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Friday, January 4, 2013

VEER NARSINGH SADHNA


 
All the incarnation of Shri lord Vishnu, protector of universe and controller of Rajas character have been amazing in themselves. From Tantra point of view, all these incarnations carries special significance and worship of all forms of lord is done in all path and all achaars.In Satvik, Raajsik and Tamsik sadhnas different forms of Lord Vishnu have highest importance but with passage of time, these sadhnas vanished and hence could not come in vogue.

In this context, his incarnation in Narsingh form is famous among sadhaks. For getting rid of fear, obstacles etc. sadhna of Lord Narsingh is done. His form may seem to instil fear but this form of lord is for problems and enemies of sadhak. For sadhak his form is very auspicious and father-like which is capable of solving any problem of sadhak.

Sadhna of Lord Narsingh is contained with in both Vedic and Tantric padhati. In Tantra, there is mention of sadhna padhati of 9 different forms of Lord Narsingh. Out of these nine forms, one form is Veer Narsingh form. It is very well known in sadhna field that Shri Aadi Shankracharya did sadhna of this form and from time to time Lord Narsingh manifested in front of him and provided him complete security from unexpected dangers and obstacles. Prayog presented here is related to this form of Lord Narsingh which is done by chanting his root mantra. This prayog provides many benefits to sadhak
There is circulation of courage in sadhak and his fear is destroyed.
Sadhak is secured from unknown obstacles.
Sadhak‘s enemy and enemy related problems are resolved.
Many evils of sadhaks are destroyed and sadhak becomes pure.

If sadhak is suffering from any Tantra obstacle or Pret obstacle then he gets riddance from them.
Procedure of prayog is as follows.
Sadhak should start this sadhna on Sunday.
Sadhak should take bath after 9:00 P.M and wear red dress.
Sadhak should sit on red aasan and face north direction.
After it, sadhak should establish picture, idol or yantra of Narsingh in front of him. In addition to Guru Poojan and Ganpati Poojan, sadhak should do normal poojan of picture, idol or yantra of Lord Narsingh. Sadhak should then chant Guru Mantra.
After it, sadhak should pray to Sadguru and Lord Narsingh for success in sadhna, take their mental permission and chant below mantra.
Sadhak has to chant 51 rounds of below mantra. Sadhak should use Moonga rosary for chanting mantra.
Om Kshoum phat

Sadhak should do this procedure for 5 days. On the last day, sadhak should ignite fire and offer 108 oblations of pure ghee by this mantra. In this manner, sadhna is completed. After completion of prayog, sadhak should immerse the rosary in pond, river etc.

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सृष्टि के पालक तथा रजस् भाव के नियंत्रक श्री भगवान विष्णु के सभी अवतार अपने आप में अद्भुत रहे है. तांत्रिक द्रष्टि से इन सभी अवतारों की विशेष महत्ता है तथा भगवान के सभी स्वरुप की साधना उपासना सभी मार्ग और सभी अचार में की जाती है. सात्विक, राजसिक तथा तामसिक भाव की साधनाओ में भगवान विष्णु के अलग अलग स्वरुप का एक उच्चतम महत्त्व है लेकिन काल क्रम में इन साधनाओ का लोप होने के कारण यह प्रचालन में नहीं आ पाए है.
इसी क्रम में उनका नृसिंह अवतार तो साधको के मध्य प्रसिद्द है ही. भय शोक निवारण, बाधा निवारण जेसी अनेक समस्याओ से मुक्ति हेतु भगवान नृसिंह की साधना की जाती है. उनका स्वरुप भले ही भय को उत्तपन करने वाला हो लेकिन भगवान का यह रूप तो साधको की समस्या तथा शत्रुओ के लिए है, साधक के लिए तो उनका स्वरुप अत्यंत ही मंगलमय तथा पितृतुल्य है जो की साधक की किसी भी समस्या का समाधान करने में समर्थ है.
भगवान नृसिंह की साधना उपासना वेदोक्त तथा तंत्रोक्त दोनों पद्धतियों में निहित है. तंत्र में भगवान नृसिंह के ९ विविध स्वरुप के बारे में विविरण तथा साधना पद्धति प्राप्त होती है. इनके इन्ही ९ रूप में एक स्वरुप है वीरनृसिंह स्वरुप. साधना जगत में यह तथ्य तो विख्यात ही है की श्री आदिशंकराचार्य जी ने भी इनके यही स्वरुप की साधना की थी तथा समय समय पर भगवान नृसिंह ने विविध रूप से प्रकट हो कर शंकराचार्य को कई आकस्मिक खतरों से तथा बाधाओ से पूर्ण सुरक्षा प्रदान की थी. प्रस्तुत प्रयोग भगवान नृसिंह के इसी स्वरुप से सबंधित प्रयोग है जो की इनके मूल मन्त्र से सम्प्पन होता है. इस प्रयोग से साधक को कई लाभों की प्राप्ति होती है.
साधक में वीरता का संचार होता है तथा भय का नाश होता है
अज्ञात बाधाओ से साधक को सुरक्षा मिलती है
साधक के शत्रुओ का तथा शत्रु सबंधित समस्याओ का निराकरण होता है
साधक के कई प्रकार के दोषों की निवृति होती है और साधक का पवित्रीकरण होने लगता है
साधक अगर किसी तंत्र बाधा या प्रेत बाधा से ग्रसित होता है तो उसे उससे मुक्ति मिलती है. प्रयोग की प्रक्रिया पद्धति इस प्रकार है.
इस साधना को साधक रविवार के दिन शुरू करे
रात्री में ९ बजे के बाद साधक स्नान आदि से निवृत हो कर लाल वस्त्रों को धारण करे. साधक लाल आसान पर उत्तर की तरफ मुख कर बैठ जाए.
इसके बाद साधक अपने सामने नृसिंह का चित्र, विग्रह  या यंत्र स्थापित करे. साधक गुरुपूजन तथा गणेशपूजन के साथ ही साथ भगवान नृसिंह के चित्र, विग्रह या यन्त्र का भी सामान्य पूजन करे. साधक यथा संभव गुरुमंत्र का जाप करे.
इसके बाद साधक सदगुरु तथा भगवान नृसिंह से साधना में सफलता के लिए आशीर्वाद मांगे तथा मानसिक आज्ञा ले कर निम्न मंत्र का जाप करे.
साधक को निम्न मंत्र की ५१ माला मंत्र जाप करना है. मंत्र जाप के लिए साधक मूंगामाला का प्रयोग करे.

ॐ क्षौं फट्
 (Om Kshoum phat)

साधक यही क्रम ५ दिन तक जारी रखे. अंतिम दिन साधक को अग्नि प्रज्वलित कर के इस मंत्र से शुद्ध घी की १०८ आहुति देनी चाहिए. इस प्रकार यह साधना पूर्ण होती है. प्रयोग पूर्ण होने पर साधक माला को विसर्जित कर दे.

****NPRU****

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