत्व की कितनी भी बात कर ले हम उसकी गहिनता  या उच्चता  या पवित्रता  को स्पर्श  भी नहीं कर पाते  हैं भले ही कितना भी जय गुरुदेव  कर  ले .ओर यों भी शिष्य  तो अज्ञानी ही होता हैं वह एक बार में बस समझ जाये तो यह उद्दात्त  परंपरा  का अंत ही न  हो जाये . 
स्वामी विवेकानंद  जी अपने दो सन्यासी को आज्ञा  दे कर कहा  की उतरांचल में जा कर जैसे भी हो एक अस्पताल का निर्माण करना हैं  तुम दोनों के लिए यही आज्ञा हैं ओर मेरी आज्ञा के बिना मेरे दर्शन के लिए भी यहाँ तुम दोनों लौट  कर नहीं आओगे.दोनोंसन्यासी  ने उस काल की सर्वथा साधन वाहीन   विपरीत परिस्थिति  में कितना संघर्ष  करके अपने गुरुदेवकी आज्ञा को संभव कर  दिखाया यह तो यह एक ही अलग ही कथा  हैं  . स्वामी यहाँ अपने दोनों शिष्यों को याद करते हुए प्रसन्नता  से अश्रुपूरित होते कहते थे की  मेरे वे  दोनों बच्चे गुरु वाक्य का पालन कर  परमहंस स्तर  पर पहुच गए हैं .. 
पर सोचिये स्वामीजी के देहावसान के समय समाचार मिलने पर भी अपने गुरुदेव के दर्शन को नहीं जा सकते थे ,वे दोनों वहां  उतरांचल में तडपते रहे  पर  गुरु आज्ञा /गुरु वाक्य को शिरोधार  कर उतरांचल  में ही  रहे .
अब हम सभो सोचें किहम कहाँ खड़े हैं ...... हम सब के इंतज़ार में सदगुरुदेव जी तो बाहें  फैलाये खड़े ही हैं ... 
आज के लिए बस इतना ही
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To have siddhita in sadhana is the very  attractive word and who not liked the word success, just  behind the success the hard work and the  will power ‘s utility can not be underestimated. why so much emphasis on will /sankalp.
Rays of sun has heat but if they are concentrated on a point than with in a few sec fire will automatically appears. Like that the power of word since word is the Brahma,  the word coming out of us either good or bad sweet or sour, is also a form of Brahma, than we can say that the word  used in sankalp is also a form of Brahma, and through this sankalp where should the power originated from this aim decides.
Theses sankalp may be many form  generally it is expected that it should be speak in Sanskrit but due to Sadgurudev ji grace we can speak in hindi and will get the same result. This is very simple process like that having a little water  in your right hand palm. 
I am (speak your own name), son/daughter/wife  of (speak the appropriate name ) with Nikhil gotra , I am resident of (speak the name of the city in which you are living) now from today onwards I am starting this sadhana for to fulfill following wish( name that)in the divine holy presence of Sadgurudev paramahansa swami nikhilishewaranand , o h mine beloved Sadgurudev please bless be with success in this sadhana.
Leave that water on the soil/floor.
Other way is  through taking the help of “tantrak panchang” published by  swami ji maharaj of ma Balgamukhi temple at datiya mp(india). In that it is very clearly defined that how in sanskarit using very different deity name with reference to vary our time  a sankalp should be used. And proper manner are how to be maintained, but it is little bit difficult , so it s better we will use the method suggested by /instructed by Sadgurudev to all of us.
Still the question remains..
When sadhak does the mantra jap than if not having the proper direction  than the effect of his mantra jap destroying the all his earned sins either from this life or previous ones.. than it is easily understand that why such a delay occurs. But through sankalp you can provide a direction and  your aim will fulfill early and in proper way.
Many people want to fulfill their work so a much better way   is  to ask dev /devita as a promise kindly do my work and in response to that if that happens than I will do such and a such as an offering, is there any truth in that . lets first understand that what is mantra yog, is the  out comes of kalapana yog means imagination. When any people thinking that he is talking to a live element and doing such a promises,, than according to his feeling that happens. Like as you feeling so you will  get.
Always remember this should not be used as a practice or habit. This usually happens most in female section. When your work is going to complete just because of that who has the interest to do /go for hard work or sadhana. First this is not a must thing that each time  your wish will be granted to you. Secondly if you made such an promise  than fulfill that .once upon a time a disciple of great sanit udiya babaji, came nearer to him and told about type suffering he was under going  in that, on listening to his problem babaji simply replied that had he eve make any manuti (promise) , he denied that, again baba ji said think again even in mental way.
 He replied yes , but Gurudev I never spoke .
 It does not matter that you spoke or not, words came out either from mouth or mental way it has an effect.
(very difficult  fact how we can accept that,  this means even we are thinking that also has an same effect as of speaking, dear one it’s the fact you must relies that what is this world , is a product of mental image of god as per hindu philosophy. than where is the difference lies between two mental thought, yes difference may be of power and magnitude… so the thought comes to your mind the answer related to that   just be taking shape some where in the universe. Since each coin always has two faces.)
Now the question  each one either a general common people and of a great mahayogi both has the sankalp byt the degree of power or I would say that the mahayogies has the power behind his will , what we are lacking we have only will, and hamayogi when made any sankalp there is no alternatives only a  firm unshakable thought so  the mother nature also follow according to that wish.
 But when talk about sadguru tatav or guru tatav, its being said that
 “Mantra mulam guro vakayam”(what has been said by Gurudev is a mantra )
When Sadgurudev spoke any  sentences whether that are having with beej mantra or simple word carries a meaning like mantra there is no difference.
But how that is possible both are one, since in ordinary statement if not having any beej mantra how can we treat that like a mantra.
Here I am giving an example which will help you to understand theses facts. Bhgvaan  aadi shakankarachary says that even a simple statement like you are free , so the shishy completely free from all the pash , but how is that possible same time he was giving an mantra instruction to other shishyas .truth is that whether how many time we claim that we knew guru tatav but the height , holiness, vastness can not not be ever touch by us, and very important facts that  shishy is always a ignorant and if each and every shishy understand in one time all the word as Gurudev spoke , than where will go this great guru shishy pramapara ie, order.
Once swami Vivekanand  instructed two of his sanyasi shishy  to go to uttranchal and do their best to built a hospital and without  his  permission never come back gain, even for guru darshan. So both sanyasi shishy with nothing money in hand moved to that forest area, and did their best , and how they were able to built the hospital was a another story, here swami ji remembering both his child  and usually he speak about them with tear flow in his eyes of happiness says mine both child already reached  stage of paramhans by following guru agya/guru vakya.
But think about a minute on getting the news of sami ji passing from worldly body , they cried but they could not move to see his beloved guru since they had no permission of swamiji(Gurudev). Such is the  following of guru vakya…
Now think about a sec where we all are standing…..
 Still our beloved Sadgurudev is  waiting for us  with aopen arms  only for us….
That’s enough for today….


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