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Thursday, February 14, 2013

BASE KUMUDANI HAMARE GURU PIYA - GURU AATM CHAKRA STHAPAN PRAYOG


त्सर्वश्रुतिशिरोरत्नविराजित पदाम्बुजः।
वेदान्ताम्बुजसूर्योयः तस्मै श्रीगुरवे नमः॥

अर्थात मैं उन सदगुरू के श्री चरणों में नमन करता हूँ जिनके एक –एक पग से श्रुतियों और ऋचाओं की उत्पत्ति हुई है और वो उस सूर्य के समान हैं जिनकी प्रखर ज्योति से वेद शास्त्रों जैसे ज्ञान के भंडार ना केवल उत्पन्न हुए अपितु उनका विस्तार भी हुआ ......ऐसे श्री सदगुरुदेव के पावन श्री चरणों में मेरा शत – शत नमन ||
जीवन उस बहती धारा के समान होता है जिसका यदि ओर छोर देखा जाए तो शायद इसे जीवन – मृत्यु के बीच की विभिन्न अनुभवों से ओतप्रोत एक यात्रा कहा जाएगा.....पर अगर इसके मर्म कों समझा जाए तो यह एक अति रहस्यमय प्रक्रिया है जो जाने अनजाने हमें भौतिक जगत से जोड़े रखने में ना केवल सक्षम है अपितु हर बार सफल भी होती है, इसीलिए तो कहा जाता है की मनुष्य ८४ लाख योनियों में जीवन यापन करने के पश्चात मानव योनी प्राप्त करता है और मानव देह में उसकी रीढ़ की हड्डी में उपस्थित ८४ लाख सूक्ष्म मोती उन्ही योनियों के प्रतीकात्मक रूप हैं और हमारे द्वारा किये जाने वाले सारे कर्म कहीं ना कहीं इन्हीं प्रतीकात्मकयोनियों से प्रेरित होते हैं......
........पर ये आधा सच है और वो इसलिए क्योंकि हर बार या यूँ कहूँ की हर जन्म में ये आवश्यक नहीं है की हम हर उस योनी की तरह हरकतें करें जिनके सूक्ष्म चिन्ह हमारे अंदर मौजूद हैं और ये तभी संभव हो सकता है जब हमें उस अच्छाई और बुराई का ज्ञान हो जो हमें खुली आँखों से ना तो कभी दिखाई दे सकती है और यदि कभी किसी कों दिखाई दे भी जाए तो उसे उसकी समझ नहीं होती पर ऐसा भी नहीं है की ज्ञान के ना होने से हम हमेशा भटकते ही रहेंगे ......क्योंकि गुरु एक ऐसी प्रखर ज्योति के समान होते हैं जिनमें अनन्त सूर्यों कों प्रकाश देने की क्षमता होती है, उनकी तुलना तीनों लोकों में किसी से नहीं की जा सकती , वो सवयं पारबरह्म होते हैं......
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः ।
गुरुरेवपरंब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥
भाव गुरु विष्णु के रूप में अंकुर के समान अपने शिष्य कों अपनी ज्ञान रूपी ममता और वात्सल्य की छांव में पहले पालते हैं और फिर शिव के रूप में उसे ज्ञान प्रदान करते हैं| जैसे शिव अनादि हैं वैसे ही गुरु भी इस सम्पूर्ण ब्रह्मांड की सर्वोपरि शक्ति हैं जिनका स्थान त्रिदेवों से भी ऊँचा हैं|
तंत्र में चार पुरुषार्थ कहें गए हैं –
                    धर्म , अर्थ , काम और मोक्ष
और इनमें से मोक्ष कों पूर्णता की अवस्था या पूर्णत्व पुरुषोत्तम की प्राप्ति कों कहा गया है और इस अवस्था की प्राप्ति आपको कौन करा सकता है ......केवल एक मात्र वही जो खुद नरों में नारायण हो अर्थात वो जो स्वयं उस अवस्था पर हो और ऐसे केवल गुरुओं में गुरु श्रेष्ठ सदगुरू ही हो सकते हैं|
जितनी सच्चाई इस कथन में है की सदगुरू यदि आपका मार्ग प्रशस्त करें तो आपको पूर्णता पाने से कोई नहीं रोक सकता......साथ ही साथ उतनी ही सच्चाई इस कथन में भि हैं की पूर्णता केवल उसी कों प्राप्त होती है जो उसके लिए प्रयतनशील रहता है| इसीलिये उत्तम पुरुष ना तो केवल लौकिक होते हैं और ना केवल पारलौकिक मतलब ना तो एक साधू सन्यासी के घर जन्म लेने से कोई मोक्ष का अधिकारी बन् सकता है और ना ही किसी कार्य विशेष के लिए भू लोक पर समय – समय में अवतरित हुई दिव्य आत्माएं इस परम अवस्था की प्राप्ति कर सकती हैं......इसके लिए उन्हें भी अपना चरित्र और जीवन शैली ऐसी बनानी पड़ी जिससे वो इस स्थिति कों प्राप्त कर सकें| भगवान राम कों उनके चरित्र की उच्चता के कारण ही मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है|
 हर पुरुष और हर स्त्री इस स्थिति कों प्राप्त हो सकती है यदि वो सही ठंग से जीवन जिये और उचित आचरण करे क्योंकि मानव जीवन का उदेश्य केवल पुरुष बने रहकर काम वासना कों भोगना नहीं है अपितु उसके जीवन का उदेश्य तो मानवी स्तर से उपर उठकर पुरुष से पुरुषोत्तम और नर से नरोत्तम बनना है और ऐसा केवल तब ही संभव हो सकता है जब हमारा जीवन और हमारी साँसे केवल कहने मात्र से नहीं अपितु सच में हमारे गुरु के चरणों में अर्पित हों......हमारे गुरु हमारे प्राणों में बसे हों.....हर पल, हर क्षण हमें केवल उनका ही चिंतन हो.....
बीते दिनों में हुए सेमिनार में कुछ भाईयों का प्रश्न था की साधना का चयन कैसे करें?
हमें कैसे पता चलेगा की हमे अभी ये साधना करनी चाहिए या नहीं क्योंकि हम इस क्षेत्र में अभी नए हैं?
समर्पण कैसे लेकर आयें अपने अंदर ?
और इस जैसे और भी ढेर सारे प्रश्न जिनका उत्तर उस समय केवल एक मुस्कुराहट ही हो सकता था  क्योंकि मास्टर एक बात जो बार बार मुझे समझाते हैं वो यह है की “समय अपने साथ हर प्रश्न का उत्तर लेकर आता है”और आज समय है एक ऐसे प्रयोग कों आप सब भाई बहनों के समक्ष रखने का जो अपने आप में आपके हर प्रश्न का उत्तर है|
जैसे की इस प्रयोग का शीर्षक ही हमें समझा रहा है की यह प्रयोग हमारे प्राणाधार , हमारे सदगुरुदेव से संबंधित है | जरूरी नहीं की यह प्रयोग केवल निखिल शिष्यों के लिए हैं , इसे हर वो व्यक्ति कर सम्पन्न कर सकता है जो चाहता है की उसकी आत्मा का सामंजस्य उसके गुरु की आत्मा से हो जाए , क्योंकि एक बार ऐसा होने पर आपको ना तो साधना का चयन करने में कोई परेशानी होंगी और ना ही आपमें समर्पण का आभाव होगा क्योंकि इस प्रयोग कों सम्पन्न करने के बाद हर साधना फिर चाहे वो किसी महाविद्या से संबंधित हो या फिर श्मशान से आपको गुरु साधना ही लगेगी और जहाँ तक बात आती है समर्पण की तो जिनके प्रति आपको समर्पण का भाव रखना है वो जब आपकी साँसों में ही बस जायेंगे , जब आपका हृदय उनका निवास स्थल बन् जाएगा तो समर्पण अपने आप आ जाएगा क्योंकि हमारा प्रिय जब हमारे साथ, हमारे सामने हो और जब वो हमसे दूर हो तो उनके  प्रति हमारी भावनाओं में अंतर होना स्वाभाविक है | कहने का तात्पर्य यह हैं की जब सदगुरुदेव आपके हृदय में ही रहने लगेंगे तो समर्पण कों कहीं बाहर से ढूँढ कर लाने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी|
प्रयोग विधि –
किसी भी गुरूवार को प्रातःकाल इस साधना को आप संपन्न करें| ज्यादा उचित होगा की आप प्रातः ८ बजे तक इस विधान को कर लें| वस्त्र व आसन पीले होंगे,दिशा उत्तर होगी,दीपक घृत का प्रयोग करें|स्नान कर वस्त्र धारण कर आसन पर बैठ जाएँ और सदगुरुदेव तथा भगवान गणपति और दीपक का पूजन करें पूजन में सुगन्धित पुष्प और दूध से बने नैवेद्य का प्रयोग करें और साथ ही गुरुमंत्र की ५ माला तो मंत्र जप करें और अब उनके समक्ष हाथ जोड़कर प्रार्थना करें की “वे अन्तः शरीर या ब्रह्माण्ड शरीर स्थित आत्मचक्र में पूर्ण भव्यता के साथ स्थापित होने की कृपा करें और जीवन को पूर्णता प्रदान करने की कृपा करें|”
  इसके बाद निम्न दिव्य मंत्र की ११ माला मन्त्र जप गुरुमाला से करें,

ॐ निं खिं लं ब्रह्माण्ड स्वरूपाय श्री निखिलेश्वराय शिव रूपाय मम आत्म चक्रे पूर्ण स्थापय ॐ ||

OM NIM KHIM LAM BRAHMAAND SWAROOPAAY SHRI NIKHILESHWARAAY SHIV ROOPAAY MAM AATM CHAKRE POORN STHAAPAY OM ||

  जप काल में पूरा शरीर ऐंठता हुआ लगता है,शरीर भारी हो जाता है,किन्तु थोड़े समय बाद ही सब कुछ सामान्य और हल्कापन लगने लगेगा| अतः आप अद्भुत सुगंध का अनुभव करते हुए इस साधना को संपन्न करें|ये एक दिवसीय साधना बहुत महत्वपूर्ण है शिष्यों के लिए जो सदगुरुदेव को हमेशा अनुभव करना चाहते हैं उन्हें अपने प्राणों में उतारना चाहते हैं| साधना के बाद आप प्रसाद को स्वयं और परिवार के साथ ग्रहण कर सकते हैं|
  हमेशा की तरह इस बार भी प्रयोग के सम्पन्न होने के बाद आपको प्रतिदिन अपनी दैनिक साधना या फिर कोई भी विशेष साधना या अनुष्ठान शुरू करने से पहले इस मंत्र की एक माला करनी ही है जिससे की आपको एहसास हो की सदगुरुदेव वहीँ आपके आस पास हैं और ऐसा होगा और होता ही है क्योंकि वो तो कण – कण में व्याप्त हैं -
अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम् ।
तत्पदं दर्शितं येनतस्मै श्रीगुरवे नमः ॥

“निखिल प्रणाम”
****ROZY NIKHIL****
****NPRU****

2 comments:

Alakh v.karma said...

sachmuch yah ek ati uchch koti ki sadhna he..... esi sadhna sabhi sadhnao ki sirmor he... iss sadhna ko to har haal me karna hi chaiye....

Alakh v.karma said...

ye sadhna to pratek k liye aavshyak he... saans lene jesi.... apka bahut bahut dhanyawaad ....