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Thursday, May 10, 2012

AAVAHAN-32


 
 प्रकाशपुंज स्वरुप दिव्य महासिद्ध से आगे मेरा प्रश्न यह था की एक शिष्य का गुरु के प्रति समर्पण किस प्रकार से बढ़ता है जिसके उत्तर में मुझे महासिद्ध ने कहा की शिष्य जब समर्पित होने लगता है तब उसका अनंत मन बाह्य रूप से नयी चेतना को स्वीकार करने में सक्षम हो जाता है और जब ऐसा होता है तो गुरु अपनी प्राणचेतना को उसकी चेतना से जोड सकते है और यह क्रिया के माध्यम से साधक अपने आप को सीधे ही सिद्ध गुरु से जोड़ लेता है, वस्तुतः एक स्थिति एसी आती है जब उसे अपने अंदर तथा बाह्य रूप में सभी जगह पर अपने सिद्धगुरु ही द्रस्तिगोचर होते हैएसी स्थिति आने पर साधक में वह ज्ञान अपने आप ही विक्सित होने लगता है जो वो प्राप्त करना चाहता हैअपने गुरु की ज्ञान चेतना के साथ वह सीधे ही जुड जाता है इस लिए वह सर्व तथ्यों में ज्ञान सार को प्राप्त कर ही लेता हैयह शिष्यता के जीवन की एक अमूल्य उपलब्धि होती हैसाधक को इसके लिए सदैव प्रयत्नशील रहना पड़ता हैसाधक अपने समर्पण भाव को विकसित करने के लिए उनके सद्गुरु के द्वारा प्रदत तत्पुरुष मंत्र का विधि विधान के साथ जाप करेइस प्रकार के मंत्रो की रचना सिद्धगुरु स्वयं ही अपनी प्राणऊर्जा से करते हैजो की सिर्फ उन की प्राण ऊर्जा से सबंधित रहता हैऐसा मंत्र निश्चित रूप से हर एक साधक को सिद्धि के द्वार पर ले कर जा सकता है क्यों की सिद्धगुरु अपनी ही चेतना और प्राण के माध्यम से साधक को मनोभिलाषित सिद्धि प्रदान कर सकते हैऔर इसके लिए जो समर्पण भाव की आपूर्ति होती है उसमे यह मंत्र पूरक बन जाता है.( http://www.nikhil-alchemy2.blogspot.in/2012/03/nikhil-tatpurush-sadhna.html ) इसके साथ ही साथ साधक को गुरु प्रदत प्राणश्चेतना मंत्र का जाप करते रहना चाहिए (तंत्र कौमुदी अष्टम अंकनिखिलतत्व सायुज्ज श्रीसाधना महाविशेषांक नंबर ६६) जिसके माध्यम से साधक के तथा गुरु के प्राण तथा चेतना जुड सके तथा साधक शीघ्र से अपने लक्ष्य की प्राप्ति को सुनिश्चित कर लेसाधना सफलता के ये मूल तथ्य है क्यों की जब गुरु को अपने ह्रदय में स्थान दे कर उनसे जुड़ाव सुनिश्चित कर लिया गया है तो फिर साधना तथा सिद्धि मिलना किसी भी प्रकार से दुस्कर नहीं हैजब एसी स्थिति आती है तब साधक के आतंरिक ब्रम्हांड का जुड़ाव बाह्यब्रम्हांड से हो जाता हैवस्तुतः बाह्य ब्रम्हांड अनंत है ठीक उसी प्रकार आतंरिक ब्रम्हांड भी अनंत हैलेकिन आतंरिक ब्रम्हांड का आधार मन हैक्यों की मन हमारे अंदर का ऐसा स्थल है जो की अनंत हैइसी लिए इसी धरातल पर आतंरिक ब्रम्हांड जुड़ा हुआ हैइस प्रकार जब यह शृंखला पूर्ण होती है तब साधक जिस किसी भी तथ्य का बाह्य रूप में अवलोकन करता है वही उसे आतंरिक रूप से भी द्रष्टिगोचर होते है और जो आतंरिकरूप से  अवलोकन होता है वाही बाह्य रूप से अनुभूत होता हैएसी स्थिति में प्रकृति की नित्य सत्ता ब्रम्ह का अनुभव उसे आतंरिक तथा बाह्य दोनों रूप से होने लगता हैजब ऐसा होता है तब साधक इसी परब्रम्ह का एक अटूट भाग बन जाता है क्यों की जहा आतंरिक रूप से और बाह्य रूप से एक ही तथ्य सास्वत होता है वहाँ पर विच्छेद नहीं हो सकतायही वह स्थिति जो सर्वश्रेष्ठ होती है और यही वह स्थिति हे जिसे अहं ब्रम्हास्मि” कहा गया है जो की हर एक साधक का लक्ष्य होता है, ना सिर्फ उसे समजना बल्कि उसे महेसूस करनामें सोच में पड़ गया की किस प्रकार एक सामान्य साधक प्रकृति नियंत्रण की सत्ता ब्रम्ह’ बन जाता हैयह विस्मय कारक और आश्चर्यजनक तथ्यों को सुन कर मेरे मन से सारे प्रश्न हवा बन कर उड़ गएएक नूतन ही ज्ञान और नूतन ही चेतना की आभास हो रहा थामेने महासिद्ध की तरफ कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए प्रणाम किया तब मुझे महसूस हुआ की मेरे पास कोई और भी हैसर उठा कर देखा एक सन्यासी खड़े थे जो मेरी तरह ही  प्रकाशपुंज को श्रद्धा के साथ नमस्कार कर रहे थेमेरी तरफ देख कर मुस्कुराए वहऔर फिरसे प्रकाशपुंज स्वरुप उन दिव्यमहासिद्ध को प्रणाम करने लगेमेरे मन में कोई प्रश्न नहीं था सायद इसी भाव के कारण वह दिव्य महासिद्ध का प्रकाशपुंज धीरे धीरे छोटा होता गया और मुट्ठी जितना होने के बाद एक क्षण के लिए इतना प्रकाश हुआ की उस रोशनी में कुछ दिखाई ना देअगले ही क्षण उस जगह पर वह प्रकाशपुंज नहीं थेदिव्य महासिद्ध जिन्होंने मुझे इतना ज्ञान प्रदान किया था वे चले गए थे सायद मेरी ही तरह कोई और अबोध भी अपने प्रश्नों के साथ खड़ा होगा इस आस में की उसे उत्तर मिल जाएकितना कीमती होता है सिद्धयोगियो का एक एक क्षणना जाने कितनी ही दिव्य घटनाओं के ये गुप्त प्रेरक होते होंगेसच ही तो हैहर एक क्षण में नविन बोध है नविन ज्ञान हैऔर जीवन की हर एक घटना किसी नूतन ज्ञान को आमंत्रित करने के लिए ही होती हैयही सब सोच रहा था की मेरे पास वाले सन्यासी की तरफ मेरी नज़र पड़ी वो वही पर खड़े थेमेरी तरफ देख कर किंचित व्यंग से मुस्कुराए वहमेने प्रश्न सूचक द्रष्टि से उनकी तरफ देखाउन्होंने हस्ते हुए कहा क्या तुम जानते हो वो महासिद्ध कौन थेनहीं जानताथोड़े खेद के साथ  जवाब दिया मेनेसन्यासी के चहरे पर अभी भी वही रहस्य और व्यंग वाली मुस्कान थीवह मुड़े और चलने लगेजाते जाते उनके शब्द मुझे सुनाई दिए अपने मूल को भी नहीं पहेचान पाए?” और कुछ क्षण में ही वो सन्यासी आँखों से ओज़ल हो गए.  भावविहीन सा हो गया सन्यासी के आखरी शब्द सुन करशुभ्रप्रकाश चारो तरफ बिखरा हुआ थाऔर में अभी भी उसी जगह खडा हुआ थावो दिव्यप्रकाशपुंज महासिद्ध और कोई नहीं सदगुरुदेव ही थे.
My next question to Prakash Punj divine Maha siddh was that how can the dedication of a disciple towards his Guru increase. Maha Sidh answered that when disciple starts dedicating himself, then his infinite mind becomes capable to grasp new consciousness from the outer world. When this happens, Guru can combine his own consciousness of Praan with that of disciple. Through this activity, Sadhak connect himself directly to the Guru. Actually, one situation comes when inside as well as outside at all places, he only sees his Siddh Guru. In such a state, same knowledge starts developing in sadhak on its own which he was aspiring to attain. He gets directly connected to knowledge and consciousness of Guru. Therefore, eventually, he is able to attain essence of knowledge in all facts. This is the invaluable achievement of disciple’s life. For this, Sadhak has to always remain endeavoring. Sadhak, in order to increase his dedication, should chant the TatPurush mantra given by his Sadguru while following full rules and regulations. Such types of mantra are created by Siddh guru using their own powers of praan, which is related only to their powers of praan. Such mantra definitely can take every sadhak to the doors of Siddhi (accomplishment).This is because of the fact that Siddh Guru through their own consciousness and Praan can provide the desired Siddhi to sadhak. And the dedication necessary for it is provided by this mantra..(http://www.nikhil-alchemy2.blogspot.in/2012/03/nikhil-tatpurush-sadhna.html ).Along with this, sadhakshould chant the Pranaschetna Mantra given by Guru.(Tantra Kaumadi Eighth Edition-Nikhil TatvSaayujyaShree Sadhna Maha Visheshank Page No 66)so that praan and consciousness of sadhak and guru can be combined and sadhak can quickly ensure the attainment of his aim.This is the basic fact for success in sadhna because when you have ensured the connectivity by giving Guru the place in your heart, then getting siddhi is not difficult in any manner whatsoever. In such situation, inner universe of sadhak gets connected to his outer universe. Actually outer universe is infinite. In the same way, inner universe is also infinite. But the base of inner universe is mind because mind is the place inside us which is infinite. That’s why, on this surface, inner universe is connected. Activities of mind are through the medium of senses and knowledge of senses gives us consciousness. In this way, when series gets completed, then sadhak, when, analyses any of the facts in outer form, they also get reflected internally and the analysis done internally are experienced externally. In such a condition, he experiences the nature’s daily power Brahma both internally and externally. When this happens, sadhak becomes integral part of this ParBrahma because where only one fact perpetuates internally and externally, there can be no separation. This is the condition which is the best and this is the condition which has been called “Aham Bramhaasmi” which is the aim for every sadhak, not only understanding it but experiencing it.I started thinking how a normal sadhak becomes an authority to control nature the “Bramha”.After listening to such amazing and astonishing facts, all my questions disappeared. I was experiencing a novel consciousness and novel knowledge. I prayed to Maha Siddh to express my gratitude. Then I felt that someone is also alongside me.When I raised my head, I saw one Sanyasi who was praying to the Prakash Punj just like me.He smiled upon looking at me and again he started praying to Divine Maha Siddh. I did not have any question in mind. May be due to this, that Prakash Punj of Divine Mah Siddh started reducing in size and when it reached the size of a fist, at that point so much light was emitted that one could see hardly anything. Next moment that Prakash Punj was not there. Divine Maha Siddh, who provided me so much of knowledge, was gone. May be some innocent like me would be standing with his questions and hoping that his questions are answered. How much valuable is each and every moment of these Siddh Yogis, how much divine incidents they secretly inspire. Definitely it is true that there is new knowledge, new perception contained in each moment and every incident of life happens to invite any novel knowledge. I was thinking all this, suddenly I saw the Sanyasi. He was standing there only. He smiled at me in a little bit ironical way. I looked at him in somewhat interrogative manner. He smiled and asked do you know who that Maha Siddh was. I told apologetically no.Same ironical and secretive smile was there on the face of Sanyasi. He turned and started walking. While he was going, I heard his voice “You were not able to recognize even your root? “In few moments, that Sanyasidisappeared. I became emotionless after listening to sanyasi’s last words. White light was scattered all over and I was still standing at the same place. That Prakash Punj Divine Maha Siddh was nobody else, but Sadgurudev only.  

                                                                                               
 ****NPRU****   
                                                           
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