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Saturday, February 23, 2013

TANTRA DARSHAN - SIDDH KUNJIKA STOTRA KE GUPT RAHASYA(PAARAD TANTRA AUR DURGA SAPTSHATI)


मित्रों, इस अद्बुत स्तोत्र के रहस्य कों उजागर करने के पूर्व, मै आप लोगो से कुछ तथ्य बांटना चाहता हू जो मेरे अपने अनुभवों में से है, कैसे मुझे ज्ञात हुए ये पूज्यपाद सदगुरुदेव जी का आशीर्वाद तो सदा से मुझ पर रहा है इसमें कोई नयी बात नहीं, और ना केवल मुझ पर अपितु हम सभी इस बात का अनुमोदन करेंगे की उनका आशीर्वाद सदेव हम सभी पर है ही. सदगुरुदेव जी ने दुर्गा सप्तशती की महत्ता के बारे में कई बार मंत्र तंत्र यन्त्र विज्ञान पत्रिका में उल्लेख किया है. (वैसे ये एकमात्र उन तांत्रिक ग्रंथो में से है जो मूलरूप में आज भी हमारे समक्ष है) परन्तु मैने  उन पूर्व अंको की तरफ कभी खास ध्यान ही नहीं दिया. सिर्फ पढ़ लिया करता था. असल में तो मै उसे हलके में ले लिया करता था. मै उनके दिव्य शब्दों की महत्ता कों नहीं समझता था, नहीं समझ पाया था उन बोलो कों जिस पर वे हमेशा जोर दिया करते थे. मैंने इस दिव्य ग्रन्थ कों मात्र माँ दुर्गा की स्तुति और एक कहानी जिसमे माँ भगवती असुरों से युद्ध करती है और जो संस्कृत में प्रकाशित है. बस, इससे ज्यादा और कुछ नहीं... मरे कई गुरु भाइयो ने मुझे बताने की कोशिश की इस ग्रन्थ के बारे में, परन्तु में स्तोत्र वोत्र में इच्छुक नहीं था कभी. मंत्र और साधना में ही मेरी रूचि थी. कभी इस पर ध्यान ही केंद्रित करने का नहीं सुझा.   
पर वो जो सदगुरुदेव पर निर्भर है, फिर कैसे भला वे छोड़ देते अपने बच्चे कों इस भटकन भरी जिंदगी में, भले ही बात छोटी हो या बड़ी.. और फिर वो दिन आया जब मै पहली बार आरिफ जी से मिला ( वह कहानी कभी और बताऊंगा शायद आगे आने वाले समय में ) उन्होंने मुझे एक महान तत्र मंत्र के साधक के बारे में बताया जो अब तक जीवित अवस्था में वाराणसी में रहते है. वे अब तक अपनी वही तरुणावस्था की ऊर्जा कों बरकरार रखे हुए है अपनी ९० साल की आयु में भि.. मै यकीन ही नहीं कर पाया की वे सच कह रहे है. उन्होंने मुझे कई बार उनसे मिलने के लिए कहा परन्तु समय निकलता गया और ऐसे करते करते ४ महीने बीत गए. सच कहू तो मै उनके आग्रह के पीछे की भाव भूमि कों समझ ही नहीं पा रहा था. उनसे मिलने की बात कों हलके में ले रहा था. 
जेसा की मैंने ऊपर बताया की मेरे अपने संकोच के कारण मै यही सोचता था की जब सदगुरुदेव जी है तो किसी और की क्या आवश्यकता. कही और क्यों जाना... पर उन्होंने कहा की सदगुरुदेव जी ने हमें कभी नहीं कहा या रोका कही और से ज्ञान बटोरने के लिए अगर वे प्रामाणिक सिद्ध साधको की श्रेणी में आते है तो, उन्होंने हमें कभी बाँध के नहीं रखा अपितु उन्होंने हमें हमेशा स्वछन्द श्वास लेने के लिए कहा. सो एक दिन मै बनारस चला गया, वैसे तो मै बहुत ही बेचैन था क्युकी आरिफ जी ने मुझे पहले से ही कहा था की भैया वे तो ऐसे व्यक्ति है जो कुछ मिनटों में तोल लेते है की कोन कितने पानी में है. मुझे लगा की तो हो सकता हे की मै भीकुछ मिनटों में बाहर आ जाऊ.. इसीलिए पुरे प्रवास में सतत सदगुरुदेव जी से प्रर्थना करते हुए आ रहा था की इस् उद्देश्य से यह मेरा पहला प्रवास है तो आप मुझे इसमें सहायता कीजिए. यहाँ तक की वह पहुचने पर उन मंदिरों शिवालयों में दर्शन करने पर भी मै यही प्रार्थना में लगा रहा की मुझे सफलता प्रदान करे.

उस साधक ने मेरा स्वागत किया. उनके मुखमंडल का तेज और तरुणाई की उर्जा अब तक झलक रही थी. परन्तु मै तो नर्वस था ही इसीलिए कुछ बोल ही नहीं पाया. मैंने देखा कुछ ही मिनटों में वे मुझ से खुल कर बातचीत करने लगे. उसके बाद तो उन्होंने मेरे कई सवालों के जवाब दिए. (उसमे कई मूर्खतापूर्ण भी थे) पहली ही मुलाकात में हमने अनेक विषयो पर जेसे साधना, तंत्र, मंत्र और निश्चित ही दुर्गासप्तशती पर भी बातचीत करी. बातों बातों में पाता ही नहीं चला की कब ६ घंटे बीत गए. उन्होंने इस् दिव्य ग्रन्थ के बारे में मेरी धरणा कों बहुत हद तक दूर करी. साथ ही साथ नवीन रहस्यों कों भी उजागर किया मेरे सामने.. वह से लौटते हुए मै इस दिव्य ग्रन्थ कों खरीद लाया. और बाद में मैंने सदगुरुदेव और माँ दुर्गा से क्षमा याचना की अपनी अब तक की इस गलत धरणा के लिए और उपेक्षा भव रखने के लिए.. खैर देखा जाए तो ये एक और लीला ही थी सदगुरुदेव जी की मेरे प्रति की मै फिर सही ट्रेक पर चलने लगु.
आगे आने वाले लेखो में कुछ और रहस्यों कों उजागर करूँगा जो मुझे उनसे प्राप्त हुए. लगता हे मै कुछ ज्यादा ही बोल रहा हू तो चलिए मुद्दे पर पुनः लौटते है..
सिद्ध कुंजिका स्तोत्रं
फिर एक दिन मैंने उन्हें फोन किया (बनारस के उन महान साधक कों) और पुछा- की क्या कोई गुप्त सिद्ध कुंजिका स्तोत्रं भी है, जिस पर मै आपसे चर्चा करना भूल गया हू, फिर बड़ी ही सरलता से उन्होंने कहा की इन सब बातो पर समय और उर्जा मत गवाओ, और मेरा ध्यान दूसरी ओर केंद्रित करते हुए बोले की जो मैंने पहले बताया था उसे याद रखो. फिर मुझे लगा की उस स्तोत्र का कोई खास महत्त्व नहीं जब की इस दिव्य ग्रन्थ में तो इसके बारे में बहुत ही उल्लेख मिला.. फिर एक दिन मै और आरिफ जी एक विशेष चर्चा में गुम थे तो बात करते हुए मैंने उन्हें पूरा वृतांत सुना दिया. जब मैंने स्तोत्र सम्बन्धी बाते बताई तो सुनने पर वे सिर्फ हलके से मुस्कराए.. मैंने समझा की वे भी मेरे इस बात का समर्थन कर रहे हे. सदगुरुदेव के आशीर्वाद से हम दिव्य माँ शक्ति रूपा के पावन मंदिर में बैठे कुछ महत्वपूर्ण चर्चा में रत थे. हमारी चर्चा पारद विज्ञान के अमूल्य सूत्रों पर हो रही थी. मै भी सुन रहा मेरे कुछ गुरु भाईयो के साथ. और फिर अचानक उन्होंने “सिद्ध कुंजिका स्तोत्र” के बारे में बोलना शुरू किया.. मै हतप्रभ रह गया की उस समय उन्होंने इस पर कुछ भी नहीं कहा और आज अचानक (मतलब, क्या मैने उस मुस्कान कों गलत समझ लीया था) सदगुरुदेव जी ने उन्हें इस् स्तोत्र की गुप्त कुंजी दि थी. तो कुछ पंक्तिय इसी संबंध में जो सदगुरुदेव जी के ज्ञान गंगा से उद्दृत हुई है आरिफ जी के मुख से –

“बहुत लोग हमारे प्राचीन शास्त्रों और ऋषि मुनियों के ज्ञान कों बहुत ही हलके में लेते है. वे जानते नहीं की प्रत्येक स्तोत्र अपने आप में गुढ अर्थ निहित है. और अगर उसे समझ लिया जाए तो फिर क्या असंभव है. अगर आप लोगो कों दयां हो तो सदगुरुदेव ने एक बार श्री सूक्त के अंतर्गत स्वर्ण निर्माण करने की विधि का उल्लेख किया था, हना ये उसका शाब्दिक अर्थ तो नहीं पर हे संकेत लिपि में बद्ध.( इसका भाषांतर अभी भी“स्वर्णसिद्धि” पुस्तक में लिखित है)”
“ऐंकारी सृष्टि रूपायै” अर्थात ऐंग बीज मंत्र की सहायता से कुछ भीनिर्माण किया जा सकता है, और जब मै कहता हू की कुछ भीमतलब कुछ भीही है... इसलिए जब खरल क्रिया करते हुए इस मंत्र का जाप किया जाय तो पारद में सृजन की शक्ति निर्मित हो जाती है (सदगुरुदेव जी ने भीइस बीज मन्त्र के बारे में बहुत वर्णन किया है ) इस ऐंग मंत्र के द्वारा बिना गर्भ के बालक कों जन्म दिया जा सकता है. इस् क्रिया कों महर्षि वाल्मीकि ने त्रेता युग में सफलतापूर्वक प्रदार्शित किया था जब कुश(भगवन राम के पुत्र) का जन्म हुआ था. मै यहाँ प्रक्रिया तो नहीं परंतु पारद से इसका क्या संबंध है ये बताने का प्रयास कर रहा हू.
“ह्रींकारी प्रतिपालिका” अर्थात माया बीज, इस् भोतिक जगत में किसी भीधातु का रूपांतरण कर समस्त भौतिक सुखो का उपभोग किया जा सकता है. जब ह्रींग मंत्र का जाप रूपांतरण क्रिया के दौरान किया जाए तो सफल रूपान्तर संभव है. और इससे सफलता के प्रतिशत द्विगुणित भी हो जाते है.

“क्लींकारी काम रूपिणयै” अर्थात क्लीं बीज मंत्र आकर्षण के लिए होता है जससे बंधन क्रिया कों सफलता पूर्वक संपन्न किया जा सकता है. यह बीज साधक की देह कों दिव्य कर विशुद्द पारद सामान कर देता है. यह काम बीज आतंरिक अल्केमी में उपयोग होता है.. इस संबंधित कई साधनाए सदगुरुदेव ने दि है.
“बीजरूपे नमोस्तु ते” अर्थात यहाँ कहा गया है की मै नमन कर्ता हू इन बीज रूपी शक्तियों कों. हे पारद मै बीज स्वरूप में आपकी पूजा करता हू. ये इस् बात का भी प्रतीक है की मै ऐसा करके पारद कों बीज स्वरूप में पूज कर सिद्ध सूत का भी निर्माण करता हू. जिस से समस्त संसार की दरिद्रता का नाश हो सकता है. जो प्रत्येक रसायनशास्त्री का ध्येय हो सकता है.
“चामुंडा चंडघाती” अर्थात मृत्यु कों भी परास्त कर, अगर प्रत्येक संसकार कों सफलता पूर्वक संपन्न किया जाए तो इस से रोग रूपी मृत्यु पर भी विजय प्राप्त की जा सकती है, चंड यहाँ दानव का घोतक है. यहाँ “च” शब्द नाश/मृत्यु हे जिसे पारद में प्रेरित कर ऐसा पारद निर्माण किया जा सकता हे जिससे अकाल मृत्यु, इच्छा मृत्यु प्राप्त की जा सकती है.  
“च यैकारी वरदायिनी” अर्थात समस्त प्रकार के वरदान देने वाले पारद जो इस् सम्पूर्ण क्रिया का फल है.
“विच्चै चाभयदा नित्यम नमस्ते मंत्ररुपिणी ” अर्थात समस्त प्रकार के आरक्षण इस पारद तंत्र विज्ञान में है इस विच्चै बीज में. इस से सभी प्रकार की विनाशकारी शक्तियों से आरक्षण प्राप्त किया जा सकता हे, अभयम अर्थात एक दिव्यता जहा भय वास ही नहीं करता और जो केवल इसी से संभव है.
“धां धीं धूं धूर्जटे” अर्थात समस्त प्रकार के प्रलयकारी शक्तियो कों इस से वश में किया जा सकता है. धुर्जटा शक्ति (जो शिव का ही एक रूप है ) अर्थात ऐसे सम्पुटित पारद से हमारे समस्त दोष जो शत्रुवत है उनसे भी मुक्ति का मार्ग प्रशस्त हो सकता है.
“वां वीं वूं वागधीश्वरी” अर्थात जो माँ सरस्वती से संबंधित है. (ज्ञान की देवी) मैंने वही रोक के पूछा क्यों - यहाँ माँ सरस्वती पारद से कैसे संबंधित है ? आरिफ जी बोले, भैया क्या आपने कभी ध्यान दिया सा + रस + वती . यहाँ पारद कों रस कहा है (अब मुझे समझ आया की प्रत्येक देवी के नाम में एक गुप्त अर्थ छुपा है)
“क्रां क्रीं क्रूं कलिका देवी” अर्थात बिना माँ काली के, जो काल की देवी है, और निश्चित काल के बिना केसे हम पारद संस्कार कर सकते हे अपितु हम तो सभी काल के बंधन में है. इसीलिए उनकी कृपा से ही पारद के द्वारा काल पर विजय प्राप्त की जा सकती है. इसीलिए इस् बीज मंत्र द्वारा असंभव कों भी सम्भव किया जा सकता है. इसी सन्दर्भ में कृपया आरिफ जी महाकाली साधना पर आधारित लेख कों पढ़े जिसमे उन्होंने इस् बीज मंत्र का विश्लेषण किया है. 
“शां शीं शूं में शुंभ कुरु” अर्थात इस संसार की सभी अचूक एवं धनात्मक शक्तिया सफलता प्राप्ति हेतु हमें सहायता करे. और इस् बीज मंत्र द्वारा ये सभी पारद में समाहित हो जाये.
“हुं हुं हुंकार रूपिणयै” यह बीज मंत्र आधारित हे नियंत्रण शक्ति पर. पारद अग्नि स्थायी क्रिया इसी पर आधारित है. ‘सदगुरुदेव लिखित – हिमालय के योगी की गुप्त शक्तियां’ में सदगुरुदेव जी ने एक एसी क्रिया का उल्लेख किया है जिस में उन्होंने केवल श्वास द्वारा पारद शिवलिंग का निर्माण किया है. केवल ‘हुं’ बीज मंत्र जो किसी भी वस्तु कों आकार देने में संभव है और ये केवल इसी बीज मंत्र द्वारा ही यह संभव हो सकता है. ठीक जेसे स्तम्भन क्रिया में होता है. और बहुत से रसायन शास्त्रियों के लिए अग्निस्थायी पारद बनाना उनका स्वप्न रहता है. जो केवल इस बीज मंत्र द्वारा ही संभव है.
“जं जं जं जम्भनादिनी” अर्थात सभी प्रकार की ज्रभंकारी शक्तियों जो मुक्ति हेतु उपस्थित होती है.
“भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी....” अर्थात माँ भैरवी (भगवती पार्वती) के आशीर्वाद के बिना कैसे हमें पारद के लाभ मिल सकते है. हे माँ मै आपका नमन करता हू की आपकी कृपा के बिना इस बीज मंत्र से संसकारित पारद का लाभ समस्त संसार कों मिल ही नहीं सकता.
“अं कं चं.....स्वाहा ” ये सभी बीज मंत्र पारद की प्राण प्रतिष्ठा के लिए उपयोग होते है. प्राण प्रतिष्ठा के बाद ही इस में प्राणों का संचार होता है और तभी ये पारस पत्थर में परावर्तित होता है साधक के लिए.  इस् क्रिया कों करने का संकेत ये बीज मंत्र ही दर्शाते है. और इन्ही के कारण ये क्रिया संपन्न होती है.
“पां पीं पूं पार्वती पूर्णा” जेसा की आप सभी जानते है की गंधक अर्थात पार्वती बीज हे रसायन तंत्र की भाषा में, और बिना इस् बीज के कैसे भला पारद(शिव बीज अर्थात वीर्य) का बंधन संभव है.. इसीलिए इन तीन बीज मंत्रो से ही पारद बंधन क्रिया संपन्न होती है.
“खां खीं खूं खेचरी तथा” इसका अर्थ है कैसे खेचरत्वता अर्थात आकाश गमन क्षमता कों पारद में संस्कारित कर इन तीन बीज मंत्रो से इस् क्रिया कों संपन्न कीया जा सकता है. हमने बहुत से लेखो में खेचरी गुटिका के बारे में पढ़ा है परन्तु इसका निर्माण केसे होता है ? परन्तु इस् बिंदु पर सभी मौन हो जाते है.. अगर वर्ण माला में अ से ज्ञ तक (हिंदी शब्दमाला ५२ अक्षरों की होती है ) परन्तु इसमें किस अक्षर का उपयोग होता है खेचरी गुटिका के निर्माण में ये एक अद्बुत रहस्य है. उपरोक्त पंक्तिय वही रहस्य उद्घाटित करती है. ये हमारा सौभाग्य ही होगा अगर हम सदगुरुदेव के श्री चरणों में इस् उपलक्ष साधना एवं वही रहस्य का प्रकटीकरण की प्रर्थना करे और हमें वे प्रदान करे. 
“सां सीं सूं सप्तशती देव्या मंत्रसिद्धिं”–अर्थात ये तीन बीज है जो हमें सिद्धि प्रदान करने में सहायक होते है साथ ही साथ पारद विज्ञान में भि, क्युकी अगर सिर्फ रसायन क्रिया कर के ही सब हासिल होना होता तो अब तक वैज्ञानिको ने सभी सिद्धियाँ प्राप्त कर ली होती. जब की उनके पास तो सभी सुविधाए उपलब्ध होती है. इसीलिए यह स्पष्ट है की मंत्र सिद्धि इस् विज्ञान का अभिन्न अंग है सफलता प्राप्ति हेतु.

“अभक्ते नैव दातव्यं गोपितं रक्ष पार्वती” भगवान शिव कहते है हे पार्वती जी से की इस रहस्य कों कभी भी ऐसे स्थान पर उजागर नहीं करना चाहिए जहा साधक सदगुरू और पारद के प्रति समर्पित ना हो.
“न तस्य जायते सिद्धिररणये रोदनं यथा” अर्थात जिस किसी कों अगर इन सूत्रों का ज्ञान नहीं होगा तो वह कदापि पारद विज्ञान में सफलता प्राप्त नहीं कर सकता.. उसके सभी किये प्रयास व्यर्थ हो जायेंगे इन सूत्रों के बिना इसीलिए ये तो वही बात हुई की अरण्य में अकेले विलाप करना वो भी बिना किसी उद्देश्य के.
आरिफ जी मुझे देख कर मुस्कुराए, और कहा की भैया अब शायद आप समझ गए होंगे की क्यों उन बनारस के साधक ने आपका ध्यान कही और केंद्रित करना चाहा. वास्तव में इस् स्तोत्र के कई गुढ़ अर्थ है. और यही कारण रहा की सिद्ध साधक सावंत जन भी इन सूत्रों कों उजागर करने से कतराते है.. क्युकी बहुत ही कम लोग इसका मर्म समझ पाते है और इस मार्ग पर आगे बढते है और मै इस् बात पर पूर्णतः सहमत हुआ.. और हम दोनो एक साथ मुस्कुराए..

अब जाके मुझे समझ आया की स्तोत्र का उच्चारण आपका मार्ग प्रशस्त कर सकता है परन्तु इसके गुढ़ रहस्य और सटीक मर्म कों जान लेना असली सफलता है. सिर्फ इसी विधा में ये तथ्य लागू नहीं होता अपितु तंत्र की प्रत्येक विधा में यह नियम लागू होता है. उन्होंने इस पुरे वृतांत कों क्रमबद्ध करने की लिए मुझे कहा था. ताकि हमारे सभी अन्य गुरु भाई बहन और नए जिज्ञासु भी इस विज्ञान के इस पृष्ठ से लाभ उठा सके जो सदगुरुदेव प्रणीत है.
सो मेरे प्रिय भाई मैंने अपनी तरफ से एक कोशिश की है.. पिछले ४ घंटो से मै इसी में व्यस्त रहा की कैसे उस पुरे ज्ञान संभाषण कों लिपिबद्ध करू.. क्युकी मै ऐसे घटनाओं का विवरण देने में कुछ खास निपुण नहीं.. ;-) और ये मेरा पहला प्रयास है.. इसीलिए धन्यवाद देता हू.
अरे मुझे नर्मदा नदी के किनारे भी जाना था अपने मित्रों के साथ और यहाँ बहुत ही ठण्ड हे भाई...सो चलिए अब मै विदा लेता हू, अगर आपको पसंद आया हो तो इसे जरुर सभी भाई बहनों के मध्य पोस्ट करना... सदगुरुदेव का स्नेहाशिर्वाद मेरे साथ सभी पर बना रहे इसी कामना के साथ... smile…
****NPRU****

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