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Thursday, May 17, 2012

पूर्ण वैभव प्राप्ति प्रयोग- POORN VAIBHAV PRAPTI PRAYOG


जीवन में पूर्ण वैभववान बनना हर एक व्यक्ति का स्वप्न होता है. हर एक व्यक्ति एक उत्तम जीवन की आशा में जीता है और सदैव प्रयत्नशील रहता है की उसे किसी प्रकार से उत्तम और श्रेष्ठ जीवन की प्राप्ति हो. जीवन के हर एक क्षेत्र में वह पूर्ण विजय को प्राप्त करे और इसके साथ साथ वह उत्तम कार्यों को सम्प्पन कर अपने तथा अपने परिवार और कुल का गौरव और बढाए. वैभव का अर्थ पूर्ण आकांशाओ और भौतिक महत्वपूर्णता की प्राप्ति से है. अपने जीवन काल में व्यक्ति को कई सामजिक कार्यों का निर्वाह करने का उत्तरदायित्व स्वीकार करने की इच्छा होती है. इसके साथ ही साथ वह यह भी चाहता है की वह तथा उसका परिवार पूर्ण रूप से सुख का उपभोग करे. इसके अलावा समाज के विकास के लिए भी कार्य करे. लेकिन यह सब कार्य इतना सहज नहीं हो पता. जीवन में धन की प्राप्ति आवश्यक है साथ ही साथ वह धन का योग्य स्त्रोत से प्राप्त हो यह भी आवश्यक है. इसी के साथ उस धन का हम पूर्ण रूप से उपभोग कर सके. हमारी कीर्ति कायम रहे तथा हमारे प्रयत्नों में हमें सफलता मिले. इसके अलावा हमारे सभी कार्यों से हमारे तथा हमारे परिवार का गौरव बढे. लेकिन यह सहज नहीं हो पता है. वस्तुतः कोई व्यक्ति धन की समस्या से पीड़ित है तो कोई उस धन के योग्य उपभोग की. किसी को धन का स्थायी स्त्रोत नहीं मिलता तो कही पर परिवार में धन को ले कर क्लेश होता है. इन सब उल्जनो में व्यक्ति अपने मूल चिंतन से दूर होने लगता है, ये सब विसंगिता उसको अपनी महत्वता और जीवन निर्वाह के उत्तम चिन्तनो को दूर कर एक बोजिल जीवन जीने के लिए बाध्य कर देती है. एसी स्थिति में व्यक्ति का जीवन विविध कष्टों के आवरण में ढक जाता है. वस्तुतः इस प्रकार की परिस्थिति से साधक को बचना चाहिए तथा बाहर निकालना चाहिए. साधक को पूर्वजो की साधना पध्धातियो को अपना कर एसी परिस्थिति में साधनात्मक चिंतन संग उस समस्या का समाधान की खोज करनी चाहिए. वैभव प्राप्ति सबंधित प्रयोग से साधक की इन सभी समस्याओ का निराकरण होता है. साधक को धन, उसका योग्य स्त्रोत, धन की उपभोगता तथा कीर्ति और यश की प्राप्ति का अर्थ ही यहाँ पर वैभव का अर्थ है. साधक इस प्रकार का प्रयोग सम्प्पन कर अपनी एसी समस्याओ से मुक्ति की प्राप्ति कर सकता है. ऐसे कई प्रयोग गुरु मुखी परम्पराओ से चले आ रहे है जिसको करने पर साधक निश्चित रूप से वैभव की प्राप्ति कर लेता है. ऐसा ही एक प्रयोग भगवान वक्रतुंड से सबंधित है. भगवान गणेश पूर्ण रिद्धि और सिद्धि देने में समर्थ है और इनके सभी रूप अपने आप में महत्वपूर्ण है. प्रस्तुत प्रयोग उनके वक्रतुंड स्वरुप से सबंधित है और तीव्र है. प्रयोग को श्रद्धा और विश्वास के साथ इस प्रयोग को सम्प्पन करने पर निश्चित रूप से पूर्ण वैभव की प्राप्ति साधक को भगवान वक्रतुंड की कृपा से होती ही है.
यह प्रयोग ११ दिन का है. साधक इस प्रयोग को किसी भी शुभदिन से शुरू कर सकता है. साधना समय रात्रि काल में १० बजे के बाद का रहे.
इस प्रयोग में दिशा उत्तर रहे. साधक के आसान तथा वस्त्र लाल रहे. साधक को अपने सामने पहले भोजपत्र पर दिए हुए यन्त्र को कुमकुम की स्याही से अनार अथवा चांदी की सलाका से बनाना चाहिए. यन्त्र बन जाने पर उसका सामान्य पूजन करे. इसके बाद उसी यन्त्र पर ध्यान केंद्रित करते हुए ११ बार ध्यान मंत्र को करे.
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ निर्विघ्नं कुरुमे देव सर्व कार्येषु सर्वदा
इसके बाद साधक को निम्न लिखित मंत्र की ११ माला जाप उसी यन्त्र को देखते हुए करना है. इसमें मूंगा की माला का उपयोग हो. अगर मूंगा की माला उपलब्ध ना हो तो रुद्राक्ष की माला ली जा सकती है.
श्रीं वक्रतुण्डाय हूं
यह मंत्र दिखने में भले ही छोटा हो लेकिन यह मंत्र भौतिक क्षेत्र में सफलता प्राप्ति के लिए बेजोड है.
जब ११ वे दिन साधक मंत्र जाप कर ले तो उसी रात्री में साधक को इसी मंत्र से शहद की १०१ आहुति अग्नि में समर्पित करनी चाहिए. इसके बाद साधक दूसरे दिन यन्त्र को अपने पूजा स्थान में रख दे और उसको धुप दीप देते रहे. संभव हो तो उसके सामने यह मंत्र का ११ बार उच्चारण सुबह या शाम को करना चाहिए. साधक को मात्र कुछ ही दिनों में अपने जीवन में पूर्ण अनुकूलता की प्राप्ति होगी. साधक माला को विसर्जित कर दे. इस साधना में साधक को पूजन में लाल पुष्पों का उपयोग करना चाहिए तथा मंत्र जाप से पहले कुछ भोग लगाना चाहिए जिसको मंत्र जाप पूर्ण होने पर साधक को प्रसाद रूप में ग्रहण करना चाहिए.
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It is dream of everyone to become prosperous. All the people lives with the hope for better life and remains always active to acquire great life. One also wish for complete success in all the faces of the life and with that by accomplishing good tasks to increase proud of the family. Meaning of Vaibhava here means to fulfil the wishes and important aspects of living. In the whole life time, individuals also own their wish to do the social works and take the responsibility of the social tasks. With that, everyone also wants that happiness to be completely remained with self and family.  And with this, one also wants to contribute in betterment of the society. But these all things are not easy to achieve. It is essential to acquire wealth; with that also an important point is the acquired wealth should be from the proper source. With this, we should be completely able to use the wealth. Our repute should remain established and we should get success in our efforts. Apart from these, with our task our reputation should be increase and pride of the family should rise. But this is not so easily achievable. Many faces trouble in term of gaining money on other hand many suffers from proper use of the wealth. Many do not receive permanent source of the money or somewhere there is distress in family because of the wealth. In all these troubles, one becomes far from own thinking, these all problems lead the person far from his high thinking and importance to spend life and forces to live troubled life. In such situation person’s life gets covered in various troubles. One should save them self from such situations and come out of it. Sadhak should search for solution by adopting our ancient methods of sadhana with sadhana oriented mentality. With processes related to gain Vaibhava are solutions for all these troubles. Vaibhava here means gaining wealth, proper source of wealth, proper usage of the wealth and pride. By accomplishing such prayoga sadhaka gets relief from the troubles. Such many rituals remained active through guru disciple’s relationship by accomplishing which, sadhak without any doubts receives vaibhava or prosperity. One of such prayoga is related to god Vakratunda. Lords Ganesha can grant complete Riddhi and Siddhi (prosperity and accomplishment) and his all forms are very important. The prayoga given here is related with his Vakratunda form and it is very quick. By attempting this prayoga with faith and devotion one will for sure receives complete prosperity with the blessings of lord Vakratunda.

This is 11 days prayoga. Sadhak can start this prayoga from any auspicious day. Time should be after 10 in the night.

Direction in this ritual should be north. Cloths and aasana of the sadhaka should be Red in color. Sadhak should first prepare given yantra on Bhojpatr with ink of red vermillion (kumkum) and with pen made of silver or stick of pomegranate. When yantra is prepared one should do normal poojan of the same. After that one should chant 11 times meditative mantra concentrating on the yantra.

Vakratund Mahaakaay suryakoti Samaprabh nirvighanm Kurumedev Sarvkaaryeshu Sarvadaa.

After that sadhak should chant 11 rosaries of the given mantra looking at the yantra. In this ritual Moonga rosary is used. If Moonga rosary is not available, one may take rudraksh rosary.

Shreem Vakratundaay Hoom

This mantra might look small but it is incomparable when it comes to achieve success in the material world.

When on 11th day mantra chanting is completed; one should offer 101 aahutis of honey in the fire with the same mantra. After that on next day sadhak should place yantra in the poojan place and one should light lamp and dhoop. If possible one should even chant this mantra 11 times in front of yantra in the morning or evening. Sadhak will receive complete comfort in the life in few days. Rosary should be immersed. Sadhak should use red flowers during sadhana and one should offer some Bhog before mantra chanting starts and after mantra chanting is done, sadhak should have it in the form of prasada (offerings to the god)


 
   

                                                                                               
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