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Wednesday, July 6, 2011

SANGEET TANTRA


प्राचीन काल से मनुष्य का सबंध संगीत से रहा हैं , संगीत को मनुष्य ने अपने भाव को व्यक्त करने का माध्यम बनाया था. प्राचीन समय में यह मात्र एक मनोरंजन का स्त्रोत नहीं था. हमारे कई ऋषि मुनि संगीत शाश्त्र में निपूर्ण थे. और आज भी कई उच्च कोटि के योगीजन संगीत में पूर्ण होते हैं . क्या हमने एक बार भी यह सोचा की जो हमेशा इष्ट के आनंद में रहते हैं  उन्हें यह बाहरी मनोरंजन के माध्यम संगीत की क्या जरुरत हैं .
 संगीत का मतलब आज क्या लिया जाता है  ये कहा नहीं जा सकता लेकिन प्राचीन काल में ये एक आध्यात्मिक माध्यम ही रहा था. संगीत के माध्यम से ही कई लोगो ने पूर्णता प्राप्त की हैं  मीराबाई या फिर नरसिंह जेसे कई उदाहरण  हमारे सामने ही हैं . तो फिर यह भेद क्यों ?
 वास्तव में हमने संगीत को कभी समझा  ही नहीं, सदगुरुदेव कहते थे की भवरे की गुंजन भी एक प्रकार से संगीत ही हैं  जिसे रोज सुना जाये तो आदमी धीरे धीरे विचार शून्य हो जाता हैं . सामान्य मनुष्यों को संगीत मनोरंजन आधारित होना चाहिए लेकिन योगीजन के लिए संगीत बहुत  गहरी परिभाषा लिए हुए हैं .
 ध्वनि की महत्ता निर्विवाद रूप से मानी जाती हैं  और एक विशेष ध्वनि कोई न कोई विशेष उर्जा प्रसारित करती ही हैं . संगीत के सप्तक या सा रे ग म प् ध नि आदि शब्दों के कोई सामान्य समूह नहीं हैं . देने को तो इन ध्वनियों को कोई भी उच्चारण दे दिया जाता लेकिन सा रे ग म प ध नि का गहन अर्थ हैं . जब एक विशेष लय के साथ एक मूल ध्वनि सम्मिलित होती हे तो वह शरीर में किसी एक विशेष चक्र को स्पंदित करती हैं .
सभी सुर अपने आपमें तत्वों के प्रतिनिधि हैं  और हर सुर एक विशेष तत्व के ऊपर अपना प्रभुत्व रखता हैं . जिसमे सा- पृथ्वी, रे, ग – जल तत्व म,प – अग्नि तत्व ध- वायु और नि- आकाश तत्व के प्रतिनिधि हैं
.अब जिस तरह से ये सप्त सुर हैं उसी तरह शरीर में सप्त सुरिकाए हैं  जहाँ से सुर का या ध्वनि की रचना होती हैं . यह हे सर, नासिका, मुख-कंठ, ह्रदय (फेफड़े), नाभि, पेडू और ऊसन्धि. ध्यान से देखा जाए तो ये साडी जगह शरीर के सप्त चक्रों के अत्यंत ही नजदीक हैं . अब इस तरह संगीत तंत्र में कुण्डलिनी सबंध में सप्त सुर एक एक चक्र को स्पंदित करने में सहयोगी हैं
सा – मूलाधार ( पृथ्वी तत्व, सुरिका- ऊसन्धि)
रे – स्वाधिष्ठान( जल तत्व , सुरिका – पेडू )
 – मणिपुर (जल तत्व , सुरिका – नाभि )
 – अनाहत ( अग्नि तत्व, सुरिका – ह्रदय)
 – विशुद्ध ( अग्नि तत्व, सुरिका – कंठ)
 – आज्ञा ( वायु तत्व, सुरिका – नासिका)
नि – सहस्त्रार ( आकाश तत्व, सुरिका – मस्तक)
 इन स्वरों का, उपरोक्त स्वरिकाओ से इनसे सबंधित चक्र का ध्यान करने से चक्र जागरण की प्रक्रिया शुरू हो जाती हैं  और उसे कई विशेष अनुभव होने लगते हैं . मगर ये चक्र जागरण होता हैं , भेदन नहीं.
इसी लिए विभ्भिन रागों की रचना हुयी हैं , जिसमे ध्वनिओ के संयोग से कोई विशेष राग निर्मित किया जाता हैं  जो की वह विशेष चक्र को भेदन कर सकता हैं .
  जैसे मालकोष राग के माध्यम से विशुद्ध चक्र को जाग्रत किया जा सकता है , इसी प्रकार कल्याण राग के निरंतर अभ्यास से भी विशुद्ध चक्र को स्पंदन प्राप्त होता है और वो जाग्रत हो जाता है. और एक बार जब ये चक्र जाग्रत हो जाता है तो साधक वायुमंडल में व्याप्त तरंगों को महसूस कर सकता है और उन्हें ध्वनियों में परिवर्तित कर सकता है , पर कल्याण राग जैसा राग सांयकाल के समय ही गाना उचित होता है. अर्थात सूर्य अस्त के तुरंत उपरांत. नन्द राग के द्वारा मूलाधार चक्र जाग्रत हो जाता है . और वेदों का सही अर्थ व्यक्ति तभी समझ सकता है जब उसका मूलाधार पूरी तरह जाग्रत हो. इस राग को रात्रि के दुसरे प्रहार में गाना चाहिए. ठाट बिलाबल राग देवगिरी के प्रयोग से अनाहत चक्र की जाग्रति होती है  व्यक्ति अनहद नाद को सुनने में और उसकी शक्तियों की प्राप्ति में सक्षम हो जाता है, इसी प्रकार सभी राग किसी न किसी चक्र को स्पंदित करते ही हैं.
लेकिन क्या, संगीत सिर्फ कुण्डलिनी जागरण के लिए ही हैं  ? नहीं. संगीत की शक्ति से तानसेन ने दीपक राग का प्रयोग कर जहा दीपको को प्रज्वलित कर दिया था वही बैजू बावरे ने संगीत के एक विशेष राग का प्रयोग कर पत्थर को पिघलाकर उसमे अपना तानपुरा दाल दिया था और राग बंद कर दिया था जिससे की वो तानपुरा उस पिघले हुए पत्थर में ही जम गया था. ये सब तो कुछ उदाहरण मात्र हैं संगीत भी अपने आप में एक पूर्ण तंत्र हे. ब्रम्हांड के सभी पदार्थ ५ तत्व से ही निर्मित हैं . संगीत के सप्त सुर इन ५ तत्वों का प्रतिनिधित्व करते हैं . संगीत से किसी विशेष सुर या राग के माध्यम से हम अपना वायु तत्व बढ़ाले और भूमि एवं जल तत्व को कम करदे तो मनुष्य अद्रश्य एवं वायुगमन सिद्धि प्राप्त कर लेता हैं .. यदि साधक सही तरीके से संगीत का प्रयोग करे तो   बाह्य चीजों पर यही प्रयोग करने पर वह भी अद्रश्य हो जाएगा. या फिर उसके तत्वों के साथ संयोग करके तत्वों को बदल ने पर उसका परिवर्तन भी संभव हैं . या फिर संगीत के माध्यम से हवा में ही सबंधित कोई भी वस्तु के तत्वों को संयोजित कर के उसे कुछ ही क्षणों में प्राप्त किया जा सकता हैं . वास्तव में ही संगीत मात्र मनोरंजन नहीं हैं , हमारे ऋषि मुनि अत्यंत ही उच्चकोटि के वैज्ञानिक थे मगर हमने  समझने की कभी कोशिश नहीं की हैं
Since ancient time, human being’s relation has remained with music, human used music as a medium to express the feelings. In the ancient time, it was not just a medium for entertainment. Many of our ancient sages were accomplished in music and today even many high spiritual level attended yogis are accomplished in music. Have we thought once even that the one who remain in joy of god realization, what is the need to them of this outer entertainment?
It can not be said that what do we understand by music today but in ancient time it was medium of spirituality. With the help of music, many people attained totality. There are several examples in front of us like Meerabai and Narsinh to name few. Then what the difference is this?
In true term we have never understood music, Sadgurudev used to say that the hum of the insect is even a music which if applied to hear daily, the human can gain thoughtless mind. For general humans music must be based on entertaining point of view but for yogis it has deep definitions.
The  importance of sound is accepted widely and specific sound creates specific energy. The Saptak of music Sa, Re Ga Ma Pa Dha Ni are not just words. To just give name and pronunciations anything could had been given but  Sa, Re Ga Ma Pa Dha Ni has a deep meaning. With a special rhythm if one specific sound is applied to incorporate, then it creates vibration on specific chakras of the body.
All Sapt Sur are representative of elements and every Sur (tone) hold a command over one element in which Sa- Earth , Re and Ga – Water, Ma Pa – Fire, Dha – Air and Ni – Eather.
The way we have 7 tones, we even have 7 voice force from which a sound could be made. These are head, nose, throat, lungs, navel, Abdomen and groin, if we watch carefully, these all places are very close to 7 chakras. This way, in relation to Kundalini 7 tone can vibrate chakras in Sangeet tanra.
Sa – Muladhar ( Earth element, sound generation – groin)
Re – Swadhisthan ( Water element, Sound generation - Abdomen
Ga – Manipur ( Water element, Sound generation – Nevel
Ma – Anahat ( Fire element, Sound generation – Lungs)
Pa- Visuddh (Fire element, Sound generation – Throat)
Dha – Agya (Air element, sound generation – nose)
Ni – Sahashtrar (Eather element, Sound Generation – Head

If these tones are generated with related sound then the specific starts awaking and they start having many mysterious experiences. But this is Chakra Jagaran and not Chakra bhedan.
That’s why many Raga’s were meant, in which with the help of sounds, specific Raga is made which can completely open Chakras.
For example, with the help of Malkosh Raga, Visuddh chakra can be awaken, same way daily exercise of Kalyan raga even helps in vibrating Visuddh chakra. And one this chakra is activated, then sadhak can realize the etmoshperic waves and can convert them into sound but Ragas like Kalyan have to be sung into evening only means quick after sun set. With the help of Nand Raga Muladhar gets activated. And one can understand the Vedas completely only when the Muladhar is active completely. This Raga should be sung in 2nd phase of night. The That Bilabal Raaga Devgiri can active Anahat Chakra and then one can hear Anhad Naad & owns every accomplishment related to it, this way every Raga gives effect to vibrate and open specific chakra.
But is it that music can only activate kundalini? No. With the power of music, Singing Deepak Raga; Tansen lighten a lamp. Baiju Bawara on other hand sung a specific raga and melted a Stone, he threw his music instrument TanPura into that and when he stopped the Tanpura was inside the solidified liquid of stone. These are just few examples, Music is also complete Tantra. Everything in this universe is made of five basic elements. The 7 tones of music can control these five elements. If with the help of specific tone or Raga, if we increase our Air element and lessen our Earth and Water element, one can have power to fly in sky and can have power to get invisible. And if this also applied outer side on anything, that will even becomes invible. Or else it is incorporated with on elements of any specific item and elements are subjected to change, in this condition the whole substance changes. Or with the help of music one can gather elements in the air and can make anything out of this word in few moments. Truly our ancient sages were scientist but we were never bothered to understand.
****NPRU****

2 comments:

Srinath said...

It is very nice to know about relation between Ragas and Chakras.

Be kind enough to provide Ragas for each chakra. Give it for all chakras from Mooladhara to Sahasraar

Srinath said...

It is very informative to know the relationship between Ragas and Chakras.

Please give Ragas to each chakra from Mooladhara to Sahasraar