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Thursday, January 17, 2013

SOOKSHMA SHAREER AUR KUCHH JIGYASAYEN - 6





Every information related to Para or Astral world is so much titillating and secretive that you can’t even deceive yourself and resist it from yourself…….As much easy it is entering into this world, difficulty lies in maintaining the coordination and stability within it…..Because very often, we are not able to differentiate between our illusion and imagination….and from there, our doubt starts…..but that is the point when you have to focus on our vision and move ahead.
During my journey of movement by astral body, I imbibed various secrets……Describing that experience as it is will not be possible but I will try to put forward them as much as I can…..During movement by astral body when both bodies are segregated from each other then I have felt that both physical body/physical mind and astral body compiles their memories separately….
At the time of separation most of practitioners of astral body have felt that they feel a sudden click, vibration occurs and subsequently they feel the separation…….It can be felt only during practice….more it is practised with continuity , with more calmness, it gets separated. Now it is difficult to say that when one will have such an experience….it can take some days, one month or six months….While doing practice, one should not wear tight clothes….more loose clothes we wear, more convenient it is for us in doing this procedure. This fact should be kept in mind especially by preliminary practitioners.
In today’s discussion, I have tried to exhibit importance of Smriti and Shruti in movement by astral body. There exist a strong relation between movement by astral body and memory. Because whenever you come to conscious state after astral body journey, then you can yourself make out which incident has been written into your mind and in which manner? 
For example, during your journey, you have reached any cool place, then you will also have mild sensation of cold when you come back to conscious state….But it can last only for few seconds…..In the same manner , if had gone deep into water then you will have mild feeling of wetness once you get up. Reason behind giving these examples is to demonstrate the fact that most of the times, we are not able to segregate out experiences occurring to us in this procedure and hence could not unveil secret of nature which it tries to show to us in this state.
In previous articles, I put forward many technical things related to astral body in front of you all but I also consider necessary the discussion on above points since every genre has got infinite aspects. More you dive into it, more you will attain the pearls of knowledge……But you should keep on trying.
In next article, I will give description on journey of astral body related to Smriti and Shruti…….Till then…



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परा या सूक्ष्म जगत से जुडी हुई हर जानकारी इतनी रोमांचक और रहस्यमयी है की आप भरमाते हुए खुद से भी प्रतिरोध नहीं कर सकते इसे.. पर इस् जगत में प्रविष्ट होना जितना सहज है उतना ही कठिन इस् में सामंजस्य या स्थिरता बनाये रखना... क्युकी अक्सर भ्रम और काल्पना कों हम इन्तियाज नहीं कर पाते.. और वही बस असमंजस भरी कड़िया शुरू हो जाती है.. लेकिन वही एक बिंदु है जहा आपको अपने बिनाई पर केंद्रित होना है और आगे बढ़ना है...
सूक्ष्म शरीर विचरण यात्रा में मैंने अनेक रहस्यों कों आत्मसात किया.. इस् प्रवास कों ठीक वैसे के वैसे बयां करना शायद मुमकिन नहीं पर जितना हो सके आपके सामने रखने का प्रयास हमेशा रहेगा.. सूक्ष्म शरीर विचरण के दौरान जब दोनों शरीरों का विच्छेद होता है तब कई बार मैंने महसूस किया की स्थूल शरीर / स्थूल मन अपनी स्मृति का संकलन करता है और सूक्ष्म शरीर अपना..
विच्छेद के समय बहुत से सूक्ष्म शरीर प्रक्षेपकों ने अनुभव किया है की उन्हें अचानक एक क्लिक सा महसूस होता है, कंपन हो कर विच्छेद महसूस होता है... इस कों अभ्यास के दौरान ही महसूस किया जा सकता है.. जितना इसका अभ्यास सातत्यता से किया जाता है उतनी ही शांति से इसका विच्छेदन भी होने लगता है. अब ये कहना कठिन हे की कुछ दिन,  महीना या छह महीने में इसका अनुभव आये.. परन्तु अभ्यास करते वक्त कसे हुए कपड़ो कों नहीं पेहेहना चाहिए.. जितना हम शरीर कों ढीले ढाले कपडे पहनाए उतना ही आसानी इस् क्रिया कों करने में होती है. इस् बात का ध्यान खास तौर पर प्रस्ताविक अभ्यासको कों रखना चाहिए..
आज के विषय में मैंने स्मृति और श्रुति का सूक्ष्म शरीर विचरण में मेहेत्व दर्शाने का प्रयास किया है.  सूक्ष्म शरीर विचरण और स्मृति का बहुत ही घनिष्ट संबंध है. क्युकी विचरण के पश्चात जब आप जाग्रत अवस्था में आते है तब आप स्वयं ही पृथक कर सकते है की किस स्मृति का अंकन आप के मनोमास्तिश्क में किस प्रकार से हुआ है. 
उदाहरणार्थ विचरण करते हुए आप अत्यन्त ही हिम प्रदेश में पहुच जाते है तो एक ठंडक का धुंधला एहसास आप कों जाग्रत अवस्था में आने पर भी होगा.. परन्तु ये चंद पलो के लिए ही हो सकता है.. वैसे ही अगर आप जल में विचरण करते हुए गहरे निकल जाते हे तभी आपको जागने पर गीलेपन का हल्का सा एहसास होता है. इन संदर्भो कों देने का तात्पर्य यह है की अधिकाँश हम इस् क्रिया में स्वयं के साथ होते हुए अनुभवों कों पृथक ही नहीं कर पाते हे और प्रकृति के उस रहस्य से दूर हो जाते है जो वो हमें एसी अवस्था में दिखाने का प्रयास करती है.
विगत लेखो में मैंने सूक्ष्म शरीर सम्बन्धी बहुत सि तकनिकी बाते आप सभी के समक्ष रखी. परन्तु उपरोक्त बिन्दुओ पर चर्चा भी मै आवश्यक समझती हू क्युकी हर विधा की अनगनत पक्ष है आप जितना ही उसमे डूबता जायेंगे उतने ही खरे मोती प्राप्त होते जायेंगे..  परन्तु प्रयास करना नही छोडना है..
अगले लेख में मै स्मृति और श्रुति से संबंधित सूक्ष्म शरीर विचरण पर विवरण के साथ जालद ही आपसे वार्ता करुँगी.. आज के लिए यही विराम देती हू..

निखिल प्रणाम
सुवर्णा निखिल...   
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