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Saturday, January 14, 2012

VIGYAN AUR TANTRA BHED(RAS VIGYAN AUR TANTRA 4)


पिछले लेख मे हमने जाना की किस प्रकार से तंत्र का समन्वय पारद विज्ञान या रस विज्ञान से हुआ और रस तंत्र का अस्तित्व सामने आया. अगर रस तंत्र की मूलभूत गुढ़ क्रियाओ की बात करे तो सब से पहले बात आती है रस लिंग अर्थात रसेश्वर की. इसी रस लिंग को पारद शिवलिंग भी कहा जाता है. जब शुद्ध किए हुए पारद को ठोस रूप दे दिया जाए तब वह रसलिंग बनता है यह धारणा हकीकत मे अधूरी है. चूँकि वह एक मात्र धातु की मूर्ति ही बनेगी जब तक उसमे पूर्ण तंत्रोक्त विधानों के साथ प्राणप्रतिष्ठा नहीं की जाती. यह ठीक उसी प्रकार से है जिस प्रकार से एक व्यक्ति कोई यन्त्र को तो बना ले लेकिन उसमे विद्युत ही नहीं है. बिना विद्युत के वह यन्त्र चल नहीं सकता. तो फिर उस यन्त्र का अर्थ ही क्या हुआ. जो मूल शक्ति का स्थापन किया जाता है उससे ही वह शव शिव के रूप मे परावर्तित हो जाता है. इसी क्रम मे पारद के विग्रह, सिद्ध गुटिकाऐ तथा यन्त्र रस तंत्र की प्रमुख क्रियाओ मे से है. इसी प्रकार कई तंत्र को सिद्ध करने के लिए कई प्रकार की गुटिकाओ की आवश्यकता होती है. रस तंत्र की अद्भुत प्रक्रियाओ मे से एक है कनकावती प्रयोग, इस तंत्र प्रयोग के माध्यम से व्यक्ति तन्त्र मुद्राओ से रस को उच्च मूल्यवान धातु मे परावर्तित कर सकता है. इसके अलावा पुष्पवस्त्र से सबंधित कई वाम मार्गी प्रक्रियाए है जिसके माध्यम से पारद को सिद्ध कर वायुगमन की प्रक्रिया को प्राप्त किया जा सकता है. महारसेश्वर प्रक्रिया से व्यक्ति किसी भी समय कोई भी देवी देवता को प्रत्यक्ष कर सकता है. नाथ सिन्दूर के माध्यम से इंटो की ईंट भी को धातु मे परावर्तित कर ढेर लगाया जा सकता है. कांकीणी साधना और रस के संयोग से तांत्रिक प्रक्रियाए करने पर अक्षतयौवन की प्राप्ति की जा सकता है. इसी क्रम मे रस तंत्र की ब्रम्हांड गमन प्रक्रिया के माध्यम से साधक सशरीर विभ्भीन लोको की यात्रा करने मे समर्थ हो जाता है. जैन तन्त्रो मे भी पारद का बराबर प्रचलन रहा है तथा नागार्जुन ने भी वायुगमन सिखने के लिए जैन मुनि से दीक्षा प्राप्त की थि. इस प्रक्रिया के अंतर्गत विशेष मंत्रो के साथ एक लेप का निर्माण होता है जिसे पैरों मे लगाने पर वायुगमन की शक्ति प्राप्त होती है वह प्रक्रिया मे विशुद्धपारद भी एक अंग था. सिद्धनागार्जुन ने जैन तंत्र के माध्यम से ही सिद्धकोटिवेधी रस का निर्माण किया था. इस रस के माध्यम से एक ग्राम एक करोड ग्राम का रूपांतरण कर सकता है. आगे जाके बौद्ध सम्प्रदाय मे भी इसका बराबर प्रचलन रहा तथा तिब्बत के लामाओ ने कई वज्रयानी प्रक्रियाओ के लिए पारद का सहयोग ले कर रस तंत्र का विस्तार किया. वैसे एसी करोडो प्रक्रियाए रस तंत्र से सबंध रखती है जो की एक से एक हीरक खंड है. यहाँ पर ये सब बताने के पीछे का आश्रय यह है की हम इस विज्ञान तथा इसके तंत्र भेद का विस्तार समझ  सके तथा सदगुरुदेव की ज्ञान शक्ति के बारे मे कुछ प्रकाश अपने मन पर ड़ाल सके. उनके ह्रदय के प्रिय बन कर इस ज्ञान को आत्मसात कर सके तथा एक शिष्य बन कर गर्व ले सके. अगले लेख मे एक नूतन विज्ञान पर कुछ चर्चा करेंगे.
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In previous article we get to know that how tantra was merged with paarad science or rasa science and ras tantra came to existence. If we talk about basic rare process of ras tantra then first of all subject becomes ras linga or raseshwar. This ras linga is also called as paarad shivalinga. When pure mercury is solidified will become ras linga but this is half fact. It would be just another idol of metal unless and until there is no establishment of prana or livening process with complete tantric procedure. It is something like one men prepares a machine but there is no electricity. And without electricity that machine does not work. Then what is the use of that yantra. When basic power is established then only it becomes shiva from shava (living from dead). This way, paarad idols, siddh gutika and yantras are basic processes of ras tantra. This way, to accomplish many tantra, one may need many type of gutiks. In the ultimate processes of ras tantra there is a process called kanakaavati prayog, with help of this prayoga one may convert rasa into valuable metals through tantra mudras only. Apart from these there are many vaam maarg processes related to menstrual cloth with help help of which vayugaman could be possible by accomplishing paarad. With MahaRaseshwara process one may get glimpses of any god goddesses at will. With the help of naath sindoor process bricks could be transformed to metals to no limits. Intact youth could also be gained by merging kankini sadhana with tantra processes of rasa. This way, with the process of bramhand gaman prakriya, one may bodily visit various earths. In jain tantras too paarad had remained famous and siddh nagarjuna took initiation from Jaina ascetic to lear vaayugaman process. Under this process, a coating is prepared with various mantras which if applied on the foot can give the power to fly; in this process pure paarad was one of the parts. Sidhh nagarjuna also prepared Koti Vedhi Rasa with medium of jain tantra. With the help of this rasa one gram could convert ten million grams. Further this tantra remained famous in bauddha sect also and for many vajrayana processes lamas of Tibet took help of paarad and spreaded ras tantra. There are millions of such processes which are related to ras tantra and all are gems. Mottow behind all these description is that we can understand coverage of this science and tantra aspect of the same and to throw some light on our mind about knowledge power of sadgurudev. To become his beloved and realize this knowledge and to have proud of being disciple. In further post, we will discuss about some new science.

  


                                                                                               
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