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Sunday, October 17, 2010

SadGurudev Prasang- Divine Parad Linga(SadGurudev historical contribution to the Country)


जय गुरुदेव
सदगुरुदेव एक शाम को बहुत चिन्तित थे ओर उदास मन से सूर्यास्त देख रहे थे. वे अपने मित्र से कहते हे कि लाल रंग का आकाश आगामी दिनों में मासूम लोगो का खून दिखा रहा हे ...और आप सब उस समय दुनिया कि परिस्थिति से परिचित हे.
वे मुट्ठी बांध के आंसूओ के साथ बेठे रहने वालो में नहीं थे, उन्होंने न सिर्फ अपने शिष्यों के लिए परन्तु पूरे देश के आम नागरिक,निःशक्तजन ओर ऊँचे पदों पर कार्यरत उन लोग कि भी जो की उनके महत्तम प्रयास के बारे में जानते तक नहीं थे, और न ही समझना चाहते थे और अनजान थे आने वाले समय के आर्थिक संकट की स्थिति से, उनके लिए कुछ करने को ठानी.
स्व. श्री शंकर दयाल शर्मा उस समय भारत के राष्ट्रपति थे, वे सदगुरुदेव के शिष्य भी थे, यु तो सगुरुदेव ने उन्हें हमेशा अपने भाई कि तरह ही माना हे. सदगुरूजी उनसे मिले ओर पूछा कि क्या वे (श्री शंकर दयाल शर्मा) संसद में कोई ऐसा प्रस्ताव रख सकते हे कि जिससे हेमवती विद्या (स्वर्ण निर्माण कि प्रक्रिया) को कानूनी रूप से स्वीकृत कर सके तो इस विद्या के माध्यम से वे और उनके शिष्य देश कि गरीबी ओर विदेशो का क़र्ज़ को हटा सकते हे. परन्तु शर्माजी ने इस पर अपनी असमर्थता दिखाते हुए कहा कि इस समय देश कि स्थिति अयोग्य हे. सदगुरुदेवने दर्द भरी मुस्कान के अलावा कोई जवाब नहीं दिया शर्मा जी को.
फिर शर्मा जी ने पूछा कि इसके अलावा भी क्या कोई रास्ता नहीं हे जिससे देश कि प्रगति हो सके ?अभी देश में बेरोजगारी ही सबसे बड़ी समस्या हे जो कि रोज ब रोज़ बढती ही जा रही हे, जिसकी वजह से आर्थिक ऋण के जाल में हमारा देश फँसता जा रहा है सरकार के सारे प्रयास को कोई मोल नहीं उपजा नहीं कोई नयी आशा का उद्भव हुआ.
पता नहीं किस भावना या विचारों के वशीभूत होकर ही तो मैंने एक बार में ही इन समस्त समस्याओं का समाधान करना छह रहा था पर यही तो हमारे देश का दुर्भाग्य है कि यहाँ कि राजनीती स्वार्थ लोलुपता कि चरम पराकाष्ठा से भरी हुई है जिसका मूल्य एक एक भारतीय को अपने रोम को भी गिरवी रख कर चुकाना पद रहा है. भारत सोने कि चिड़िया था अब ये तो सदैव सदैव इतिहास में ही लिखा रहेगा , इसकी साकारता अब हमारे देश का भाग्य नहीं हो सकती खैर.................... एक उदास प्रश्वांस के साथ सदगुरुदेव ने कहा , और तनिक विचार के बाद उन्होंने कहा ‘पारद शिवलिंग के द्वारा ही इन सारी समस्याओं से मुक्ति पाया जा सकता है और साथ ही आगामी समय के लिए सदा सर्वदा के लिए भी आर्थिक उन्नति के अवसर को स्थिर रखा जा सकता है.’ सदगुरूजी ने उनसे कहा.
पर ऐसा अदभूत शिवलिंग का निर्माण आप के अतिरिक्त भला और कोई कर ही नहीं सकता और न ही इतना सामर्थ्य किसी में है,जो कि पूरे देश के लिए योग्य हो, और इतना बड़ा परिवर्तन संभव कर सके भारत कि भूमि पर जो कि आर्थिक ऋणों से ग्रस्त है और बेरोजगारी तथा अर्थाभाव जैसे जोंक इसकी उन्नति रूपी रक्त को निरंतर चूस रहे हैं. क्या आप अपनी महती कृपा के द्वारा देश कि उन्नति के लिए इस असाध्य क्रिया को साकार नहीं करेंगे. –शर्मा जी ने विनीत भाव से कहा .
शिष्य ऐसा आग्रह करे और वो भी देश के हित में तो भला सदगुरुदेव कैसे अस्वीकार कर पाते इस प्रार्थना को , क्यूंकि अपना सम्पूर्ण जीवन ही तो उन्होंने देश को उसकी मूल भावना को मजबूत करने में ही तो लगाया है, अपना जीवन , अपना साहस , अपनी विचारधारा को लगातार इसी स्वप्न को साकार करने में लगाया है. तभी तो कभी भी स्वार्थ को खुद पर हावी न होने दिया और इसकी कीमत उन्होंने आलोचना और घात-प्रतिघात रूपी आग में निरंतर जल कर चुकाई है. खैर.................

न उन्होंने एक क्षण भी सोचा कि इतनी व्यस्तता में वे केसे समय दे पाएँगे..क्या ये संभव था कि इतना जटिल कार्य सतत उनके निदर्शन में ही नहीं वरन उनके स्व हस्त से हो पाए ?...पर ये तो वो व्यक्ति हे जिसने प्रत्येक क्षण देश के लिए ही तो जिया था..चाहे वह उनका शिक्षा का क्षेत्र हो..या फिर सन्याश या फिर वापस गृहस्थी का विष...वे हमेशा नीलकंठ कि तरह मुस्कुराते हुए पी गए
फरवरी महीने कि महाशिवरात्रि के दिन उन्होंने पूर्ण लक्ष्मी सायुज्य शिव प्रतिष्ठा से युक्त ऐसे पारद शिवलिंग का निर्माण किया. मगर क्या निर्माण मात्र पर्याप्त था ? नहीं नहीं .. बल्कि कुबेर मन्त्रों से अभिसिक्तिकरण और कई गोपनीय मन्त्रों से उसमे पूर्ण प्राणों का प्रवाह भी तो करना था साथ ही साथ जोड़ना था वर्तमान और भविष्य कि समस्त पीढ़ियों के प्राणों से भी. ताकि पूर्ण उन्नति और सम्रद्धि दायक हो सके वो . उन्होंने अपने शिष्यों को जो कि जोधपुर आश्रम में रहते थे उनको विशिष्ट पूजन और उस प्राण प्रतिष्ठा कर्म के लिए तैयारी करने का आदेश दिया जो कि किसी व्यक्ति विशेष मात्र का न होकर पूरे देश का कल्याण व अर्थोत्थान कर सके. और दे सके भारत को ऋण मुक्त कर उसका खोया हुआ गौरव भी.
शिवलिंग निर्माण के बाद पूजनीय माताजी ने सदगुरुदेव के साथ पूरे २ महीने उस शिवलिंग का विशेष और गोपनीय मन्त्रों से पूजन किया. इसके बाद नित्य प्रति सदगुरुदेव अपने जोधपुर आश्रम के शिष्यों के साथ इसका पूजन करते रहे.अभी भी कई गोपनीय तंत्र प्रक्रियाएं बाकि थी ही जिन्हें पूर्ण करने और तेजस्विता युक्त करने के लिए विविध शमशानों की भस्मों से उस परम तेजस्वी रसलिंग का पूजन महाकाल मन्त्रों से किया जाता रहा, रोज बरोज अलग अलग स्मशान जो कि जोधपुर के आस पास के थे जेसे कि मंडोर, महामंदिर रोहट आदि शमशान से लाया जाता था. हर दूसरे दिन अलग स्मशान कि राख उपयोग में ली जाती थी. ये भी एक आश्चर्य रहा कि जब भी कोई इस कार्य हेतु स्मशान से भस्म लेने जाता तो उसे ताज़ी जली चिता कि भस्म ही प्राप्त होती. कई लोगो ने उन्हें पूछा भी कि ये क्या कर रहे हे पर उन्होंने मुह बंद रखा. सर्व प्रथमउस महाभस्मी का शुद्धिकरण होता. शुरुआत में किसी को भी ये पता नहीं था कि ये क्रिया किस लिए हो रही हे. ये प्रक्रिया पूरे ५ महीने फेब्रुअरी से जून तक चली .जोधपुर स्टाफ को कोई जानकारी नहीं थी कि ये प्रक्रिया क्यों ओर किस के लिए कि जा रही हे किन्तु ये सदगुरुदेव कि आज्ञा थी. उनकी आज्ञा पालन ही उनका धर्म था. किसीने भी उनसे नहीं पूछा कि यह लंबी प्रक्रिया क्यों जबकि सदगुरुदेव विचार मात्र से रसलिंग का निर्माण कर सकते थे इन दिनों में वे सतत विविध तांत्रिक उपकरणों के साथ कभी रात्रि तो कभी दिवस समय में कालानुसार पूजन करते. २४ प्रकार के विविध महामृत्युंजय मन्त्रों का प्रयोग भी इस क्रिया में किया जाता रहा (आश्र्चर्य! किनको २४ प्रकार के महामृत्युंजय मन्त्रों का ज्ञान है ?). एक और विशिष्टता थी पारद का रंग परिवर्तन. शुरुआत में वो अभिषेक काल में काले रंग की आभा के साथ था. कुछ अभिषेक के बाद वह काले से सिन्दूरी हुआ. तीसरे मुख्य अभिषेक के बाद उसका रंग चांदी जेसा धवल ओर चमकीला हो गया था. उसके बाद वो पूर्ण जाज्वल्यमान शुभ्रवर्ण में ही आ गया ओर रंग्परिवर्तन कि प्रक्रिया खत्म हुयी. अंत में ये लंबी प्रक्रिया पूर्ण हुयी और . स्थापन के लिए उस अद्भुत परम ज्योतिर्मयी रस लिंग को ले जाना था उसे विशेष मन्त्रों से लाल वस्त्रों में बंद कर काले धागे से बंद दिया गया और सदगुरुदेव स्वयं ही उसे अपने साथ दिल्ली ले आये,उस समय तक भी स्टाफ को ये पता नहीं था कि ये रसलिंग किनके लिए बनाया गया हे
आप सब जानते ही हे कि उस जुलाई महीने में सदगुरुदेव ने वह पारद शिवलिंग भारत के राष्ट्रपति स्व. श्री शंकर दयाल शर्मा को भेंट किया गया था.
प्रश्न ये हे कि सदगुरुदेव ने वो पारद शिवलिंग को राष्ट्रपति को ही वो पारद शिवलिंग क्यों भेंट किया ? इसका कारण ये रहा कि राष्ट्रपति हमारे देश का प्रमुख माना जाता हे. यदि वह दिव्य पारद शिवलिंग उनके घर में (राष्ट्रपति भवन) रहेगा तो सारा देश सुख एवं समृद्धि पूर्ण होगा. अब आप सदगुरुदेव के द्वारा किया गया श्रम ओर वेदना को समझ सकते हे. इस दिव्य पारद शिवलिंग का वजन २१ किलो हे. यही अनछुआ पहलु था कहानी का. परन्तु उसका प्रभाव हमारे दिन प्रतिदिन के जीवन पे क्या था बिना उसको समजे ये कहानी पूर्ण नहीं हो सकती.
१९९५ के बाद आप चारो तरफ हमारे देश कि प्रगति को देखे. यहाँ में अपने सदगुरुदेव का पक्ष नहीं ले रहा हू नाही उन्हें इसकी आवश्यकता हे. और में ये साफ़ कर देना चाहता हू कि ना में अपने देशवासियों के कठोर श्रम और प्रयासों को कम आंक रहा हू. परन्तु यहाँ पे में उस और ध्यान आकर्षित कर रहा हू कि क्यों वर्तमान के मंदी के समय विकसित कहलाये जाने वाले देश आर्थिक विफलता के शिकार हुए परन्तु हमारा देश जो हर प्रकार कि समस्याओ से ग्रस्त हे उतना उससे प्रभावित नहीं हुआ और लगातार विकास के रास्ते पर चल रहा हे. आज रोजगार के अवसर पहले कई गुना अधिक उपलब्ध हैं और सहज ही है अपनी प्रतिभा का विकास भी और . क्या ये धनात्मक चिन्ह नहीं हे. ये दिव्य आशीर्वाद हमारे देश ओर देशवासियों के साथ हे.
अंत में , में आपसे और क्या कह सकता हू कि कम से कम ये हमारी जिम्मेदारी हे कि सदगुरुदेव द्वारा किया गया कठोर श्रम और वेदना को हम समझ सके जो कि हमारे दिन प्रतिदिन के जीवन को आनंदमय बनाने के लिए किया गया था. कम से कम हम उस रस्ते पर चले जो दिव्य पथ उन्होंने हमें दिखाया था. में आप सभी लोगो कि सफलता एवं दिव्यता के लिए आज के पवित्र दिन पर सदगुरुदेव से प्रार्थना करता हू.
मैं समझ सकता हू कि आपको धन्यवाद देने कि आवश्यकता नहीं हे ये मेरा सौभाग्य हे कि आप जेसे मित्र इस ब्लॉग ओर ग्रुप में हे. जेसा कि आप सभी जानते हे कि हम इस समय पारद संस्कार के ४० दिवसीय कार्यशाला में व्यस्त हे तो हम लोगो के लिए आपको इस समय जवाब दे पाना थोडा कठिन हे. पर हमारा ह्रदय और शुभकामनायें आपके साथ हे .
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Jai gurudev,
sadgurudev ,one evening were very worried and in pensive mood watching sunset he told to his friends that this red colored sky shows the blood of many innocent people in coming days…and you all are aware of the situation in that time worldwide…
He just not to be a watcher with folded hand and tearful eyes, he made his mind to do something great not only for his shisya but also to the general masses of this great country, even though not only general people but people belongs to higher position is not understanding his Himalayan task neither interested to understand and unaware of upcoming big financial crises.
Late shri Shanker dayal Sharma was the president of india at that time, he was also a devoted shishya of poojya sadgurudevji, though sadgurudevji always treated him like his own brother, sadgurudevji once met him, and asked him, if he (late shri shanker dayal sharmaji) passed a bill in sansad to legalize alchemy tantra’s hemvati vidya (process to make gold from inferior metal). If he could do this then his shishya using this vidya will remove not only the poverty of the nation but also the foreign debt upon our country but sharmaji showed his inability to do that, according he further condition of country was not suitable for that. Sadgurudevji painfully smiled and said nothing in response to late shri B.D.sharmaji ‘s answer.
Then he asked to sadgurudevji is there any other way to accelerate the progress of this country. sadgurudevji replied in his view present situation showing very gravest problem of unemployment. Which was increasing day by day, on because of that country is in grip of financial debts. even govt.’s all efforts were proves to fruitless or not gaining any positive sign.
Don’t know with which feeling and emotions, I was trying to solve all such problems at once. But it’s the misfortune of our country that here selfishness of the politics reaches to its height. That’s why the cost is being paid by each country men. India used to be “Golden Sparrow”, but it had become history only. There is no chance and fortune of our country that golden era can materialize again.anyways…..with deep breath gurudev replied him. And after a while with a thought he replied “with the help of Parad shivling only we can get ride over the all such problems and the growth and progress of the country could be establish for coming days.” Sadgurudev told him.
“But to make such rare divine shivling could not be possible by anyone else except you only and no one else is capable which is appropriate for whole country and can lead such big change in the land of India which is being under heavy financial debts. And demons like unemployment & financial problems are harassing people. Would you, with your holly blessing, not accomplish this great task for the development of our country??? Sharmaji sincerely asked.

if discipal make a wish and that too in the favour of the country then how it is possible for sagurudev to refuse a pray, because he devoted his whole life to establish and maitain the countryhood only. his life, his will, his thinking had always worked for to make this dream come true. that why he never let any selfishness to be inside him and in repeat condition he paid for burning him self in fire of critisism and false eligation. anyways...
not even for a moment he thought that how he will provide seperate time for this task from his busy schedule ...was it possible that such complicated work goes on not only under him but with his own hand?...but this is the men who lived every moment on the name of country...rather it is about his contribution in teaching field...or sanyash or poision of materialism...he took it with smile like Nilkantha.
In the month of February, on the day of mahashivratri he made such divine “Purn Mahalaxmi Saayujy Shiv Pratistha yukt parad shivling”, but making is enough, no no... Still the kuber establishment and life inducing process with many secret mantras in that shivling ,with that it was also requisition to attach shivling with all countrymens current and future even, with that they can acheive completness. He instructed his discipals, working in jodhpur Ashram to be ready for a special poojan which is not related to specific person but for whole country’s goodwill and financial growth. and also can give the lost self respect of country by removing debts.
after shivling was made, Poojniya mataji, herself did the poojan of that parad shivling with various Special and rare mantras for more than two month with poojya sadgurudevji , after that each day poojya pad sadgurudev did the poojann of that parad shivling with his jodhpur staff member (shishya). Still, many tantra processes to make it complete effective were yet to be done for which the ritual of that great shivling was not going through various ash of smashanas with Mahakal mantra. Each days the ashes collected from different graveyard, continuously from four shamshan situated around the jodhpur city like mandor, maha mandir ,rohat etc.. daily the ash was suppose to come from different Smashana. It was also amazing facts that when our gurubrothers went to collect the ashes they always found the ashes from recently burned chita. Even people asked them why they were doing the same but they kept silence. First after collecting ashes their purification used to be done. even staff member know not initial for which purpose that was going to be used .the same process done continuously for feb to june means lasting five months. Not a single staff member of jodhpur staff knew why this process is done and for whom, but it was their beloved sadgurudevji agya, to fulfill his agya was only their dharma, neither any of them asked him why such a lengthy process required, even when poojya sadgurudev could make parad shivling from his thought only.
in those days Sadguruev used to do poojan with various tantrik things and articles sometime in day or sometime in night even, based on specific time. . More than 24 type of maha mirtunjan mantra recited by poojya sadgurudevji.(amazing fact. who knows the 24 types of that Maha mrutyunjay mantra). One more specificity was colour change of paarad. In begining it was with a black shade shine. Then after some abhishek it again changes its color from black to sindoori (similar to red). After the third main abhishek it shines again like silver. And after that it acquired the colour of parad and did not get changed after that. last, this lenthy process came to end. and for its establishment, it was to be carried. With special mantra, it was wrapped with red cloth and tied with black threads. Sadgurudev him self carried it to delhi, Till then staff member not understood where and for whom that divine parad shivling was made.
As all of you already knew that in the month of july sadgurudevji himself presented that divine parad shivling to then president of india late Dr .shri Shanker dyal sharmaji, president very pleased to had that gift.
The question was why sadgurudevji, had given that parad shivling to then president of India, reason was that president is consider head of our country, and if that great divine holy parad shivling be in his home i.e. Rastrapati bhavan (president’s house).whole country be prosperous by that. He had not given that shivling to a person but the main head member of our country. You can understand the pain and laborer done by him. The divine parad shivling weighted 21 kg. This is the story behind. But what is the effect of that in our day to day life without understanding that whole story would not be completed.
After 1995 you can see the all round success of our country in every field, I am not here advocating about the sadgurudevji , he needs not that. And also I am also clearly mentioned that I am not underestimating the hard labors and effort of our country man, but I am here only pointing to a direction that why in recent time recession period, many of the so called developed country suffered a lot and reached a verge of financial failure, but our country with having all type of imagined problems, not suffered much and still able to maintain healthy growth rate. Everywhere new graduate gaining jobs as they want. Is not the Positive sign that divine blessing is always with us and in country.
In the last, what can I ask you; at least it’s the duties of all of us to understand the hard work and pain felt by our sadgurudev, which was done for to shape a happy life of every countryman. At least we try to move forward to the path divine showed by him. I am praying for your success and divinity in this path to this holy day to poojya sadgurudevji.
I understand that I do not need to thank you; it’s my pleasure to have friend like you all, here in blog and group. as all of you already knew that we are(specially I) busy in parad sanskar ‘s workshop organized by aifji, so it will be little bit difficult for me to reply you in time, but my heart will be with you as always………



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1 comment:

anamika bandopadhyay said...

I have contacted the Jodhpur ashram , for quite a few times . didn't get any response . Should I draw an inference that I'm not allowed to take part or enter your world ?
Om Nmah shivaya