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Monday, July 30, 2012

SOME NECESSARY FACTS REGARDING YAKSHINI SADHNA PART 2(यक्षिणी साधना के परिपेक्ष में कुछ आवश्यक तथ्य २)

In last article we learnt about the Aakash element and its relation with other elements and what is its relation with sadhna. Definitely, Aakash element has a relationship with not one rather all. It may be Apsara Yakshini or some other God-Goddess. Yes, but the procedures related to each one are different. Here we will discuss regarding Yakshini sadhna.
First of all it is important to know that what the meaning of Mandal is?
Yantra and Mandal are two important parts of Tantric Padhati. A commoner may have some information about Yantras but very few persons know about Mandal Vidhaan. Yantra is one such geometrical shape upon energizing which it does the work of sending its mantric power to Isht or Abhisht or related God-Goddess. For example, when one sadhak does a prayog to get rid of enemy problem and he has got Shatru Gati Stambhan Yantra, then the power which carries out the work through Mantra’s energy and the procedure done on it, then this energy reaches the God/Goddess related to that power through yantra. Mandal means one such geometrical shape which is copy-image of Isht. Yantra transforms the energy and sends it to related God/Goddess, but Mandal is different from it.Isht is not present in front of sadhak then if sadhak creates its image in front of himself and after that sadhak do Pratishtha on it then that shape (symbolizing Isht) becomes Mandal which can do multiple jobs at one time or in other words Mandal can accomplish all tasks related to that Isht for which it is created. This is the normal difference. But more normal it seems, it is that much full of secrets. Some Mandals take few months and sometimes take few years. After this, many coming generation can take benefit from these Mandals. In some of Buddh Maths of Tibet, there are present many centuries old Mandals on which sadhna has been done from so many years that they are never needed to changed or disposed off. Definitely, this Vidya is one invaluable Vidya and if looked from importance point of view, then Mandal Yantra can be only called rare. In the times of Sadgurudev, such rare Mandal Yantra were in vogue in which sthapan of so many God and Goddess was done by Sadgurudev himself and one such Mandal Yantra consist of so many yantra within it.Many times, Sadgurudev created one Mandal from yantra shape related to 7-8 God-Goddess and gave it to sadhak in form of Yantras. The depth of these lines can be understood by only those who have some knowledge about yantras and who have seen the Pratishtha being done on them or done Pratishtha on any yantra anytime. I have seen such rare yantras with some old Guru Brothers and they also say that attainment of such rare Mandal is definitely attainment of success in all respects. This demonstrates the height of Sadgurudev’s knowledge regarding Yantras and Mandals and before each prayog; he used to tell about significance of yantra, its related procedure and Pratishtha procedure to sadhaks.
There are so many differences and sub-differences in relation to Mandal Yantras. Now, it can be understood like this that how is it possible for a normal person that he creates one Mandal in months or years and after that do sadhna on it.Therefore, there were some secret procedures in vogue relating to Mandals and Yantras by which person can create them in lesser time and get the benefit from it.
Now we come back to Aakash element. In last article we learnt that if we manage to establish contact with Aakash element then it is definitely possible that if we call then that voice reach the Isht because Aakash element is present everywhere. But if Aakash element is Omni-present then how to concentrate it at one place? How can it be made possible that we only have access to Aakash element and attain the related benefits
As it is said about Mandal Yantras that they are the copy-image of Isht. If such geometrical shape is created and Pratishtha of related God/Goddess is done on it and their Praan are connected then that Mandal becomes the mirror image of Isht. And after that, benefits can be taken from all procedures related to it.Among sadhaks, many vidhis relating to Mandals are present but Vidhaan of Aakash element’s Mandal has remained hidden. If Mandal Yantra of Aakash element is created then it is possible. If sadhak gets the shape of Mandal related to Aakash element also but if it does not have Vidhaan along with it, then it is merely a geometrical shape. There are many differences and sub-differences within it.
In other words, one thing can be understood here that there are many vidhis of Aakash Mandal. But there should be one Vidhaan which is in accordance with time and Mandal can be made in less time.
Now since Aakash element is Omni-present and we have to get the benefit related to Yakshini from it then how it should be written and which mantra should be written. And Vidhaan should be such that even normal sadhak can do it.How is it possible?
Yes this is possible. Sadhak can create such Mandal in one night and also do Pratishtha related to Yakshini so that it can work especially for Yakshini category. We have made the switch and definitely this switch is capable of switching on any fan or bulb or other thing but we have to switch on the fan using it so we have to connect it to wires of fan.
In the similar manner, we have to create Aakash Mandal and make it suitable for Yakshini Sadhna. How it will be done?
This can be done by making basic pillar of Mandal, one beej mantra and after writing it, make fitting Mandal and chanting Pratishtha Yukt Sampark Mantra. But such Vidhaan will take lot of time? No, definitely not.
Sadhak has to make geometrical shape and chant 11 rounds then full Vidhaan is completed. And it does not even take more than one hour for sadhak to do it.
पिछले लेख में हमने जाना की किस प्रकार आकाशतत्व तथा दूसरे तत्वों में सबंध है तथा आकाशतत्व का साधना से क्या सबंध है. निश्चित रूप से आकाशतत्व का सबंध किसी एक साध्य से नहीं वरन सभी साध्य से है. चाहे वह अप्सरा यक्षिणी हो या कोई भी देवी देवता हो. हाँ लेकिन सभी से सबंधित प्रक्रियाए अलग अलग है. यहाँ पर हम यक्षिणी साधना के बारे में चर्चा करेंगे.

सर्व प्रथम हमें ये जानना ज़रुरी है की मंडल का तात्पर्य क्या है.??
 यन्त्र तथा मंडल तांत्रिक पद्धति के दो महत्वपूर्ण अंग है. सामान्यजन को यंत्रो के बारे में जानकारी भले ही हो लेकिन मंडल विधान की जानकारी बहोत ही कम प्राप्त होती है. यन्त्र एक एसी आकृति होती है जिनमे प्रतिष्ठा करने पर वह आपकी मांत्रिक उर्जा को इष्ट तक या अभीष्ट तक पहोचाने का कार्य करती है या सबंधित देवी देवता तक पहोचने का कार्य करती है. उदहारण के लिए एक साधक शत्रु समस्या से मुक्ति के लिए प्रयोग करता है और उसके सामने शत्रु गति स्तम्भन यन्त्र है तो उसके द्वारा की गयी प्रक्रिया तथा मंत्रो की उर्जा से कार्य सम्पादित करने के लिए जो शक्ति है, जो उस कार्य से सबंधित देवी या देवता या इष्ट है उन तक यह उर्जा पहोचाने का कार्य यंत्रो के द्वारा होता है. मंडल का तात्पर्य एसी आकृति है जो की इष्ट की प्रतिकृति हो. यन्त्र उर्जा को रूपांतरित कर के उसे सबंधित देवी या देवता तक पहोचाना है जब की मंडल इससे भिन्न है. इष्ट साधको के सामने प्रत्यक्ष नहीं है तो साधक उनकी प्रतिकृति को ही अपने सामने निर्माण कर ले और इसके बाद साधक उसमे प्रतिष्ठा कर दे तो वह इष्ट रूप आकृति मंडल बन जाती है जो की एक साथ अनेक कार्य कर सकती है या दूसरे शब्दों में मंडल उस इष्ट से सबंधित सभी कार्यों को सम्प्पन कर सकता है जिस के लिए उसका निर्माण हुआ हो. यह सामन्य भेद है. लेकिन यह जितना सामन्य दिखता है उतना ही गुढ़ है और उतना ही रहस्य से पूर्ण है. कई मंडलों को बनाने में कई महीने तथा कई बार कई साल लग जाते है. इसके बाद इन मंडलों का लाभ कई पीढि उठा सकती है. तिब्बत के कई बौद्ध मठो में कई सदियों पुराने मंडलयन्त्र विद्यमान है जिन पर इतने साले से साधनाए होती आई है, उसे बदलने की या विसर्जित करने की आवश्यकता नहीं होती. निश्चय ही यह विद्या एक अमूल्य विद्या है तथा इनकी महत्वपूर्णता को द्रष्टि में रखे तो  मंडलयंत्र दुर्लभ ही कहे जा सकते है. सदगुरुदेव के समय में ऐसे दुर्लभ मंडलयन्त्र प्रचलन में थे जिनमे वह एक साथ कई देवी तथा देवता का स्थापन सदगुरुदेव खुद ही सम्प्प्न करते थे तथा एक ही ऐसे मंडलयंत्र में कई यन्त्र एक साथ होते थे. कई बार सदगुरुदेव ने एक साथ ७ – ८ देवी देवताओ से सबंधित यन्त्र आकृति का एक पूर्ण मंडल बना कर उसे यंत्रो के स्वरुप में साधको को प्रदान किया है. इन पंक्तियों की गंभीरता वही समझ सकता है जो ऐसे यंत्रो के सबंध में ज्ञान रखता हो तथा जिन्होंने इनकी प्रतिष्ठा होते हुवे देखि हो या खुद कभी किसी यन्त्र की प्रतिष्ठा की हो. मेने कुछ पुराने गुरुभाइयो के पास ऐसे दुर्लभ यंत्रो को देखा है तथा उनका कथन भी यही है की ऐसे दुर्लभ मंडल की प्राप्ति निश्चितरूप से सर्व सफलता की प्राप्ति है. इससे सदगुरुदेव के यंत्रो तथा मंडलों के सबंध में उनके ज्ञान की विशालता का परिचय होता है तथा हर प्रयोग से पहले वह यंत्रो की महत्ता उनसे सबंधित प्रक्रिया तथा प्रतिष्ठा क्रम के बारे में साधको को बताते थे.

मंडलयंत्रो के सन्दर्भ में कितने ही भेद तथा उपभेद है. अब इसको इस प्रकार से समझा जाए की एक सामान्य व्यक्ति के लिए यह कैसे संभव हो की वह महीनो तक या सालो तक एक मंडल बनाये तथा उसके बाद उस पर साधना करे. इसी लिए मंडलों तथा यंत्रो से सबंधित भी कई गुप्त विधान प्रचलन में रहे जिसके माध्यम से व्यक्ति इनका निर्माण कुछ समय में ही कर सकता है तथा उसका लाभ प्राप्त कर सकता है.

अब हम वापस बात करते है आकाशतत्व की. पिछले लेख में हमने जाना की अगर हमारा आकाशतत्व से संपर्क हो जाए तो निश्चित रूप से यह संभव है की हम आवाज़ दे तो वह सबंधित इष्ट तक पहोच जाए क्यों की आकाशतत्व सर्व व्यापी है. लेकिन आकाशतत्व तो सर्व व्यापी है तो उसे किसी एक जगह केसे एकत्रित किया जाए? ऐसा केसे संभव हो सकता है की हम आकाश तत्व को ही अपने सामने रखे तथा उसके सन्दर्भ लाभों की प्राप्ति कर सके.

जेसे की मंडलयंत्रो के बारे में कहा गया है की वे इष्ट की प्रतिकृति होते है. अगर एसी आकृति का निर्माण कर के उसमे सबंधित देवी देवता या साध्य की प्रतिष्ठा कर दी जाये तथा उनके प्राणों को जोड़ दिया जाये तो वह मंडल इष्ट की प्रतिकृति बन जाता है. तथा उसके बाद उससे सबंधित सभी प्रक्रियाओ का लाभ प्राप्त किया जा सकता है. साधको के मध्य पञ्चतत्वों के मंडल की कई विधि प्रचलित है. लेकिन आकाशतत्व के मंडल का विधान गुप्त रहा है. अगर आकाशतत्व का ही मंडलयन्त्र का निर्माण कर लिया जाये तो यह संभव हो सकता है. साधक को आकाशतत्व से सबंधित मंडल की आकृति मिल भी जाए लेकिन उसका विधान नहीं हो तो वह मात्र एक आकृति ही है. इसमें भी कई भेद तथा उपभेद है.

अर्थात यहाँ पर यह बात समजी जा सकती है

की आकाशमंडल की कई विधियां है जिनमे से एक ऐसा विधान हो जो की समय अनुरूप हो तथा कम समय में मंडल का निर्माण हो जाये.

अब बात यह आती है की आकाशमंडल चूँकि सर्व व्यापी है तथा हमें उस मंडल से यक्षिणी  से सबंधित लाभ प्राप्त करना है तो उसका अंकन केसे किया जाये तथा उसमे कोन से मंत्र का अंकन किया जाए. तथा इसका विधान ऐसा हो की सामान्य साधक भी सम्प्पन कर सके. क्या ऐसा संभव है?

हाँ ऐसा संभव है. साधक ऐसे मंडल का निर्माण कर एक ही रात्रि में उसमे यक्षिणी से सबंधित प्रतिष्ठा भी कर सकता है क्यों की यक्षिणी वर्ग के लिए वह विशेष रूप से कार्यशील हो सके. हमने स्विच बना ली है और निश्चित रूप से यह स्विच किसी भी पंखे को या बल्ब को या किसी भी चीज़ को चालू करने में सक्षम है लेकिन हमें तो इससे पंखा चलाना है तो उसे पंखे के साथ तारों से जोड़ना पड़ेगा.

ठीक उसी तरह आकाशमंडल का निर्माण करना है तो इसके साथ ही साथ उसे यक्षिणी साधना के प्रयुक्त करना है. अब वह किस तरह से होगा?

यह होता है मंडल का आधार स्तंभ एक बीज मंत्र बना कर और उसको अंकित कर उसके अनुरूप मंडल बनाया जाए तथा  उसमे प्रतिष्ठा युक्त संपर्क मंत्र का जाप करने से. लेकिन ऐसा विधान करने में तो बहोत समय लग जायेगा? बिलकुल नहीं.

यह गुप्त प्रक्रिया को करने में साधक को आकृति बना कर मात्र ११ माला जाप करे तो पूर्ण विधान सम्प्प्न हो जाता है. और साधक को इसमें सायद एक घंटे से ज्यादा समय नहीं लगता.




Vinod S Sharma said...

Bhaiji Jai sadgurudev kya ye mandal thik pranpratishtit chitra hi hota hai kya

Nikhil Devraj said...

Very informative article raghu bhaiya. Like to know more about it.

Dinesh Paliwal said...