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Wednesday, January 2, 2013

SAHSTRAAR CHAKRA JAAGRAN - AMRITV SOAHAM SADHNA


 
In all the various methods of spiritual world, place of Kundalini is most important. Kundalini is present inside human as prime universal power. There are diverse padhatis in various paths to complete the infinite Kundalini procedure and this Kundalini introduce person to his own huge self. Kundalini forms the basis of all fields whether it is Parad Vigyan or Soorya Vigyan or Yog Tantra or any other. Seventh Chakra of this very Kundalini has been called Sahastrar Chakra.
Root of Kundalini has said to be Muladhaar which is the residing place of Shakti. Journey of Kundalini happens in various stage like making each chakras conscious, their activation, subsequently bhedan and development. Objective of this basic journey of Kundalini is to meet with his Shiva. This is accepted by all tantra scriptures. This Chakra is Sahastrar which is said to be having 1000 lotus petals and considered to be place of Shiva.
Sahastrar Chakra is place of supreme element. From this place, human frees himself from craving of self-element and move towards truth of Brahma element and attains Samadhi (deep meditation) state. If all praan of body becomes one and is focused on Sahastrar Chakra then person definitely attains Samadhi state where he becomes one with Brahma.
From spiritual point of view, it can be called a very highest stage where person gets introduced to various universal secrets and truth. Definitely if person can attain such higher spiritual level then what can be said about his materialistic life. There is highest development in memory power of person, sadhak get to know the thought of person approaching him, can meditate and with practice, he can attain various types of spiritual accomplishments. But in root of all of them, there are procedures to make it conscious and activate it.
Sadhak should understand that if any mass of body does not have any consciousness then its activation is not possible. And the one which is not activated cannot be developed and if it is developed too then due to it being in dormant state, this development is meaningless.
In Kundalini Procedure, first of all Kundalini is made conscious and then all chakra are made conscious and after that activation is done. This procedure is very complex and cumbersome. But rare prayog presented here is amazing in itself. Reason for it is that it is sadhna to make Sahastrar Chakra (place of Shiva) conscious and activate it. If person does this sadhna then definitely he becomes capable to attain all preliminary benefits related to Sahastrar Chakra. He becomes aware of nectar element which originates from sahastrar and due to able circulation of elements in body, sadhak gets riddance from diseases. To add to it, sadhak attains many kinds of spiritual accomplishments. Getting such hidden prayog is definitely very lucky because in ancient Tantra opinion, only few people were given such prayogs by Guru Tradition. This prayog, even rare to Devs is done through Parad Shivling or Saundarya Ras Kankan.
Sadhak can start this prayog on any auspicious day.
Sadhak can do it anytime in day or night but sadhak should do it daily on same time.
Sadhak should take bath, wear white clothes and sit on white aasan. Sadhak should face North direction.
Sadhak should establish ENERGISED PURE PARAD SHIVLING OR SAUNDARYA RAS KANKAN in front of him. After it sadhak should do Guru Poojan and do poojan of Parad Shivling or Kankan. After poojan, sadhak should chant Guru Mantra.
Thereafter, sadhak should chant 11 rounds of below mantra while doing tratak on Shivling. Sadhak should use sfatik (Crystal) rosary for this purpose.
Om sham shaam shim shum vam vaam vim vum amrit varchase varchase soham hansah swaha
After completion of chanting, sadhak should close his eyes and sit peacefully for some time. Sadhak has to do this procedure for 5 days.
In these five days, sadhak can have many types of experiences and can see many scenes or hear many voices. But there is no need to worry at all; these are symptoms of success in sadhna. Rosary should not be immersed. Sadhak can use this rosary in future for doing this sadhna.
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आध्यात्म जगत की सभी विविध प्रणाली में कुण्डलिनी का स्थान अत्यधिक महत्वपूर्ण स्थान है. मनुष्य के अंदर ब्रह्मांडीय मुख्य शक्ति के रूप में कुण्डलिनी अवस्थित है. इसी कुण्डलिनी के अनंत क्रम को सम्प्पन करने के लिए विविध मार्ग में विविध पद्धतियाँ है और यही कुण्डलिनी मनुष्य का उसकी स्वयं की विराट सत्ता का साक्षात्कार कराता है. चाहे वह पारदविज्ञान हो सूर्यविज्ञान मंत्र, योग तंत्र या कोई भी क्षेत्र, इन सभी का आधार कुण्डलिनी ही है. और इसी कुण्डलिनी के सप्तम चक्र को सहत्रार चक्र कहा गया है.
कुण्डलिनी के मूल स्थान को मूलाधार कहा गया है जिसे शक्ति का स्थान कहा जाता है, जब की उसकी यात्रा एक एक चक्र का चेतन, जागरण, भेदन, विकास आदि विविध चरणों में होता है, तथा कुण्डलिनी शक्ति की यह मूल यात्रा उसके शिव के साथ मिलन के लिए है यह सर्व तंत्र ग्रन्थ स्वीकार करते है. यही चक्र सहस्त्रार है, जिसको सहस्त्र पद्मदल अर्थात १००० कमल पंखुड़ी वाला स्थान कहा जाता है, जिसे शिव का स्थान माना जाता है.
सहस्त्रार चक्र सर्वोच्च तत्व, परम तत्व का स्थान है. इसी स्थान से मनुष्य स्व भाव की वासना से मुक्त हो कर ब्रह्म भाव के सत्य की और बढ़ता है तथा समाधि अवस्था को प्राप्त करता है. अगर शरीर का पूर्ण प्राण एक हो कर सहस्त्रार चक्र में केंद्रित हो जाता है तो व्यक्ति निश्चय ही समाधी अवस्था को प्राप्त कर लेता है, जहां पर उसका अस्तित्व ब्रह्म में विलीन हो जाता है.
आध्यात्मिक द्रष्टि से यह एक अत्यंत ही उच्चतम अवस्था कही जा सकती है जहां से व्यक्ति विविध ब्रह्मांडीय रहस्यों तथा सत्यों से परिचित होने लगता है. निश्चय ही अगर साधक अपना आध्यात्मिक स्तर इतने उच्च स्तर को प्राप्त करा सकता है तो फिर भौतिक जीवन की तो बात ही क्या. फिर भी अगर कहा जाए तो व्यक्ति के स्मरण शक्ति में उच्चतम विकास होता है, साधक आगंतुक व्यक्ति के मानस में चल रहे विचारों को जानने लगता है, ध्यान में लिन हो सकता है तथा अभ्यास के साथ साथ व्यक्ति कई प्रकार की सिद्धियों की प्राप्ति कर सकता है. लेकिन इन सब के मूल में सर्व प्रथम चेतन तथा जागरण प्रक्रियाए है.
साधक को यह समजना चाहिए की अगर कोई पिंड में चेतना नहीं है तो उसका जागरण संभव नहीं हो पता. और जो जागृत नहीं है, उसका विकास नहीं किया जा सकता और अगर वह विकास हो भी जाए तो सुसुप्त अवस्था होने के कारण यह विकास अर्थहिन् ही है.
कुण्डलिनी क्रम में पहले कुण्डलिनी को चेतन कर सभी चक्रों को धीरे धीरे चेतन किया जाता है तथा उसके बाद जागरण किया जाता है. यह क्रिया अत्यंत ही पेचीदी तथा जटिल है.  लेकिन प्रस्तुत देव दुर्लभ प्रयोग अपने आप में एक आश्चर्य है. इसका कारण यह है की यह सीधे ही सहस्त्रार चक्र अर्थात शिव स्थान को चेतन और जागरण करने की साधना है. अगर व्यक्ति इस साधना को सम्प्पन कर ले तो निश्चय ही वह सहस्त्रार चक्र से सबंधित सभी प्रारंभिक लाभों की प्राप्ति करने में समर्थ होने लगता है. सहस्त्रार से जरने वाले अमृत तत्व का उसको भान होने लगता है तथा शरीर में तत्वों का संचारण योग्य होने से साधक के रोग शोक भी शांत होने लगते है. साथ ही साथ साधक को कई प्रकार की आध्यात्मिक उपलब्धिया तो होती ही है. ऐसे गुप्त प्रयोग को प्राप्त करना निश्चय ही सौभाग्य ही है क्यों की प्राचीन तंत्र मत में मात्र कुछ ही व्यक्तियो को गुरु मुखी प्रणाली से ऐसे प्रयोगों का ज्ञान कराया जाता था. इस देव दुर्लभ प्रयोग को पारदशिवलिंग अथवा सौंदर्य रस कंकण के माध्यम से सम्प्पन किया जाता है.   
यह प्रयोग साधक किसी भी शुभदिन शुरू कर सकता है.
समय दिन या रात्रि का कोई भी हो लेकिन साधक को रोज एक ही समय पे यह प्रयोग करना चाहिए.
साधक स्नान आदिसे निवृत हो कर सफ़ेद वस्त्रों को धारण करे तथा सफ़ेद आसान पर बैठ जाए. साधक का मुख उत्तर दिशा की तरफ रहे.
साधक को अपने सामने प्राणप्रतिष्ठित विशुद्ध पारदशिवलिंग अथवा सौंदर्य रस कंकण  को स्थापित करना चाहिए. इसके बाद साधक गुरुपूजन तथा पारदशिवलिंग अथवा कंकण  का पूजन सम्प्पन करे. साधक को पूजन करने के बाद गुरुमंत्र का जाप करना चाहिए.
इसके बाद साधक शिवलिंग पर त्राटक करते हुवे निम्न मंत्र की ११ माला मंत्र का जाप करे. यह जाप साधक स्फटिक माला से करे.
ॐ शं शां शिं शुं वं वां विं वुं अमृत वर्चसे वर्चसे सोहं हंसः स्वाहा
(Om sham shaam shim shum vam vaam vim vum amrit varchase varchase soham hansah swaha)
मंत्र जाप पूर्ण होने पर साधक थोड़ी देर आँखे बंद कर के शांत चित्त से बैठ जाए. इस प्रकार साधक को ५ दिन तक करना है.
साधक को इन ५ दिन में कई प्रकार के अनुभव हो सकते है और कई द्रश्य दिखाई दे सकते है तथा विविध आवाजे सुने दे सकती है लेकिन साधक को विचलित नहीं होना चाहिए, यह सब साधना में सफलता के ही लक्षण है. माला का विसर्जन नहीं करना है, साधक भविष्य में भी इस माला का प्रयोग इस साधना को करने के लिए कर सकता है.

****NPRU****

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