There was an error in this gadget

Sunday, June 19, 2011

KAAL GYAAN BY MANTRA YOG

   
हमारे प्राचीन ऋषियो  ने सही अर्थो में विज्ञानं का अभ्यास किया था जिनका मूल उद्देश्य मनुष्य जाति के लिए इसे अविष्कार करना था जिससे वे उन खुशियों को प्राप्त कर सके जिसे हमारे शास्त्रों में आनंद कहा गया हैं . इसी दौरान उन्होंने आध्यात्मिकता के पथ पर कई इसी क्रिया पद्धत्तिओ की रचना की जिससे हर एक  अपनी मानसिकता के अनुरूप पथ को चुन सके.  
          इसी राह में १०८ पद्धत्तिओ की रचना हुई जैसे  मंत्र, तंत्र, योग, ध्यान, दर्शन, यज्ञ, पारद, सूर्य विज्ञानं,...ये सब अलगअलग खास पद्धत्तिया थी जिनका उद्देश्य एक ही था. जरुरी हैं  की मनुष्य अपने जीवन में एक ऐसा  रास्ता चुने जोकि उसे अपने आध्यात्मिक लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सहायता प्रदान करे क्यूँ की हर एक मानव एक अलग विचार पद्धत्ति एवं जीवन जीने का के लिए स्वतंत्र हैं .
मगर समय चलते हमारे महर्षियोंने ज्यादा खोज की, उन्होंने पद्दतियो के मध्य स्थिरता स्थापित  की और सबसे सहज पद्धत्तिओ के लिए खोज की, जिसमे जल्द और बेहतर  परिणाम प्राप्त करे. इस दौरान , उन्होंने क्रिया पद्धत्तिओ को एक दुसरे के साथ मिलाना शुरू किया जिससे और नयी पद्धत्तिया सामने आई. 
            जैसे  की सूर्य विज्ञानं पूर्ण रूप से अणु आधारित विज्ञानं हैं , जब उसे तंत्र के साथ सम्मिलित किया गया तो वो और सहज हो गया. और एक नया रास्ता मिला जिसमे सूर्य विज्ञानं लेंस की आवश्यकता न होके मात्र नेत्रों के माध्यम से पदार्थ परिवर्तन संभव था, इसी क्रिया को सूर्य विज्ञानं तंत्र कहा गया. यही  तथ्य पारद तंत्र के ऊपर भी  लागु होता हैं . जब पारद विज्ञानं का समन्वय तंत्र की विभिन्न  क्रियाओ के साथ किया गया, तब पारद से लाभ प्राप्त करना और भी आसान  हो गया.
      भारतीय आध्यात्मिक प्रणालियों  में सबसे ज्यादा प्रसिद्द प्रणाली मंत्र एवं योग रही हैं , वैसे तो दोनों एक दुसरे से बिलकुल अलग हैं . मंत्र सिर्फ ध्वनी का विज्ञानं हैं . हमारे कान सिर्फ कुछ एकं निश्चित आवर्ती तक ही ध्वनि सुन सकते हे, लेकिन ध्वनि तो हर जगह होती ही हैं . चाहे हम सुन सके या नहीं, ध्वनि से एक विशेष उर्जा का निर्माण होता ही हैं . इस तरह विशेष ध्वनि विशेष उर्जा का निर्माण करती हैं  और जब अलग अलग  ध्वनियो का निर्माण एक साथ किया जाता हैं  वे एक साथ एक अलग ही उर्जा को जन्म  देती हे. यही मंत्र विज्ञानं का सही संकल्पना हे. दूसरी तरफ योग में आध्यात्मिक अनुभूतियो के लिए शरीर का सहारा लिया जाता हैं . योग पद्धति में शरीर को माध्यम मात्र ही गिना जाता हैं . विशेष प्रकार के व्यायाम से आत्मा को एक विशेष उर्जा के द्वारा आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढाया जाता हैं , अलबत्ता   योग में भी विविध प्रकार हैं .
     जब इन दोनों प्रणालियों को , एक  विशेष प्रणाली खोजने के लिए एक साथ जोड़ा गया, तब वह मंत्र योग बना. इस प्रणाली में मंत्र जाप से निर्मित ध्वनि को , योग की विशेष तकनीक से जोड़ा गया. इससे कई सिद्धिया प्राप्त करना आसान हो गया. और इसमे भी आगे शोध कार्य हुआ. इसी दौरान ये  तथ्य सामने आया कि  कुछ विशेष तरीको से निर्मित ध्वनि की उर्जा, कुण्डलिनी में कोई विशेष चक्र को स्पंदित करती  हैं . काल ज्ञान के विषय में, अनाहत चक्र जोकि ह्रदय पटल के पास स्थित हैं  वही काल ज्ञान को समेटे हुए हैं . और उन्होंने खोज की काल ज्ञान के लिए उपयुक्त  क्रिया की.इस प्रकार की पद्धतिया हमेशा ही गोपनीय रखी गयी, क्यूंकि इस प्रकार की प्रणाली को अभ्यास में लेने  के लिए गुरु की तरफ से शिष्यों को ये शर्त हुआ करती थी कि वो मूल दो प्रणालियों पूर्ण हो. जैसे  की यहाँ मन्त्र एवं योग. या तो गुरु शिष्य से अत्यंत खुश हैं  तो ही वो इस प्रकट की प्रक्रिया दे देते थे. इस प्रकार की प्रक्रियाए बहुत  आसान होती हे और रोजबरोज के जीवन में की जा सकती हैं . या फिर इसमें इसमे ज्यादा बाध्यता नहीं हैं . इस लिए ये गृहस्थो के लिए ज्यादा उपयुक्त हैं . मेरे देखने में आया हे कि  ऐसी  पद्धतिया गुरु अपने जीवन के आखरी क्षणों में अपने मुख्य शिष्य को देते रहे हैं  या फिर कुछ इसे इंसानों को जो की उनके ज्यादा नजदीक रहे हो. में आप लोगो के सामने एक इसी ही प्रक्रिया रख रहा हूँ .


      कुछ दिनों तक पूरक कुम्भक रेचक का अभ्यास करे. मतलब की सांस अन्दर खींचना अन्दर रोकना और फिर बाहर  निकलना. जितना हो सके उतना लम्बी प्रक्रिया हो मगर कोई बलपूर्वक प्रयास  नहीं. कुछ दिनों में ये क्रिया प्राकृतिक हो जाएगी.

इसके बाद नीचे  दी गयी क्रिया का अभ्यास  प्रारंभ करना चाहिए

पूरक करते वक्त बीज मंत्र " ह्रीं " का उच्चारण करे .
कुम्भक करते वक्त बीज मंत्र " ह्रां " का उच्चारण करे .
रेचक करते वक्त बीज मंत्र " ह्रूं " का उच्चारण करे
.

कुछ दिनों तक मन ही मन जाप होना चाहिए. फिर अभ्यास  हो जाने के बाद उच्चारण भी हो ,अभ्यास से यह सहज संभव हो जाएगा.

आँखे बंद होनी चाहिए और अनाहत चक्र पर ध्यान करे. कुछ समय बाद आपको कई द्रश्य दिखने लगेंगे जो की आपने पहले कभी नहीं देखे होंगे. इसी का अभ्यास आगे करते रहने अनाहत चक्र जाग्रत होने से आप काल खंड के किसी भी क्षण को पकड़ के देख सकते हैं .     
****************************
       Our ancient sages were real scholars of the science whose basic aim was to make invention through which the mankind can attain total happiness or the magnifying joy termed as “Anand” in the scriptures. Mean while they developed particular systems for the path of spirituality which lay the option of comfortable selection according to one’s nature.

                In this regard’s total 108 system were been designed like Mantra, Tantra, Yoga, Dhayana, Darshana, Yagna, Paarad, Sury Siddhant etc. these were the particular branches leading to the same goal with different ways. As one is independent with differentiation of thoughts and way of conduct to live the life, they can select particular path in which they do attend a spiritual goal with best of the comfort.

But when the time passed, more research had been carried out by our Maharishis. They made a core balance between these systems and started innovating best possible systems, which can give quick and best results. Meanwhile they started combining various methods with each other and it gave a birth to very new and effective systems.

            For example Sury Vigyan was complete science of atoms. When it was applied a bled with tantra it became easier. And a new way was found in which the lens used for Sury Vigyan was not required and the atoms of matters could be change with medium of eyes only, it became sury vigyan tantra. The same goes for Paarad Tantra, when paarad vigyan was combined with various tantrik processes, it became easier to handle paarad and take benefit of it.

In all Indian spiritual system, the most famous systems to everyone had remained Mantra and Yoga, though both are very different from each other. Mantra is science of Sounds only. Our ear can hear sounds up to some decibels, but sound is everywhere rather we can hear it or not, and sound do prepare a particular energy vibration. This way, particular sound prepares a particular energy and combining various sounds it gives a set of specific energy. This is the actual concept of Mantra Vigyan. On the other side, Yoga deals with spiritual attainment with the help of body. In Yoga system body is counted as medium only. With particular exercise they generate energy in the body with leads a soul to the spiritual way. Well, in yoga even we have various types.

         When this both science were combined for to invent a new system, it became Mantra Yoga. In this system, energy of the sound generated through specific chanting was combined with various yoga techniques. This made various accomplishments easy to achieve. Again they went deep and started researching more.

This way, they found that with some methods a vibration could be generated to activate particular chakra of Kundalini. In regards of kaal gyan, it is found that Anahat Chakra situated to side of Heart is the main holder of Kaal. And they innovated special method for Kaal Gyan.

Such exercises and Processes had always remained secret; because, to go through with such process, there was a condition for the disciples to master in both the sciences. Like in this case Mantra and Yoga. Or else if Guru is very pleased with disciple he will provide such process. Such processes are very easy in nature to perform and can be added into day to day life. Or else there are very less boundaries. It makes it very easy for householders. I have seen many yogis to give such process at very last time of their life to the chief disciples or to particular people which had been in very touch of them. One of such process I am sharing with you all.
……………………………………………………
One should practice Poorak, Khumbhak and rechak of Yoga for some days. Simply to breath-in, Hold and Breath-out, but one should do it as long as they can and with no force at all. In some days it became very natural to do this.

After that one should follow the particular practice.

When Doing poorak Chant beej Mantra “Hreem”.
At the time of Khumbhak  chant “ Hraam”
At the time of Rechak chant “ Hroom”

In practice first you can chant in Mind, then practicing it for some days, you chant it with mouth.
The eyes should be closed and concentration should be at anahat chakra with in. slowly you will start watching various scenes which previously you have not seen. Practicing it make you catch any moment of any tense and you will be able to see anything you desire when Anahat chakra becomes activated.


****NPRU****

1 comment:

Registered User said...

Many thanks for sharing it here.