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Saturday, September 22, 2012

MAHAVIDYA BAGLAMUKHI TANTRA - HIRANYAGARBHA VALGA SADHNA SE SOOKSHM SHAREER SIDDHI RAHASYA - 1



Nemishunyamraan Dhate Rashunyam Naabhinishthitam |
Samety Naabhishunytvam Vishwchakrasy Shunyta ||

“Entire world is Shunya only and in this Shunya, Yojit Shunya, Yojna Shunya and Kendra Shunya are contained within.”  Bindu means only this that immersing oneself in that supreme power….i.e. Universe.

The subtler than subtle unit by which any particular element is created is called Universe. It can be both visible and invisible. Shape of universe can be expanded as well as subtle too. But the reality is this that the basic unit by which particular element is created is called Universe.

Have you seen that rays of sun which comes inside the room through some whole, window or vents???

In those rays , small-small atoms move constantly………it is so much amazing that may be they are not visible to us in the full light of Sun but rays coming through vents is seen by our eyes. Do you know….they are called TISRENU…….that unit from which universe is created too and which in itself is one complete universe too.

They contain the secrets of creation and flow in them, which are called universal secrets….complete secret of creation, maintenance and destruction………….in other words they have speciality and qualities of Sat, Raj and Tam in them. Science says that speed of light, speed of sound is fastest….Isn’t it….

But Tantra and Aagam-Nigam has clarified that speed of words is faster than sound …….As soon as words are originated in contemplation, even before the sound( through which people understand that this is A,B or C) is produced, they make a complete rotation   of universe and come back to us

We were talking about the universe…..physically its journey is very difficult and cumbersome so is the knowledge of its secrets…….but through astral body, not only this journey can be done easily rather those secrets can be unveiled very easily which are hidden in them. But normally, when we try to accomplish Astral body then in reality, we are merely trying to make strong the relation between astral body and physical body.

Time of this journey of astral body is fixed by universe to 24 minutes only…….sadhak’s astral body has to come back to his basic body after completion of this time. But it is not necessary that one can know those secrets in this limited time-frame.

The Rajat Sootra through which our astral body is connected to navel of basic body, in reality it is one form of Atharva Sootra only. Establishing a stable connection of physical body with astral body and doing this journey in fixed time and fulfilling its purpose and coming back without any harm is possible only through Hiranyagarbha Valga Sadhna of Maa Baglamukhi. Navel indicates universe only which by combination of Praan and Vayu, help creature attain knowledge and secrets. The person whose Naabhi Chakra is more activated and conscious, that person moves on the knowledge path with fast speed and attains the knowledge of secrets of various subjects.Lankesh Raavan is strong example of this fact. And sadhak who has reached navel i.e. Shunya then immerse himself in that supreme power and become one with it, attains universal oneness, chance of his downgrading is very less.

Very often when sadhak does the practice of activation of astral body, he considers it as separate from chakra jagran or bhedan. But in reality it is not like this…..Chakra represents our spiritual and materialistic upward progression and this progress also includes Sookshma Shareer siddhi too.

Our body is divided into seven loks Bhu, Bhuvah, Swaha, Mah, Janah, Tapah and satyam. And in reality, these seven loks are seven layers of our consciousness. Our body has seven bodies and each body has seven bodies i.e. 49 basic bodies and then 49 subconscious bodies….then 49 and this sequence will go on. In other words, sense of infinity is possible only through complete knowledge of this procedure….Facts written above has to be used by sadhak for Sookshma Shareer Siddhi and Brahmand Bhedan. Therefore, try to understand them carefully and imbibe them in your heart.
To be continued….

How through Hiranyagarbha Valga Sadhna sadhak can completely lighten Atharva Sootra of his own and other person and accomplish Sookshma Shareer and easily move in universe…..What is its hidden padhati and secret….its description and other secrets, I will give in the next article tomorrow…….
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नेमिशून्यमरान् धत्ते रऽशून्यं नाभिनिष्ठितम् |
समेत्य नाभिशून्यत्वं विश्वचक्रस्य शून्यता ||

“सम्पूर्ण विश्वचक्र ही शून्य है और उसी शून्य में योजितशून्य,योजना शून्य और केंद्र शून्य निहित हैं.” बिंदु का अर्थ ही है,स्वयं परम में विलीन होकर फिर वही एक....अर्थात ब्रह्माण्ड.

  वह सूक्ष्म से सूक्ष्म इकाई जिसके द्वारा तत्व विशेष की सृष्टि होती हो,ब्रह्माण्ड कहलाता है,ये गोचर भी हो सकता है और अगोचर भी. ब्रह्माण्ड का आकार विस्तृत भी हो सकता है और सूक्ष्म भी,किन्तु सत्य यही है की वह मूल इकाई जिसके द्वारा तत्व विशेष की रचना होती हो,ब्रह्माण्ड कहलाता है.

     कभी आपने सूर्य की उन किरणों को देखा है,जो किसी झिर्री,छिद्र,या छोटे झरोखों से घर या कमरे के भीतर आती हो ???

   उस किरण में कैसे छोटे छोटे कण गति करते रहते हैं,निरंतर चलायमान....कितने आश्चर्य की बात है की,सूर्य के पूर्ण प्रकाश में हमें वो भले ही दृष्टिगोचर ना होते हों,किन्तु उस झरोखे से आती किरणों में हमारी आँखे,उन्हें देख ही लेती है. क्या आप जानते हैं....इन्हें तिसरेणु कहा जाता है.....वह इकाई जिससे ब्रह्माण्ड का निर्माण भी हुआ है और जो स्वयं अपने आप में एक पूर्ण ब्रह्माण्ड भी हैं.
   
 ये अपने आप में निर्माण,गति के उन रहस्यों को समेटे हुए होते हैं,जिन्हें ब्रह्मांडीय रहस्य कहा जाता है....सृजन,पोषण और अंत का सम्पूर्ण रहस्य...... अर्थात सत्,रज और तम की विलक्षणता और गुणों को खुद में समेटे हुए. विज्ञान कहता है की प्रकाश की गति,ध्वनि की गति सबसे तीव्र होती है...है ना.....

   किन्तु तंत्र और आगम-निगम ने स्पष्ट किया है की ध्वनि से भी अधिक तीव्र गति शब्द की होती है.... शब्द जैसे ही चिंतन क्षेत्र में उत्पन्न होते हैं,वैसे ही उसकी ध्वनि (जिसके द्वारा ही लोग समझ पाते हैं की ये,क है,ग है या ल है) होने के पूर्व वो ब्रह्माण्ड की परिक्रमा कर आपके पास वापिस आ जाते हैं.
  
 हम बात कर रहे थे ब्रह्माण्ड की...भौतिक रूप से इसकी यात्रा अत्यधिक दुसाध्य है और कठिन है इसके रहस्यों का ज्ञान भी...किन्तु सूक्ष्म शरीर के माध्यम से ना सिर्फ इस यात्रा को सरलता पूर्वक किया जा सकता है,अपितु उन रहस्यों का अनावरण भी सहजता से किया जा सकता है,जिन्हें ये अपने भीतर छुपाये बैठे हैं. किन्तु सामान्य रूप से जब हम सूक्ष्म शरीर को सिद्ध करने का प्रयास करते हैं तो वास्तव में मात्र हम अपने सूक्ष्म शरीर के भौतिक देह के साथ सम्बन्ध को स्थूल करने की क्रिया मात्र करते हैं.

    सूक्ष्म शरीर की इस यात्रा का समय ब्रह्माण्ड द्वारा निर्धारण २४ मिनट ही होता है...एक साधक की सूक्ष्म देह को अपने मूल शरीर में इस समय के पूरा होते ही वापिस आना होता है. किन्तु आवश्यक नहीं है की आप उन रहस्यों को इस सीमित समय के भीतर जान ही लें.
     
   जिस रजत सूत्र के द्वारा हमारा सूक्ष्म शरीर मूल देह की नाभि से जुड़ा होता है,वो वास्तव में अथर्वा सूत्र का ही एक रूप है. भौतिक देह के साथ सूक्ष् शरीर को स्थायित्व देकर जोड़े रखना और निर्धारित समय में उसे वापिस यात्रा और यात्रा का मंतव्य पूर्ण कर वापस बिना किसी क्षति के वापस ले आना माँ बगलामुखी की हिरण्यगर्भा वल्गा साधना से ही संभव है. नाभि ब्रह्माण्ड का ही प्रतीक है,जो प्राणों और वायु के समन्वय से प्राणी मात्र को सत्ता जीवन,ज्ञान और रहस्यों की प्राप्ति कराती है. जिस व्यक्ति का नाभि चक्र जितना अधिक जाग्रत और चैतन्य होता है,वो व्यक्ति  उतना अधिक ज्ञान मार्ग पर तीव्रता से बढ़ता है और विविध  विषयों के रहस्यों का ज्ञान अर्जित कर लेता है. लंकेश रावण इसका प्रबल उदाहरण हैं. और नाभि अर्थात शून्य तक पहुच गया साधक फिर परम में विलीन होकर एक हो जाता है,ब्रह्मांडीय एकाकारता को प्राप्त कर लेता है,उसका फिर अधोगति करना इतना सहज नहीं होता है.

  बहुधा साधक जब सूक्ष्म शरीर जागरण का अभ्यास करता है तो वो उसे चक्र जागरण या भेदन से प्रथक ही मान लेता है.किन्तु वास्तव में ऐसा है नहीं...चक्र आपकी आध्यात्मिक और भौतिक उर्ध्वगति का प्रतीक होते हैं और इस उर्ध्वगति में सूक्ष्म शरीर सिद्धि भी आती है.
    
    हमारा शरीर सप्तलोकों में बंटा हुआ है भू,भुवः,स्वः,मह,जन:,तपः और सत्यम्. और वास्तव में ये सप्तलोक हमारी चेतना की सात परतें हैं. हमारे शरीर में सात शरीर है और प्रत्येक शरीर में सात शरीर हैं अर्थात मूल शरीर ४९ और फिर उपचेतना शरीर ४९...फिर ४९ और ये क्रम चलता रहेगा अर्थात अनंत का बोध इसी क्रम के पूर्ण ज्ञान से संभव हो पाता है....... ऊपर जो भी तथ्य लिखे हैं,उनका प्रयोग साधक को सूक्ष्म शरीर सिद्धि और ब्रह्माण्ड भेदन के लिए करना ही पड़ता है. अतः उसे ध्यान से समझने का प्रयास करें और हृदयंगम कर लें...
                                                                 क्रमशः ........
  कैसे हिरण्यगर्भा वल्गा साधना द्वारा साधक स्वयं के और अन्य व्यक्तियों के अथर्वा सूत्र को पूर्ण प्रकाशित कर तथा  सूक्ष्म शरीर सिद्ध कर ब्रह्माण्ड में सरलता पूर्वक विचरण कर सकता है...क्या है इसकी गोपनीय पद्धति और सहस्य..इसका विवरण और अन्य रहस्यों का विवेचन मैं अगले लेख में कल दूंगी..........

****RAJNI NIKHIL****
****NPRU****

 
  
    

2 comments:

Neeraj Kumar said...

Aati vishist jaankari aur durlabh gyan main bhi ye suksham sharir jagran sadhana karne ka manas bana raha hun aur bhai ke bataye vidhan ke dwara karunga par ye janakari bahut hi labhdayak hain Jaigurudev

SHIVAM SARASWAT said...

JAI GURU DEV

SIR MAIN DAILY APKA BLOG READ KARTA HU MUJHE APKE BLOG PE ETNI ACHHI-2 JANKARI MILI HAIN JO KI MUJHE KAHI OR SE NAHI MIL SAKTI THI.
SIR MAIL APNI LIFE SE BAHUT PRESHAN HU OR MERE SATH-2 MERI FAMILY WALE BHI MERE LIYE PRESHAN RAHTE HAI
SIR MERE OR MERI MAA PE KOI NA KOI UPARI CHAKKAR HAI.

SIR MERI MAA HAR SAMAY BIMAR RAHTI HAI OR USKO AJIB SA MAHSUS HOTA HAI

OR SIR MAIN JAB 1 YEAR KA THA TAB SE CHAL NAHI PA RAHA HU OR TO OR MERI HALAT DIN PE DIN BAHUT JAYDA BIGATI JA RAHI HAIN

SIR JI MUJHE AAP PE BAHUT BHAROSA HAI SIR AAP LOG APNI VIDHAYA KA USE KARKE HUMKO THEEK KARDO PLZ SIR JI PLZ APKO APKE GURU JI KASAM
MAIN YE EMAIL BAHUT UMID SE SEND KAR RAHA HU PLZ REPLY JARUR KARNA KAHI DER NA HO JAYE

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Saraswatshivam007@india.com