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Wednesday, January 23, 2013

SHRIKAR SADHNA


 
There are different sects under Tantric system of traditional school. Primarily, Shaiva, Shaakt and Vaishnav sadhnas were most spread ones. Whereas on one hand Shaiva and Shaakt sadhnas were intense, strong and fiery, on the other hand were peaceful and related to rajas character. Prime basis or prime god of Tantric sadhnas of Vaishnav path was Lord Vishnu and his different forms. Vaishnav Tantric path was once best path for attaining completeness in worldly pleasures as well as salvation and it was very easy for any completely Satvik person. But slowly and gradually this hard-work demanding path became obsolete and its place was taken by Bhakti path. As a result, amazing sadhnas related to Vaishnav tantra gradually started becoming obsolete.
Definitely there are present such amazing Vidhaans under Vaishnav Yantra by doing which sadhak can fulfil his desire but with time, such type of amazing prayog vanished. But Sadgurudev from time to time has made sadhaks do this type of sadhna prayog and sadhaks have witnessed the intense capability of these sadhnas. In fact, significance of amazing tantric sadhnas of Vaishnav sect cannot be considered lower in any sense because aim of tantra path is to fulfil desired objective irrespective of any sect. Lord Vishnu is god of maintenance, one among the Tridev. How can a sadhak face any shortcoming in life after doing his sadhna? Sadgurudev from time to time has given amazing sadhnas relating to his various forms. One sadhna among many sadhna of different forms of lord is Shrikar Sadhna. This prayog resolves many obstacles coming in sadhak’s life at once. It may be resolving financial problem, attaining new sources of income or getting supreme position in life. It may be attaining promotion or getting respect in life, sadhna of Lord Shrikar helps sadhak to achieve complete prosperity. And what more is left to be said when attaining such diverse results is possible only through very easy prayog. This easy and amazing prayog related to Shrikar sadhna can be done by any sadhak or sadhika and attain related results.
Sadhak can start this prayog from any auspicious day. It can be done any time in day or night but daily sadhna time should remain same.
Sadhak should take bath, wear yellow dress and sit on yellow siting mat (Aasan). Sadhak should face North direction.
Sadhak should establish any conch on yellow cloth spread on Baajot in front of him. Conch can be of smaller or bigger size but it should not be broken from anywhere.
Sadhak should do Guru Poojan and Ganpati Poojan. After it, sadhak should do poojan of conch and write “SHREEM” on it by vermillion.
After it, sadhak should do nyas and chant basic mantra in front of conch itself.
KAR NYAS
SHRAAM ANGUSHTHAABHYAAM NAMAH
SHREEM TARJANIBHYAAM NAMAH
SHRUM MADHYMABHYAAM NAMAH
SHRAIM ANAAMIKAABHYAAM NAMAH
SHRAUM KANISHTKABHYAAM NAMAH
SHRAH KARTAL KARPRISHTHAABHYAAM NAMAH

ANG NYAS
SHRAAMHRIDYAAY NAMAH
SHREEMSHIRSE SWAHA
SHRUMSHIKHAYAI VASHAT
SHRAIMKAVACHHAAY HUM
SHRAUMNAITRTRYAAY VAUSHAT
SHRAHASTRAAY PHAT

It is better if sadhak chant this mantra by conch rosary. In case conch rosary is not available, sadhak should use crystal rosary for chanting mantra. Sadhak should chant 21 rounds.
Om shreem shreem shreem utishth shrikar swaha
Sadhak should do this procedure for 3 days and after it, conch should be established in worship room.

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सनातन मत की जो तांत्रिक प्रणाली है, इस साधना पथ के अंतर्गत कई प्रकार के मत्त है. मुख्य रूप से शैव, शाक्त तथा वैष्णव साधनाओ का प्रचार अधिक ही रहा था. शैव और शाक्त साधनाए जहां एक तरफ तीव्र, तीक्ष और उग्र थी. वहीँ वैष्णव मार्ग की साधनाए सौम्य और राजसिक भाव से सबंधित थी. वैष्णव मार्ग की तांत्रिक साधनाओ का मुख्य आधार या मुख्य देव भगवान विष्णु तथा उनके विविध स्वरुप थे. वैष्णव तांत्रिक मार्ग भोग तथा मोक्ष के क्षेत्र में पूर्णता को प्राप्त करने का एक समय पे श्रेष्ठ मार्ग था तथा किसी भी पूर्ण सात्विक व्यक्ति के लिए भी सहज मार्ग था लेकिन धीरे धीरे यह परिश्रम का मार्ग विलुप्त होता गया और उसकी जगह स्थान ले लिया भक्ति मार्ग ने.इसी कारण तंत्र क्षेत्र में वैष्णव तंत्र सबंधित अद्भुत साधनाएं धीरे धीरे लुप्त होने लगी.
वैष्णव तंत्र के अंतर्गत भी निश्चय ही ऐसे अद्भुत विधान है जिनको सम्प्पन करने पर साधक अपने अभीष्ट की प्राप्ति कर सकता है लेकिन काल क्रम में इस प्रकार के अद्भुत प्रयोग लुप्त होते गए. लेकिन सदगुरुदेव ने समय समय पर इस प्रकार के साधना प्रयोग को सम्प्पन करवाया है तथा साधको ने इन साधनाओ की तीव्रतापूर्ण क्षमता का अनुभव किया है. वस्तुतः वैष्णवमत की अद्भुत तांत्रिक साधनाओ की महत्ता को किसी भी रूप से कम नहीं आँका जा सकता क्योंकि तंत्र मार्ग अपने अभीष्ट की प्राप्ति के लिए है भले ही वह किसी भी मत्त से क्यों न हो. भगवान विष्णु तो पालन के देव है, त्रिदेव में से एक है. इनकी साधना करने के पश्च्यात साधक को क्या कमी रह सकती है जीवन में? उन्ही के विविध स्वरुप की साधना के सबंध में सदगुरुदेव ने समय समय पर एक से एक साधन रत्न प्रदान किये है. भगवान के इन्ही स्वरुप में से एक स्वरुप साधना है श्रीकर साधना. साधक के जीवन में आने वाली कई बाधाओं का एक साथ निराकरण यह प्रयोग के द्वारा हो जाता है. धन सबंधित समस्याओ का समाधान हो, आय प्राप्ति के नए स्त्रोत की प्राप्ति हो या जीवन में श्रेयकर स्थान प्राप्त करना हो. पद्दोन्नती की प्राप्ति या समाज में मान सन्मान को प्राप्त करना हो, भगवान श्रीकर की साधना साधक को पूर्ण ऐश्वय की प्राप्ति करवाती है.  और फिर ऐसे विविधता से परिपूर्ण फल की प्राप्ति अत्यधिक सहज प्रयोग के माध्यम से कर सकता हो तो फिर कहना ही क्या. श्रीकर साधना सबंधित यह सरल और अद्भुत प्रयोग कोई भी साधक साधिका सम्पन कर सकता है तथा उससे सबंधित लाभों की प्राप्ति कर सकता है.
यह प्रयोग साधक किसी भी शुभदिन से शुरू कर सकता है. यह दिन या रात्रि के किसी भी समय किया जा सकता है लेकिन रोज साधना का समय एक ही रहे.
साधक स्नान आदि से निवृत हो कर पीले वस्त्र धारण कर पीले आसन पर बैठ जाए. साधक का मुख उत्तर दिशा की तरफ हो.
साधक अपने सामने बाजोट पर पीले वस्त्र पर कोई एक शंख को स्थापित करे. शंख कोई भी हो चाहे छोटा हो या बड़ा लेकिन शंख कही से भी खंडित नहीं होना चाहिए  अर्थात टुटा हुआ नहीं होना चाहिए.
साधक को गुरु पूजन, गणपति पूजन करना चाहिए. इसके बाद साधक शंख का पूजन करे तथा उसके ऊपर कुमकुम से ‘श्रीं’ लिखे.
इसके बाद साधक न्यास करे तथा मूल मन्त्र का जाप शंख के सामने ही करे.
करन्यास
श्रां अङ्गुष्ठाभ्यां नमः
 श्रीं तर्जनीभ्यां नमः
 श्रूं  मध्यमाभ्यां नमः
 श्रैं अनामिकाभ्यां नमः
 श्रौं कनिष्टकाभ्यां नमः
 श्रः करतल करपृष्ठाभ्यां नमः

अङ्गन्यास

श्रां हृदयाय नमः
श्रीं शिरसे स्वाहा
श्रूं शिखायै वषट्
श्रैं कवचाय हूम
श्रौं नेत्रत्रयाय वौषट्
श्रः अस्त्राय फट्
इस मन्त्र का जाप साधक शंख माला से करे तो सर्वोत्तम है लेकिन शंख माला न मिलने पर साधक स्फटिक माला से मन्त्र का जाप करे. साधक को २१ माला जाप करना है.
ॐ श्रीं श्रीं श्रीं उतिष्ठ श्रीकर स्वाहा
(om shreem shreem shreem utishth shrikar swaha)
साधक यह क्रम ३ दिन तक करे तथा उसके बाद शंख को पूजा स्थान में स्थापित कर दे.

****NPRU****

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