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Thursday, October 21, 2010

DIVINE PAARAD SIDDHA- RAGHAV DAS JI(LIVING ENCYCLOPEDIA OF SADHNA JAGAT)


( गुरुदेव के सन्याशी शिष्यों और उनके साधनात्मक ज्ञान के बारे में तो काफी कुछ प्रचलित हे. हमारी यह इच्छा रही हे की हम ऐसे ही वरिष्ठ सन्याशी गुरुभाइयो एवं उनके साधनात्मक उपलब्धियों को आप सब के मध्य रखे. ताकि हम समझ सके की सदगुरुदेव ने प्रेम के वशीभूत न जाने कितने हीरक बिखेरे हे , अब ये तो हमारे ऊपर निर्भर हे की हम कितना और क्या क्या समेट सकते हे.)
श्री राघवदास बाबाजी के बारे में कुछ भी कहना या लिखना सूर्य को रोशनी दिखने जेसा हे . चहरे पर हलकी सी मुस्कान, लंबा दुबला परन्तु बलिष्ठ शरीर, उल्झी हुयी जटाऐ, दीप दीप करती सूर्य ओर चंद्र के प्रतिक सम दिल तक उतरने वाली आँखे, एक गमछा लपेटे हुए, वे एक ऐसे भव्य व्यक्तित्व हे जिनके सामने उच्चकोटि के योगी भी हमेशा नतमस्तक रहते हे. उनका विनोदी ओर अत्यंत प्रफुल्लित स्वाभाव दिल को छू लेता हे. हमेशा यथा संभव अपने आपको सामान्य बनाये रखते हुए कुछ एसी माया बिखेरते रहते हे कि लोग एक बार धोखा खा ही जाएँगे कि योगीजन वंदित राघवदास बाबा यही हे ?...
राघवदास बाबाजी कि उम्र क्या हे कोई बता नहीं सकता, यदा कदा से जानकारी मिलती हे कि उनकी उम्र २०० साल के ऊपर ही हे. परमहंश निखिलेश्वरानंदजी के वे वरिष्ठ सन्यासी शिष्य हे. साधनाओ के क्षेत्र में राघवदास बाबाजी ने जो कीर्तिमान कायम किये हे , वहाँ तक पहुचने का साधक ख्वाब भी नहीं देख सकता. राघवदास बाबाजी सदगुरुदेव के सन्याश काल में साये कि तरह साथ रहते थे, इसी लिए गुरुदेव ने इनका नाम राघवदास (हनुमान) रखा था. कई लोग इनको श्याम बाबा के नाम से भी जानते हे. राघवदास बाबाजी का नाम सायद हम गृहस्थों के बिच नया हो सकता हे, मगर सदगुरुदेव से जिन्होंने अघोर एवं पारद क्षेत्र में ज्ञान प्राप्त किया वे लोग इस नाम से भली भांति परिचित है.....ऐसेही हमारे एक अग्रज गुरु भाई के बारे में कुछ तथ्य आपके सामने रखना चाहूँगा.
श्री राघवदास बाबाजी सदगुरुदेव के निदर्शन में ही १०८ पारद संस्कार को सिद्ध कर चुके हे. उन्हें पारद स्वरुप कि भी संज्ञा दी जाए तो कम ही हे. पारद सूर्य प्रक्रिया के बारे में सिर्फ कुछ साधको को जानकारी हे. पारद सूर्य तंत्र के अंतर्गत पारद के ऊपर होने वाली सभी प्रक्रियाए सूर्य कि किरण मात्र से सम्प्पन कि जाती हे जिनमे धातुपरिवर्तन से ले करके विभ्भिन गुटिकाओ के निर्माण शामिल हे. पारद सूर्य तंत्र में ये सिद्ध हस्त हे ओर पारद को सूर्य कि रश्मियों से शुद्ध कर गुटिका निर्माण करना एसी जटिल प्रक्रियाओ को उन्होंने मेरे सामने कुछ ही क्षणों में करके दिखाया था. संस्कारो के क्षेत्र में उन्होंने कई एसी विधियो कि रचना कि हे कि शायद एक बार तो विश्वाश भी न आए. एक साथ एक ही संस्कार में १ से १८ संस्कार करना या फिर सिर्फ वायु विज्ञान मात्र से पारद में से खेचरी गुटिका बनाना, सब बाये हाथ का खेल ही तो हे बाबाजी के लिए. सन १९८३ में जब वे जोधपुर गुरुधाम में पूज्य गुरुदेव से मिलने पधारे थे तब सिर्फ स्वमूत्र से उन्होंने ताम्बे के टुकड़े को सोने में बदल दिया था. बाबाजी के बारे में प्रचलित हे कि यह वही योगी हे जिन्होंने विश्वनाथ शिव मंदिर के लोहो के भरी दरवाजों को कुछ ही मिनिटो में सिद्धसुत के माध्यम से सोने में बदल दिया था. वनस्पति तंत्र में ऊनकी जो महारत हे वे शब्दो से परे हे . उन्होंने इस क्षेत्र में नए तन्त्रो कि रचना कर जिज्ञासु साधको को कई नयी उपलब्धियां प्रदान करने में सहयोग दिया हे. वनस्पतियों से धातुओ को अलग करके उनका प्रयोग करना या विभ्भिन यंत्रो का निर्माण सिर्फ वनस्पति के माध्यम से करने... ये सब तो बाबाजी के लिए खेल मात्र ही हे. प्रारंभ में योगमार्ग पर रहे राघवदास बाबाजी अष्टांग योग में पूर्णतः सिद्ध रहे हे, जिनमे ह्रदय चक्र ओर नाभि चक्र जेसी दुर्लभ सिद्धिया प्राप्त कर चुके थे जो कि सहश्त्रार भेदन के बाद ही संभव हे. मगर बाद में राघवदास बाबाजी ने अपना मुख्य क्षेत्र पारद ओर तंत्र को ही बनाया.
तंत्र के क्षेत्र में वे सिद्धहस्त हे. सौम्य महाविद्या साधना को सिद्ध करना भी अत्यंत जटिल हे मगर उन्होंने तो उग्र मार्ग से एक ही साल में ४ महाविद्याओ को सिद्ध किया था. औघड साधना, स्मशान साधना में निष्णांत हे वह. श्री बाबाजी हिमालय, नेपाल, अरावली, पंचमढ़ी, गोरखपुर आदि अधिकांश सिद्ध साधना स्थलियो में साधना कर चुके हे. वे सशरीर सिद्धाश्रम में कई बार जा चुके हे ओर अन्य दिव्य आश्रमो में भी उनकी बराबर गति हे. पारे कि एक बूंद भी इंसान के लिए मृत्यु साबित हो सकती हे मगर राघवदास बाबाजी का नित्य आहार ही ५-१० तोला कच्चा परा हे. देखते ही देखते वे पारे को गटक जाते हे. कामाख्या के आसपास का जंगल ही कार्यक्षेत्र रहा हे उनका. नाग्बुद्ध एवं सिद्ध नागार्जुन जेसे रसाचरयो से निकट का संपर्क हे उनका.
कई बार साधको को उन्होंने दर्शन दिया हे. उनकी गति अदभूत हे. एक ही समय पर उनको कई जगह देखा गया हे. कुछ साधको को अनुभव हुआ हे कि सिर्फ याद करने मात्र पर ही वे उपस्थित हो जाते हे.
मेरी इतनी सामर्थ्यता नहीं हे कि में उनके बारे में कुछ भी लिख सकू. पर में चाहता था कि सब को मालूम रहे ही गुरुदेव के शिष्यों कि सामर्थ्यता कितनी हे. इसी लिए याचना के साथ इस लेख को आपके सामने ला रहा हू. जब बाबाजी को एक गुरुभाई ने मुलाकात के क्षणों में प्रश्न किया कि बाबा आप सबसे मिलते क्यों नहीं ? तो उन्होंने जवाब दिया कि “ इससे क्या होगा ? लोग मुझसे सिर्फ इस लिए मिलना चाहत हे कि मेरी आयु २०० वर्ष हे?! ...इससे ज्यादा कुछ भी तो नहीं .”
सायद कोई वेदना सता रही हे उनको. एक अलग प्रसंग में उन्होंने मुझे कहा था कि “मेरी जोली में तो सब कुछ भर दिया हे सदगुरुदेव ने. मगर में चाहू भी तो किसको दू ये सब ? कोई टूटे हुए पात्र में दिया जलता हे क्या ?”
आप सब लोग सायद ये समज रहे होंगे कि वे क्या कहना चाहते थे। मुझसे भी ओर आपसे भी। ऐसे ही महान साधक एवं शिष्य को हम सब कि ओर से कोटि कोटि वंदन. आपके द्वारा प्राप्त ज्ञान हमारी साधनास्वप्न के स्तंभ हे..
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(There are many things famous about sanyashi disciples of sadgurudev and their knowledge in the field of spirituality। It was our wish to share with you something about our senior sanyashi gurubrother and their achievements in the sadhana field. By which we can understand that so many diamonds been spread by gurudev being affected by love, but now it is on us that how much we can gain)
To write or to say something about poojya shri Raghav Das babaji is like showing earthen lamp’s light to sun, always with soft smile, tall ,thin but mescular body, his jata like hairs scattered on his shoulders, penetrating eyes to heart lighting like sun and moon, wearing a Gamchha( small cloth around his waist). he is having such a personalty that even highest yogis bows down. his sence of humour and ever joyful nature touch everyone’s heart , whosoever come to his contact. always living with so much simplicity and spreading his maya in such a way that people often gets illusioned. he is none other then ,but shri RaghavDas babaji.
how old is RaghavDas babaji,no one can tell us, information received from various sources tells us, his material (physical or bodily) age is more then 200 years. he is among the senior most sanyasi disciple of Paramansa Nikhileshwaranandaji, he has achieved so much hights in sadhana field , that ,no sadhak can ever dream to reach there, Poojya RaghavDas babaji had always remained with poojya sadgurudevji like his shadow,thats why poojya sadgurudevji gave him name “RaghavDas” (hanuman).some people know him as Shyam babaji. His name may be new for we house holder material people but it is very well known name for those who had been into field of tantra and parad vigyan under sadgurudev’s guidance. Like way, I would like to share something about one of our senior guru brother..

in the direction of poojya sadgurudevji RaghavDas babaji had already got mastery in 108 sanskar of parad. if ,he is consider as Parad swarup( having form like mercury), that will not be oversay. very few sadhak have a knowledge of “Parad Surya Prakriya”, in this parad surya tantra all the sanskar process can be done only with rays of sun, that includes metallic transformation to making of various divine parad gutikas. he is well versed in the field of parad surya tantra and he showed to me some of the very complex process of making of divine parad gutika’s after purified parad with sun rays within some seconds.he also has developed such methods ,one can hardly believe on that. to complete parad’s 18 sanskar in one sanskar’s process,or making of khechary gutika with the help of vayu Vigyan. all these process is like child’s play for him. in 1983 when he visited Jodhpur to meet his beloved poojya sadgurudevji,then he converted a piece of copper to gold by his self urine only. this is also very famous fact about him that he is the same yogi who had converted the iron gate of kashi vishwanath temple into gold in minites with help of siddhsut. his mastery over the vanaspati tantra( a tantra who deals with the various divine herbs) is can not be expressed in words. he also have develop many new tantra to help new aspirants to get success, in this field. to seperate various divine herbs from metals or through using only these herbs to make yantras, is like a childs play for him. in the begining, RaghavDas babaji also gets full mastery over Astaang Yoga.in that he successfully achieved very rear siddhi in hradya chakra and in Nabhi chakra process,that can be possible only after Shahastradhar bheden. But then after he made his main way in tantra and paarad vigyan field.
he is an accopmplished sadhak in tantra field,to get siddhi in mahavidya in soumya process way is very very difficult and complex, but he achieved siddhi in Urga marg(process) way in four mahavidya in a year .he is well versed in Aughad sadhana , and in shamshan sadhana process. shri RaghavDas babaji already did sadhana in many sadhana field of Himalaya, Nepal, Aravali,Panchmadhi,Gorakhpur, and also visited Siddhashram many times in his material body too. and the same goes for other divine ashrams even. single drop of mercury can cause death to person,but eating daily 50 to 100 grm of mercury is food of him. his working field is mainly the forest places around ma kamakhya maha peetem. he is in very close contact with rasachary like Nagbuddh and siddh nagarjun.
he has given his divine darshan to many sadhak, he can be seen with same body in different places at same time.even by remembering his name ,he appeared in front of many sadhak that is what had been experienced by many sadhak.
i have not such capicity to write anthing about him, but i wants to share this knowledge to all of you how much great capacity and abilty of sadgurudev’s shisya.with the same thought, i am writing this post for all of you.once one of our gurubhai asked him why babaji you not meet with all in person. his replied was.”what it does matters?people wants to meet me because i am having age more then 200 years?...not any thing more than that....”
may be, he has pain in his heart which had took deep roots. on other occasion he told me that” sadgurudev has already filled his bag with everything, but whom can i give, this wealth? can any broken earthen lamp lights up..?
Now you can understand ,what he wanted to tell. to me and you even. With this I many time bow down to such humble desciple of sadgurudev on behalf of all. The knowledge given by you is only pillors of our dream level of sadhana.

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4 comments:

suvarnashilpi said...

Ahhaa padh kar sach bahut bahut achha laga...Aise Mahanubhav se ek baar sakshaatkaar karne ki ichha kise nahi hogi..Har sadhak jo sadhna marg par agrasar hai wo jarur chahega ki un sabhi uchha siddhasadhako ka margdarshan prapt ho..Siddhashram hi to hai jaha har sadhak jana chahta hai..Sadgurudev ke nikat unke sanidhya me..parantu is tarah ki gyaan hame padhne ke liye mila raha hai waha kam nahi..

suvarnashilpi said...

hnna ek jaruri baat apka yaha blog urjaa ka strot bante jaa raha hai..Ban chuka hai...
bahut bahut dhanyawaad ap sabhi ka..

Neeraj said...

arif bhai, raghu bhai, annu bhai is bar mera bhi ticket aap log kara lena mujhe 1 bar jurur inform karna main jarur chulnga aur baba ji se kuch tantra main bhi sikhunga unke charno mein baith kar....... Arif bhai se kehna ke Neeraj ne bhi Baba ke darshan karne hain


Jai Gurudev.....

Snehal said...

Jai Gurudev. Aaj hi maine yeh blog pada aur bada accha laga. Mere Guruji Swami Aatma Prakashanandji ne hume ekbar baton baton mein unke Gurubhai Swami Raghavdasji ke bare mein bataya tha.Tab Swami Raghavdas ji Mandor ki gufa mein Pitambara(Baglamukhi Sadhna) kar rahe the.
Yadi aap mein se koi bhi unse mile to Swami Aatma Prakashanandji ke bare mein jaroor puche.Ummed rakhta hu ke veh jaroor Prasannah Chin honge apne Purane Gurubhai ke bare mein sunkar jis tarah weh Trijata Aghori Maharaj ji ke bare mein hote hai.
Jai Gurudev.
snehal_kothari@yahoo.com