There was an error in this gadget

Monday, June 13, 2011

SABAR TANTRA MAHAVISHANK-NIRGAD DWAAR(GATE OF DIVINITY)




दूर से ही विशाल वटवृक्ष नज़र आ रहा था, जो अपने आप में एक अलग आभा लिए हुए था. रात्री का प्रथम प्रहार ही था और किसी एक कार्य के लिए मुझे परमहंस निखिलेश्वरानंदजी के

 तत्वाश्रम में पहोचने का और उनके दर्शन करने का मौका मिला था. उसी वट वृक्ष के निचे एक अत्यंत ही विशाल आसन पर सदगुरुदेव निखिलेश्वरानदजी अपने पूर्ण रूप में विराजमान थे. सामने कुछ शिष्य गण भी थे जो की अत्यंत विनम्रता से बेठे हुए थे. उनसे दसेक कदम दूर में खड़ा हुआ और नमस्कार किया, लम्बी जटाए, सुगठित शरीर और उनका तेजश्वी मुखमंडल, दिव्य गंध से ओत प्रोत सम्मोहित करता हुआ वातावरण,

 वे कुछ सन्यासी गुरु भाइयो को निर्गद द्वार के बारे में बता रहे थे...तभी न जाने कहा से धूम्र का एक गुब्बारा सा प्रकट हुआ. सदगुरुदेव ने उसे हाथ में लिया और अत्याषिक आश्चर्य के साथ मेने देखा की वह उस धूम्र को अपने हाथो से आकार दे रहे हे, जेसे कोई कुम्हार अपने हाथ में मिटटी लेके उसे मनचाहा आकार दे देता हे , उतनी ही या यु कहू की उससे भी कही अधिक सहजता से वह धूम्र उनके हाथो में गोलक के

 रूप में परावर्तित हो गया. कुछ देर बाद उन्होंने उस गोलक को खींचना शुरू किया और कोई रब्बर की तरह वह लम्बा से लम्बा होता गया और कुछ अंडे के आकर का दिखाई देने लगा. लेकिन उस के बिच में कुछ अजीब सा खिंचाव आ गया था और धूम्र के उस गोलक में सिर्फ किनारा ही जेसे धूम्र का रहा हो और बाकी अन्दर का भाग कुछ अलग ही रहा था. कुछ ही क्षणों में वह ३-४ फीट का हो गया तो हमने देखा की धूम्र की एक इंच

 किनारी के अलावा अन्दर जेसे पूरा एक भूभाग बन गया हे जब की वह हर तरफ से मात्र १ इंच से ज्यादा मोटा नहीं था पर दूर से ही उसमे सेकड़ो फीट का रास्ता दिख रहा था, उससे भी आश्चर्य यह था की वह कभी लाल, कभी सुनहरा तो कभी नीला तो कभी कोई अलग ही रंग का दीखता या फिर एक साथ कई रंग. बड़ा ही विचित्र द्रश्य था. तभी  सदगुरुदेव परमहंस निखिलेश्वरानंदजी ने सबको संबोधित करते हुए कहा की यही वह

 निर्गद द्वार हे जिसकी में चर्चा कर रहा था, यु इसका निर्माण कई तरीको से हो सकता हे लेकिन तुम सब को मेने धूम्र विज्ञानं के माध्यम से इसका निर्माण कर के दिखाया हे, अगर कोई व्यक्ति अपने मन से किसी भी स्थान पर जाने की इच्छा रखते हुए इसमे प्रवेश करे तो तत्क्षण वह इसमे प्रवेश के साथ दूसरी तरफ ठीक वही स्थान पर निकलेगा जहाँ उसे जाना हे...इसका उपयोग सिद्धयोगी सूक्ष्मजगत से लेके अन्य

 किसी भी लोक में प्रवेश करने के लिए करता हे, साथ ही साथ अपना कार्य समाप्त करने पर वह उसी तरह निर्गद द्वार में प्रवेश कर के अपने स्थान पर वापस आ जाता हे और इस अवधि तक उस निर्गद द्वार का अस्तित्व बराबर बना रहेगा. एसे कई निर्गद द्वार पृथ्वी के अलावा अन्य लोक में स्थायी रूप से हे जिसका उपयोग सिर्फ सिद्धो के द्वारा ही संभव हे, इतना कहके उन्होंने अपने एक सन्यासी शिष्य को अपनी

 उंगली से इशारा किया. वह सन्यासी आगे बढे और ३ - ४  फीट लम्बे और महज १ इंच चौड़े उस निर्गद द्वार में धीरे से प्रवेश कर गए जबकि आश्चर्य यह था की वह दूसरी तरफ दिखाई नहीं दे रहे थे ,... गुरुदेव ने कहा की वह दिव्यलोक में घूमने गया हे, वह आ जाए उसके बाद एक एक कर के अन्दर जा के देख लेना. इतना कहके उन्होंने सीधे मेरी तरफ ताका में तो अभी जो भी देखा वह नशे में ही था..जब वह हलके से मुस्कुराये तो

 मुझे होश आया और मेने वही से खड़े खड़े उनकी अभ्यर्थना में दंडवत किया, जल्द ही उन्होंने मुझे सन्देश दे दिया जो मुझे पहोचाना था.समय बहोत कम था , में उन्हें नमस्कार करके वापस लौटने के लिए पीछे मुडा, न चाहते हुए भी एक द्रष्टि उस द्वार पर पड़ ही गयी वह अपनी जगह पे शून्य में स्थिर था और वह सन्यासी जो उसमे प्रवेश कर गए थे वे बहार आ रहे थे और दुसरे सन्यासी उसमे प्रवेश करने वाले थे...में

 सोचता हुआ चल पड़ा की हम कितने तुच्छ और बेपरवाह जीवन को जी रहे हे क्यूँ की जो हम जानते हे वह मात्र हमारे जानने का भ्रम हे, ज्ञान अनंत हे जो की सिर्फ सदगुरु के चरणों में बैठ के ही मिल सकता हे



खैर, कुछ

 दिनों बाद एक और घटना इसी सबंध में देखि.

आओ, कुछ दिखता हु इतना कह के राघवदास बाबाजी आगे बढ़ गए, में ठीक उनके पीछे चल रहा था, उनके साथ चलना मेरे लिए गर्व की बात रही हे, सदगुरुदेव के वे वरिष्ठ सन्यासी शिष्य हे और सदगुरुदेव के आदेश से ही उनसे मिलने का मौका मिला था. कुछ मिल घनेजंगले में चलने पर एक

 जगह वह रुके और कुछ जाड़ियाँ हटाते हुए वे कुछ कदम आगे बढे, वहा पे एक बहोत बड़ी पहाड़ी चट्टान से सट के चारो तरफ से विशाल वृक्षों से घिरी हुई एक कुछ १० फीट करीब लम्बी और उतनी ही चौड़ी सपाट जमीन थी, मुझे उसमे कोई खास विशेषता नज़र नहीं आई मगर वहा पे कुछ ज्यादा ही उर्जा का अनुभव दूर से ही हो रहा था. बाबाजी ने कहा की यह एक निर्गद द्वार हे जिसका निर्माण मेने सदगुरुदेव के आदेश से किया हे,

 यहाँ के आसपास के सिद्ध इस निर्गद द्वार का उपयोग किया करते हे जिससे उनकी गति पृथ्वी के अलावा ने लोक में भी बनी रहती हे और कई गुप्त आश्रम, अद्रश्य आश्रम व् सूक्ष्म आश्रम में तत्क्षण पहोचने के लिए इसका उपयोग होता आया हे....में आश्चर्य से उनकी और देख रहा था, उन्होंने कहा की तेरी इच्छा एसे कोई निर्गद द्वार को देखने के लिए थी जो स्थायी हो इस लिए तुजे दिखा दिया वर्ना यह अत्यंत

 गुप्त हे और इसका ज्ञान ज्यादा किसीको नहीं दिया जाता. वहा पे कुछेक दूर एक सन्यासी थे उन्होंने बाबाजी की और देखा और नमस्कार किया, मुझे एसा लगा जेसे कुछ देर उनमे मौन वार्तालाप चला और उसके बाद बाबाजी ने मेरी तरफ देख के कहा चलो अब चलते हे...मेने जब पीछे मूड के देखा तो वह सन्यासी निर्गद द्वार की तरफ जा रहे थे और जेसे ही वे वहां खड़े रहे, एक क्षण में ही वे अद्रश्य हो गए. में कुछ बोला

 नहीं तभी बाबाजी ने कहा की वह सिद्धाश्रम गया हे....मेने और कुछ पूछना उच्चित नहीं समजा बस मुस्कुराता रह गया



एसे कई निर्गद द्वार का निर्माण नक्षत्र तंत्रसे भी  हुआ हे और कुछ एक सितारों के बिच में वह

 निर्मित होता हे... ब्रम्हांड में एसे कई निर्गद द्वार हे.  कहने के जरुरत नहीं की सिद्ध मंडली के सद्श्य वायु गमन करते हुए एसे निर्गद द्वारो का उपयोग विचरण करते हुए आज भी करते हे. निर्गद द्वार अत्यंत ही गुप्त रहते हे और इसके बारे में विवरण देना गुप्तता की मर्यादा को भंग करना हे इस लिए इसका ज्यादा विवरण योग्य नहीं. वेसे रात्रि काल में चमकते सितारों को देख के कौन बता सकता हे की

 इसके बिच में वह रास्ता भी हे जो सूक्ष्म जगत में प्रवेश दिलाता हे जहा से विभ्भिन्न लोको की यात्रा प्रारंभ होती हे...

------------------------------------------------------------------------------------



the big banyan tree was visible from far away, which was having its own glow. the first face of the night was just begun and with an task I did received chance to visit Paramahansa Nikhileshwaranand and his divine Tantvashram. under the same tree, Sadgurudev Nikhileshwaranand were seated in his immortal form. there were few sanyashi disciples in front of him seated in very disciplined way. about 10 feet far, I made my self stand and bowed to him. Sadgurudev were giving knowledge about nirgad dwar to those shanyasi Gurubrothers....and at the same time do not know from where a balloon like ball of smoke appear. Sadgurudev took that in his hand and with so much surprise of mine he stared moulding that smoke. with the same comfort or I say more than the comfort  a potter can give a shape to clay, he made a round shaped of it. after a little time he

  started stretching that round shaped smoke and it went to be long and more long like a rubber and it was being in egg shape now. but now in-between the smoke the stretch was visible and now the smoke was visible at outer rim of the shape only and the rest part was something different. om few seconds, when it became 3-4 feet long, we seen that apart from a small layer of smoke at rim, the rest of the internal part had became like a long territory. where as it was not thick more than 1 inch, but hundreds feet of the way was clearly visible in it, the more surprise was that the tunnel used to turning the colours from red, golden, sky or some times many at a time instantly. it was really a very strange scene, at that time only, addressing all, sadgurudev paramahansah nikhileshwaranandji told that this is Nirgad Dwar about which I had discussed. the making may differ with many processes for the same but I sawed you all the process through Dhumra Vigyana.

If any one enters to this with a wish to go on any place in mind, in that condition at the same moment on the other side, he will reach to the same destination he wished for. Accomplished Yogis uses it to enter in Sukshma Jagat to any other world, with this, after

 compliting his task enters into the same and come back at the same place. meanwhile the task, the Nirgad dwar stays in same position. Such many Nirgad dwar are permenently exists in prithvi loka and others, the use of the same is only possible through accomplished yogi. by telling this, he made a point to his one of the shanyasi disciple. Shanysi went ahead and entered into that 3-4 feet long and 1 inch thick nirgad dwar and the real surprise was that on the other side of the same nirgad dwar he was not visible. Gurudev said “ he went to see Divyaloka, when he returns one by one every one of you go in and see “. by saying this he looked direct into my eyes, i was still intoxicated by whatever I seen... when he smiled, I came to conscious and from the place I was standing I bowed down to him. soon he gave me a message which I was suppose to make reach. time was too less to stay anymore. I again bowed down to him and went back to walk. with having a

 will not to watch, loosing control, my eyes went to that Nirgad dwar, it was in the same position in air and the Shanyasi who entered in that were coming back from it and another Shanyasi were ready to enter, I went wondering that How trivial and unrequited life we lives because the knowledge we have its just a mistake of being knowledgeable, knowledge is infinite which could be gain only by sitting in feet of Sadguru.



anyways, after somedays I came in contact with other incident in the same

 regards.



Come, I will saw you something, by telling this, Raghavdas babaji went ahead, I too went behind him, it was proud to walk with him, he is one of the superior Shanyashi disciple of sadgurudev and with sadgurudev’s ordor I was able to have chance to meet him. walking through dark forest for some miles, he stopped at one place. and by removing some plants he went a bit ahead. there was a flat land of 10 feet long and of same wide accompanied by attached big rock hill and big trees around. I didnt

 found anything special about it bur I felt the big energy level from far. Babaji said that this is a Nirgad dwar which I prepared with gurudev’s order. the Siddha yogi of nearby uses this nirgad dwar through which keeps them in touch with other lokas apart from Prithaviloka and they even use this to reach at many secret aashrams, invisible aasrams and sukshma aasharams. I was looking at him with surprise. he said that your wish was to watch a permenent nirgad dwar that is why I brought you here other else this is secret and the knowledge in this regards is not shared much. there were another sanyashi a bit far who bowed to babaji, I felt like both are doing silent talk and after that at looking to me babaji said that let us leave. When I turned back and looked ,the shanyasi were going towards nirgad dwar and as soon as he stood there, at very next moment he became invisible. I didnt spoke anything but then babaji spoke that he went to siddhashram. I

 didnt felt of asking anything more. just kept smiling.

such so many Nirgad dwars are even ment with Nakshatra Tantra and it is built in between stars. there are many such nirgad dwar exist in universe. it is needless to say that the accomplished of siddhamandali by roaming into sky, flying, even till date uses such nirgad dwar. Nirgad dwar stays secret and to disclose more about it is not good. anyway, in the night, looking at the stars who can say that, they even contains a way which is path to enter in Sukshma Jagat from which the journey to different worlds starts.
****NPRU****

4 comments:

baba1973 said...

bhai, abhi tak jo artical is maha visheshank ke pade hain bade hi vismaykari aur adhbhoot hain.aur sochta hoon ki aur kitne ajoobe aur rahasya harmari soch se pare aane wale hain,khulne wale hain.har baar aap acharaj me daal dete ho ki kya ye bhi hai,aur kya kya ho sakta hai sochta rahta hoon.sadgurudev bhagwan aap aise hi hamare bade bhai par asim kripa banaye rakhen, aisi mai unse prarthna karta hoon jisse hum aage bhi apke madhyam se aur labhanvit ho saken.

baba1973 said...

bhai, abhi tak jo artical is maha visheshank ke pade hain bade hi vismaykari aur adhbhoot hain.aur sochta hoon ki aur kitne ajoobe aur rahasya harmari soch se pare aane wale hain,khulne wale hain.har baar aap acharaj me daal dete ho ki kya ye bhi hai,aur kya kya ho sakta hai sochta rahta hoon.sadgurudev bhagwan aap aise hi hamare bade bhai par asim kripa banaye rakhen, aisi mai unse prarthna karta hoon jisse hum aage bhi apke madhyam se aur labhanvit ho saken.

baba1973 said...

bhai, abhi tak jo artical is maha visheshank ke pade hain bade hi vismaykari aur adhbhoot hain.aur sochta hoon ki aur kitne ajoobe aur rahasya harmari soch se pare aane wale hain,khulne wale hain.har baar aap acharaj me daal dete ho ki kya ye bhi hai,aur kya kya ho sakta hai sochta rahta hoon.sadgurudev bhagwan aap aise hi hamare bade bhai par asim kripa banaye rakhen, aisi mai unse prarthna karta hoon jisse hum aage bhi apke madhyam se aur labhanvit ho saken.

Subodh said...

Nikhil ji, aap ke jankari bohot hi mehtva-porna hai aur mujhe atayant romanchit kar deti hai.. Maan mae ek sath bohot se swal ate hai. Mae bhi Sri Gurudev se milna chahta hon. Aap mujhe delhi mae gurudham ka address bata dejiye .........
Jis se mae bhi aap jaise guru bhaiyo ke sath kuch gyan prapt kar sako