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Thursday, February 7, 2013

TRUTH !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!


मित्रो,
 जैसे जैसे साधना सामग्री के  बारे मे और पारद विग्रहों के बारे मे हमारी ओर से आपके सामने जानकारी आती जा रही हैं,साथ ही साथ इन वस्तुओ को प्राप्त करने के लिए आप लोगों का  उत्साह भी साफ़ साफ़  परिलक्षित होता हैं  तो यही समय हैं की कुछ प्रश्नों के उत्तर आपके सामने स्पस्ट होना ही चाहिये,और यह आवश्यक भी हैं जिससे आप सभी  और भी सुविचारित  तरीके से पूरी तरह निर्णय ले कर ही इन वस्तुओ को प्राप्त करने के लिए हमसे कहें.
इनमे से कुछ प्रश्न बेतुके  से भी  हो सकते हैं पर उन सभी को आप ध्यान से पढ़े .
प्रश्न :NPRU द्वारा  उपलब्ध कराये जा रहे विभिन्न साधनात्मक दुर्लभ वस्तुओ का लागत मूल्य इतना अधिक क्यों हैं ?
उत्तर –मित्रो,यह हम कई कई बार स्पस्ट कर चुके हैं,की इन वस्तुओ को उपलब्ध कराने हेतु हमारा कोई व्यापारिक उदेश्य नही हैं.हलाकि कतिपय लोगों को ऐसा लगता होगा,और ऐसा लगने के लिए हमेशा से ही वे स्वतंत्र हैं,न केबल अभी  बल्कि आगे भी  ..क्योंकी यह उनका कार्य हैं पर यह विचारणीय तथ्य हैं कि हमारी कोई भी दूकान या शाखा नही हैं,साधको के लाभार्थ कई कई बार जो दुर्लभ वस्तुए हमें प्राप्त हो सकती हैं या जिनकी हमें  जानकारी हमारे वरिष्ठ सन्यासी गुरू भाई बहिन द्वारा प्राप्त होती हैं,उनको उपलब्ध करवाने  हेतु  यह एक प्रयास ही हैं.इन दुर्लभ वस्तुओ को प्राप्त करने मे लगा श्रम,उन दुर्लभ वस्तुओ की शोधित करना और विभिन्न प्रक्रिया से संगुफित करना, जिनमे  हवन और अन्य  प्रक्रियाये हैं.
अब किसी अन्य स्थान की तरह  बस  एक ताबे का टुकड़ा लेकर कुछ भी बना कर  कर उसे उपलब्ध करा दिया जाए,फिर चाहे किसी साधक का सारा श्रम बेकार हो जाए,वह इन आलोचकों को स्वीकार हैं,क्योंकी वह साधना सामग्री मात्र कुछ रुपये मे प्राप्त  हो गयी हैं, और अब अपनी सारी असफलता अब सदगुरुदेव जी पर आरोपित कर दें.अब आप सोच लें.की सही प्रामाणिक सामग्री उपलब्ध करवाना भी मानो एक गुनाह हैं .कुछ ऐसे मानसिकता वाले  लोग तो हर बात का केबल आर्थिक पक्ष ही देखते हैं.
प्रश्न :इसका क्या प्रमाण हैं की उपलब्ध कराई जाने वाली वस्तुए प्रामाणिक हैं .?
उत्तर –मित्रो,आश्चर्य की बात  तो यह हैं की जहाँ लोग हज़ारों रूपये  दे रहे हैं,आप इशारा समझ सकते हैं,वहां सामग्री की गुणवत्ता की बात करने मे  इन आलोचकों को साप सूंघ जाता हैं.वहां तो कुछ बोला ही नही जाता हैं और अपने बचाव ने एक से एक तर्क ,पर यदि कोई प्रामाणिक साधना उपकरण उपलब्ध करवा  रहा हैं  तो उसे चाहिये की वह इन कतिपय  फर्जी आई डी धारक  आलोचकों  से पहले प्रमाण ले,इनकी सहमति ले.हमने सदैव कहा है की आप इन सामग्रियों की सत्यता को परखने के लिए स्वतंत्र हैं.इनकी प्राण ऊर्जा को मापने के लिए जिन यंत्रों का प्रयोग किया जाता है,उसके द्वारा इनकी प्राण ऊर्जा को स्वयं हो माप लीजिये.और जाकर उन स्थानों की भी सामग्री का सत्यापिकरण करवा कर देखिये,जो ये कहते हैं की सामग्री प्रमाणिक है और प्रत्येक साधना और विधान को सामग्री की ओट लेकर मात्र करोडो रुपयें खीचते हैं.
    आभा मंडल मापने वाले यंत्र से प्राण प्रतिष्ठा का तेज नापिए स्वतः हि दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा.किसी श्रेष्ठ कर्मकांडीय विद्वान् से एक बार पूरा विधान और उस क्रिया पर होने वाला व्यय ज्ञात तो करके देखिये.(विधि विधान को तो मैंने यहाँ पर चर्चा में शामिल भी नहीं किया है) 

    और क्या  कहूँ इन आलोचकों  लोगों ने शायद अपनी माँ का दूध पिया नही हैं ,अन्यथा फर्जी  id से कभी उग्रतारा तो कभी गुरू त्रिमूर्ति की फर्जी आई डी  बना कर आरोप लगाना ,और अपने आप को सिद्ध हस्त तांत्रिक बताना,पर हिम्मत तो इतनी नही की, अपनी सही आई डी  से सामने आये और अपनी बात कहें,आमने सामने की लडाई के लिए तो  हमारी सारी टीम तो हमेशा से तैयार हैं,और ऐसा भी नहीं है की हमें इस तथ्य का ज्ञान नहीं था की कौन ऐसा कर रहा है, वो अपने बन कर हि तो ऐसा कर रहे थे.किन्तु इसका लाभ हुआ क्या.
कोई महीने  मे मारण प्रयोग करके  हमे  नेस्तनाबूद  कर रहा था. तो कोई  अब इस होली की रात मे मारण प्रयोग करने की तैयारी मे लगा हुआ हैं,इन पक्तियों के माध्यम से इन कतिपय सिद्ध  हस्त तांत्रिको को यही चुनौती देता हूँ की जिस भी भयंकर  से  भयंकर मारण प्रयोग को ये कर सकते हैं करके देख लें,हमारा  एक बाल भी  टेढा कर पाए  तो बताये.क्यूंकि कम से कम हमारी आई डी तो वास्तविक फोटोज के साथ ही है.वास्तविक तंत्र मुह पर चुनौती देता है और क्रिया को सफल बनता है.कौन कब कहाँ क्या क्या बाते करता है योजनायें बनता है...इतना तो हमारी समझ में भी आता ही है.
     मित्रो,दोस्त बने तो इतना साहस रखें की सामने साथ खड़े  हो सकें और शत्रुता रखें  तो भी सामने आकर चुनौती दे,कायरो की भांती फर्जी आई डी से अपशब्दों और अपनी अमर्यादा  दिखाना का  क्या अर्थ हैं.क्या हम आज तक कोई भयभीत  हुये,आप सभी ने  विगत मे  हुये अनेक प्रयास देखें ,पर हम तो आगे बढते  गए,आज भी कई कई ग्रुप मे यही कृत्य होते रहते हैं.                 
अगर आपको भरोषा  नही हैं  तो  आपके  लिए  यह साधनात्मक वस्तुएं  नही हैं.
    मित्रो हमने यह बात बार बार की हैं की जिन भी प्रक्रिया की हम बात करते हैं जो इन साधनात्मक वस्तुए के निर्माण मे की जाती हैं वह जो सत्य मे  इसको सीखना चाहते हैं और उनमे चाहे गयी यथा उचित योग्यता  के साथ विन्रमता भी यदि हो तो जितना हमें निर्देश हुआ  हैं उस मर्यादा के अंतर्गत हमें सिखाने मे  कोई आपत्ति नही हैं,पर इसे यह न समझा जाए की हर किसी के लिए यह संभव हैं आप यह समझ सकते हैं.अन्यथा यहाँ कोई कोचिंग सेण्टर तो हैं नही.और जिन भी भाइयों ने  हमारे द्वारा आयोजित कार्यशालाओ मे भाग लिया हैं वह इस तथ्य से भली भांती परिचित हैं,अब क्यों नही हम यह कार्यशालाएं कर रहे हैं तो उसका यही उत्तर हैं की पूर्व मे हमने यह सारी प्रक्रियाये सभी के लिए कर दी ,जिसका परिणाम यह हुआ की हमारे द्वारा उपलब्ध कराये गए फोटो और नोटस् को सुनियोजित तरीके से बदल कर किताबे निकाली जा रही हैं, कम से कम हमें इस बात का गर्व है की हमने एक पहल की थी और उसी पहल का लाभ उठाया गया और यहाँ के नोट्स तोड़ मरोड़ कर छपवाकर अपनी पीठ थप थापायी जा रही है.अन्यथा पहले यह सब कहाँ थे.अतः बेवजह आरोप लगाकर,यह छद्म रूप से मित्र बन् कर  कोई यह यदि सोचता हैं की वह सारे सत्य जानने का अधिकारी हो गया हैं तो वह माने बैठे रहे और अपनी  ढपली अपने ग्रुप मे बजाता रहे.हमने पूर्व मे भी कई कई बार यह बात रखी हैं .
   एक विशेष तथ्य ये है की जब ये फेसबुक ग्रुप प्रारंभ हुआ था तो जब हम साधनाएं लिखा करते थे तो सैकड़ो उंगलियाँ उठती थी की आपको अधिकार नहीं है आप लोग कैसे बता सकते हैं,कैसे किसी को साधना सम्बन्धी जानकारी दे सकते हैं...आप सब गुरु द्रोही हैं इत्यादि इत्यादि,हमने उस उपाधि को भी ग्रहण किया,की ठीक है भैया आप सही कह रहे हो...किन्तु ये क्रम रुका नहीं और आज यदि अन्य भाई बहनों में इतनी हिम्मत आई है की वे भी ज्ञान आदान प्रदान कर रहे हैं तो अपना वो प्रयास और उसकी पहल पर गर्व होता है. अन्यथा तब भी अन्य भाई बहनों के पास ज्ञान था किन्तु वे मात्र अपराध बोध में ग्रसित रहते थे.उन्हें ज्ञान का विस्तार ग्लानी देता था.एक अपराध भाव से ग्रस्त करता था.जबकि आज सभी आपस में पूर्ण प्रेम भाव से आपस में ज्ञान का आदान प्रदान करते हैं और उसका लाभ उठाते हैं.
 
      और इस बात को अच्छी तरह से समझ लिया जाए या जान लिया जाएँ की,और पूर्व काल मे भी कई कई बार हम यह स्पस्ट कर चुके हैं की जोधपुर और दिल्ली स्थित आश्रमो और गुरू त्रिमूर्ति से हमारा कोई सबंध नही हैं,अतः हम बाध्य नही हैं की कोई भी उनसे सबंधित व्यक्तियों के या उनकी संस्था से सबंधित किसी भी बातों का उत्तर हम दें ही. और ना ही वे हमसे कोई जानकारी प्राप्त करने का अधिकार रखते हैं.
साथ ही साथ कार्यशालाओ के आयोजन की बात बार बार की जाती हैं ,पहले यह समझे की सेमीनार मे चार पांच घंटे लगातार बैठे रहने पर के प्रश्न पर सोचिये,उसमे  मे एक या दो बार अल्प  अवकाश देना पड़ता हैं और जब  कार्यशालाओ का आयोजन किया जाए  और उसमे  १०० माला   सुबह और १०० माला शाम को  जप एक एक बार मे करनी पड़ेगी वह भी एक दो दिन नही बल्कि ७ से २० दिन तो भला दूसरी बार कौन आएगा ,यहाँ यह जबाब नही की.... मैं तैयार हूँ ,बल्कि वास्तविकता हम भी जानते हैं ही .
    पहले तो यह समझा जाए की यह किताबें कोई २०,००० या ३०,०००  कापी  मे तो छपती नही हैं, सिर्फ जितने लोगों को हम सेमीनार मे अनुमति देते हैं.लगभग उतनी ही छापी जाती हैं,निश्चय ही समय,धन और श्रम तो लगता ही हैं.क्योंकी यह किताबें सेमीनार मे भाग लेने  वालें व्यक्तियों के लिए ही हैं.साथ ही साथ किसी भी किताब की कीमत उसके पृष्ठ संख्या देख कर लगाने वाले व्यक्तियों की मानसिकता को सिर्फ प्रणाम ही किया जा सकता हैं.साधनात्मक ज्ञान  का मूल्यांकन  कभी भी उसके  पृष्ठ संख्या देख कर नही किया जा सकता हैं.पर कुछ अति बुद्धिमान हैं उन्हें मैं यह बताना  चाहता हूँ की स्वर्ण प्रिया  लक्ष्मी साधना मे सदगुरुदेव उस साधना के यंत्र के बारे मे यह कहते हैं की इस यन्त्र की महत्वता के सामने व्यक्ति का जीवन भी कुछ नही हैं.तो जरा सोचिये भला एक जीवित मानव की तुलना मे एक ताबे का ढाई इंच का टुकड़ा की  कीमत ...पर अभी भी कई हैं ऐसे .
साथ ही साथ ,इस सेमीनार मे ही आपमे से कई लोगों ने वहां आकर कहा की उन्हें यह यन्त्र किताब चाहिये हैं और उनकी आर्थिक स्थिति नही हैं ऐसी की इसे वह ले पाए या कुछ ने कहा की वह बाद मे धन राशि भेज देंगे या कुछ मे  ने कहा की वह पार्ट पार्ट करके दे पायेंगे और हमें उन्हें तत्काल  किताब और यन्त्र सहर्ष प्रदान की,अगर उनके अनुरोध मे जरा सा भी सत्य रहा.अब आप ही सोचिये अगर हमारी यह व्यावसायिकता होती तो ...
      अगर व्यक्ति सोचें तो समझ पायेगा की एक सेमीनार मे भाग लेने के लिए व्यक्ति का कुल व्यय लगभग ८ से १० हज़ार तक हो जाता हैं.(इसमें उसके अपने घर से यहाँ तक आना जाना और होटल मे रुकने,भोजन का व्यय भी तो समझे )तब वह जाकर यह किताब और यन्त्र पा पाता हैं.सेमीनार के बहाने किताब  के साथ कोई सिर्फ ताबें का टुकड़ा नही भेजते हैं उस यन्त्र जो किताब के साथ भेजा जाता हैं उसका मूल्यांकन कर पाने के लिए जो योग्यता चाहिये वह कहाँ हैं ?.
साथ ही साथ अगर सारा व्यय,जो कुल आय हुयी हैं उससे निकाल देने के बाद जो भी बचता हैं वह योग्य साधनात्मक कार्यों मे ही लगता हैं .
     इन बातों को न मानने  के लिए आलोचक स्वतंत्र हैं वह कोई हमारे बंधुआ मजदुर तो हैं नही दूसरी बात फर्जी आई डी  से लिखने वालें ऐसे महान तांत्रिको क्या कहाँ जाए,इनकी बुद्धि शायद घास चरने चली जाती हैं,इन्हें यह तो याद रहता हैं की इसमें लाभ कमाया जा रहा हैं.पर उन्हें यह नही दिखायी देता की जो सामग्री हम साथ मे उपहार स्वरुप  दे रहे होते हैं ,इन्हें यह नही दिखता की कितने हमने लक्ष्मी यन्त्र उपहार स्वरुप अपने  खर्चे पर भेंजें,वहां पर मौन साध कर ये चुपचाप बैठ जाते हैं.मित्रो तीन बार हमें कितने लक्ष्मी यन्त्र अपने खर्चे  पर भेंजें.वह इन अक्ल के अन्धो को दिखाई नही देता हैं.
साथ ही साथ हमने  एक योजना बनायीं रही की हर महीने सात सात साधनाए न केबल हम देंगे बल्कि उनकी लियी आवश्यक साधना यन्त्रपूरी तरह से अपने खर्चे पर फ्री मे भी,हाँ उन प्रयोगों के लिए माला आपको ही बनाना पड़ेगा,हमने सारी विधियाँ भी सामने रखी यहाँ तक की सेमीनार मे भी विशिष्ट माला निर्माण की बात हमने आपके सामने पूरी तरह से रखी..पर  सिर्फ़ एक महिने साधना करने  के बाद अनेको का उत्साह ठंडा पड़ गया ,और ...जरा सोचें की यह सब क्या फ्री मे हो जाता हैं .इन आलोचकों का बस चले  तो इन्हें सब कुछ फ्री मे ही .तब भी शायद इनका पेट ...
और यह मित्रो इस तरह से सम्भव होता हैं की हमारे कई कई भाई जिनके नाम मैं कई पोस्ट मे ले चुका हूँ  वह निस्वार्थ भाव सहायता करते हैं,ये होते हैं इस तरह हमारा और उनका एक समूह बनता हैं,जो अपने ही कम भाग्यशाली  भाइयों की सहायता करता हैं वह भी चुपचाप ....ये होते हैं  एक सच्चा साधक  और शिष्यता की राह पर चलने वाले  अन्यथा यहाँ तो ..ऐसा लिखते जाए की आरिफ भाई  आप तो ये हो वो हो और मैंने  तो आपमें ..परन्तु अंदर ही अंदर ...
प्रश्न :ये पारद विग्रह ,कभी पारद कंकण तो कभी पारद शिवलिंग,तो अभी हाल मे पारद सहत्रन्विता देह तारा हर बार एक नया  विग्रह ,क्या यह एक नया तरीका नही  हैं लोगों को अपने जाल मे फसायें रखने  का ?
उत्तर: क्या अब हर बात के लिए इन नव आलोचकों को सदगुरुदेव की हर बात बतानी ही पड़ेगी इनके पास न तो समय हैं न ही अपने सदगुरुदेव द्वारा कहीं गयी बातों को समझने का,हमने  तो  जिस  ज्ञान को सदगुरुदेव ने उस काल मे सबके सामने रखा वह फिर  एक बार सबको उपलब्ध करवाया या करवाने का प्रयास कर रहे हैं ,तो इनको हजम नही हो रहा हैं कृपया एक बार उनकी पूरा साहित्य  पढ़े तो उनकी द्वारा बनायीं गयी केसेट्स सुने तो और यह न भूले की सन १९८० से जब तक रिकार्डिंग की सुविधा नही थी तब उस काल मे  सदगुरुदेव द्वारा प्रदत्त ज्ञान का क्या ? और उनके  सन्यासी शिष्य शिष्याओ द्वारा प्रदत्त ज्ञान को क्या...........और  सदगुरुदेव द्वारा दिया गया अद्भुत ज्ञान को क्या ....इन आलोचकों के प्रमाण की आवश्यकता हैं .
और हमने  तो कभी नही कहा की यह तो लेना ही  होगा .हमारी तरफ से कोई जोर  जबरजस्ती हैं  ही नही .किसी के  साथ भी नही ,और एक और तथ्य हैं की हमारे द्वारा बनाए गए विग्रह पूरे शास्त्रीय  विग्रह  इतने  महगें हैं की सभी उसे ले पायें  यह संभव सा भी नही हैं,यह तो सदगुरुदेव की परम कृपा  रही की उन्होंने उस काल मे यह सब उपलब्ध करवाया,पर यह उनके लिए संभव रहा ....
और आज ***कुछ लोग या सस्थान *** अल्प मोल मे इनको उपलब्ध कर रहे हैं,ज्यादा अच्छा  होगा की जिन्हें सिर्फ मूल्य से मतलब हैं वह उन्ही से प्राप्त करें.यह उनके लिए  और हमारे लिए दोनों के लिए श्रेष्ठ  होगा . 
     मित्रो ,पहली यह बात अच्छी तरह से समझ लेना चाहिये की हम कोई मंत्र सृष्टा  तो हैं नही हैं,की अपने घर मे बैठे रोज रोज नयी नयी साधनाओ का निर्माण करते जाएँ या हमारे यहाँ कोई फैक्टरी मंत्र और साधना निर्माण की लगी हुयी हैं  हालाकि हमारे आलोचकों मे कई कई मंत्र सृष्टा  बने हुये हैं ...... ,
पर हमारी वास्तविकता  तो यही हैं या यूँ कहूँ सत्य तो यही हैं की हम सभी (NPRU) तो संकलन करने वाले हैं.और यह तथ्य तो हमने कई कई बार सामने रखा  हैं की हमें किन स्त्रोतों से यह साधनाए प्राप्त होती हैं ,उनमे से सदगुरुदेव जी के सन्यासी शिष्य शिष्याओ का एक बहुत विशाल वर्ग हैं,साथ ही जब सदगुरुदेव साधना प्रयोग  करवाते  तो कई कई  उच्चस्तरीय दुर्लभ ग्रंथो का उल्लेख करते रहे और ऐसा  तो उन्होंने कई कई अपने लेखन मे भी किया  हैं तो उन दिव्यतम ग्रंथो मे प्रकशित साधना मंत्रो की प्रमाणिकता पर संदेह भला हम कैसे कर सकते हैं,तो अब क्या हर साधना को प्रकाशित  करने से  पूर्व इन आलोचकों से प्रमाण पत्र लेना कोई अनिवार्य प्रक्रिया ...
   स्वयं की या उन साधकों की अनुभूत साधनाएं और उन्होंने जिस भी पद्धति से सफलता प्राप्त की है उसे बिना किसी फेर बदल के ही दिया जाता है.   
इसके साथ ही साथ हमारी साधना यात्रा के  समय जिन भी सिद्धो ,महासिद्धो ,तंत्र विद ,तंत्र मर्मज्ञो से जो भी प्रामाणिक ज्ञान मिला हैं वह आपके सामने हैं .अब आप उसका क्या  प्रयोग और कैसे प्रयोग करते हैं वह तो एक साधक की मानसिकता पर हैं,पर आलोचना करने वाले कम से कम यह तो बताए की किन किन किताब से हमने लिखा हैं .हमने दुर्लभतम मौलिक साधना क्रम जो हमें सदगुरुदेव  की असीम कृपा  करूणा से  प्राप्त हुये हैं.और हमने कभी यह कोई क्लेम किया हैं की हम इन साधनाओ के निर्माणकर्ता हैं,अब यह इन आलोचको की मानसिकता पर निर्भर हैं की साधनाए करके  अपने साधना जीवन को उच्चता पर ले जाएँ  या फिर  अनर्गल आरोपों की बरसात करते रहे .
प्रश्न : हमें कैसे पता चले की आप जो कहते हैं वह ज्ञान सच मे ..प्रामाणिक हैं ही ?
उत्तर :मित्रो ,सेमीनार मे  चार से छह घंटे बिना किसी किताब से देखें,अनवरत बोलना वह भी हर प्रश्न का सटीकता से  उत्तर देते हुये,भला किस  किताब को रट कर संभव हो सकता हैं,वह जहाँ मंत्रो का उच्चारण और  मुद्राओं का प्रदर्शन के साथ साथ उन साधनात्मक रहस्य को भी उद्घाटित करना होता हैं क्या अब भी यह सब किसी रटंत विद्या से संभव हैं एक पल को सोचें? ,और यह तो तभी संभव  हो सकता हैं जब उन साधनात्मक स्थिति को स्वयम जिया हो ,उन साधना को स्वयं साकार साक्षात् किया  हो ,और यह तो आप मे से अनेको ने देखा हैं,
तब भी कितने बार इन सामने ज्ञान से पैदल ..आलोचकों को ..
किसी भी ज्ञान की प्रामाणिकता पर सदेह उठाने के लिए एक स्वयं का भी उस अवस्था के आस पास  होना जरुरी हैं.
प्रश्न :दुर्लभ वनस्पतियों को हमें पूरी जानकारी हर हाल मे  दी जाए,अगर ऐसा नही करते हैं तो सारी npru  टीम की यह व्यावसायिकता ही हैं यह और क्या ?
उत्तर :सिर्फ लिख देने से वह कार्य कर ही दीया जाए यही तो आलोचकों का मंतव्य होता हैं ,पर हम तो अपनी मर्यादा मे बंधे हैं जिन वनस्पतियों का उपयोग तंत्र मे  विशिष्टता से होता हैं अगर वह प्रचुरता से उपलब्ध होती  हैंतो हमें आपको उसको फ्री मे उपलब्ध करवाने मे कोई दिक्कत नही हैं.जिस तरह आज आरिफ भाई जी  ने चंद्र प्रिया जड़ी के बारे मे कहा  की अगले सेमीनार मे वह यह उपहार स्वरुप उपलब्ध करवाएंगे ,पर अन्य जिनको पाना बहुत कठिन हैं उनके  लिए   तो यह तो संभव नही हैं.साथ ही साथ  इनका परिचय सभी के लिए उपलब्ध  करवा पाना संभव होगा क्योंकी विगत समय का  हमें अनुभव हैं ही ,और यह तो सभी जानते हैं की सीधे  पेड़ ही सबसे पहले काटे जाते हैं अतः सिर्फ बातों मे भावुकता लाकर यह एक बार फिर से हो जाए कम से कम अब तो संभव नही हैं.हमारी टीम अपनी मर्यादा और सीमा जानती हैं .
अब जिसे इनकी प्रमाणिकता पर संदेह  हो वह सदैव से स्वतंत्र हैं किसी अन्य स्त्रोत से जहाँ पर उसे विश्वास हो,वही से साधना सामग्री ले ... यही उसके लिए उचित होगा. क्यूंकि ये बात हम पहले भी कह चुके थे की जब सभी भाई बहन बोलते हैं की प्रमाणिक सामग्री की व्यवस्था करवाई जाये तो हम सदैव मन करते रहे हैं.    
साथ ही साथ ,उन तथाकथित स्वयम्भू महान सिद्ध तान्त्रिको को जो इस फेसबुक मे फर्जी आई डी बनाकर हमारे आस् पास उपस्थित हैं (कुछ मित्र बनकर तो कुछ प्रशंसक बन  कर भी ),वे यह अच्छी तरह से  से समझ ले की,बनाते रहे फर्जी आई डी और करते रहे  इंतज़ार सिद्ध महुर्तो का, करते रहे टाइम पास मारण प्रयोग ..........पर हम सदैव  विजय पथ पर ही अग्रसर होते आयें  हैं और होते जायेंगे ही.हमारी आज  तक की यात्रा इस बात का गवाह हैं,हमने जो कहा हैं वह हमने हर हाल मे किया ही हैं,और हम सदगुरुदेव जी के दिव्य चरण कमल आश्रित हैं. यह इन मित्र रूपी  छदम वेश धारी आलोचकों को ध्यान मे रहे .
****NPRU****         

5 comments:

Neeraj Kumar said...

Annu Bhai ye to aapki hi lekhni ka jadu hai aap to cha gaye aur kya karara jawab diya hai in bagula bhakto ko main to Arif bhai se bhi jyada aapki lekhni ka kayal hota ja raha hun jai gurudev......

naren said...

kuch logo ke liye ye sab mayne nahi rakhata lekin hamare liye to ye khajane se kam nahi he

naren said...

aap jo hame ye sab deraho ho vo hamare liye bahot kuch he

googlebhai said...

jay gurudev muze sadhna samagri chahey ky ap apka addres de sakte hai taki mai apko samgri ke ley bol saku ya apka email id de please rupesh bobde

Shri Hari Jewellers said...

mai bhi jagat kalyankari sadhanaye sikhna chata hu. kripya mujhe marg darshit kare
+91-9712002319