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Tuesday, May 22, 2012

Shakti rahashyam (secret of power) – शक्ति रहस्यम




साधना जगत की अद्भुत शक्तियों की खोज में ना जाने किन किन साधकों से मेरी मुलाकात हुयी....पर ये भी एक सबसे बड़ा सत्य रहा है की,जिस दिन से सदगुरुदेव ने मेरा हाथ अपने हाथों में पकड़ा था.... बस प्रति क्षण अभय और निश्चिन्तता ही अनुभव होती थी..... हर पर अनोखा सुकून मानों आत्मा को महसूस होता रहता था. जिस भी जिज्ञासा की मन के जल में उत्पत्ति होती...उसी क्षण जैसे वो हौले से उसे शांत कर के ये अहसास दे देते कि  “अरे तू तो मेरा ही है,इतना व्यथित क्यूँ होता है.... याद रख जब भी तेरे मन को कोई प्रश्न अपनी चुभन से व्यथित करेगी....तब तब मैं उसका समाधान उसी मन से निचोड़ कर निकाल कर तुझे दे दूँगा....उसी मन से जहाँ मैं चिरकाल से सदा सदा के लिए अपने प्रत्येक शिष्य के ह्रदय में विराजमान हूँ.और ऐसा आजन्म होगा और प्रत्येक शिष्य के लिए होगा...यह निखिल वाणी है”
   बस तबसे कोई चिंता ही नहीं रही मन में .
जब भी मेरे मन के सरोवर में कही से जिज्ञासा का पत्थर गिरता और उसमे लहरे उत्पन्न होती या मन कि शांति भंग होती...तब तब सदगुरुदेव अपनी अमृतवाणी से या तो स्वयं या फिर उनका कोई ज्ञानांश सन्यासी या गृहस्थ शिष्य आगे बढ़ कर उन तरंगित लहरों को अपने उत्तरों से शांत कर देता .और एक बात मैं आपको जरुर बता देना चाहता हूँ कि जब भी किसी ज्ञान कि चाह में मैं कही गया तो उस साधक का व्यव्हार मेरे लिए पूर्ण अनुकूल रहा है और उसने ये अवश्य कर स्वीकार कि उसे पहले ही बता दिया गया था कि यहाँ तुम्हारा आना सदगुरुदेव ने पूर्वनियोजित किया हुआ था .और ऐसा  प्रत्येक शिष्य के लिए उन्होंने निर्धारित किया हुआ है...किसे कब देना है ,क्या देना है....ये पहले से उन्होंने तय कर दिया है .
यात्रा के उसी काल में मेरी मुलाकात सदगुरुदेव के पूर्ण शाक्त शिष्य कौल मणि शिवयोगत्रयांनद से मुलाकात हुयी . सदगुरुदेव कि आज्ञा से उन्होंने विंध्यवासिनी के परम पावन पीठ को अपनी साधनाओं के लिए चुना था . वो उसी पर्वत कि एक अत्यधिक गुप्त गुफा में आज भी साधनारत हैं . और उसी गुफा में मेरी उनसे मुलाकात हुयी और दर्शनों का सौभाग्य प्राप्त हुआ .
थोड़े ही समय बाद मैंने मानो प्रश्नों कि बौछार कर दी थी उन पर ,और वो उतने ही शांत भाव से मंद स्मित होकर मुझे उत्तर देते रहे और रहस्यों कि नवीन परतों को उधेड़ते रहे .(उन्होंने सैकडो प्रश्नों के उत्तर दिए थे,परन्तु इस विशेषांक में विषय वस्तु पर आधारित जो प्रश्न हैं ,मैं मात्र उनमे से कुछ को ही यहाँ दे रहा हूँ...जिससे विषय को समझना अपेक्षाकृत आसान रहेगा)
शक्ति क्या है,इसके कितने रूप होते हैं ???
सरल शब्दों में यही कहा जा सकता है कि सम्पूर्ण ब्रम्हांड मात्र जिसकी कल्पना से साकार हो गया हो और जिसके प्रभाव से प्रकृति सृजन, पालन और संहार कर्म में जुटी हुयी हो ,उसी चिन्मयी परात्पर ज्योति को शक्ति कहा  जाता है . ये किसी भी रूप में हो सकती है. इसका प्रभाव सभी पर होता है फिर चाहे वो चेतन हो या अचेतन.प्रकट रूप में हम जिन्हें शक्ति देने का उर्जा देने का या फिर बल देने का स्रोत मानते हो,वे सभी भी इसी परा शक्ति से ही शक्ति प्राप्त करते हैं .ये परा शक्ति  स्थूल, सूक्ष्म या किसी भी रूप में हो सकती है .
   ये सभी प्राणियों में विद्यमान है , इसी के कारण हम सृजन तथा अन्य कर्म सम्पादित कर पाते हैं. और विचारों की  उत्पत्ति का मूल भी यही शक्ति है .
इसके कितने प्रकार होते हैं ?
भावगत्ता के आधार पर गुणों की तीन ही स्थितियां होती हैं-
सत्
रज
तम
ठीक इन्ही गुणों के आधार पर तीन क्रियाएँ सृजन ,पोषण और विध्वंश होती है . और इन क्रियाओं को शक्ति के तीन आधारभूत शक्तिमान(जिनके द्वारा शक्ति अपने कार्यों को सम्पादित करती हैं) संपन्न करते हैं . याद रखने योग्य तथ्य ये है की जिस प्रकार गुणों के तीन प्रकार होते हैं, ठीक उसी प्रकार इन गुणों की अधिष्ठात्री तीन मूल अधिष्ठात्री शक्तियां होती हैं.
महाकाली – तम
महालक्ष्मी – रज
महासरस्वती – सत्
ऊपर जब बात मैंने शक्तिमानों की कही तो उसका अर्थ यही होता है की शक्ति तथा शक्तिमानों में कोई भेद नहीं होता है , ये एक दुसरे से प्रथक नहीं किये जा सकते है, शक्तिमान इन्ही शक्तियों की प्रेरणा से अपने अपने कार्यों का सञ्चालन करते हैं. जैसे महाकाल शिव संहार का, विष्णु पालन का और ब्रम्हा सृष्टि के सृजन का. एक प्रकार से ये समझ लो की सृष्टि का कोई भी कार्य या कण निरर्थक नहीं है. प्रत्येक क्रिया या व्याप्त प्रत्येक कण पूर्ण शक्ति युक्त होता है.
    शक्ति की व्याख्या के क्रम में ये भी समझना अत्यधिक उपयोगी होगा की मानव अपना विकास कर देव स्तर तक पहुच सकता है और अपने अभीष्ट को प्राप्त करता हुआ अपने अस्तित्व को सार्थक कर सकता है. और ये स्थितियां तभी साध्य हो पाती है जब आप परिष्कृत रूप से निम्न सात शक्तियों  को सदा सर्वदा के लिए पूर्ण संकल्पित होकर अपना व्यक्तित्व बना लेते हो. और यदि पूर्णता के साथ निम्न सात शक्तियां  आपको परिष्कृत अवस्था में प्राप्त हो गयी तो कुछ भी असाध्य नहीं रह जाता है .
प्रज्ञा शक्ति   
चेतना  शक्ति 
वाक् शक्ति 
क्रिया शक्ति
विचार शक्ति
इच्छा शक्ति
संकल्प शक्ति
   ये उपरोक्त तीनों मूल शक्तियों के ही परिवर्तित रूप है.
क्या इनके अतिरिक्त कोई और शक्ति नहीं है जिसकी अनिवार्यता मानव जीवन में प्रकृति द्वारा नियोजित की गयी हो ????
है क्यों नहीं.... काम शक्ति की अनिवार्यता सर्वोपरि है . जीवन में परिपूर्णता काम भाव से ही आती है. सृजन के मूल में यही भाव विद्यमान है तभी तो वेद भी काम को देवता कहते हैं . काम का मूल गुण आकर्षण है ... जो विद्वान होते हैं वे काम को इच्छा शक्ति का ही पर्याय मानते हैं . तंत्र तो यहाँ तक कहता है की सृष्टि में जितने भी प्रकार की ऐषणायें हैं,उनके मूल में यही काम शक्ति ही है. इस लिए ये सम्पूर्ण विश्व उसी परमशक्ति की इच्छा या काम भाव का ही विस्तार कहलाती है.
   जीवन के सारे चैत ,सामाजिक और वैषयिक नियमों के मूल में काम भाव ही होता है.
    परमात्मा से लेकर आत्मा तक के जितने भी सम्बन्ध होते हैं वे सब आकर्षण,काम और मैथुन(योग) से ही युक्त होते हैं. किसी भी प्रकार की परिस्थिति में किसी भी प्रकार के सम्भोग में फिर वो चाहे आत्मिक हो या बाह्यगत, वो आदिशक्ति ही काम शक्ति के रूप में परिणत होती है कार्य करती है.
भला ये कैसे माना जाये की सभी कार्यों के पीछे यही कामशक्ति कार्य करती है ... सृजन तो समझ में आता है की इसी काम भाव से उत्प्रेरित है,परन्तु भला संहार से इस काम भाव का क्या लेना देना ???
  इसे ऐसा समझा जा सकता है की यदि आप किसी के आकर्षण में बांध जाते हैं और आगे जाकर प्रेम करने लगते हैं तब भी तो आप एक समय बाद उसकी अपने से प्रथकता सहन नहीं कर पाते हैं तब आप क्या करते हैं... उसे आत्म एकाकार करने की कोशिश करते हैं . ऐसे में या तो आप उसमे विलीन होने की चेष्ठा करते हैं या उसे अपने में मिलाने की. भूख समाप्त करने की आपकी लालसा या इच्छा भोजन के प्रति आपको आकर्षित करती है... अब ऐसे में उस भोजन का जो थोड़ी देर पहले तक अपना अलग अस्तित्व था... आपके भोजन के प्रति आकर्षण के कारण,उस भोजन की सत्ता का ही अंत कर देता है. ये नियम प्रत्येक प्राणी पर समानान्तर रूप से कार्य करता है.  परमात्मा से ही अंश प्राप्त कर आत्मा मनुष्य शरीर धारण करती है इस क्रम में मनुष्य जन्म लेता है, जीवन के सुखों का उपभोग करता है और आखिर में एक समय बाद मृत्यु उसका वरण कर उस आत्मा को पुनः परमात्मा की तरफ गतिशील कर देती है तो क्या इसके मूल में परमात्मा की काम शक्ति कार्य नहीं करती है जो की वो अपने अंश का विलीनीकरण अपने में कर के संपन्न करता है.  क्या यहाँ पर सृजन हुआ ..... नहीं ना..... लेकिन लौकिक  दृष्टि से ये संहार भी सृजन की तरफ एक कदम ही तो है. आप किसी से जब प्रेम करने लगते हैं तो तीव्र आकर्षण के कारण उससे सम्भोग करने की तीव्र लालसा को आप क्या कहेंगे ..... क्या वो मात्र इन्द्रिय लोलुपता है ,नहीं... उसके मूल में भी आपकी अपने प्रेम या अभीष्ट से प्रथक ना रह पाने की चरम लालसा ही तो है जो की उसके अस्तित्व का योग अपने अस्तित्व से करवाने के लिए उत्पन्न होती है. तब वह दो हो ही नहीं सकते ..... रह जाते हैं तो मात्र एक ही. ये अलग बात है की एक साधक ,एक शिष्य ,एक योगी इस भेद को आत्म एकाकार क्रम अपना कर दूर करता है और सामान्य अवस्था में सामान्य मनुष्य शरीर का योग कराकर. परन्तु तंत्र शरीर से ऊपर उठ कर आत्म योग की बात करता है इसी काम शक्ति का सहयोग लेकर. इस प्रकार ये काम शक्ति उसी आदिशक्ति का ही तो रूप होती है जिसके वशीभूत होकर वो तम,रज और सत् गुणों का पालन भिन्न भिन्न रूप में करती है.
तांत्रिक दृष्टि से तम,रज और सत् गुणों की अधिष्ठात्री शक्ति महाकाली,महालक्ष्मी और महा सरस्वती को ही क्यूँ माना जाता है,क्या ऐसा नहीं हो सकता है की महालक्ष्मी रज के बजाय तम गुणों का प्रतिनिधित्व करे ???
नहीं ऐसा नहीं हो सकता है... सृष्टि के आरंभ में जब सृजन भी नहीं होता है,पालन भी नहीं होता है.तब ऐसे में मात्र पूर्ण अन्धकार ही होता है ...जब मात्र महानिद्रा की उपस्थिति ही अपने पूर्ण साकार या निराकार रूप में होती है.और ये तम तत्व ही महाकाल है...जिसके अधीनस्थ काल भी सदा भयभीत रहता है . एक बात उल्लेखनीय है की शरीर का विसर्जन काल के द्वारा सम्पादित होता है और आत्मा पर काल का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है, आत्मा सदैव काल से परे रहकर मात्र महाकाल द्वारा ही तिरोहित होती है. उसी महाकाल की शक्ति है महाकाली, जो संहार भाव की प्रणेता है . ये शक्ति प्रलयनिशा के मध्य काल से सम्बन्ध रखती है ,इसी की उपस्थिति से ये संसार शिववत बनकर साकार है , जैसे ही इनका लोप होता है ,शिव को शव बनने में एक क्षण नहीं लगता है,चूँकि ये प्रलयनिशा अर्थात रात्रि से सम्बंधित हैं और है इनका सम्बन्ध मध्य काल से तब ऐसे में ये जहा तम को दर्शाती हैं वही ये संक्रांत रूप में अपने अंदर रज अर्थात पालन-पोषण और सत् अर्थात सृजन के गुणों को भी रखती हैं. परन्तु महालक्ष्मी तम भाव से प्रेरित नहीं है  और न ही महा सरस्वती ही रज से सम्बंधित हैं. इसलिए संहार का गुण तो कदापि इनमे नहीं हो सकता है. हाँ ये अलग बात है की महाविद्या रूप में ये जब अपना योग तम से कर लेती हैं तो ये संहार भी कर सकती हैं.
आपने महाविद्याओं की बात कही है ,तो क्या सारी महाविद्याएं इन्ही तीन मूल शक्तियों का रूप होती हैं,क्या पंचमहाभूत तत्वों से इनका कोई लेना देना नहीं होता है ????
नहीं ऐसा नहीं है ,जब हम आदि शक्ति की बात करते हैं तो उसका अर्थ बहुत विराट होता है,आदि शक्ति से मेरा मतलब राजराजेश्वरी षोडशी त्रिपुर सुंदरीसे है, उन्ही के तीन गुणों की अधिष्ठात्री वे तीनों महा शक्ति हैं. वैसे श्रीकुल की मूल महा विद्या षोडशी त्रिपुर सुन्दरी को माना जाता है. परन्तु उनका मंत्र और यन्त्र महाविद्या रूप में भिन्न ही होता है ,और जब वे आदि पराशक्ति राज राजेश्वरी होती हैं तो उनका मूल यन्त्र श्री चक्र या श्री यंत्र ही होता है जो की इस ब्रम्हांडीय रूप का ज्यामितीय रूप प्रदर्शित करता है,ऐसा रूप जो अकल्पनीय शक्तियों को प्रदर्शित करता हो.
   रही बात पंचमहाभूतों की तो प्रत्येक तत्व २ महाविद्याओं का प्रतिनिधि है ,और इस प्रकार ५२=१० होते हैं, इसमें भी ध्यान रखने वाली बात ये है की प्रत्येक तत्व के दो गुण होते हैं .
 उष्ण
 शीत
इसी प्रकार प्रत्येक तत्व की दो महाविद्याओं में से  एक महाविद्या उग्र भाव से युक्त होती हैं और दूसरी शांत प्रकृति से युक्त होंगी. जिस प्रकार उस पराशक्ति की शक्ति से ही सूर्य और चन्द्र दोनों प्रकाशित होते हैं, और सूर्य जहा उष्णता देता है वहीं चंद्रमा शीतलता देता है.लेकिन कितने आश्चर्य की बात है की सूर्य की उष्णता जहाँ मानव में ताप,तेज और तीव्रता लाती है, आत्मकेंद्रित होने के लिए हमें प्रेरित करती है,वही, चंद्रमा की शीतलता और प्रकाश हमारे मन को आह्लादित और काम भाव की तीव्रता से युक्त कर देती है.
    जीवन के प्रत्येक कर्म की अधिष्ठात्री कोई ना कोई विशेष शक्ति होती है.तंत्र में जितनी भी क्रियाएँ होती हैं वे सभी किसी खास शक्ति के अंतर्गत ही आती हैं,यही कारण है की बहुधा लोगो को जब इन कर्मों की अधिष्ठात्री शक्ति का ही ज्ञान नहीं होता है तो भला उनके द्वारा किये गए तांत्रिक कर्म कैसे सफल हो सकते हैं . अज्ञानतावश किया गया कैसा भी सरल से सरल प्रयोग इसी कारण सफल नहीं हो पाता है . इसलिए यदि क्रिया से सम्बंधित शक्ति का ज्ञान हो जाये तो ज्यादा उचित होता है.... जैसे –
वशीकरण – वाणी
स्तम्भन – रमा
विद्वेषण – ज्येष्ठा
उच्चाटन – दुर्गा
मारण – चंडी या काली
            के अंतर्गत आते हैं . इसी प्रकार तंत्र और उससे जुडी प्रत्येक क्रिया का यदि विधिवत प्रयोग किया जाये तो क्रिया से सम्बन्धी शक्ति पूर्ण सिद्धि देती ही है.
भला वो कैसे संभव है ?? क्यूंकि महाविद्या इत्यादि क्रम तो अत्यंत जटिल कहे गए हैं कोई बिरला ही इसमें सफलता पा सकता है, ठीक इसी प्रकार मैंने ये भी सुना है की दुर्गा सप्तशती एक तांत्रिक ग्रन्थ है , और मैंने ये भी सुना है की यदि सही तरीके से इसका पथ या प्रयोग किया जाये तो शक्ति के प्रत्यक्ष दर्शन संभव होते ही हैं, और वह कौन सी मूल क्रिया है जो सरल और सहज भाव से जीवन के चतुर्विध पुरुषार्थों की प्राप्ति करवाती ही  है ??
देखो ये तो सही है की महाविद्या को पूर्णता के साथ सिद्ध कर लेना एक अलग बात है परन्तु , बहुत बार साधक अपने जीवन की सामान्य से परेशानियों या कार्यों के लिए सीधे ही इन महाविद्याओं का प्रयोग करने लगता है , जो की उचित नहीं कहा जा सकता है ,क्यूंकि ऐसी स्थिति के लिए तो आप जिस महाविद्या का मन्त्र जप करते हैं हैं या जिसे वर्षों से कर रहे हैं , यदि मात्र उनके मन्त्र का विखंडन रहस्य समझ कर मन्त्र के उस भाग का ही प्रयोग किया जाये तब भी आप को समबन्धित समस्या का निश्चित समाधान मिलेगा ही. जैसे मान लीजिए कोई साधक भगवती तारा की उपासना कर रहा है और उसके परिवार के किसी सदस्य को स्वास्थ्य सम्बन्धी जटिल बीमारी हो गयी हो .... तब इसके लिए मूल मंत्र की दीर्घ साधना के बजाय उस मन्त्र या स्तुति के एक विशेष भाग का प्रयोग भी अनुकूलता दिला देता है .... ‘तारां तार-परां देवीं तारकेश्वर-पूजितां, तारिणीं भव पाथोधेरुग्रतारां भजाम्यहम् . स्त्रीं ह्रीं हूं फट्’  - मन्त्र से जल को अभिमंत्रित कर उससे नित्य रोगी का अभिषेक करे, तो उसके रोगों की समाप्ति होती है.
‘स्त्रीं त्रीं ह्रीं’ मन्त्र से १००८ बार अभिमंत्रित कर अक्षत फेकने से रूठी हुयी प्रेमिका या पत्नी वापिस आती है .
‘हंसः ॐ ह्रीं स्त्रीं हूं हंसः’ मन्त्र से अभिमंत्रित काजल का तिलक लगाने से कार्यालय,व्यवसाय और अन्य लोगो को  साधक मोहित करता ही है.
   वस्तुतः मूल साधना से सिद्धि पाने में बहुत सी बातों का ध्यान रखना पड़ता है . जिनके सहयोग से ही उस महाविद्या साधना में सिद्धि मिलती है. यथाशरीर स्थापन इत्यादि. और एक निश्चित जीवन चर्या को भी अपनाना पड़ता है .तभी सफलता प्राप्ति होती है ,अन्यथा ये साधनाए तो साधक का तेल निचोड़ देती हैं ,इतनी विपरीतता बन जाती है साधक के जीवन में की वो इन साधनाओं को सिद्ध करने का संकल्प ही मध्य में छोड़ देता है . 
  रही बात दुर्गा सप्तशती की तो हाँ ,निश्चय ही ये सांगोपांग तंत्र का बेजोड ग्रन्थ है और इसके माध्यम से देवी के समन्वित और भिन्न भिन्न तीनों रूप के दर्शन किये जा सकते हैं,बस उनके लिए निश्चित विधि का प्रयोग करना पड़ता है . यदि इसके लिए भगवती राज राजेश्वरी की साधना कर ली जाये तो सोने पर सुहागे वाली बात हो जाती है . एक बात कभी नहीं भूलनी चाहिए की मन्त्र ,उस मन्त्र की इष्ट शक्ति और साधक ये तीनों साधना काल में एकात्म ही होते हैं ,यदि साधक इसमें अंतर लाता है तो उसे सफलता नहीं मिल सकती है . प्रत्येक साधना में सद्गुरु की प्रसन्नता आपको सफलता दिलाती है , इसलिए हमें सदा सर्वदा ऐसे कृत्य ही करना चाहिए , जिससे उन्हें प्रसन्नता का अनुभव हो. जब एक सामान्य व्यक्ति भी प्रसन्न होकर हमरे कार्यों को सरल कर देता है तब ऐसे में ब्रम्हांडीय विराटता लिए हुए सदगुरुदेव के प्रसन्नता हमें क्या कुछ प्रदान नहीं कर सकती है.  
शक्ति प्राप्ति की मूल साधनाएं कौन कौन सी हैं ,जिन्हें संपन्न कर साधक सक्षमता को प्राप्त कर अभीष्ट को पा लेता है ???
शक्ति की किसी भी रूप में साधना की जा सकती है, फिर वो चाहे पुरुष रूप में हो या स्त्री रूप में ,उससे कोई फर्क नहीं पड़ता क्यूंकि लिंग बदल जाने से शक्ति का मूल स्रोत नहीं बदल जाता है.इसलिए मन में ये भाव कभी नहीं रखना चाहिए की ये पुरुष देव की साधना है तो इससे शक्ति की प्राप्ति नहीं होगी या ये स्त्री देवता की साधना है तो इससे ज्यादा शक्ति की प्राप्ति होगी. चाहे वो पुरुष देवता हो या स्त्री देवता, ऐसा नहीं है बहुत कम लोग होंगे जिन्हें ये पता होगा कीशुक्र अर्थात काम शक्ति की बिंदु साधना की मूल शक्ति काल भैरव होते हैं,जिनके तांत्रिक क्रम को अपनाकर कोई भी अद्भुत यौवन को प्राप्त कर सकता है और पा सकता है पूर्ण स्त्रीत्व या पूर्ण पौरूषत्व . और काल भैरव की शक्ति की प्राप्ति का उनका मूल स्रोत वो आदि शक्ति ही तो होगी,जिसे निखिल शक्ति या राज राजेश्वरी कहा जाता है. सैकडो साधनाओं में से कुछ सरल मगर तीक्ष्ण प्रभाव से युक्त साधनाएं निम्न अनुसार हैं ,जो की साधक के जीवन को अपनी जगमगाहट से भर देती हैं और उसकी अपूर्णता को पूर्णता में परिवर्तित कर देती हैं.
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In the search of amaizing powers of sadhana world, I met with so many sadhaka…but this is the biggest fact that the day when sadgurudev hold my hand in his hand… at the very same moment I started feeling no worries and state of Insouciance at every moment… every moment it was a peace which my soul was feeling. Any doubt arise in the mind…at the very next moment he used to vanish it by this way “ you are mine, why are you so much of Distressed…remember,  whenever any of the question will trouble you, at that time I will give you by extracting your same mind, from the mind which is the source of my place in the heart of the disciples for and from infinite time duration, this will continue for whole life and will happen for every disciple this are my words.”
From that moment there has been no place of worry in the mind.
Whenever any curiosity comes to the mind and when it affects on the peace of mind… at those very specific moments sadgurudev himself or any of his loving sanyashi or gruhasth disciple came forward and established the peace of mind by their valuable answers. Here I would like to mention specifically that whenever I went to anywhere with a will to have knowledge at that time the behavior of those specific sadhaka have remained completely positive for me and they had always accepted that they already had information about my arrival and the meeting has been designed already by the sadgurudev. And he have designed this for his every disciple…who and where to give and what to give, he had decided already from long.

In that time period of my travel I met Sadgurudev’s purn Shakt disciple Kaul Mani Shivayogatrayanand. With order of sadgurudev he selected very sacred vindhyavasini peetha for his sadhana. He is still in his sadhana in a secret cave of the same mountain. And I met him in the same cave and got blessing of his glimpse.
In very short span of time I started shooting my questions, and he too kept on answering my all questions with peace and smiles on the face & kept on revealing secrets. (He answered hundreds of questions, but in this special issue I am giving few of them which are related to the subject which can make subject easy to understand.)

What is the shakti (power), how many form does it have?
In simple words whose imagination have caused complete universe and with whose effect nature keeps on works in creating, rearing and vanishing that only infinite light is called as Shakti. It could be in any form. It leaves effect on all rather living or non living. In tangibles, those who are classified as power supplier, energy supplier or force supplier those all receives power from this supreme power. This supreme power could be in tangible, non tangible or in any other form.

It stays inside all beings, with only which we can accomplish task of creation and others. And base for the thoughts to be created is the same power.

How many types are there?

On the base of nature, it has three conditions-

Sat

Raj

Tam
Holding the base of particular nature there is existence of three main processes of creation, rear and vanishes. And this processes are done by three base of shaktis, Shaktimaan ( by whose medium shakti does the processes) . it is the point to be remembered that the way there are three main type of nature, the same way there is three main controlling power goddesses for those nature.

Mahakaali – tam

Mahalakshmi – raj

Mahasawashwati – sat

What I said above about the shaktimaana that does mean that there is no difference between shakti and Shaktimaana, they are inseparables, shaktimaan accomplish their tasks with inspiration of these shaki only. Like mahakaal in vanishing, Vishnu in rearing and creation of bramha. This way, understand this that any of the process or particle is not insignificant. Every process and particle is full of shakti.

          In the definitional description of shakti, it is also an essential point to understand that humans can reach to the stages of god by processes of development and can make his existence meaningful by accomplish his life desires. And these conditions could only be accomplished when you make these seven main powers your personality completely by being full determined and devoted. And if you accomplished this main power in their complete form then there would remain nothing impossible.
Pragya shakti

Chetana shakti

Vaak shakti

Kriya shakti

Vichar shakti

Ichha shakti

Sankalp shakti

These are modulated forms of the main three powers only.

Apart from these, is there any other shakti which is pre-designed by nature for the requirement of human life?
Yes why not… requirement of Kamashakti is paramount. The fullness of the life comes throught Kaama Bhav only.  In the base of creation this nature only stays for which even Vedas have classified it under Gods. The main property of kama is attraction… Scholars always understand Kama as synonymous of Ichha shakti.  Tantra says at extent that every type of thing which are liable do have the base as kama Shakti. For this only, this whole universe is called as ichha or kaama bhav’s expansion.

All regulations of life subjected to socialism and subjects do have base as kama bhav.

 From the supreme soul to the normal soul all the relations exists, all those are accompanied by attraction, kama and maithoona (sex) {more specifically ‘Yoga’}. In any situation in any type of sambhoga either internal or external, the task is done by the supreme Shakti by emerging a form of kama shakti.

How does it could be understandable that behind every task there is work of kama shakti…creation could be understand that it is derived with kama bhav but what does it have relation with vanishing or destruction?

This could be understand that in case that if you are in attraction with someone and further you start loving then too after a particular time duration you cannot tolerate what do you do at that time…you again try to merge your soul. In that condition either you try to merge yourself in that person or you try that person to merge with you. Your wish to overcome hunger will always attract you to the food… in that condition before a short time that particular food was having a very different form in itself…because of your attraction to that food, it ends the existence of food. This rule works on every being equally. With the separation from supreme soul, normal soul gets to be human and in this way, human takes birth, have pleasures of various comfort and at last one day cause of death will again make it move to supreme soul so don’t kama shakti of supreme soul work in the base of this which is done by merging its part in itself. Is there a creation? No…but from the cosmic vision it is also a step to the creation. When you start loving someone with a strong attraction you feel to have a sex with person what you will call this…is it just a physical satisfaction, no…in the base of this there is a desire not to remain separate with that peson which is on extreme level which came up just to merge yourself with that person. At that time it does not stays two…anything stay behind is one. It is another thing that one sadhak, disciple, yogi will have internal self merge and stay far of it and in normal situation merging a normal body. But tantra speaks about aatmayoga being ahead from body and that too with the help of this Kama power only…this way this kama shakti stays form of the supreme shakti by being attracted to which it works with different form of tam, raj and sat.

In the tantra sight, why controlling goddess of tam, raj, sat are believed to be mahakali, mahalkashi and mahasaraswati respectively? Is it not possible that mahalakshmi works with nature of tam instead of raj???
No, it cannot happen.  In the dawn of universe where there was no creation, there was no rear. At that time there was complete darkness only… when presence of mahanindra is there in its form of saakar and niraakar. And this tam element is mahakal only…from which kaal (time) even stays feared. Here it is to be noted that destruction of the body is done by kaal and there is no effect of the same on the soul. Soul always stays apart of kaal and covered with mahakaal. The same mahakal have mahakali as shakti, who is precursorproducer of the destruction. This shakti haves relation with middle time of pralaynisha. The presence of the same makes this world exist being covered with shiva, when it disappear, there is no moment time shiva turning in shavaa (death body or non existence).  As it is related with pralaynisha means night time and they have a relation from middle time this way when it represents tam, it also has raj (to rear nature) and sat (creating nature) in the sankrant form. But mahalakshmi is not inspired from tam nature and neither maha sarashwati have relation with raja. This way there is no possibilities of them to have nature of vanishing. Yes, it is completely different condition when they get connected with tam in form of mahavidhyas, at that time they can even accomplish destructions.

You just spoke about mahavidhya, so does all mahavidhyas are form of these three base powers, does they have not any relations with panchamahabhoota ????

No, it is not that way, when we are speaking about aaadhya shakti (supreme power) then it has a very big meaning, from aadishakti I mean to say Raajraajeshwari Shodashi Tripur Sundari; holding the three main nature of her, there stands three maha shaktis. Perhaps, main mahavidhya of shrikul is taken as shodashi tripur saundari. But her mantra and yantra in mahavidhya form is different, and when she is parashakri raaj raajeshwari then her main base yantra is shri chakra or shri yantra which is represents geometry form of universe, the one which is holder of unimaginable powers.

And about panchmahabhuta then every element represents 2 mahavidhyas, and this way 5X2 = 10 occurs, in this too there is a notable thing that every element has 2 nature

Ushn (hot)

Sheet (cold)

This way, from ever element’s 2 mahavidhya one would be with ugra nature and second would be having peaceful nature. The way sun and moon owns light with that parashakti, where sun gives heat and moon gives cold. But how strange is this, where heat of the sun provides warmth, splendor and intensity in humans, which inspire us to concentrate with oneness; the cold shine of moon gives excitement to the mind and make it filled with kama bhav.
 Behind the each and every action ( karma) of life there is a special ownering shakti, to whom we call Adhishthaatri Devi, related to that action is responsible for its happening similarly in tantra every procedure is carried out under the command of some special power but there are number of people who don’t know which deity is regarded as the supreme power of which procedure than how they expect success in tantra as we all know little knowledge is dangerous thing and it’s this little knowledge which becomes the cause root of failure in the easy to easiest process of tantra so it’s better to have the complete knowledge of process and its authority like-
Such procedures as
Vashikaran- Vaani
Stambhan- Rama
vidveshhan- Jyeshhtha
UchchatnanDurga
Maaran - fall under the authority of Chandi or we can say Kaali.
Now the doubt here rises is….
 Who takes its guarantee that if the whole procedure is carried out properly then its related supreme power will bless you??? As all the process and procedures related to Mahavidya is entitled as the toughest one and out of hundreds ones a single unique one gets success in them…..Just like that I have heard that Durgasapatshatii is a tantric granth and if carefully and properly its practicals should carry out than the deity is bounded to mark its appearance in front of sadhak and which is that fundamental process which helps to attain complete man power ( Chaturvidh Purusharth) in life that too by following easy going way???
 Now here the all answers are there…..firstly let me make it clear for all of you that to get all Mahavidya Sidh is something different matter…..so its completely unfair if a sadhak starts to use these Mahavidhyaas just to get rid of his daily life’s minor problems and situations as he can get them settle down just by doing the mantra jaap of that deity which he is doing from a long time back and for this he just need to understand the Vikhandan Rehasya of that mantra as which section of mantra will help him to which type of action…..definitely he will get the solution…..see how simple it is….isn’t it……ya it is if the doer is conscious. Let me make it more simple for you with an example……now just think there is a sadhak who is doing Bhagwati sadhna but at the same time someone is suffering from severe health disease in his family………than he just to change the section of mantra that is at the place of basic mantra’s Dheerg Sadhna he should enchant that mantra or Satotra of it which deals with health portion as –
…..Tara Taar-Pra Devi Tarkeshwer-Poojtiyan, Tarini Bhav Pathodherugratara Bhjamyahm...Streem Hreeng Hum Phat…just get the water enlighten (abhimantrit) with this mantra and give it to that person everyday he will soon recover his health. “Streem Treem Hreem” by making the rice (akshht) enlightens (abhimantrit) with this mantra jaap 1008 times and then throwing them away is helpful in getting back angry beloved or wife. If a sadhak put a tilak of enlighten kajal on his forehead with the mantra “Hans: Om Hreeng Streem Hum Hans: then every person in his office or business place gets attracted towards him. Finally in order to get sidhi in basic sadhna one need to pay attention at number of things because with the co-operation of these small things one get sidhi in Mahavidya. For this one need to follow a decided life style and shreer sthaapan process otherwise these sadhnaas can make your life living hell. Sometime situation become so severe that sadhak drop his resolution in between. Now come to our first question so the answer is YES!! Durgasapatshatii is a marvelous granth of Saangopaang Tantra and by following its complete process one can have the blissful presence of the whole three figures of Durga Deity but to have this divine feeling one need to follow proper procedure. If a sadhak does the sadhna of Bhagwati Raj Rajeshwari for this than its divinity becomes peerless. Always remember one thing that during sadhna- mantra, supreme authority of that mantra and sadhak becomes one during sadhnaa period as if there remains any gap then forget about success. In every sadhna Sadgurudev’s happiness is essential for success so one should do such deeds which can bring smile on Sadgurudev’s face as smile is a power to get your work done from a common person then think what will its reaction if it spread on the lips of the Highest Divine Power of this Universe.    
Which are the base sadhanas of shakti, after accomplishing which, sadhak will have their desires fulfilled?
Sadhana of shakti could be done in any form, rather it is in form of man or woman, there is no difference because changing the gender will not change the basic source of energy.  Therefore it should never be in mind that this is male deity so the shakti could not be gain or this is female deity so more energy could be generated. Rather it is male or female diety, it is not so many people know about thissukra i.e. kaam shakti’s bindu sadhana have kaal bhairava as base shakti, of which anyone can adopt the process and have extraordinary beauty and can have complete femininity or robust. And source to have energy for kaal bhairav would be the main basic shakti only, which is called as nikhilshakti or raaj raajeshwari. From hundreds of sadhanas few easy but extreme powerful sadhanas are as followed, which can bloom life of the sadhaka and will convert emptiness into totality.
   

                                                                                               
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