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Sunday, May 6, 2012

AAVAHAN-30


सिद्धयोगी ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा की जेसा की में कह चूका हू उनके मूल शरीर में वापस आते ही उनमे पूर्व बोध और संस्कार कुछ अंश में वापस आ जाते हैये जिव की भोग प्रवृति ज्यादा होती है अतः ये किसी भी जिव को अपने भोग से सबंधित इछाओ और तृष्णाओ के लिए वचनबद्ध कर लेती हैइसके बाद उनसे कई प्रकार के उपभोग ये प्राप्त कर लेती है. क्यों की ये योनिया भी अपनी सिद्धियो का इस्तेमाल मूल रूप से व्यक्ति की विरोधइच्छा पर नहीं कर सकती है इस लिए ज़रुरी यह होता है की वह सामने वाले व्यक्ति को किसी न किसी रूप में ऋणी बना कर बाध्य कर ले. इसी लिए कई बार ये जिव सामने वाले जिव से वचन ले ले लेते हैवचनबद्ध हो जाने पर जिव के लिए कार्मिक नियमों के अनुसार यह आवश्यक हो जाता है की वह वचन का पालन करे और अगर व्यक्ति अपने वचन का पालन नहीं करता है तो यह जिव अपनी शक्ति का इस्तेमाल तब कर सकता है क्यों की व्यक्ति कर्मो के सिद्धांत के अनुसार बध्ध है. एसी स्थिति में वह श्राप देने से भी नहीं चुकते. अगर तुम उस समय वचनबद्ध हो गए होते तो तुम्हारे लिए यह ज़रुरी था की वह जो भी इच्छा प्रकट करे उसकी पूर्ती करो. इनकी इच्छा भोगजन्य होती है लेकिन तंत्र साधको की इच्छाओ के बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकताऐसा भी हो सकता था की वह तुम्हारे पास से कोई साधना मांग ले या ऐसा भी की तुम्हारे पास से वह तुम्हारी साधनात्मक उर्जा को मांग ले जो सिंचित की गई हैएसी स्थिति में वह सारी उर्जा को साधक से खिंच कर अपने पास लेने से नहीं कतराते और असीम सिद्धियो के स्वामी बन जाते है हालाकि इसका परिणाम भयंकर ही होता है लेकिन सिद्धि के मद और लालच में एसी भयंकर भूल होती हैसाथ ही साथ अगर तुम ऐसा नहीं करते तो तुम श्राप के हकदार होते इसी लिए तुम्हारा अनुभव उसी समय समाप्त कर दिया गया था. साधको को हमेशा वचन देने में ध्यान रखना चाहिएसत्य का उच्चारण और उसी के अनुरूप साधक का आचरण हो ये ज़रुरी है, साधक अपने ह्रदय में जितना भी मेल और मलेछ रहता हैउतना ही उसकी श्रापबध्ध होने की संभावना बढ़ जाती है और एसी स्थिति में साधक के ऊपर विभ्भिन्न प्रकार की इतरयोनी हावी रहती है और अनिष्ट की संभावना बढती है. ये साधक के साधनात्मक जीवन की बात है इसे भौतिकता से नहीं जोड़ा जाता. मेने कहा की एक साधक को इसके अलावा कोन कोन सी एसी बात है जिसका ख्याल रखना चाहिए इतरलोक के सबंध में. सिद्ध ने मेरे प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा की जेसे की तुम्हे कहा जा चूका हैदेव योनी साधक के आतंरिक स्तर मात्र को देख कर उसकी तरफ आकर्षित होती हैसाधक का चित जितना विशुद्ध होगा साधक के लिए देव योनी से संपर्क स्थापित करने में उतना ही सफल हो पाएगा. इसके लिए साधक एक तांत्रिक मंत्र है जो की महासिद्ध गोरखनाथ प्रणित हैइस मंत्र का जाप अगर व्यक्ति रात्री काल १० बजे के बाद में या ब्रम्ह मुहूर्त में एक माला नित्य करे तो उसमे इस प्रकार का परिवर्तन आने लगता है,यह मंत्र में दिशा उत्तर रहे तथा साधक के वस्त्र और आसान कोई भी रहेसाधक कोई भी माला से इसका जाप कर सकता है, “ॐ नमो नारायणाय सिद्ध गुरु को आदेश आदेश आदेश ”.  इस में दिन की संख्या नहीं हैसाधक को इसे करते रहना चाहिए और अगर साधक इसे नियमित नहीं रख सके तो भी कोई दोष नहीं लगताइस प्रकार योगतंत्र जगत में नए साधको के लिए यह मन्त्र वरदान का काम करता है. इसके अलावा एक तंत्र साधक को अपने मन में चल रहे विचारों पर हमेशा ये ध्यान रखना चाहिए की उसका यह विचार उसका क्या नूतन ज्ञान दे सकता हैइस प्रकार साधक का चिंतन सदैव ही साधनामय बना रहता है और जितना ही साधक का चिंतन साधनामय बना रहेगा साधक को साधना की प्रक्रिया के लिए भी उतनी ही मजबूत पृष्ठभूमि प्राप्त होगी. कई साधक साधना नहीं कर पाते है लेकिन उनका चिंतन बराबर साधनात्मक ही रहता हैएसी स्थिति में अगर वो शुद्ध भाव से और ज्ञान तत्व तथा गुरु तत्व के प्राप्ति के लिए साधनात्मक चिंतन भी करता है तो स्वः लोक के सिद्ध उसको साधना की प्रक्रिया की और गतिशील करने के लिए तैयार करते हैसाधक को लगेगा की स्वतः ही एसी परिस्थितियो का निर्माण हो गया है की उसको साधना की प्रक्रिया करने के लिए एक सुविधापूर्ण माहोल मिल गया है लेकिन इसके मूल में दिव्यसिद्ध होते है इस लिए जो मन से साधना करना चाहता हो उसे एक समय पे मौका मिल ही जाता है किसी न किसी रूप में. अतः निराश होने का कोई कारण नहीं हैवैसे भी अगर साधक सही में साधक ही है तो उसके मूल तत्व की खोज के लिए उसका अंतर्मन उसे हमेशा आकर्षित करता ही रहेगा. मेने पूछा की साधको के मन में यह जिज्ञासा बराबर रहती है की उसे साधना के क्षेत्र की और अग्रसर होना चाहिए जिससे उसे त्वरित सफलता मिले. महासिद्ध ने इस प्रश्न का जो उत्तर दिया उसे सुन कर मन को एक नूतन ही बोध मिला.
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Siddh yogi continued with his talks and told that as I have earlier told you that upon coming to their basic body, their consciousness about the past and sanskars come back in some portion .These creature have more tendency towards enjoyment therefore they take commitment from other creatures regarding their enjoyment-related desires. After that, they attain many means of enjoyment from them. These yonis basically can’t use their siddhis against the person’s opposition. Therefore it is needed for them to compel the person by making him debt-ridden in one form or the other. That’s why sometimes they take promise from the creature. After being committed, it becomes necessary for the creature according to the rules of Karma that he fulfills the promise. If the person does not fulfill the promise then this creature can use powers because that person is committed as per the principles of karma. In this condition, they don’t even hesitate to give curse. If you would have become committed that time then it would have been necessary for you to fulfill desires which she would have expressed. Their desires are for enjoyment but we can’t say anything about the desire of tantra sadhak. It could have happened that she could have demanded any sadhna from you or your sadhna’s energy which you have gathered. In this situation, they do not hesitate to pull all the energy from sadhak towards themselves and become the master of infinite siddhis. However the result is always disastrous but such type of blunders do happen in the greed of siddhi. To add to that, if you would not have done as she would have told you, you would have become eligible for curse. Therefore your experience was ended there and then. Sadhak should always be cautious while giving any promise. Telling the truth and its matching behavior is necessary for sadhak. More the impurities in sadhak’s heart more are the possibility of sadhak to be cursed. In such a condition, various ittar yonisdominate over the sadhak and possibility of disaster increases. These all pertains to the spiritual life of sadhak; it cannot be connected to materialistic life. I asked what all other things should sadhak bear in mind in relation to Ittar Lok. Siddh told, answering my question that as I have earlier told you that Dev yoni is attracted towards sadhak by merely looking at his internal level. The more pure the sadhak’s heart is, more successful he will be in establishing a contact with Dev Yoni.For this there is one tantrik mantra given by Maha Siddh Gorakhnath .If sadhak chants 1 rosary of this mantra in night after 10 P.M or in Brahm Muhurat, then such type of change starts taking place in sadhak. Direction should be north .Dress and aasan of sadhak can be of any colour.Sadhak can use any rosary. Mantra is ॐ नमो नारायणाय सिद्ध गुरु को आदेश आदेश आदेश ”.(Om Namo Naarayanaay Siddh Guru Ko Aadesh Aadesh Aadesh.Number of days are notfixed. Sadhak should keep on doing it.If sadhak is not able to do regularly; it does not harm him. In this way, this mantra is boon for all the new sadhak of Yog-Tantra. Besides this, tantra sadhak should pay attention to the thoughts going in his mind and see what novel knowledge could be provided by thesethoughts. In this manner, sadhak’ thinking always remain sadhna-centric and more sadhna-centric sadhak’s thinking will be, strong background he will get for his sadhna process. Some sadhaks are unable to do sadhna but their thinking continuously remains sadhna-centric. In such a condition, if he does sadhna-centric pondering about attainment of knowledge element and Guru Element with pure heart then siddhs of Swah lok prepares him for sadhna process. Sadhak will feel that automatically situation has been created whereby he is getting conducive environment for doing sadhna. However Divine siddhs lie in the root of this fact. Those who want to do really do sadhnas; they definitely get a chance to do so at one point of time in one form or the other. Therefore, there is no reason to get disappointed. If sadhak is truly a sadhak then his subconscious mind will keep on attracting him towards the discovery of basic element. I asked that curiosity remains continuously in the minds of sadhak that he should move on the sadhna path so that he can get quick success. The answer which Maha Siddh gave to my question, gave novel knowledge to me.  

                                                                                               
 ****NPRU****   
                                                           
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