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Saturday, September 1, 2012

AAVAHAN - 38


 
Sadgurudev gave answer to my question and said that after doing sadhna of Ruler god or goddess related to any siddh area, one definitely gets result upon searching in that area. Abu area –Arbuda, Jammu Kashmir-Shri Vidya, Manali and Dehradun –Shiva and Shakti combined, northern region of Punjab- Aadi Nath, Varanasi- Vishweshwar and Vishaalakshi, in Bengal Ugra Tara, in Assam and north eastern states Kamakhya, Tripur Sundari and Mahakaali, in Gorakhpur, Amarkantak and Jabalpur area  Aghoreshwar and Yogini sadhna, in Orissa Sapt Maatrika sadhna, In Gir area Lord Shiva and Valga sadhna, On western coast Haygreev or Kamla Sadhna and person taking special interest in area related to Shri Shail should do upasana of Malikaarjun i.e. Shiva. Through them, possibilities of sadhak getting benefits increase. But first of all it is very much necessary for sadhak to increase level of consciousness. Because without developing inner consciousness, it is not possible to establish contact with outer consciousness. Since siddh area is full of consciousness then if person himself does not possess inner consciousness then how can he feel the consciousness of that area. Acharya Kanaad in his own time has done various discoveries on subject of element and has offered a new dimension to the subject. He has given amazing description relating to five elements in his scriptures Kanaasrahasya and Kanaadsootra. In composition of every material five element are important. Through this principle, he understood many unknown secrets of universe and put them in midst of common people. Definitely, this principle applies to both physical and subtle aspects. This fact also applies to humans. But subject of his search was on composition of material related to that element. In other words, his search was confined to discovering about the element and what is the role played by them in determining structure of any material or creature or their inner and outer composition. Only five elements are present in all materials, this fact is incomplete since composition of all material or level of consciousness of creature is different from each other. In humans, basis of levels of consciousness does not depend on five elements rather it depends on 12 types of elements. When we talk about level of consciousness or spirituality or establishing contact of inner universe with outer consciousness, then capable transmission of 12 elements is extremely important and this is the first essential procedure. Besides five elements, these elements are Maanas element, Aatm element, Praan element, Time element, Prakash (light) element, Ooj (Aura) element and Jeev element. These elements are subtle elements. All these have different-different elements embedded in them. Mind is not concrete, it is subtle but for composition of subtle also, some element or the other will be required. Therefore, this element is said to be important base for composition of mind, it is called Maanas Element. Besides this, Praan element related to composition of Praan. Without time, imagination of human is not possible. It is the time element which connects inner and outer time of humans and gives the perception of time. Lightness or darkness or for feeling all elements of creature internally and externally it is necessary that they are visible and the element which is necessary for this beholding is Prakash element. Ooj element is scale for purity. It is the element which take humans towards physical and subtle purity internally and externally or impurity-less basic composition. And Jeev element or Jeev fluid is the purest form of metals contained in human body which provides the capability of creation and life. In ancient times, Maharishi Kapil provided the procedures related to 12 types of elements which are obsolete today. But it is extremely important for sadhak that sadhak should activate these elements.
Kalps related to all siddh areas contains the description of such sadhnas through which sadhak can attain consciousness. But first of all sadhak should do the sadhna procedure related to element circulation for development of level of consciousness.

For this sadhak should do this procedure for one or four Mondays. Sadhak should take only Havishya Bhoj (only milk and rice should be taken as food).Sadhak should chant “SHIVSHIVAAY NAMAH” for one hour while doing tratak on Parad Shivling. It has to be done alone in night. Side by side, sadhak after doing this procedure should do the Jap of Aghor Mantra as much as possible. This procedure also has to be done while doing Tratak. Sadhak should face North direction and use white dress and aasan. There is no need for any rosary or other articles. Chanting while doing Tratak on Parad Shivling lead to elemental movement in sadhak as a result of which all elements of body starts activating.

After activation of these type of elements, person‘s life is filled with many divine experiences and he experiences other-worldly experiences. Pure Parad is the summary element of all elements because it is life-fluid of Shiva through which Shiva does the work of creation, control and movement of universe; it is central point for all origins. Doing tratak on it and chanting definitely leads to attainment of all siddhis. Parad Shivling is not merely Shiva form rather it is combined form of Shiva and Shakti. In this manner, sadhak after attaining the blessings of Shiva and Shakti, attaining siddhis of various Kalps becomes easy. If in normal course also, sadhak does this sadhna then sadhak definitely gets different types of sadhna-related benefits.
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सदगुरुदेव ने मेरे प्रश्न के सबंध में वृहद उत्तर देते हुवे कहा की किसी भी सिद्ध क्षेत्र से सबंधित अधिष्टात्री देवी देवता की साधना उपासना करने के बाद उस क्षेत्र में खोज करने पर निश्चय ही परिणाम प्राप्त होते है. आबू क्षेत्र– अर्बुदा, जम्मू कश्मीर – श्रीविद्या, मनाली तथा देहरादून – शिव शक्ति सम्मिलित, पंजाब के उत्तर क्षेत्र – आदिनाथ, वाराणसी – विश्वेश्वर तथा विशालाक्षी, बंगाल में उग्रतारा, आसाम में तथा उत्तरीपूर्व राज्यों में कामाख्या तथा त्रिपुरसुंदरी तथा महाकाली, गोरखपुर अमरकंटक तथा जबलपुर के क्षेत्र में अघोरेश्वर तथा योगिनी साधना, उडीसा में सप्त मात्रिका साधना, गिर क्षेत्र में भगवान शिव तथा वल्गा साधना, पश्चिमी घाट में हयग्रीव या कमला साधना, तथा श्रीशैल से सबंधित क्षेत्र में विशेष रुचि लेने वालो को भगवान मलिकार्जुन अर्थात शिव उपासना करनी चाहिए. इसके माध्यम से साधक को लाभ प्राप्ति की संभावनाए और भी बढ़ जाती है. लेकिन सर्व प्रथम साधक के लिए यह बहोत ही ज़रुरी है की वह अपने चेतना स्तर का विकास करे. क्यों की बिना आतंरिक चेतना के विकास के बाह्य चेतना से सबंध स्थापित करना संभव नहीं है. क्यों की सिद्ध क्षेत्र तो पूर्ण चेतना बद्ध होता है जब व्यक्ति खूद ही आतंरिक चेतना विहीन होगा तो वह उस क्षेत्र की चेतना को अनुभव कर भी केसे सकेगा. आचार्य कणाद ने अपने काल में तत्व विषय में विभिन्न खोज कर उस विषय को एक नया आयाम दिया था. पञ्चतत्वों के सबंध में उनके ग्रन्थ कणादरहस्य तथा कणादसूत्र में उन्होंने अद्भुत व्याख्या दी है. सर्व पदार्थो के बंधारण में पञ्च तत्व ही मुख्य होते है यह सिद्धांत के माध्यम से उन्होंने ब्रह्माण्ड के कई अज्ञात रहस्यों को जाना तथा जनमानस के मध्य में रखा. निश्चित रूप से सभी स्थूल तथा सूक्ष्म के ऊपर यह सिद्धांत लागू होता ही है. मनुष्य के सबंध में भी यही तथ्य मूल रूप से है. लेकिन उनकी खोज का विषय तत्व सबंधित पदार्थ के बंधारण के ऊपर था अर्थात उनकी खोज का दायरा तत्व तथा उसका कार्य किस प्रकार से किसी भी पदार्थ की या जिव के बंधारण में या उनके बाह्य तथा आतंरिक संरचना में कार्य करता है यह था. लेकिन सभी पदार्थ में यह पञ्च तत्व ही मात्र है यह बात अधूरी है. क्यों की सभी पदार्थ बंधारण या जिव का चेतना स्तर अलग अलग होता है. मनुष्य में चेतना स्तर का आधार मात्र पञ्च तत्वों पर नहीं बल्कि बारह प्रकार के तत्वों से होता है. जहां पर बात चेतना स्तर की हो या आध्यात्म की हो या आतंरिक ब्रह्माण्ड का बाह्य ब्रह्माण्ड से संपर्क स्थापित करने की हो वहाँ पर साधक के बारह तत्वों का योग्य संचारण नितांत आवश्यक है तथा यह प्रथम अनिवार्य प्रक्रिया है. पञ्च तत्वों के अलावा ये तत्व है मानस तत्व, आत्म तत्व, प्राण तत्व, समयतत्व, प्रकाशतत्व, ओज़ तत्व, तथा जिव तत्व. यह सब तत्व सूक्ष्म तत्व है इन सब में भी अलग अलग तत्व समाहित है. मन ठोस नहीं है, मन सूक्ष्म है लेकिन सूक्ष्म की संरचना में भी कोई न कोई तत्व तो चाहिए ही, इस लिए इस तत्व को मन की संरचना का मुख्य आधार है उसे मानस तत्व कहा गया है. इसके अलावा प्राण संरचना से सबंधित प्राण तत्व, समय के बिना मनुष्य की कल्पना भी संभव नहीं है मनुष्य के आतंरिक तथ्य बाह्य समय को जोड़ने वाला तथा समय का बोध देने वाला समय तत्व है. प्रकाश या अंधकार या जिव के सभी तत्वों को आतंरिक या बाह्य रूप से  अनुभव करने के लिए उसका द्रश्यमान होना ज़रुरी है तथा यह जो निहारने की प्रक्रिया के लिए जो अनिवार्य तत्व है वह प्रकाश तत्व है, ओज तत्व विशुद्धता का प्रमाण है जो की मनुष्य को आतंरिक तथा बाह्य रूप से स्थूल तथा सूक्ष्म शुद्धि; या अशुद्धि विहीन मूल बंधारण की तरफ ले जाने वाला तत्व है. तथा जिव तत्व या जिव द्रव्य शरीर में निहित धातुओ का विशुद्ध स्वरुप है जो की मनुष्य में जीवन की तथा सर्जन की अनन्य क्षमता प्रदान करता है. पुरातन काल में महर्षि कपिल ने १२ प्रकार के तत्वों से सबंधित क्रियाए प्रदान की थी जो की आज लुप्त है. लेकिन साधक के लिए यह नितांत आवश्यक है की साधक इन तत्वों को जागृत करे.
सभी सिद्ध क्षेत्रो से सबंधित कल्प में भी एसी साधनाएं वर्णित है जिसके माध्यम से साधक को सहायता की प्राप्ति हो सके. लेकिन साधक को सर्व प्रथम अपने चेतना स्तर के विकास के लिए तत्व संचार से सबंधित साधना क्रम करना चाहिए.
इसके लिए साधक को एक या चार सोमवार को यह प्रक्रिया करनी चाहिए. साधक को हविष्यभोज (भोजन में मात्र दूध तथा चावल को ही लेना) करना चाहिए तथा पारद शिवलिंग पर त्राटक करते हुवे एक घंटा ‘शिवशिवाय नमः’ का जाप करना चाहिए. यह कार्य रात्री में एकांत में होना चाहिए. इसके साथ ही साथ साधक को यह प्रक्रिया करने के बाद जितना संभव हो अघोर मंत्र का जाप करना चाहिये यह प्रक्रिया भी साधक को त्राटक करते हुवे करनी चाहिए. साधक को उत्तर दिशा की तरफ बैठ कर यह क्रिया करनी चाहिए तथा सफ़ेद वस्त्र और आसान का प्रयोग करना चाहिए. इसमें किसी भी प्रकार की माला या दूसरे पदार्थो की कोई अनिवार्याता नहीं है. पारद शिवलिंग पर त्राटक करते हुवे जाप करने पर साधक में तात्विक संचलन होने लगता है जिसके फल स्वरुप शरीर के सभी तत्व जागृत होते है. इस प्रकार के तत्व जागृत होने पर व्यक्ति कई प्रकार की अलौकिक अनुभूतियों से परिपूर्ण होता है तथा साधक को कई परालौकिक अनुभवों की प्राप्ति होती है. विशुद्ध पारद निश्चित रूप से सभी तत्वों का सार तत्व ही है. क्यों की जो शिव का जिव द्रव्य है, जिसके माध्यम से शिव सृष्टि का कार्य, नियमन, संचलन करते हो, जो सर्व उत्त्पति का केन्द्र बिंदु है, उसके ऊपर त्राटक के साथ जाप करने पर निश्चय ही सर्व सिद्धि की प्राप्ति होती ही है. पारद शिवलिंग मात्र शिव स्वरुप न हो कर शिव शक्ति का सम्मिलित स्वरुप है. इस प्रकार साधक को शिव तथा शक्ति का आशीर्वाद प्राप्त करने पर विभिन्न कल्पों की सिद्धि प्राप्त करना सहज हो जाता है. यूँ भी अगर साधक इस साधना को सम्प्पन करता है तो साधक को निश्चित रूप से कई प्रकार के साधनात्मक लाभों की प्राप्ति होती है.
****NPRU****


2 comments:

Hemraj said...

Rahgu bhiya iska Aghor Mantra Pradhan kare....Jay nikhileshwer

rachel mokin said...

JAI SHRI GURUDEV.JAI Nikhileshwer