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Monday, January 7, 2013

AATM CHAITANYA SADHAN PRAYOG


 
Any human or creature is final creation, formed by many organized and procedural creations of different elements. In this creation, some important elements which are very important from Yog-Tantric point of view are Maanas Element, Praan Element and Aatm (soul) Element.

Here, first of all one need to have knowledge of states of elements. Basically, there are three preliminary states of elements.

Susupt State (Dormant/Sleeping State)

Chaitanya State (Conscious State)

Jaagrit State (Active State)

All elements present inside us are basically in dormant state i.e. they are in state of vibration, they are operational but not conscious, and they do not have knowledge about purity, progress and intellectual development.

Second state is Conscious state in which elements move towards attaining purity, elements starts knowing about their prime task and direction in which creature has to be moved.

Third and final state is called Active State which is very difficult state to attain. After this state, elements of sadhak regularly and at each moment moves sadhak towards that aim about which indication is given to them.

Here we will talk about Aatm Element. Aatm element is that element which is base of basic creation of soul in creature. If seen simply, the element of which person’s soul is made up of is called Aatm Element.

Naturally, this element is also in dormant state like other elements. That’s why our soul does not know in which direction it should move or what it should do and what should be its direction. What is the way to move towards spirituality and which padhati/path can help us attain materialistic and spiritual success.

If this element i.e. Aatm Element attains Conscious state then definitely person becomes capable to decide any type of aim. He starts getting inner feeling that what efforts and in which direction he should make effort in order to ensure development of self. Actually, benefits and significance of this sadhna cannot be described in words; rather it has to be felt by person after doing it. This sadhna is called Aatm Chaitanya Sadhna.

This prayog can be started from any Thursday or Sunday.

This prayog can be done by sadhak anytime in Morning or night but he should keep in mind that daily time should remain same.

Sadhak should first of all take bath, wear white clothes and sit on white aasan facing North Direction.

Sadhak should do Guru Poojan. If sadhak desires, he can also do mental Guru Poojan. After it, sadhak should chant 1 round of Guru Mantra.

After chanting Guru Mantra, sadhak should chant 21 rounds of below mantra. Sadhak can use Guru Rosary, Guru Rahasya Rosary, Aksh Rosary, Crystal Rosary or Rudraksh Rosary for chanting.

om aing shreem chaitany chaitany namah)

After it , sadhak should again chant 1 round of Guru Mantra and dedicate mantra Jap to Sadgurudev.

Sadhak should do this procedure for 5 days. In this sadhna, sadhak should take Satvik food i.e. excessive spicy, Tamsik food like non –vegetarian and onion should not be taken. Sadhak should follow celibacy.

Sadhak should not immerse rosary. This rosary is appropriate for doing any sadhna related to Aatm element in future and can be used.

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मनुष्य या जीव का निर्माण अनेको तत्वों की सुसंयोजित, प्रक्रिया बद्ध, कई रचनाओ का एक संकलित रूप है. इस रचना में कुछ मुख्य तत्व जो की योग तांत्रिक द्रष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण है वह है मानस तत्व, प्राण तत्व तथा आत्म तत्व.

यहाँ पर सर्व प्रथम तत्वों की अवस्थाओ के बारे में जानना अत्यधिक आवश्यक है.
तत्वों की मूल रूप से 3 प्राथमिक अवस्थाएं होती है.

सुसुप्त अवस्था

चैतन्य अवस्था

जागृत अवस्था

हमारे अंदर के सारे तत्व मूल रूप से सुसुप्त अवस्था में ही होते है, अर्थात वह स्पंदन शील तो होते है और गतिमान भी होते है लेकिन चेतन नहीं होते, उनमे शुद्धि और उत्थान का, बौधिक विकास के बारे में ज्ञान नहीं होता है.

दूसरी अवस्था होती है चैतन्य अवस्था, इसमें तत्वों की गति विशुद्धता की तरफ होने लगती है, तत्वों को बोध प्राप्त होना शुरू होता है की उनका कार्य मुख्य रूप से क्या है और जिव को किस तरफ गति देनी है.

तीसरी अवस्था जागृत अवस्था कहेलाती है जो की अत्यधिक दुस्कर अवस्था है. इसके बाद साधक के तत्व नियमित रूप से प्रति क्षण मात्र उसी लक्ष्य की और गतिशील रहते है जिस लक्ष्य की और उनको संकेत दे दिया जाता है.

यहाँ पर बात हम करेंगे आत्म तत्व की. आत्म तत्व वह तत्व है जो की जिव में आत्मा का मूल रचना का आधार है. अर्थात सामान्य शब्द में कहा जाये तो व्यक्ति का आत्मा जिस तत्व से बनी हुई है वह तत्व आत्म तत्व है.

प्राकृतिक रूप से ही यह तत्व भी दूसरे तत्वों की भांति अपनी सुस्प्त अवस्था में ही है इस लिए हमारी आत्मा को बोध नहीं है की उसे किस तरफ जाना चाहिए या उसे क्या करना चाहिए तथा उसकी गति किस तरफ होनी चाहिए. किस प्रकार आध्याम की और गतिशील हुआ जा सकता है या कोन सी पद्धति या मार्ग से हमें भौतिक तथा आध्यात्मिक सफलता की प्राप्ति हो सकती है.

अगर यह तत्व अर्थात आत्म तत्व चेतन अवस्था को प्राप्त कर ले तो निश्चय ही व्यक्ति अपने किसी भी लक्ष्य का निर्धारण करने में सक्षम बन सकता है. उसको आतंरिक रूप से बोध होने लगता है की उसको किस तरफ और कोन से प्रयास करने चाहिए जिससे की स्व का  उत्थान संभव हो सकता है. वस्तुतः इस साधना के लाभ तथा महत्त्व को शब्दों से व्यक्त करना संभव नहीं है, व्यक्ति स्वयं ही इसे कर के अनुभव कर सकता है. इस साधना को आत्म चैतन्य साधना कहते है.

यह प्रयोग किसी भी गुरुवार तथा रविवार से शुरू किया जा सकता है.

साधक यह प्रयोग दिन या रात्रीकाल के किसी भी समय कर सकता है लेकिन रोज साधना का समय एक ही रहे इस बात का साधक को ध्यान रखना चाहिए.

साधक को सर्व प्रथान स्नान आदि क्रियाओं से निवृत हो कर सफ़ेद वस्त्रों को धारण करे. साधक को उत्तर दिशा की तरफ मुख कर बैठना चाहिए. आसन सफ़ेद रंग का हो.

साधक सर्व प्रथम गुरु पूजन सम्प्पन करे, साधक चाहे तो मानसिक गुरु पूजन भी सम्प्पन कर सकता है, इसके बाद एक माला गुरुमंत्र का जाप करे.

गुरु मंत्र जाप के बाद साधक निम्न मंत्र की २१ माला मंत्र जाप करे. यह जाप गुरुमाला, गुरुरहस्य माला, अक्षमाला, स्फटिकमाला या रुद्राक्ष माला से भी किया जा सकता है.

ॐ ऐं श्रीं चैतन्य चैतन्य नमः

(om aing shreem chaitany chaitany namah)

इसके बाद साधक फिर से गुरुमंत्र की एक माला मंत्र जाप करे तथा इसके बाद मंत्र जाप सदगुरुदेव को समर्पित कर दे.

साधक को यह क्रम ५ दिन तक करना है. साधक को इस साधना में सात्विक आहार को ग्रहण करना चाहिए अर्थात ज्यादा मसाले, मांसाहार तथा प्याज आदि तामसी आहार को ग्रहण नहीं करना चाहिए. साधक को ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करना चाहिए.

साधक को माला का विसर्जन नहीं करना है. यह माला आगे किसी भी प्रकार की आत्म तत्व से सबंधित साधना करने के लिए उपयुक्त है तथा इसका उपयोग किया जा सकता है.

****NPRU****

1 comment:

Heena Insan said...

गुरु मंत्र का जाप चलते फिरते काम धंधा करते हुए भी ले सकते हैं
dailymajlis.blogspot.in/2013/01/soulpower.html