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Friday, June 10, 2011

RAS TANTRA ME ASAFALTA KA KAARAN


रस शास्त्र कोई कपोल कल्पना नहीं है और न ही ये कोई मिथ्या है,सर्व शक्ति मान पारद की वेध क्षमता अनंत है. तभी तो आनंद कन्द , रसोपनिषद, रसरत्नाकर , रसार्णव,रसह्रदय तंत्र आदि अनेक ग्रंथों में उसकी श्रृंखला पद्धति का वर्णन दिया गया है, रस शास्त्र के ज्ञान से धातुवाद और देहवाद की सिद्धि होती है इसका विवरण वेदों में दिया गया है, यहाँ तक की जिस श्रीसूक्त का पाठ हम लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए करते हैं, वस्तुतः वो धरुवाद को सिद्ध करते की कूट विधियाँ हैं, रस मर्मज्ञों के मध्य इस सूक्त के ५४ अर्थ प्रचलित हैं . मैं इस श्री सूक्त में से मात्र एक श्लोक का अर्थ उदाहरण स्वरुप यहाँ पर दे रहा हूँ.
     आदित्य वर्णे तपसोऽधिजातो,वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः .
    तस्य फलानि तपसा नुदन्तु मायान्तरा याश्च बाह्या अलक्ष्मीः.
 इसके तात्विक अर्थ पर जरा ध्यान दीजिए –
“ हे अग्निदेव, हे भगवान सूर्य आप मुझे उस क्रिया में पूर्ण सफलता प्राप्त होने का आशीर्वाद और ज्ञान दीजिए जो की सभी वनस्पतियों और वृक्षों में सर्वश्रेष्ट बिल्व (बेल फल) रस के द्वारा ताम्र आदि धातुओं को अग्नि में पुट पाक कर निर्दोष लक्ष्मी(स्वर्ण,रजत) की प्राप्ति से सम्बंधित हैं. और जिसके द्वारा मैं अपने दुःख-दारिद्रय को दूर कर सकू.
(हालाँकि इसी श्लोक में वो गोपनीय पुट पाक की पद्धति भी दी हुयी है, पर यहाँ पर उसका उल्लेख करना हमारा ध्येय नहीं है.)
      सदगुरुदेव स्वयं यही बात हमेशा हमें समझाते थे की ये धातुवाद की क्रिया के रहस्यों का विवरण इतना सहज नहीं है की, गुरु के पास गए और उसने उठाकर दे दिया, पहले आप अपना समर्पण भी तो दिखाइए , आप तो आते हैं, घंटे दो घंटे या ज्यादा से ज्यादा २ दिन साथ में रहते हैं और ये अपेक्षा करते हैं की गुरु आपकी चाटुकारिता भरी बातों से प्रसन्न हो जाये और आपको वो गोपनीय कुंजी आपके हाथ में पकड़ा दे और आप उसे लेकर अपना कर्जा दूर कर दे. और ऐश्वर्य के चरम शिखर पर पहुच जाये .
   मुझे भी अपने जीवन में ऐसे ही लोग मिले हैं, उनका लेना देना ज्ञान से नहीं है, वो ये नहीं समझते हैं की गुरु सेवा के नाम पर पहले अपने जीवन को ऐश्वर्य से मुक्त करेंगे फिर गुरुसेवा के लिए समय और साधन देंगे जैसी बातों से बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता. इस शास्त्र को समझने के लिए लगातार धैर्य और उत्सुकता का चरम भाव बनाये रखा जाता है. इस ज्ञान को तो प्रायोगिक रूप से बैठकर ही समझा जा सकता है और यदि कोई इस ज्ञान को देना चाहता है तो फिर वो जब बुलाए, जहाँ बुलाए वहाँ पहुचना ही चाहिए , क्यूंकि जो विशुद्ध नहीं होगा उसको ये विद्या फलीभूत भी नहीं होती.इसलिए लगातार खुद को मांजते रहना चाहिए.
 किन कारणों से इस विद्या में सफलता नहीं मिल पाती, इन पृष्ठों पर मैं आज उन्ही कारणों का वर्णन कर रहा हूँ-
अनुभव शुन्य क्रिया करने से,जो क्रिया समझाई गयी हो उसे पूरी तरह से न करने से,अस्थिर चित्त से क्रिया करने से,शास्त्रों के वाक्य में विश्वास न करके मन से क्रिया करने से, ये क्रिया उन लोगो को भी फलीभूत नहीं होती जिनमे हानि झेलने का सहस नहीं होता या जिनके पास इस क्रिया के लिए पर्याप्त धन का आभाव हो,बिना सदगुरुदेवके आशीर्वाद और मार्गदर्शक के क्रिया करने से,समय पर आवश्यक औषधि और पदार्थ न मिलने से,किसी भी पदार्थ का सही ज्ञान न होने से और उसकी जगह उसका विकल्प प्रयोग करने से, गुरु या दैवीय कोप से, यदि गुरु असंतुष्ट है तो भी ये क्रिया नहीं हो सकती,आलस्य का जोर होने से, पूर्वजन्म के पापों की प्रबलता से,इन्द्रिय भोगो में व्यस्त रहने से, चरित्र की कमजोरी से, गुरु के साहचर्य में ना होने से मन्त्र और रस सिद्धि की कोई क्रिया नहीं हो सकती.
    जिनके पास संसाधन और धन की उचित व्यव्च्स्था नहीं है उन्हें बिलकुल भी इस क्षेत्र में प्रयास नहीं करना चाहिए.ये क्रियाएँ लगातार ज्ञान अर्जन करने से ही सिद्ध हो सकती हैं. इसलिए पहले आत्म अवलोकन करके ही एआगे बढ़ना चाहि

Ras Tantra and the causes of failure in that,well Ras Shastra is not fiction science nor a cheek that is a misnomer, All power is infinite potential value perforation of mercury. Many works have been described in the series like Anand Kand, Rasoupnishad, Rasratnakar, Rasarnav, Rashriday Tantra, from the Ras shastra the knowledge of Dhatuvad and Dehvad accomplishment is done.The details are given in the Vedas, actually these are the texts which proved the code metheods of Dhatuvad. Between Ras Scholars 54 meanings of that are very publicised and famous. Out of these facts I m giving a meaning of only one of the shlokas from it as an example.

"Adityay Varne tapasoudhijato,vanaspati vrikshouth bilva:
Tasya Phalani tapasaa nudantu mayantara yashch baahya alakshmi:"

  Just pay attention to its intrinsic meaning - "Oh Lord of Fire, Sun God you please bow me the blessings of success in that action and knowledge above all plants and trees  and the best among them i.e. the best Bilv (Bell) fruit juice which converts the metals copper by fire to put in baking and produce an innocent Laxmi (Gold, Silver) are associated with the receipt and by which I can finish away all my sorrows and pains (Although the same stuff that put confidential in this shlokas given the method of baking, but our goal is not to mention that it here.)

    We were always been told the same thing by Sadgurudev, that the detail secrets of this Dhatuvad action is not so comfortable, easy and even not that casual that u ask for it to master & he would give u. First we must show our urge, desire, dedication and of course seriousness for achieving it. If you come, for an hour or two hours with more than 2 days to live and then expect the things to shapeup as you wann it ! Then you try to please the master by buttering him and you ll get that secret key held in your hand and you took it away to pay off your debts and ultimately would reach at the peak of prosperity??? No no no....  

I also found the similar people who have nothing to do with the knowledge, And they cannot make fool of their masters by giving such stupid statements that on account of master service u will enjoy the worldly leisure and master would not be able to see this? Hnnaaa…. No dear it is not at all like that... You know what any single action is not hidden from our Master's eyes. So to understand these scriptures constantly need to be extremely patient and a sense of curiosity is need to maintained. This knowledge can then be understood and treated as practically sitting and then someone wants to give this knowledge, whenever he call you, as called there u must reach to learn it promptly. Because whosoever will be pure can get this knowledge and fruits of it. Which are those reasons due to which we do not get success in this discipline, these lines would describe the reasons as:
By the zero action experiment (Anubhav Shunya Kriya) what actions have been explained not to let it all out, the unstable mind of the action, Scriptures of the sentence by not believe in the mind to action, these actions of people who would also not fructify. Of whom would not withstand the losses or who lack sufficient funds for this performing this activity, without Sadgurudev’s blessing and guidence action, the time not getting the necessary herbs, medicines and materials, the absence of any accurate knowledge of material and his choice to use his place, the master or divine anger, even if you master this action cannot be dissatisfied, of laziness emphasis, from being predominantly of the sins of Past life, character weakness, not being master of the mantra of the association and cannot give the accomplishment in Ras shastra nor can any action be perform.
Well who do not have appropriate resources & money should not step forward or attempt these activities of this field. These actions may prove to be the constant acquisition of knowledge and observation. Therefore one should proceed it only after the first self-observation stage.
****NPRU****

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