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Monday, June 27, 2011

AAVAHAHAN-10

योगिनी? सन्याशी के हाव भाव से साफ़ नज़र आ रहा था की वे सहमे हुए हे, गभराए हुए है. मेने मेरे साथ आए दूसरे व्यक्ति की ओर देखा, वे कुछ गुस्से मे नज़र आ रहे थे, उनके इशारे रे हम तीनों आगे की और चल पड़े. रास्ते मे मुझे सन्याशी जी से पता चला की वे हिमालय मे कई साल तक साधनारत रह चुके है. सन्यासी महोदय के गुरूजी को परमहंस निखिलेश्वरानंद जी का अत्यधिक सहयोग एवं मार्गदर्शन मिला था साधना मार्ग मे. सन्यासी महोदय की भी इच्छा थी की वे भी निखिलेश्वरानंद जी के चरणों मे बैठे और कुछ ज्ञान प्राप्त करे. अपने गुरूजी से ये प्रार्थना बार बार करने पर उन्होंने श्री निखिलेश्वरानंद जी से आज्ञा प्राप्त की. सन्यासी महोदय को अपने गुरु के सहयोग से आखिरकार निखिलेश्वरानंदजी की छत्रछाया मिल ही गयी. निखिलेश्वरानंदजी ने सन्यासी महोदय को योग तन्त्र का अभ्यास  करना शुरू किया और आवाहन की उच्चतम क्रियाए सिखाई जो अत्यधिक श्रमसाध्य और गुह्य है. सन्याशी महोदय ने भी अत्यधिक परिश्रम के साथ इन आवाहन की साधनाओ को सिद्ध किया. एक दिन वे निखिलेश्वरानदजी से आज्ञा प्राप्त कर सन्यासी महोदय देशटन पर निकले. लेकिन बिच मे जहा कही भी सिद्धो का जमावड़ा होता तो वही रुक जाते, उनकी सिद्धियो को देख के सिद्धो के भी होश उड़ जाते एसी गज़ब सिद्धिया प्राप्त इस व्यक्तित्व का जीवन अब बदलने वाला था, घुमते घुमते जब वह बंगाल के पास पहोचे तब उनकी भेंट एक अघोरी से हुई, अघोरी भी अघोर साधनाओ मे निष्णात था. दोनों सिद्ध साधको ने अपने अपने क्षेत्र मे मिले ज्ञान को आपस मे बांटा और अघोरी ने अपनी सिद्धियो का प्रदर्शन किया, तब सन्याशी महोदय ने भी अपनी सिद्धियो को अघोरी के सामने रखा, न जाने क्यों ? अघोरी को क्या सुजा, उसने कहा अगर बात सिद्धियो की हो तो तुम सिद्ध हो लेकिन जब बात ज्ञान की हो तो तुम अभी कच्चे हो...सन्यासी को अपनी सिद्धियो पर अबतक कुछ विशेष गर्व या यु कहा जाए की अभीमान सा हो गया था...उसने कहा की मेरी सिद्धियो के सामने अच्छे अच्छे सिद्ध भी पानी भरते है, अघोरी को भी चमक आ गयी...अघोरी ने कहा अगर यही बात हे तो जाव यहाँ से कुछ ही दुरी पर योगिनियो का कस्बा है, हिम्मत है तो वहाँ जाके अपनी सिद्धियो का प्रदर्शन करो, अभी तुम बच्चे हो, वहाँ जाने का नाम तो बड़े बड़े तांत्रिक भी नहीं लेते...दिखाओ अब अपनी सिद्धिया वहाँ जाके....सन्यासी की आँखों मे खून उतर आया, अपमान मे जुलस के रह गया वह एक बार मे ही...और बिना कुछ कहे वह चल दिया उस सूखे पथरीले रस्ते पर..उस कसबे की और....अगर सन्यासी को पता होता की उसका यही कदम उसके लिए एक भयंकर आफत लाने वाला है तो वो सायद अघोरी की बात मान लेता...लेकिन अब तक तो उसके कदम उसे काफी दूर तक ले चले थे.....
(क्रमशः)
Yogini ? From the expression of sanyashi it was too clear that he was traumatized at that moment. I just looked at second person accompanied me, he was looking bit angry, with his sign, all three started moving ahead. In the middle of the way, I cme to know that sanyasi had been through sadhana practice for years in Himalaya. Guruji of sanyasi received tremendous support and guidance in sadhana pathfrom Paramahansa Nikhileshwaranandji. Sanyasi was also willing to sit in the feet of Nikhileshwaranandji and to have some knowledge. Requesting often to Guruji, Guruji took permission from Nikhileshwaranandji. Sanyashi mahoday, with help of his guruji, finally became able to have nikhileshwaranandji’s bless. Nikhileshwaranandji started teachings of yogtantra for sanyasi mahodaya to practice it and made him learn the very high processes of Aavahan which were hard and secret.
Sanyasi too worked hard and accomplished sadhanas of Aavahan. One day he asked for a leave from Nikhileshwaranandji and went to roam in country. But wherever in between his way, if he finds any group of siddha people, he used to stay. After watching accomplishment of sanysi, siddh people even used to be amazed and surprised. Such honoured and accomplished person’s life ws about t change. Roaming across, when he reached near bengol, he encountered with an Aghori, who was also accomplished in Aghor sadhana. Both accomplished shared their knowledge which they had gained. And aghori demonstrated his accomplishments at that time sanyasi too displayed his powers. Can’t say why? But, something came to Aghori’s mind and he told that if we speak about powers, definitely you are accomplished but when it come to Knowledge, you are blank... till now, sanyshi did generated a good amount of proud or in other words ego on his powers...he said in front of my powers, big siddhas even bows...aghori even became excited..Aghori said, Go then, a bit far is a township (small village) of yoginis. If you have courage, go there and display your powers there, you are a kid yet, those even scare to take name of this place, which are classified under big tantriks. Go and show your powers there...Eyes of Sanyasi turned to red, He burned inside with fire of disrespect....and without speaking a single word, he made his foot on the rocky path…towards that township…if sanyshi was aware that his this step only may lead him to a big storm then he must have agreed to aghori. But till now his steps lay him a big far… (Continue)
****NPRU****

1 comment:

NitinPPatil said...

जय सद्गुरुदेव, भाई ये आवाहन कि पोस्टिंग मुझे बहोत बहोत सुंदर लगी, मन बहोत हि प्रसन्न हो गया, मेरि उत्सुकता और बड सि गयि है, जिग्ग्यासा हेतु मुझे और आनंद आ रहा है, धन्यवाद, ऐसि दुर्लभ जानकारि के लिये,....लेकिन ऐसा प्रतित होता है कि कुछ पोस्टिंग नहि है, वो भि हमारे समक्ष रखे तो बडि मेहर्बानी होगी, धन्यवाद......जय सद्गुरुदेव